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रविवार, 30 मार्च, 2008 को 02:41 GMT तक के समाचार
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प्रिया दत्त के साथ एक मुलाक़ात

प्रिया दत्त
प्रिया दत्त अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इस हफ़्ते 'एक मुलाक़ात' में हमारे साथ हैं प्रिया दत्त जो एक जानेमाने परिवार से आती हैं और अब उस परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं.

प्रिया दत्त भारतीय राजनीति का युवा चेहरा हैं और लोगों को उनसे काफ़ी उम्मीदें हैं.

मैंने अभी आपके बारे में कहा कि आप परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं. इसके अलावा आपके ऊपर परिवार और अपने संसदीय क्षेत्र की भी ज़िम्मेदारी है. कभी सोचा है कि इनमें से सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी कौन सी है?

आज की तारीख़ में मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती है परिवार और काम के बीच सामंजस्य बैठाना. मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं. इससे आप सोच सकते हैं कि मेरे लिए कितनी कठिन चुनौती है. मुझे प्राथमिकता तय करके काम करना पड़ता है और निश्चित रूप से मेरे बच्चे और मेरा परिवार अभी मेरे लिए पहली प्राथमिकता है. लेकिन साथ ही जब संसदीय क्षेत्र की बात होती है तो मेरी ज़िम्मेदारी उसके प्रति भी कम नहीं है.

 आज की तारीख़ में मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती है परिवार और काम के बीच सामंजस्य बैठाना.मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं. इससे आप सोच सकते हैं कि मेरे लिए कितनी कठिन चुनौती है. मुझे प्राथमिकता तय करके काम करना पड़ता है और निश्चित रूप से मेरे बच्चे और मेरा परिवार अभी मेरे लिए पहली प्राथमिकता है.

इस मामले में पुरुष सौभाग्यशाली होते हैं, क्योंकि उन्हें परिवार संभालने की चिंता नहीं करनी पड़ती है

ठीक कह रहे हैं आप और यही वजह है कि महिलाएं बहुत से क्षेत्रों में आगे नहीं आ पाती हैं. हम कहते हैं कि राजनीति में बहुत महिलाएं नहीं आ रही हैं लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिए कि इस तरह के क्षेत्र में पूरा समर्पण देना पड़ता है, यह सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे की ड्यूटी की तरह नहीं है.

मैं अपने पति से हमेशा कहती हूँ कि आप दिनभर ऑफ़िस में काम करते हैं और घर आने के बाद चाहते हैं कि कोई आपके आराम में खलल न डाले लेकिन दुर्भाग्य से महिलाओं के साथ ऐसा नहीं होता.

आप सुनील दत्त और नर्गिस की बेटी हैं, आपने अपनी बहन के साथ मिलकर उनके बारे में एक किताब भी लिखी है. दत्त परिवार का हिस्सा होना कैसा लगता है?

हमलोगों का जीवन बहुत सामान्य था. मैं अपने माता-पिता की तीसरी संतान थी. बहुत से लोग तो जानते भी नहीं थे कि मेरे माता-पिता की कोई तीसरी संतान भी है. लोग मेरे बारे में पदयात्रा के बाद जानने लगे. इसके बाद लोगों की उम्मीदें मुझसे बढ़ गईं और मीडिया की भी नज़र मुझ पर पड़ गई. मैं उस समय सिर्फ़ 21 साल की थी और सामान्य ज़िंदगी जीना चाहती थी.

इसलिए मैं न्यूयॉर्क चली गई और वहाँ टेलीविज़न प्रोडक्शन का कोर्स किया. मैं खोजी पत्रकार बनना चाहती थी. न्यूयॉर्क से लौटने के बाद मैंने अपनी माँ के ऊपर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाई और फिर बाल वेश्यावृत्ति पर स्क्रिप्ट लिखी. मैं अपने में ख़ुश रहने वाली इंसान थी और मुझे कभी यह चाह नहीं थी कि सुर्खियों में रहूँ.

अपने मम्मी-पापा में से किसकी लाडली थीं?

जब मेरी माँ ज़िदा थीं तो लोग कहते थे कि प्रिया अपनी माँ के पल्लू पकड़े रहती है क्योंकि मैं उनके साथ हर जगह जाती थी. उस समय मेरे भाई और बहन बड़े हो चुके थे और दोनों अपने दोस्तों के साथ मशगूल रहते थे. इसलिए मैं ही हमेशा माँ के साथ रहती थी और उन्हें मुझसे बहुत लगाव था. जब मैं 13 साल की थी तो मम्मी गुजर गईं. हम तीनों में से पिताजी के साथ भी सबसे ज़्यादा वक़्त मैं ही रही. पिताजी के साथ मेरे संबंध हमेशा से बहुत अच्छे थे लेकिन पदयात्रा के दौरान मैं उनके और क़रीब आ गई.

