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मराठी राज 'नीति' ठाकरे की | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना समर्थकों के उत्तर भारतीयों पर हमले और फिर राज ठाकरे की गिरफ़्तारी और रिहाई के पीछे मुझे लगता है कि दो वजह हैं. एक बात तो ये कि महाराष्ट्र के क्षेत्रीय हितों की झंडाबरदार शिव सेना ने पिछले कुछ वर्षों में अपने रुख़ में नरमी लाई है. उसने पार्टी में उत्तर भारतीयों को स्थान दिया है. इसकी एक वजह हिंदुत्व का एजेंडा है दूसरी वजह है कि मुंबई में ग़ैर मराठियों की बड़ी आबादी. राज ठाकरे शिव सेना से अलग हुए क्योंकि नेतृत्व को लेकर उनकी अपने चचेर भाई उद्धव ठाकरे से लंबी लड़ाई चली जिसमें वो हार गए और उसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया. इसके बाद से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का मकसद उद्धव ठाकरे को किसी तरह नीचा दिखाना था. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का अतिक्षेत्रवाद इसी प्रतिद्धंद्विता की उपज है. साथ ही ये भी हिसाब लगाया गया था कि यदि इस मुद्दे पर शिव सेना से उसके मराठी मतदाता दूर हुए तो वो राजनीतिक शक्ति के रूप में समाप्त हो जाएगी. लेकिन ऐसा लगता नहीं क्योंकि इस दौरान उद्धव ठाकरे ने किसानों के मुद्दे पर एक बड़ी रैली की. इसलिए ये तय नहीं है कि शिव सेना इतनी जल्दी हार मान जाएगी. प्रभुत्व का संघर्ष इसका दूसरा पहलू है कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के बीच प्रभुत्व का संघर्ष. कांग्रेस को इस मुद्दे पर एनसीपी और उसके गृह मंत्री को नीचा दिखाने का मौक़ा मिल गया. गणित ये था कि एनसीपी जो क्षेत्रीय पार्टी है, वो अक्षम पार्टी के रूप में सामने आए और गठबंधन में उसका दबदबा कम हो जाए. साथ ही शहरों में यदि शिव सेना अपने वोट खोती है तो उसका लाभ कांग्रेस को मिल जाए. महाराष्ट्र में परिसीमन के बाद राज्य विधानसभा की 288 सीटों में से 150 शहरी सीटें बन गईं हैं. इसी वजह से राज ठाकरे के ख़िलाफ़ एफ़आईआर और फिर उन्हें ज़मानत पर रिहा करने का ड्रामा रचा गया. कांग्रेस और एनसीपी सरकार राज ठाकरे और अराजक तत्वों से निपटने के प्रति कतई गंभीर नज़र नहीं आती है. बदलता महाराष्ट्र महाराष्ट्र के अधिकतर शहरों का मिज़ाज बदलता जा रहा है. इनमें दो तरह की धाराएं हैं, एक तो सफेद कॉलर वाले मध्यम वर्ग के लोग हैं. दूसरे निम्न वर्ग की पृष्ठभूमि के मज़दूर लोग है. इससे स्थानीय अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों की परेशानियाँ बढ़ी हैं. दूसरी ओर क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर मध्यम वर्ग की भावनाओं को भड़काना आसान है. इसलिए ये मामला थोड़ा जटिल है. इससे प्रभावित ग़रीब और निचले तबके का युवा है लेकिन क्षेत्रीयता का समर्थक मध्यम वर्ग है. सबक इस मुद्दे के कई सबक हैं. एक तो भावनात्मक मुद्दे को भड़काना बहुत आसान होता है. ग़ैरज़िम्मेदार और व्याकुल राजनेता ऐसा करने से नहीं चूकेंगे. दूसरा मीडिया उतावला है, वह सीमित प्रभाव और दृष्टिकोणवाले राजनीतिक खिलाड़ियों को हीरो बना सकता है. तीसरा, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अधिक विकसित क्षेत्रों के शहर दबाव में हैं. चौथा राजनीतिक दल ऐसे खेल खेल रहे हैं जो ख़तरे की घंटी है. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का संदेश काफ़ी परेशान करनेवाला है- यहाँ रहें लेकिन हमारी शर्तों पर. पाँचवा-अधिकतर दलों को सामाजिक रूप से बांटनेवाले मुद्दों से कैसे निपटा जाए, इसका अतापता नहीं है. वो तनाव से लाभ उठाना तो जानते हैं लेकिन उसे कम कैसे किया जाए, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है. छठा, थोड़े समय के लिए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की राजनीति को कुछ समर्थन हासिल हो सकता है. लेकिन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से उपजे तनाव से कैसे निपटा जाए, इसको लेकर राजनीतिज्ञों के पास विचारों का अभाव है. इसकी वजह से नीतियों और मूल मुद्दों से भटकाव होता है. |
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