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शुक्रवार, 29 जून, 2007 को 12:44 GMT तक के समाचार
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अपमान से बचाने के लिए...

हिंदी
भारत सरकार यूँ तो कम ही काम हिंदी भाषा में करती है. लेकिन विदेश मंत्रालय एक ऐसा मंत्रालय है जिसका वास्ता इस भाषा से कमतर ही पड़ता है

अगर अतिशयोक्ति न लगे तो कहा जा सकता है कि हिंदी से विदेश मंत्रालय का वास्ता दो ही बार पड़ता है. एक बार राजभाषा सप्ताह मनाते हुए, दूसरे विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन करते हुए.

इस बार विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन अमरीका में होने जा रहा है. और कथित रुप से हिंदी की सेवा में लगे 'विद्वानों' की बाँछें खिली हुई हैं. सरकारी ख़र्चे-पानी पर न्यूयॉर्क जाना है.

आश्चर्य है कि सरकारें बदलती हैं तो हिंदी के सेवक भी बदल जाते हैं. हिंदी का विद्वान होने की परिभाषा बदल जाती है और हिंदी के प्रति उनका योगदान बदल जाता है.

उदाहरण के तौर पर एनडीए की सरकार में जो लोग विद्वान माने गए थे वे इस बार वामदल समर्थित यूपीए की सरकार में हिंदी के पिद्दी तक नहीं माने जा रहे हैं. जो लोग पिछली बार हाशिए पर थे अब वे ज्ञानियों की सूची में हैं.

आयोजकों के पौ बारह हैं. एक मंचीय युवाकवि का दावा है कि आयोजन समिति के एक सदस्य ने फ़ोन किया था कि वह भी न्यूयॉर्क चलें. मना करने पर कहा गया कि 'बहुत से चिरकुट चल रहे हैं' तो वे भी क्यों नहीं चल लेते. कवि महोदय का यह भी दावा था कि उन्होंने चिरकुटों में शुमार होने से इनकार कर दिया है. अलबत्ता उन्होंने यह ज़रुर बताया कि आयोजकों में से एक साहब की निजी सचिव इस आयोजन में शामिल होने के लिए किस तरह से ‘इंटरनेट पर हिंदी’ विषय की विदुषी बना दी गई हैं.

चाहे वह लंदन में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हो या त्रिनिडाड में. हर आयोजन के बाद के पंद्रह दिनों में ‘साहित्यकारों’ की महफ़िलों में जाने का मौक़ा मिल जाए तो पता चलता है कि किसने क्या-क्या गुल खिलाए हैं. और पता चलता है कि किस तरह हिंदी के अलावा सब कुछ उनके ज़हन में था.

अशोक वाजपेयी ने थोड़ ही दिनों पहले जनसत्ता में प्रकाशित होने वाले अपने साप्ताहिक कॉलम में कई प्रासंगिक सवाल उठाए थे. उनमें सबसे अहम सवाल यह था कि क्यों विदेश मंत्रालय इस सम्मेलन का आयोजन करता है और यदि करता भी है तो विदेशों में ही क्यों करता है? उन्होंने सुझाव दिए थे कि यदि इस आयोजन का पैसा कुछ अच्छे शोध कार्यों, संदर्भ ग्रंथ बनाने और शब्दकोश बनाने के लिए दे दिया जाता तो हिंदी का ज़्यादा भला होता.

लेकिन ऐसे सुझाव सरकारों को समझ में नहीं आते. आयोजन करने वालों को क़रीब से देखें तो पता चलता है कि सरकारें इसे अपनी-अपनी विचारधारा से जुड़े कथित बुद्धिजीवियों को उपकृत करने के मौक़े की तरह देखती हैं.

अपवाद स्वरुप ही होता है कि सुपात्रों को इस तरह के सम्मेलन का न्यौता मिलता है. लेकिन सच यह है कि सुपात्रों को इस सम्मेलन से लौटते-लौटते कोफ़्त होने लगती है कि हिंदी के उत्थान के ऐसे प्रयासों में वे क्यों भागीदार बन गए.

ख़बरें हैं कि इस बार विश्व हिंदी सम्मेलन में माँग उठाई जाएगी कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में कामकाज की भाषा में शामिल किया जाए. कहा जाए कि यह हास्यास्पद माँग है तो हिंदी के कई हितैषियों को बुरा लग सकता है. लेकिन सच यही है.

भारत सरकार तो हिंदी में काम कर नहीं पा रही है. सरकार का सारा काम अंग्रेज़ी में होता है और फिर सरकारी अनुवादक उसका सबसे कठिन और अटपटी हिंदी में अनुवाद करते हैं ताकि हिंदी की राजभाषा होने की लाज बची रहे. हिंदी के जो विद्वान भारत सरकार हिंदी में काम करने के लिए राज़ी नहीं कर पा रहे हैं वे संयुक्त राष्ट्र को इसके लिए राज़ी करवाना चाहते हैं. वहाँ भी अनुवादकों का भारी भरकम खर्च शुरु करने और थोथे गर्व के अलावा इससे क्या हासिल होगा नहीं पता.

विश्व हिंदी सम्मेलनों से न तो हिंदी की किताबों की बिक्री पर फ़र्क पड़ने वाला है और न हिंदी के प्रकाशकों की टेड़ी दुम सीधी करने का रास्ता निकलने वाला है. हिंदी के लेखक ऐसे अनगिनत सम्मेलनों के बाद भी ग़रीब और बेचारे रहने वाले हैं और हिंदी की पत्रिकाएँ फिर भी उन्हें मानदेय भिजवाने में असमर्थ रहने वाली हैं.

ज़रुरत है कि नीतिगत निर्णय लेते हुए इन सम्मेलनों को बंद कर दिया जाए और सरकारी विभागों में हर साल मनाया जाने वाला राजभाषा सप्ताह हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए. हिंदी का मान बढ़े न बढ़े कम से कम अपमान तो न हो.

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