कितने दिनों की पदयात्रा थी?

78 दिनों की. पदयात्रा के दौरान मैंने अपने पिताजी का दूसरा रूप देखा. इससे पहले उनका सिर्फ़ एक पिता का रूप देखा था लेकिन पदयात्रा के दौरान यह जान सकी कि वो कैसे इंसान हैं और लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं. इस पदयात्रा ने मेरी ज़िंदगी बदल दी और कई मायनों में मेरे लिए टर्निग प्वाइंट साबित हुई.

राजनीति में मेरे पिता एक ऐसे आदमी थे जो चाहते थे कि उनके साथ काम करने वाले लोग उनसे भी ऊपर जाएं. मैं दो साल से राजनीति में हूँ और जानती हूँ कि यहाँ लोग बिना कारण दुश्मन बन जाते हैं. लोग हमेशा कोशिश करते हैं कि किसी को आगे न निकलने दें. लोगों में असुरक्षा का भाव बहुत ज़्यादा है. लेकिन मेरे पिता एकदम इसके उलट थे. वे लोगों की सेवा और जीवन से एकदम संतुष्ट थे.

 राजनीति में मेरे पिता एक ऐसे आदमी थे जो चाहते थे कि उनके साथ काम करने वाले लोग उनसे भी ऊपर जाएं. मैं दो साल से राजनीति में हूँ और जानती हूँ कि यहाँ लोग बिना कारण दुश्मन बन जाते हैं. लोग हमेशा कोशिश करते हैं कि किसी को आगे न निकलने दें. लोगों में असुरक्षा का भाव बहुत ज़्यादा है.

क्या आप ख़ुद को असुरक्षित महसूस करती हैं? क्या कभी लगता है कि कोई आगे न निकल जाए?

जैसे कि मैंने आपको पहले भी कहा कि मैं राजनीति में परिस्थितिवश आ गई. कभी भी सत्ता और पैसे की चाह रही नहीं. इसकी वजह शायद मेरी परवरिश और पिता के साथ गुजरा लंबा वक़्त है. मैंने देखा है कि मेरे पिता कैसे लोगों के साथ काम करते थे. मुझे लगता है कि मेरे पिता की सोच मुझमें आ गई और इसलिए मै किसी भी चीज़ पर बहुत ज़्यादा निर्भर नहीं हूँ. कभी भी कुछ भी छोड़ सकती हूँ. इसलिए मुझमें असुरक्षा का भाव नहीं है.

आपकी माँ इतनी ख़ूबसूरत थीं, कभी उनकी फ़िल्में देखती थी?

बचपन में तो नहीं लेकिन बाद में उनकी फ़िल्में देखीं. हमें अंदाज़ा ही नहीं था कि वो कितनी बड़ी स्टार थीं. माँ हमलोगों के साथ इतनी सामान्य रहती थीं कि स्कूल के सारे कार्यक्रमों में आती थीं और साथ में पानीपूरी खाती थीं. उन्होंने कभी हमें यह महसूस नहीं होने दिया कि इतनी बड़ी स्टार नरगिस की बेटी हैं. ऐसा ही पापा के साथ भी रहा. हमलोगों की परवरिश किसी भी सामान्य बच्चों की तरह ही हुई.

मैं जब अपनी माँ पर फ़िल्म बना रही थी तब उनके व्यक्तित्व को जान सकी, क्योंकि उससे पहले मैं उन्हें सिर्फ एक माँ के रूप में ही जानती थी. वह अपने समय से काफ़ी आगे थीं.

हमलोग यह पढ़ते हुए बड़े हुए हैं कि कैसे सुनील दत्त साहब ने आग में कूदकर नरगिस की जान बचाई. कभी घर में लगा कि दोनों के बीच ज़बरदस्त प्रेम था?

दोनों ने कभी इसका प्रदर्शन नहीं किया लेकिन जब मम्मी बीमार पड़ गईं तो हमने देखा कि किस समर्पण के साथ पापा उनकी देखभाल करते थे. उन्होंने हर कुछ त्याग दिया और तब हमें महसूस हुआ कि दोनों में किस तरह का प्रेम था. वास्तव में हमें इससे यह भी पता चला कि प्यार किसे कहते हैं.

