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'बाइप्रोडक्ट' की तरह इतिहास रचना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सोनिया गांधी कह रही हैं कि प्रतिभा पाटिल का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना ऐतिहासिक है. यक़ीनन एक महिला का राष्ट्रपति पद तक पहुँच जाना एक आम भारतीय के लिए और एक लोकतंत्र के लिए इतिहास रचने जैसी ही बात है. लेकिन सवाल यह है कि अगर सोनिया गांधी और उनकी पार्टी को किसी महिला का राष्ट्रपति बनना ऐतिहासिक अवसर लगता है तो यह अवसर उन्होंने पिछली बार क्यों गँवा दिया था? पिछली बार वामपंथी दलों ने लक्ष्मी सहगल को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था. लेकिन तब सोनिया गाँधी और उनकी पार्टी को इतिहास रचना याद नहीं आया था. इसी कांग्रेस पार्टी को इतिहास रचने का मौक़ा तब तक याद नहीं आया था जब वह राष्ट्रपति पद के लिए शिवराज पाटिल को अपनी पहली पसंद बता रही थी और सारे सहयोगी दलों को इस नाम पर राज़ी करने की कोशिश कर रही थी. दूसरे और तीसरे और चौथे नामों में भी प्रतिभा पाटिल या निर्मला देशपांडे या मोहसिना किदवई का नाम नहीं था. तो क्या यह मान लिया जाए कि इतिहास रचना सोनिया गाँधी की पहली प्राथमिकता नहीं थी? इस तरह देखें तो इतिहास रचना वामपंथी दलों की प्राथमिकता में भी नहीं था. उन्होंने भी पसंद के जो नाम गिनाए थे, उनमें किसी महिला का नाम नहीं था. कहा जा रहा है कि आख़िर महिला का नाम सुझाने का प्रस्ताव उनकी ओर से ही आया लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का था. जिसका भी सुझाव हो, यह आया बहुत देर से. एनडीए की ओर से तो ख़ैर, इतिहास रचने या इतिहास रचने में भागीदार होने के संकेत नहीं ही हैं. सच तो यह है कि राजनीतिक परिस्थितियों या अंको के समीकरण के दबाव में लिए गए फ़ैसले के ‘बाइप्रोडक्ट’ की तरह इतिहास रचा जा रहा है. इतिहास रचने की मंशा थी नहीं लेकिन इतिहास रचा भी जा रहा है. और विडंबना है कि बिना संकोच इसका भी श्रेय लिया जा रहा है. रपट पड़े तो हर गंगे. दरअसल इतिहास रचने का दावा करने वाली यह पार्टियाँ कई बरसों से इतिहास रचने से कतराती घूम रही हैं. संसद में एकाधिक बार महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का विधेयक पेश होकर कालातीत हो चुका है लेकिन कोई सहमति नहीं बन रही है. भारतीय जनता पार्टी भी दावा करती रही है कि वह महिलाओं को आरक्षण देना चाहती है. कांग्रेस भी कथित रुप से चाहती है कि महिलाओं को आरक्षण मिले. वामदल इस मामले में ख़ुद को सबसे प्रगतिशील मानते हैं. लेकिन बरसों-बरस तक इस एक मसले पर आमसहमति का बहाना बनाकर मामला टलता रहता है. महिलाओं को टिकट देना और पद देना राजनीतिक दलों के लिए एक तरह से दिखावा भर रह गया है, जिसे ‘टोकनिज़्म’ कहा जाता है. वे एक अपवाद पेश करते हैं और फिर चाहते हैं कि लोग उसी की खुमारी में जीते रहें. अच्छा है कि इसी देश में अपने दम-ख़म पर पहचान बनाने वाली और इतिहास रचने वाली महिलाएँ पहले से रही हैं और अभी भी हैं. इस देश ने एक महिला को प्रधानमंत्री के रुप में देखा है. कई राज्यों में महिलाएँ मुख्यमंत्री रही हैं और हैं. अगर अच्छे-बुरे की बहस में न पड़ें, उनके कार्यकाल के विवादों का मुद्दा रहने दें तो ये कुछ महिलाएँ अपने-अपने राज्य में अपनी-अपनी पार्टियों की दमदार और दबंग नेता रही हैं और हैं. भारत का राजनीतिक समाज अभी भी महिलाओं को लेकर सहिष्णु नहीं है क्योंकि भारत का नागरिक समाज महिलाओं को लेकर बहुत कुँठाओं में है. अब तक भारतीय इतिहास में जो कुछ दर्ज है वह इस समाज का दिया हुआ कम, अपने दम-ख़म पर उनका हासिल किया हुआ ज़्यादा है. असली इतिहास तो उस दिन रचा जाएगा जिस दिन ‘रपट पड़े तो हर गंगे’ नहीं होगा और इतिहास बाइप्रोडक्ट की तरह नहीं रचा जाएगा, इतिहास रचने की मंशा के साथ इतिहास रचा जाएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें तेरा, मेरा, उसका मानवाधिकार08 जून, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस कोसल में विचारों की कमी26 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस अभिव्यक्ति की एकतरफ़ा स्वतंत्रता22 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस सबसे तेज़, सबसे आगे या....सबसे पीछे12 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस प्रेस की ज़िम्मेदारी का भी सवाल03 मई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस डिज़ाइनर मेहंदी का रंग...27 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस एक यादगार शहर की यादें...27 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस मुँह खोलने की आदत ज़रूरी20 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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