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हैरी पॉटर और हमारी दुनिया | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभी जब हिंदी के कई विद्वानों की खुमारी अंपायर बिल्डिंग की ऊँचाई से उतरी नहीं होगी, दुनिया भर के हज़ारों लोग घंटों-घंटों कतार में खड़े हुए अंग्रेज़ी की एक किताब ख़रीद रहे हैं. लाखों ने बहुत पहले से इसकी प्रति आरक्षित करवा रखी थी तो कुछ लोग इसे तत्काल ख़रीदकर ले जाना चाहते हैं. दुनिया भर के लोगों को छोड़ दें, भारत को ही लें. यहाँ भी इस किताब की दो लाख 40 हज़ार प्रतियों की एडवांस बुकिंग हो चुकी थी. और पूरा भारत ही क्यों, मध्य और उत्तरी भारत को लें जिसे हिंदी-प्रदेश कहा जाता है. तो यहाँ भी किताब को लेकर उत्सुकता कम नहीं है. हिंदी प्रदेश के हज़ारों लोग हैरी पॉटर की किताब पढ़ने के लिए महीनों से प्रतीक्षा कर रहे हैं. पिछले कुछ दिनों से उनकी चर्चा के विषयों में यह भी शामिल है कि हैरी पॉटर का क्या होने जा रहा है. हैरी पॉटर श्रृंखला की इस आख़िरी किताब की ब्रिक्री से जुड़े लोग आश्वस्त हैं कि इसी हिंदी प्रदेश में हैरी पॉटर की लाख-डेढ़ लाख प्रतियाँ अगले एक महीने में आसानी से बिक जाएँगीं. अंग्रेज़ी में छपने वाली इस किताब की हिंदी प्रतियों को लेकर भी दीवानगी कम नहीं है. इससे पहले आई हैरी पॉटर की किताबों का हिंदी अनुवाद हाथों-हाथ लिया गया था और हज़ारों प्रतियाँ बिकी थीं. पता नहीं हिंदी के विद्वानों के मन में यह देखकर कैसे भाव उपजते हैं? पता नहीं वे अपने चिंतन में ऐसी तुच्छ चीज़ों को कोई तवज्जो देते हैं या नहीं? यह भी नहीं पता कि हिंदी के प्रकाशकों के मन में हैरी पॉटर के प्रति दीवानगी देखकर कोई कौतुक जागता है या नहीं? लेकिन हिंदी का एक साधारण पाठक होने के नाते मेरे मन में कई सवाल उपजते हैं. यदि हज़ारों प्रतियाँ हैरी पॉटर की बिक सकती हैं तो क्यों हिंदी का प्रकाशक किसी भी लेखक की किताब की पाँच सौ प्रतियाँ छापता है और बहुत अधिक हो गया तो 11 सौ प्रतियाँ? जैसा कि एक बार कृष्ण कुमार ने कहा था कि यदि हिंदी के किसी लेखक की एक किताब की 11 सौ प्रतियाँ बिक जाती हैं तो वह प्रकाशक उसे हिंदी का बड़ा लेखक मान लेता है. इसी तरह केरल में हिंदी पर काम करने वाले डॉ आरसू ने एक बार बताया था कि मलयामल में अगर एक स्तरीय किताब प्रकाशित होती है तो उसका प्रिंट-ऑर्डर कम से कम पाँच हज़ार होता है. तो हिंदी के प्रकाशन की दुनिया में इतनी बेचारगी क्यों है?
