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निर्देशक बनने की तमन्ना: नंदिता
नंदिता दास
नंदिता दास कान फ़िल्म समारोह में जूरी की सदस्य रह चुकी हैं
हिंदी और भाषाई फ़िल्मों में सार्थक और सशक्त भूमिकाएँ निभाकर अपनी ख़ास जगह बना चुकीं नंदिता दास अब निर्देशन के क्षेत्र में अपना हाथ आज़माना चाहती हैं.

नंदिता ने नुक्कड़ नाटकों में काम किया है और बच्चों के लिए ‘ऑडियो बुक्स’ तैयार की हैं. उन्हें कान फ़िल्म समारोह की जूरी में शामिल किया गया.

32वें टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह के दौरान बीबीसी के लिए वी राधिका ने नंदिता दास के साथ बातचीत की.

इस साल टोरंटो फ़िल्म महोत्सव में आपकी दो मलयालम फ़िल्में दिखाई जा रही हैं, पिछले साल आपकी एक मराठी फ़िल्म दिखाई गई थी. हिंदी फ़िल्म क्यों नहीं?

मैने क़रीब 30 फ़िल्मों में काम किया है जिनमें से कई ऐसी हैं जो दूसरी भाषाओं मसलन कन्नड़, तमिल, मलयाली, मराठी की हैं. मुझे इनमें काम करने में ज़्यादा मज़ा भी आता है.

हर जगह का अपना मज़ा है, अपना परिवेश है, अलग-अलग कहानियाँ हैं. प्रतिभा सिर्फ़ मुंबई में नही है (मुंबईवासी मुझे ग़लत न समझें) प्रतिभा पूरे भारत में है.

वैसे तो मुझे बचपन से विभिन्न भाषाओं का शौक रहा है पर मुश्किल तो होती ही है. ख़ासतौर पर दक्षिण भारतीय भाषाएँ जो हम उत्तर भारत में रहने की वजह से सीख नहीं पाते है.

लेकिन धीरे-धीरे इनका पैटर्न मुझे समझ में आने लगा. मैने अब तक तीन मलयाली फ़िल्मों मे काम किया है.

जब आप अपरिचित भाषाओं में फ़िल्में करती हैं तो क्या संवाद भी ख़ुद बोलने का प्रयास करती हैं?

 लेकिन मैने सामाजिक मुद्दों पर काम किया है और ऐसे लोगों से जुड़ी रही हूँ, तो ये संगत मेरे भूमिकाओं के चयन को प्रभावित करती है. मिसाल के तौर पर अगर मैने औरतों के मुद्दों पर काम किया है तो ज़ाहिर है मुझे ऐसी भूमिकाएँ आकर्षित करती हैं

मैने तेलगू फ़िल्म की डबिंग की है, लेकिन कन्नड, तमिल और मलयाली में नहीं. क्योंकि बोलने का लहजा अलग है. बात सिर्फ़ शब्दों की नहीं, बल्कि शब्दों को सही ढंग से कहने की है.

ये आसान नहीं है. बहुत मुश्किल होती है. हर बार जब मैं क्षेत्रीय भाषा की फ़िल्म करती हूँ तो सोचती हूँ कि ज़िंदगी में दोबारा ये फ़िल्में नहीं करूँगी. लेकिन अपने आप को सज़ा क्यों दूँ.

शबाना आज़मी मुझसे कहती हैं, तुम कैसे काम कर लेती हो अलग-अलग भाषाओं में, मैं तो कभी न करूँ. पर जब मैं एक फ़िल्म कर लेती हूँ और दूसरा दिलचस्प प्रोजेक्ट सामने आता है तो मैं अपना प्रण भूल जाती हूँ.

पीछे मुडकर देखती हूँ तो ज़ेहन में आता है क्षेत्रीय भाषा की फ़िल्मों में मुझे हिंदी फ़िल्मों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मज़ा आया है.

क्या हिंदी फ़िल्मों में मनपसंद भूमिका न मिलने की वजह से आपने दूसरी भाषाओं में काम किया?

मैं समझती हूँ कि ऐसा नहीं है. मेरी तीसरी ही फ़िल्म मलयालम में थी. मैंने कहानी सुनी, अच्छी लगी और मैंने फ़िल्म में काम करने की हामी भर ली.

तब सोचा था- सीख लूँगी, कर लूँगी. लेकिन करने के बाद पता चला कितना मुश्किल था. उसके बाद इसी तरह हुआ कि कोई कहानी अगर अच्छी लगी, डायरेक्टर अच्छा लगा या पात्र रोचक लगे तो मैने उसमें काम किया.

मुझे लगता था कि ऐसी हिंदी फ़िल्म, जिसके लिए और दूसरी तमाम चीज़ों पर समझौता करना पडे़ उसे करने से बेहतर है भाषाई चुनौती का सामना करूँ.

