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सोमवार, 04 फ़रवरी, 2008 को 17:48 GMT तक के समाचार
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'हीन भावना है झगड़े की जड़ में'

बाल ठाकरे ने पहले दक्षिण भारतीय लोगों को अपना निशाना बनाया था
जब अहमदशाह अब्दाली ने पानीपत की तीसरी लड़ाई जीत ली तो कहते हैं कि महाराष्ट्र में ऐसा कोई परिवार नहीं बचा जिसका एक सदस्य लड़ाई में न मारा गया हो, न जाने कितने लोगों को अफ़ग़ानिस्तान में गुलाम बनाकर बेच दिया गया.

इस लड़ाई के बाद महाराष्ट्र को जो सदमा लगा उससे उपजी हीनभावना से उबरना उसके लिए आसान नहीं रहा.

हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि मराठी समाज के सारे ही लोग हीनभावना के शिकार हैं, बल्कि ऐसे लोग हमेशा मुट्ठी भर ही होते हैं लेकिन मुखर होने की वजह से इनका सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव बहुत गहरा होता है.

अब से लगभग चार दशक पहले राज ठाकरे के चाचा बालासाहेब ठाकरे ने मुट्ठी भर मराठियों की इसी हीनभावना का फ़ायदा उठाकर उन्हें दक्षिण भारतीय लोगों के ख़िलाफ़ भड़काया था.

पिछले दो दिनों से मुंबई में उत्तर भारतीय लोगों (जिन्हें नफ़रत के साथ भइया कहा जाता है) के साथ हो रही मार-पीट और तोड़फोड़ को समझने के लिए मराठियों के एक वर्ग की मानसिकता को समझना ज़रूरी है.

उत्तर भारतीय लोगों के खिलाफ़ ये नफ़रत का वातावरण राज ठाकरे के बयान से नहीं बना है बल्कि कई वर्षों से मराठी नौजवानों का एक तबक़ा गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर भइयों को सबक़ सिखाने के मंसूबे बनाता रहा है.

राज ठाकरे ने उसमें एक चिंगारी लगाई है और बड़ी आग भड़का कर उसमें अपनी राजनीति की रोटी सेंकने का प्रयास किया है.

महाराष्ट्र को अलग राज्य बनाने का जब आंदोलन छिड़ा था तो उसके नेता थे एसए डांगे और एसएम जोशी, उन्होंने मराठियों की इस भावना का राजनीतिक फायदा नहीं उठाया लेकिन उस वक़्त भी मराठी मानते थे कि उनकी बदहाली के लिए ग़ैर-मराठी ज़िम्मेदार हैं, तब उनके गु़स्से के निशाने पर गुजराती थे.

महाराष्ट्र में शिव सेना एक राजनीतिक ताक़त के रूप में कमज़ोर पड़ी है

महाराष्ट्र के गठन के बाद बाल ठाकरे ने दक्षिण भारतीय लोगों के ख़िलाफ़ यह कहते हुए आंदोलन शुरू किया कि वे मराठियों की नौकरियाँ छीन रहे हैं, इस तरह शिव सेना की नींव पड़ी.

ऐसा नहीं है कि मराठी समाज के सारे ही लोग हीनभावना का शिकार हों, ऐसे लोग हमेशा मुट्ठी भर ही होते हैं लेकिन मुखर होने की वजह से इनका सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव बहुत गहरा होता है.

उत्तर भारतीय लोगों ने अपनी मेहनत के बल पर टैक्सी, ऑटोरिक्शा चलाकर 20-25 वर्षों में मुंबई में अहम योगदान किया है. उनकी मेहनत और लगन को समझे बिना उनसे जलन रखना और कहना कि "भइयों ने मुंबई को ख़राब कर दिया है, उनकी वजह से झुग्गियाँ बढ़ रही हैं," नासमझी ही दिखाता है.

चाय की चुस्की लेते हुए इस तरह का सतही विश्लेषण करके, उत्तर भारतीय लोगों का मज़ाक बनाकर उस पर ठहाके लगाने वाले लोगों में कुछ बुद्धिजीवी वर्ग के भी कुछ लोग शामिल हो गए, इसी का परिणाम पिछले दो दिनों में सामने आया है.

हालांकि उत्तर भारतीय लोगों पर हुए हमलों की तीव्रता बहुत कम है लेकिन उसमें जितना ज़हर और विस्फोटक भरा है कि वह पूरे देश को टुकड़ों में बाँट सकता है, इस मामले की गंभीरता को पूरी तरह से समझने की ज़रूरत है.

इस देश के लोगों को हिंदू मुसलमान के नाम पर बाँटने से भी ज्यादा आसान भाषा के नाम पर बाँटना है और लोग उसी तरह लड़-मर सकते हैं जैसे धर्म के नाम पर लड़ते हैं, इस ख़तरे के प्रति आगाह रहने की ज़रूरत है.

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