आपके परिवार ने काफ़ी मुश्किलों का सामना किया है लेकिन कई ख़ूबसूरत क्षण भी देखे हैं?

जी हाँ, ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं है. उतार-चढ़ाव तो सबके जीवन में आते हैं. जब लोगों के जीवन में उतार आता है तो लगता है कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है लेकिन दूसरों का दुख देखने के बाद लगता है कि मेरा दुख तो बहुत छोटा है. मुझे लगता है कि जैसी चुनौतियों का सामना हमने किया है वैसी ही चुनौतियां दूसरे के जीवन में भी होंगी लेकिन उनके पास उनका सामना करने के लिए उतने संसाधन नहीं होंगे जितने हमारे पास थे. मैं इसके लिए भगवान का शुक्रिया अदा करती हूँ.

आपकी बहन नम्रता की कुमार गौरव से शादी हुई हैं. नम्रता से कैसे संबंध हैं आपके?

हमलोग बचपन में बहुत झगड़ते थे लेकिन उनकी शादी के बाद हमलोग सबसे अच्छे दोस्त बन गए. माँ के गुज़रने के बाद उन्होंने इस परिवार के लिए बहुत त्याग किया. वो मुझसे पाँच साल बड़ी हैं लेकिन माँ की तरह देखभाल करती थीं. हम तीनों में वह सबसे समझदार हैं और हर काम को सलीके से करती हैं.

तो क्या आप भी उन्हीं की तरह होती जा रही हैं?

नहीं मैं तो बहुत ग़लतियां करती हूँ और ग़लतियों से सीखती हूँ. मैं थोड़ी जिद्दी भी हूँ. कई बार ऐसे फ़ैसले भी ले लेती हूँ जिससे मुझे नुक़सान होता है.

अब आपके भाई के बारे में बात करते है. संजय दत्त से जुड़ी सबसे प्यारी याद कौन सी है?

जब पापा गुजर गए तो हम सब सदमे में थे. एक महीने बाद हमलोग सब एक साथ एक बिल्डिंग में रहने लगे. इससे पहले लंबे समय से हमलोग साथ नहीं रह रहे थे क्योंकि भैया अलग रहते थे और काम में बहुत ज़्यादा व्यस्त रहते थे. दीदी की भी शादी हो गई थी और मैं पापा के काम में व्यस्त रहती थी. जब हम साथ रहने लगे तो भैया के मैं बहुत क़रीब हो गई. इस दौरान भैया ने पापा की कमी न खलने देने की पूरी कोशिश की. मुझे लगता है कि भैया के साथ ये समय सबसे यादगार रहे.

 भैया ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखा है और हम सबने उनको संभालने की कोशिश की है. भैया दिल के बहुत साफ़ हैं और उनकी ज़िदगी में कुछ भी छिपा हुआ नहीं है

भैया ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखा है और हम सबने उनको संभालने की कोशिश की है. हम सबलोग एक-दूसरे की ताकत रहे हैं. लेकिन तब पापा ज़िंदा थे और उनका मानना था कि हम सब मिलकर ही इसका सामना कर सकते है. भैया दिल के बहुत साफ़ हैं और उनकी ज़िंदगी में कुछ भी छिपा हुआ नहीं है.

आप दोनों बहनें इतनी समझदार हैं फिर भाई को खुली किताब कैसे बनने दिया?

भैया का स्वभाव शुरू से ऐसा ही रहा है. लोग इसका फ़ायदा भी उठाते हैं. मैं मानती हूँ कि कुछ लोग कठिनाइयों से गुजरने के बाद ही सीखते हैं और भैया का जीवन भी ऐसा ही है.

दुनिया संजय दत्त के बारे में कुछ भी सोचे लेकिन आप उन्हें कैसे देखती हैं?

बुरे वक़्त में आपा नहीं खोने वाले और मज़बूत इच्छाशक्ति की शख़्सियत हैं. लेकिन अब भी बचपना है जिसकी वजह से लोग फ़ायदा उठा लेते हैं. आप देख सकते हैं कि उनके जीवन में उतार- चढ़ाव ज़्यादा है लेकिन वो हर बार मज़बूती से वापसी करते हैं.

