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सोमवार, 31 दिसंबर, 2007 को 07:33 GMT तक के समाचार
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'सिनेमा में ज़िंदगी का सच दिखाता हूँ'

हनुमान पोस्टर
'ये पहली फ़िल्म है जिसे सेंसर बोर्ड ने एजुकेशनल प्रमाणपत्र दिया है'

अनुराग कश्यप को हिंसक और विरोधात्मक स्वर का सिनेमा बनाने वाले फ़िल्मकार के रूप में जाना जाता है.

उनकी पहली फ़िल्म 'पाँच' सेंसर में फंस गई थी और उसके बाद ‘ब्लैक फ्राइडे’ और ‘नो स्मोकिंग’ लोगों के बीच चर्चा में तो रही लेकिन शायद उन्हें समझ नहीं आईं.

इस बार अनुराग अपेक्षा के विपरीत बच्चों की एनिमेशन फ़िल्म ‘हनुमान रिटर्न्स’ लेकर आए हैं.

भारतीय सिनेमा बदलते दौर में हैं पर आपकी बदली हुई दृष्टि को लोग और हमारा सेंसर पहचान नहीं पा रहा हैं शायद ?

अनुराग-हर दौर में सिनेमा बदलता है. ‘पाँच’ के बाद ‘ब्लैक फ्राइडे’ एक यथार्थ को दिखाने वाली फ़िल्म थी और ‘नो स्मोकिंग’ एक डार्क सिनेमा था. ‘ब्लैक फ्राइडे’ और ‘पाँच’ में मैं लोगों को घटनाओं से नहीं बल्कि भावनाओं के पीछे छिपी सच्चाई और मनोदशा से परिचित करवाना चाहता था.

‘नो स्मोकिंग’ जैसा डार्क सिनेमा भारतीय दर्शक समझने के लिए अभी भी तैयार नहीं है. ये कहानी और पटकथा के अलावा विषय को लेकर भी फतांसी जैसा है ?

अनुराग- हमारे यहाँ एक तय फॉर्मेट में फिल्में देखने का चलन है. रोम में ये अनॉफ़िशिअल फ़िल्मों में शामिल थी और इसे वहां सराहा गया. लेकिन हमारे यहाँ अब भी लोगों को ऐसे सिनेमा की समझ नहीं है . हम क्यों ऐसा सिनेमा नही बना सकते.

इसकी वजह क्या है ?

अनुराग- ख़ास नहीं. हिंदुस्तान से बाहर रहने वाली एनआरआई पीढ़ी आज भी सत्तर के दशक का पूरब पश्चिम सरीखा सिनेमा देखना चाहती है. अब ज्यादातर फ़िल्में उनके लिए बनाईं जाती हैं. हम प्रयोग करने से घबराते हैं.

आप डार्क सिनेमा से बच्चों के सिनेमा की तरफ क्यों लौट रहे हैं ?

अनुराग- इसमे मेरी बेटी की महत्वपूर्ण भूमिका है. वह हमेशा मुझसे पूछती थी कि मैं हिंसक और मारधाड़ वाली ऐसी फ़िल्में क्यों बनाता हूँ. मेरी एक भी फ़िल्म उसने नहीं देखी.

हनुमान रिटर्न्स में मेरे पास मौका था कि मैं लोगों को भी बता सकता था कि मैं केवल नए और प्रेरित सिनेमा बनाने वाला फ़िल्मकार नहीं हूँ. मैं सिनेमा में ज़िन्दगी की सच्चाई को दिखाता हूँ.

 हिंदुस्तान से बाहर रहने वाली एनआरआई पीढ़ी आज भी सत्तर के दशक का पूरब पश्चिम सरीखा सिनेमा देखना चाहती है. अब ज्यादातर फ़िल्में उनके लिए बनाईं जाती हैं. हम प्रयोग करने से घबराते हैं
अनुराग कश्यप

लाइव चरित्रों और एनिमेशन चरित्रों वाली फ़िल्म बनाने में क्या दिक्कतें है ?

अनुराग-लाइव चरित्रों को संयोजित करना एनिमेशन के मुक़ाबले आसान होता है. एनिमेशन फ़िल्म के लिए रेखाओं और रंगों को संतुलित करना चुनौती भरा काम है. हनुमान रिटर्न्स में मुझे पौराणिक और वर्तमान चरित्रों को भी एकसाथ संयोजित करना था.

हनुमान लोगों की धार्मिक आस्थाओं से जुड़ा चरित्र है. ये पहली फ़िल्म है जिसे सेंसर बोर्ड ने एजुकेशनल प्रमाणपत्र दिया है. लोगों को लगता है कि यह एक पौराणिक फ़िल्म हैं जबकि ये आज के समय की इमेजिनेटिव, एक्शन और फ़न से भरपूर फ़िल्म है.

हमारे यहाँ एनिमेशन फिल्मों का एक अलग बाज़ार बन रहा है. पर अभी हम जापान की एनिमेशन फिल्मों से पैसे और रचनात्मकता के मामले में काफ़ी पीछे हैं ?

दुनिया भर में एनिमेशन फिल्मों का बाज़ार करीब दो हजार करोड़ रूपये का है और हॉलीवुड के कई स्टूडियो की एनिमेशन फ़िल्मों के चरित्रों पर हम्रारे यहाँ दक्षिण के आर्टिस्ट काम करते हैं.

पिछले दिनों हमारे यहाँ कृष्ण और गणेश जैसी फिल्मों ने लोगों को अपनी ओर खींचा है. हनुमान तो वैसे भी हमारा देसी सुपरमैन हैं.

आप करण जौहर के लिए फ़िल्म लिख रहे हैं और ‘रंग दे बसंती’ के लेखक रहे रेंसिल दिसिल्वा उसे निर्देशित करेंगे ?

अनुराग- हाँ, मैं उनकी फ़िल्म के संवाद लिख रहा हूँ. इसमे थोड़ा समय लगेगा क्योंकि अभी मैं कुछ अंतरराराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहा हूँ.

आपकी 'गुलाल' और 'अल्विन कालीचरन' जैसी फिल्में क्यों अटकी पड़ी हैं ?

अनुराग- ‘अल्विन कालीचरण’ अनिल कपूर के साथ बनने वाली फ़्यूचर की फ़िल्म थी. बाद में लोगों ने ‘सिन सिटी’ देखी तो लोगों को पता चला कि ऐसे भी फ़िल्म बन सकती है. अब मैं इसे नए सिरे से दुबारा बनाऊंगा.

इसके अलावा ‘देव डी’ है जो आधुनिक देवदास पर रोचक फ़िल्म होगी और ‘गुलाल’ पर भी काम चल रहा है. मुझे विषय, पटकथा पर सोचने और उसकी उपयोगिता तक पहुँचने में वक़्त लगता है.

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