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गुरुवार, 06 मार्च, 2008 को 20:33 GMT तक के समाचार
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टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाए

राज ठाकरे
राज ठाकरे ने अमिताभ बच्चन पर भी सवाल उठाए थे
विचारों में मतभेद स्वाभाविक है. लेकिन कई बार विचारों का अंधापन आपको ऐसे अंधेरे की ओर ले जाता है, जिसकी आप कल्पना नहीं करते.

इस बात को आप यूँ भी समझिए कई बार आप आँख बंद करके जिन विचारों की पैरवी करते हैं, वही आपके गले की फाँस भी बन जाते हैं.

इस बात का संदर्भ मैं आपको आगे बताऊँगा. लेकिन इससे पहले अपने एक क़रीबी के दिल का हाल आप लोगों ने बाँटना चाहता हूँ.

शिवसेना हो या फिर अपने को राष्ट्रवादी कहने वाली कोई और पार्टी या संगठन- मेरे एक जानने वाले इनके विचारों में ऐसे डूब जाते थे कि उनको समझाना मेरे लिए टेढ़ी खीर साबित होती थी.

अगर 'बाबर और उनके वंशजों' को ये पार्टियाँ बाहर वाला कहती हैं, तो क्या बुरा करती हैं....बाबरी मस्जिद को तोड़ना ही चाहिए था....ज़्यादातर चरमपंथी मुसलमान ही होते हैं.....और पता नहीं क्या-क्या.

आफत

लेकिन पिछले दिनों महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ, उसके बाद मेरे इस क़रीबी के विचार बदल गए हैं...क्यों...क्योंकि शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने उत्तर भारतीयों, बिहारियों को निशाना बनाना शुरू किया है और वे ख़ुद भी बिहार के हैं.

टैक्सीवालों पर भी गाज गिरी

अब गंभीर भाव से ही सही, वे मेरी बातों को समझने लगे हैं. समझते तो वे उस समय भी थे. लेकिन वे समझना नहीं चाहते थे. उनकी आँखों पर ऐसे विचारों की पट्टी बँधी थी, जो दूसरों की बातें सुनने में यक़ीन नहीं रखती.

ख़ैर मेरे क़रीबी की बात छोड़िए....उनकी सोचिए जो महाराष्ट्र की धरती से वर्षों से जुड़े हैं. जिनकी रोज़ी-रोटी पर आफत आ रही है. पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे ने विचारों का पासा फेंका, तो अब बाल ठाकरे घबराहट में उन्हीं विचारों की गर्मी से अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं.

समझने की बात यही है कि ये पार्टियाँ किस हद तक जा सकती हैं कि उन्हें ना तो देश के संविधान की फ़िक्र है और ना ही इसके परिणामों की.

सवाल

राज ठाकरे ने अमिताभ बच्चन पर सवाल उठाए तो दूसरे दिन उनके घर पर बोतलें फेंकी गई. मतांध जनता तो ऐसे ग़ैर ज़िम्मेदार नेताओं पर पहले प्रतिक्रिया करती है, फिर डंडे उठा लेती है और फिर उनके हाथों में तलवार और बंदूकें भी आ जाती हैं.

अमिताभ बच्चन के घर पर हमला किया गया

राज ठाकरे की गर्जना का हाल ये हुआ कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने खोमेचे वालों, टैक्सीवालों की पिटाई कर दी. बिहार, यूपी के सांसद और नेता चिल्लाए तो महाराष्ट्र की सरकार ने कुछ घंटों के लिए राज ठाकरे को गिरफ़्तार किया और फिर उन्हें ज़मानत भी मिल गई.

हद तो उस समय हो गई जब नासिक में विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए एक मराठी युवक के परिजनों से संवेदना व्यक्त करने राज ठाकरे पहुँच गए. लेकिन उन्हें उन खोमचे वालों और टैक्सीवालों की पीड़ा समझ में नहीं आई.

राज ठाकरे अमिताभ बच्चन के ख़िलाफ़ बोले तो उनके चचाजान बाल ठाकरे समर्थन में आए. लोगों को लगा चलो किसी ने तो आग में घी डालने का काम नहीं किया. लेकिन बाल ठाकरे को तो जैसे इसका इंतज़ार था कि कैसे उन्हें मौक़ा लगे और वे भी आग उगले.

पिछले दिनों सामना में उन्होंने बिहार के लोगों को निशाना बनाया. कई नारे लिखे. जिनमें से एक नारा था- एक बिहारी, सैकड़ों बीमारी. इस पर सवाल उठे और राजनेताओं ने जैसे अपनी-अपनी बात कहकर अपने कार्य की इतिश्री समझ ली.

किसी ने भी इस पर कड़ी कार्रवाई की सिफ़ारिश नहीं की और ना ही महाराष्ट्र सरकार इस दिशा में उद्दत दिख रही है.

और तो और अब बॉलीवुड भी इस बात पर बँटा नज़र आ रहा है. सलमान ख़ान, सोहेल ख़ान, नाना पाटेकर और सुनील शेट्टी जैसे सितारों ने एक याचिका पर दस्तख़त करके राज ठाकरे के भाषण पर लगी रोक का विरोध किया है.

पाबंदी क्यों

मीडिया ने जब इस ख़बर को पीटा तो सल्लू मियाँ के पिताजी सलीम ख़ान सामने आए और कहा- उत्तर भारत का तो मैं भी हूँ. मैं राज ठाकरे के उत्तर भारतीय विरोधी बयान का समर्थन नहीं कर रहा. मैं तो राज ठाकरे पर लगी पाबंदी का विरोध कर रहा हूँ.

बाल ठाकरे ने भी बिहारियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है

अब सलीम साब, इतने भोले तो मत बनिए. आपको क्या पता नहीं महाराष्ट्र पुलिस ने राज ठाकरे के भाषणों पर रोक क्यों लगाई है. क्योंकि वे एक ख़ास लोगों के ख़िलाफ़ ज़हर उगल रहे थे.

अगर सलीम साहब या बॉलीवुड के अन्य सितारे इतने संवेदनशील हैं, तो उन्हें उन खोमचे वालों और टैक्सीवालों की चिंता क्यों नहीं, जो बेवजह राज ठाकरे के कार्यकर्ताओं के निशाने पर हैं.

इन सितारों ने उस समय तो याचिकाओं पर दस्तख़त नहीं किए, जब इनके बॉलीवुड के ही सुपर स्टार के घर और दफ़्तर पर बोतलें फेंकी गई. मुंबई और गुजरात दंगों के बाद कई बॉलीवुड सितारों ने खुलकर अपना पक्ष रखा था.

तो क्या मान लिया जाए कि समय के साथ इनके तर्क भी बदल रहे हैं. या फिर सौ बात की एक बात...जब अपने पर आती है तभी इसका एहसास होता है. वो चाहे मेरे क़रीबी हों या फिर बॉलीवुड के कुछ सितारे.

ये एक ऐसा विभाजन है जिससे व्यक्ति तार-तार हो जाता है और फिर उसके मन में ऐसी गाँठ पड़ जाती है जो कभी नहीं खुलती.

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