अगर उन्होंने ठान लिया है कि यह काम करना है तो वह करके ही मानेंगे. नहीं तो यह आसान नहीं है कि डेढ़ साल जेल में रहने के बाद कोई सबकुछ सामान्य कर ले और करियर की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगे. इसके बाद उन्हें फिर कुछ दिनों के लिए जेल जाना पड़ा और वो मुस्कुराते हुए बाहर निकले. ये किसी सामान्य आदमी के बूते की बात नहीं है.

आपको उनका मुन्नाभाई का चरित्र पसंद आया?

बहुत पसंद आया. मुझे लगता है कि वो सचमुच के मुन्नाभाई हो गए हैं. पापा का चरित्र तो इसमें बिल्कुल उनकी वास्तविक ज़िंदगी की तरह है.

प्रिया दत्त ख़ुद को कैसे देखती हैं?

मुझे लगता है कि मैं बहुत ही सीधी-सादी इंसान हूँ और लोगों से सामान्य व्यवहार की अपेक्षा रखती हूँ. मैं सबसे ज़्यादा ख़ुश तब रहती हूँ जब लोगों से जुड़ी रहती हूँ. राजनीति में आने के बावजूद मुझे प्रोटोकॉल और भाषण देने की आदत नहीं है. मुझे पापा के साथ काम करने का मौक़ा मिला था और इस वजह से मैं कुछ-कुछ उनकी तरह ही हूँ.

मैं इस तरह के पाखंड में विश्वास नहीं करती कि खादी का थैला लटकाकर घूमती रहूँ. मैं जीवन में अच्छी चीज़ें पसंद करती हूँ और अगर कुछ है तो उसे छिपाने में विश्वास नहीं करती. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मैं लोगों की तकलीफ़ नहीं समझती. मैं कॉलेज में भी थी तो ऐसी ही थी. मुझे तब कुछ भी पता नहीं होता था कि देश में क्या हो रहा है. जबकि आजकल के युवा बहुत जागरूक हैं और देश, समाज के बारे में बहुत कुछ जानते हैं. इससे उम्मीदें बंधती हैं.

फ़िल्म जगत से कुछ संपर्क रहता है?

मेरा कुछ ख़ास नहीं रहता है. भैया फ़िल्मी दुनिया का हिस्सा हैं इसलिए उनके साथ सबलोगों का संपर्क ज़्यादा रहता है.

अगर आप नेता नहीं होती और पत्रकार बनने के विकल्प को भी हटा दिया जाए तो क्या बनतीं?

समाज सेविका बनती. मैं नरगिस चैरिटेबल ट्रस्ट के लिए काम करती. हालांकि मैं मानती हूँ कि अब भी यही कर रही हूँ. राजनीति ने मुझे यह मौक़ा दिया है कि मैं बहुत सारे लोगों तक पहुँच सकूं. यही मेरे पिताजी भी करते थे. मैं पिताजी से कहती थी कि आप राजनीति छोड़ दीजिए लेकिन वो कहते थे कि देखो इसकी वजह से मुझे कितने लोगों की मदद करने का मौक़ा मिल रहा है.

समय रहे तो क्या करना पसंद करती हैं?

अपने बच्चों के साथ समय गुजारना और तरह-तरह का खाना खाने का शौक है. इसके अलावा मैं स्कूबा डाइवर हूँ. बहुत पहले मैंने स्कूबा डाइव का कोर्स किया था और उसके बाद हम हर साल मालद्वीप जाते थे. इधर पाँच सालों से समय नहीं मिल पाने की वजह से मैं स्कूबा डाइविंग नहीं कर पाई हूँ.

सुनील दत्त और संजय दत्त को छोड़ दें तो आपका पसंदीदा अभिनेता कौन हैं?

आमिर ख़ान. मैं उनके काम को पहली ही फ़िल्म ‘क़यामत से क़यामत तक’ से ही पसंद करती हूँ. दरअसल मुझे उनके काम करने की शैली बहुत पसंद है. वो जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और उसी हिसाब से काम करते हैं.

और आपकी पसंदीदा अभिनेत्री कौन हैं?

रानी मुखर्जी और तब्बू.

इस कार्यक्रम के ज़रिए अपने अनुभव के बारे में कुछ कहना चाहेंगी?

हमारे परिवार के बारे में लोग कहते हैं कि इस परिवार ने इतनी मुश्किलें देखी हैं और कैसे ये लोग इनका सामना मुस्कुराते हुए करते हैं. मैं कहना चाहूँगी कि जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और उनका सामना हमेशा इस मानसिकता के साथ करना चाहिए कि ये पल भी गुजर जाएंगे और अच्छा समय एक बार फिर आएगा.

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