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रे की 'पथेर पांचाली' 50 साल की हुई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजित रे की 'पथेर पांचाली’ को तो आप जानते ही होंगे और अगर नहीं तो नाम ज़रूर सुना ज़रूर होगा. पर इस बार इस फ़िल्म को याद करने की एक वजह और है. विख्यात बांग्ला साहित्यकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की इसी नाम की कृति पर आधारित फ़िल्म 'पथेर पांचाली' की उम्र अब 50 साल हो चली है. इस फ़िल्म ने भारतीय सिनेमा को एक नई शैली और दृष्टिकोण से परिचित कराया और इसी के साथ शुरू हुआ प्रसिद्ध फ़िल्मकार सत्यजीत रे का फ़िल्मी सफ़र. जो भारतीय सिनेमा जगत के लिए मील का पत्थर बन गया. 1955 में बनी सत्यजित की इस पहली फ़िल्म के 50 साल पूरे होने के अवसर पर भारत सरकार के फ़िल्म समारोह निदेशालय की ओर से दिल्ली में एक तीन दिवसीय फ़िल्म समारोह का आयोजन भी किया है. समारोह का उदघाटन भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्री जयपाल रेड्डी और जानी-मानी फ़िल्म अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने किया. इस अवसर पर जयपाल रेड्डी ने कहा, “सत्यजित रे एक बहुआयामी फ़िल्मकार थे जिनके काम में संस्कृति और कला दोनों का विशिष्ट बिंब मिलता है. उनमें एक कलाकार भी था और एक बुद्धिजीवी भी.” पथेर पांचाली को चाहनेवाले केवल भारत में ही नहीं दुनिया भर में हैं. अगले महीने कान फ़िल्म महोत्सव में इस फ़िल्म के 50 साल पूरे होने के अवसर पर इसका विशेष शो आयोजित किया जाएगा. समारोह में जयपाल रेड्डी के अलावा संदीप रे, ललिता रे, सौमित्रा चटर्जी और शर्मिला टैगोर भी हिस्सा लेंगे. ग़ौरतलब है कि 1956 के कान फ़िल्म समारोह में इस फ़िल्म को ‘दि बेस्ट ह्यूमन डॉक्युमेंट’ के पुरस्कार से नवाजा गया था. घर वापसी विडंबना यह है कि इस फ़िल्म की एक भी संरक्षित प्रति भारत में नहीं है.
हालांकि जयपाल रेड्डी ने लोगों को आश्वासन दिया है कि वो इस फ़िल्म की एक संरक्षित प्रति भारत लाने का प्रयास करेंगे. उन्होंने कहा कि वो लोगों को इसकी डीवीडी प्रतियाँ भी उपलब्ध कराने का प्रयास करेंगे ताकि लोग सत्यजीत रे के काम को ज़्यादा बेहतर तरीके से देख-समझ सकें. रे की यह फ़िल्म ‘अपू’ श्रृँखला की तीन फ़िल्मों में से पहली है. शर्मिला टैगोर इस श्रृँखला की तीसरी फ़िल्म, अपूर संसार की नायिका थीं. फ़िल्म का कथानक बीसवीं सदी के शुरुआती दौर के एक बंगाली ब्राह्मण परिवार के इर्द-गिर्द है जो एक गाँव में असुविधाओं और अभावों का जीवन बिता रहा है. फ़िल्म के कथानक में जहाँ एक बड़ा सामाजिक व मानवीय बोध साफ़ दिखता है, वहीं रे का प्रकृति प्रेम भी सामने आता है. पर सबसे विशिष्ट है सत्यजित रे की दृश्य कल्पना और उसी से यह फ़िल्म कालजयी बन गई. वैसे यह ख़ूबी रे की सभी फ़िल्मों में दिखती है और इसीलिए 1955 से 1991 तक के 36 फ़िल्मों के सफ़र को तय करने के बाद सत्यजित रे को 1992 में विशेष ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया. भारत सरकार ने भी उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया था. |
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