हैरी पॉटर की बिक्री बताती है कि हिंदी के पाठक तो हैं. उनमें पढ़ने की उत्सुकता भी है. तो फिर क्यों हिंदी के अच्छे लेखकों की किताबें नहीं बिकतीं? हो सकता है कि कुछ प्रकाशक यह तर्क लेकर हाज़िर हो जाएँ कि कभी 'झील के उस पार' बहुत बिकी थी और हाल ही में 'वर्दी वाला गुंडा' की लाखी प्रतियाँ बिकी हैं. लेकिन तब यह सवाल प्रासंगिक होगा कि क्या 'वर्दी वाला गुंडा' हिंदी के रचना संसार को स्वीकार्य हैं? क्या हिंदी का कोई साहित्यकार इसे रचना मानने को तैयार है? क्या एक पढ़ा-लिखा परिवार इस तरह की किताबों को अपने घर की आलमारियों में सजाकर रखने की हिम्मत रखता है? वैसे कहने को धर्मवीर भारती का 'गुनाहों का देवता' और शिवाजी सावंत की हिंदी में अनुदित किताब 'मृत्युंजय' है, जिनके संस्करण पर संस्करण निकलते आ रहे हैं. लेकिन ऐसे उदाहरण कितने हैं? हैरी पॉटर की भारत में बिक्री की ज़िम्मेदारी संभाल रहे लोग मानते हैं कि किताबों की बिक्री के पीछे मार्केटिंग का बड़ा हाथ है. ‘वर्दी वाला गुंडा’ के प्रकाशकों ने भी माना था कि उन्होंने बसों के पीछे पोस्टर चिपकाने से लेकर सिनेमा हॉल में स्लाइट दिखाने तक प्रचार में लाखों खर्च किए थे. तो अगर किताब बिकने की यही शर्त है तो क्यों हिंदी के प्रकाशक अच्छी किताबों का प्रचार प्रसार नहीं करते? साहित्यिक पत्रिकाओं के हाशिए में प्रकाशित होने वाले इक्का दुक्का विज्ञापनों के अलावा किसी प्रकाशक का कोई विज्ञापन क्यों दिखाई नहीं देता? ऐसा तो नहीं है कि हिंदी का प्रकाशक कमाई नहीं कर रहा है, उनकी कोठियाँ तो बड़ी होती जा रही हैं और उनकी गाड़ियों का आकार-प्रकार बदलता जा रहा है. ऐसा अपवाद स्वरूप ही होता है कि हिंदी का कोई प्रकाशक लेखक को रॉयल्टी का कोई हिसाब भेजता हो. अब तो लेखकों को इसकी उम्मीद भी नहीं होती और छोटे शहरों में तो प्रकाशक लेखक से पैसे, या किसी अन्य प्रकाशन के लिए विज्ञापन लेकर, किताबें छापने लगे हैं. क्यों ऐसी स्थिति है कि हिंदी का एक लेखक पहले तो रचना की पीड़ा से गुज़रता है, फिर प्रकाशक के शोषण जाल में फँसता है और फिर प्रयास पूर्वक उसकी समीक्षाएँ करवाता है? और आख़िर में प्रकाशक से अपने खाते की किताबें लेकर ‘सुधी पाठकों’ तक भिजवाता है कि कुछ ‘अच्छे लोग’ उसे पढ़ सकें. और फिर वही लेखक अपनी किताब को भूल जाता है. क्यों हिंदी का पाठक हिंदी के किसी लेखक की किताब की प्रतीक्षा नहीं करता? क्यों वह अपने लेखक को वैसा मान सम्मान नहीं देता जैसा दूसरी भाषा के लोग अपने लेखक-कवि को देते हैं? क्या हमारा समाज कृतघ्न समाज है जो अपने लेखकों और कवियों को महत्व नहीं देता? अभी बहुत दिन नहीं हुए जब टेलीविज़न पर मार्क़ेज़ के अपने गृहनगर लौटने के दृश्य दिखाए गए थे. जब वे ट्रेन पर सवार होकर वहाँ पहुँचे तो पटरी के किनारे सैकड़ों लोग उनके स्वागत को खडे़ थे. मार्क़ेज़ कोई अभिनेता नहीं हैं, न राजनेता. न वह भीड़ प्रायोजित दिखती थी. लोग उन्हें पहचानते हैं और उनको मान देते हैं. उनके होने पर गर्व करते हैं. क्या हमारे किसी लेखक का ऐसा कोई मान है? हमारे समाज में तो लेखक या साहित्यकार होना, एक अदने आदमी से और तुच्छ हो जाने की तरह होता है. शायद यही कारण है कि कवि-उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल ने एक बार कहा था कि वे अपना परिचय कवि के रुप में देने से बचते हैं. अक्सर ख़बरें छपती हैं कि फलाँ लेखक या फलाँ कवि गुमनामी में दिन काट रहा है या उनके परिजनों को खाने के लाले पड़े हुए हैं. हिंदी की चिंता चाहे अमरीका जाकर करें या फिर ब्रिटेन जाकर या फिर त्रिनिडाड जाकर लेकिन हम अच्छी तरह जानते हैं कि चिंता के विषयों में हिंदी के इन सवालों का कोई ज़िक्र नहीं होता. शायद यह ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसका सामना करने में हमें डर लगता है. |
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