|
परदे पर बिकिनी नहीं पहन सकतीः रीमा ख़ान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के अधिकतर कलाकार मानते हैं कि भारतीय फिल्में उनके इंटरनेशनल फ़िल्म बाज़ार में जाने का सीधा रास्ता है. लेकिन पाकिस्तान की सबसे महंगी और लोकप्रिय अभिनेत्री रीमा खान को जब महेश भट्ट जैसे निर्देशकों ने अपनी फिल्मों में काम करने के लिए प्रस्ताव दिया तो उन्होंने उनकी फिल्म में काम करने से मना कर दिया. नान्तेस फ़िल्म समारोह में जब रीमा से बात हुई तो उनका कहना था कि इस इनकार की वजह यह थी कि वह परदे पर चुंबन और बिकनी वाले दृश्य नही कर सकतीं. प्रस्तुत है रीमा से बातचीत के कुछ अंशः आपने पाकिस्तान में केवल पंद्रह साल के करियर में करीब दौ सौ फिल्में की हैं. क्या यह एक रिकॉर्ड है? जी हाँ. किसी एक्ट्रेस ने एक साथ इतनी फिल्में नहीं की. पर इनमें मेरी पश्तो, सिंधी और उर्दू सिनेमा की सारी फिल्में शामिल हैं. हमारे यहाँ मुख्य धारा के सिनेमा में एक साथ इतनी सारी फिल्में करना संभव नहीं है. क्या भारत में अब पाकिस्तान फिल्मों के जरिये अपना चेहरा बदलना चाहता है. फ्रांस के नान्तेस फ़िल्म समारोह की खुदा के लिए इस बात का सबूत है? दुनिया के हर देश में सिनेमा उसका चेहरा दिखाने और बदलने का माध्यम माना जाता है. निर्देशक शोइब मंसूर की यह फ़िल्म दुनिया भर में चर्चा में है और पहली बार हिंदुस्तानी सिनेमा के लीजेंड माने जाने वाले अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने इसमे केंद्रीय भूमिका की है. इसके लिए दोनों देशों के साथ नए सिरे से बातचीत करनी चाहिए. पाकिस्तान के कई कलाकार पहले से वहाँ काम कर रहे हैं. आपने अभी तक हिंदी फिल्में नही की हैं? मैं हिंदी फिल्मों में बिकनी पहनकर चुंबन नही दे सकती. हमें भारतीय फिल्में करके अपने देश भी लौटना होता है. भारत के फिल्मकारों के लिए पाकिस्तानी अभिनेत्रियों का मतलब है जिस्म दिखाना. मैं ऐसा नही कर सकती.
आप वीरज़ारा के लिए चुनी जाने वाली थीं पर महेश भट्ट को आप लगातार मना करती आ रही हैं? हाँ, यह सच है. महेश जी से मैंने सिर्फ़ यह कहा कि आप के लिए मैं मीरा या सोमी अली जैसे फिल्में नही कर सकती. मैं पैसे और नाम के लिए फिल्में नही करना चाहती. मैं अपने देश में पेप्सी ब्रांड और विज्ञापनों के लिए करोड़ों में पैसा लेती हूँ. नान्तेस फ़िल्म समारोह में भी मैं इसलिए हूँ कि यहाँ मेरी फ़िल्म कोई तुझसा कहाँ की विशेष स्क्रीनिंग है. इसका निर्देशन भी मैंने ख़ुद किया है फिर मैं महेश जी की सी ग्रेड सरीखी कोई फ़िल्म क्यों करूँ. पर आप भारतीय सितारों के साथ विदेशों और भारत में शो करती हैं? इसमें कोई बुराई नही है. मैंने अपना पहला शो प्रियंका चोपड़ा के साथ तब किया था जब वे टॉप एक्ट्रेस नहीं थीं. मैं और वो दोनों न्यूयार्क के एक शो में अकेले बैठे थे. मैं अकेली पाकिस्तानी कलाकार वहाँ थी. इसकी वजह थी कि इससे पहले किसी पाकिस्तानी ऐक्ट्रेस ने शास्त्रीय संगीत पर परफॉर्मेंस नही दिया था. पर मैं ऐसी फिल्में करने के बारे में कभी नही सोचती जो मेरी छवि के विपरीत हों. कराची का कारा फ़िल्म फ़ेस्टिवल अपने मुक़ाम तक क्यों नही पहुँचा? इसकी एक बड़ी वजह है कि विभाजन के समय लाहौर और कराची जैसी जगहों पर जो सुविधाएँ थी वे तबाह हो गईं. ख़ासतौर से लाहौर में. यहाँ के कला और फिल्मों से जुड़े ज्यादातर बड़े लोग भारत चले गए. आपकी पहली फ़िल्म बुलंदी से लेकर नई फ़िल्म कोई तुझसा कहाँ तक का सफर कैसा रहा? मेरे परिवार में फिल्मों के लिए मनाही थी. मेरी फ़िल्म कोई तुझसा कहाँ तक मैं ने हाँलाकि अभी तक केवल व्यावसायिक सिनेमा की फिल्में की हैं पर अब मैं गंभीर सिनेमा के फिल्में करना चाहती हूँ. भारत के एक निर्देशक मेरे साथ एक फ़िल्म बनाना चाहते हैं. ये फ़िल्म अमृता प्रीतम के उपन्यास लाइन ऑन वाटर पर आधारित है. आपको लगता है पाकिस्तान में इस तरह के गंभीर सिनेमा के लिए जगह है? पिछले कुछ समय में हमारे यहाँ सिनेमा और कला के नए प्रशिक्षण संस्थान खुले हैं. लाहौर के राष्ट्रीय कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स ने कई फिल्मकारों के लिए नई आर्थिक सुविधाएँ देने की शुरुआत की है. तब से वहाँ जागो हुआ सवेरा जैसी कई फिल्मों का निर्माण हुआ है. हाल ही में खामोश पानी जैसी फिल्में हमने जर्मन फ्रेंच और पाकिस्तान के सहयोग से बनाई हैं. इसे भारत ही नही दुनिया भर में रिलीज किया गया है और अब खुदा के लिए भारत में रिलीज हो रही है. अब आगे की क्या योजनाएँ हैं? मैंने अपनी नई फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखी है. वन टू का वन नाम से बनने वाली ये फ़िल्म बैंकाक सिंगापुर और मलेशिया में शूट होगी. आप पाकिस्तान के सबसे मशहूर गेम शो की होस्ट भी हैं? हाँ, जियो टीवी का ये घर आपका हुआ नाम का ये शो लोगों को घर देने का सपना पूरा करता है. अब अंत में वही सवाल, शादी कब करेंगी? वही जवाब , जब समय आएगा तो सबको पता लग जाएगा. अभी समय नहीं आया है. |
इससे जुड़ी ख़बरें 'आवारापन' से मालामाल पाकिस्तानी सिनेमाघर01 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस पाकिस्तान ने क्यों रोका क़ाफ़िला का प्रदर्शन?13 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस फ़हमीदा को हिंदी शब्दों से ख़ास लगाव23 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस बँटवारे का दर्द फिर महसूस किया गया17 फ़रवरी, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस मीरा की 'नज़र' पर क्यों है ऐतराज़?28 फ़रवरी, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||