मैं कोशिश करती हूँ कि ऐसी भाषाएँ जो मुझे आती हैं उनमें काम करूँ, लेकिन हमेशा ऐसी भूमिका नहीं मिलती.

मात्र किरदार ही अपने आप में नहीं देखा जाता है, उसका एक परिप्रेक्ष्य होता है- कहानी क्या है, टीम कैसी है और डायरेक्टर की ईमानदारी, सत्यनिष्ठा की भी अपनी अहमियत है.

भूमिका निभाने से पहले आपकी तैयारी क्या होती है?

इसकी कोई रोचक कहानी नहीं है क्योंकि मैं ऐसी कोई तैयारी नहीं करती हूँ. अभी तक कोई ऐसी भूमिका ही नहीं मिली जिसकी अलग से तैयारी करनी पड़े.

मसलन कोई ऐसा लिविंग करेक्टर जिसको हू-ब-हू करना हो या ऐसा कोई किरदार जिसकी आप कल्पना भी न कर सकें, जो आपने न कभी जिया हो न देखा हो.

मेरे निभाए हुए अधिकतर पात्र बेहद वास्तविक हैं. उनके जैसा या तो आपके साथ गुज़रा है या आपके आसपास के लोगों के साथ या वो आपकी कल्पना का ही हिस्सा हैं.

पिछले साल मैं जिस फ़िल्म के साथ आई थी वह एक काल्पनिक परिस्थिति पर आधारित है. अगर आप उस पात्र और उसकी यात्राओं के साथ एक जैसा अनुभव कर सकते हैं तो वो वास्तविकता के धरातल से दूर भी नही है. वो सचमुच का चरित्र है.

कहने का मतलब है कि अभी तक उस तरह कभी तैयारी करनी ही नहीं पड़ी. हाँ कुछ चीज़ें हैं जैसे उस इलाक़े का उठने-बैठने का तरीक़ा कैसा है, या रेत में मटका लेकर कैसे चला जाता है.

 निर्देशन के प्रति हमेशा से मेरा आकर्षण रहा है. जब मैं सेट पर होती थी, तब लगता था कि कलाकारों को बड़ा माना जाता है, लेकिन हम हैं नहीं. हम केवल एक अंश है. फ़िल्म निर्देशक की परिकल्पना होती है. अपनी कहानी को ख़ुद कह पाने का एक अलग मज़ा है

भावनाएँ तो व्यापक है और अगर आप ज़िंदगी पूरी तरह से जीते हैं तो ये भावनाएँ व्यक्त होती है. कई बार फ़िल्मों मे काम करते समय अनायास ऐसी भावनाएँ उभर आती हैं जिनकी उपस्थिति का आपको आभास भी न था.

मै स्वाभाविक होने की कोशिश करती हूँ और प्रयास यह रहता है कि ‘ऐक्शन’ और ‘कट’ के बीच मैं उस पात्र मे ही रहूँ.

आप सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रही है. क्या उसका प्रभाव आपके अभिनय पर पड़ा है?

स्वाभाविक है कि उसका प्रभाव होगा ही. मैं खुद को एक्टिविस्ट नहीं कहूँगी क्योंकि मैं ऐसे लोगों को जानती हूँ जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी किसी एक मुद्दे के लिए समर्पित कर दी.

लेकिन मैने सामाजिक मुद्दों पर काम किया है और ऐसे लोगों से जुड़ी रही हूँ, तो ये संगत मेरे भूमिकाओं के चयन को प्रभावित करती है. मिसाल के तौर पर अगर मैने औरतों के मुद्दों पर काम किया है तो ज़ाहिर है मुझे ऐसी भूमिकाएँ आकर्षित करती हैं.

आपकी सांस्कृतिक यात्रा का अगला पड़ाव?

मै निर्देशन करने की कोशिश कर रही हूँ, एक प्रोजेक्ट पर कम चल रहा है.

निर्देशन में आपकी रुचि कैसी बनी?

निर्देशन के प्रति हमेशा से मेरा आकर्षण रहा है. जब मैं सेट पर होती थी, तब लगता था कि कलाकारों को बड़ा माना जाता है, लेकिन हम हैं नहीं.

हम केवल एक अंश है. फ़िल्म निर्देशक की परिकल्पना होती है. अपनी कहानी को ख़ुद कह पाने का एक अलग मज़ा है.

कई ऐसी बातें है जो आप कहना चाहते है, बाँटना चाहते हैं और यह करने के लिए सिनेमा बहुत प्रभावशाली माध्यम है.

मैने हमेशा अपनी बातें लोगों के साथ बाँटी है अलग अलग माध्यमों थिएटर, फिल्में, ऑडियो पुस्तक, इंटरव्यू से. निर्देशन भी एक ज़रिया है अपनी बात कहने का.

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