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रविवार, 05 अगस्त, 2007 को 06:59 GMT तक के समाचार
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भारत की शायरी बनाम पाकिस्तान की शायरी

आज़ादी के साठ साल पूरे होने पर मुशायरा
मुशायरों में कई देशों के शायरों ने हिस्सा लिया
दिल्ली में आयोजित एक मुशायरे में भारत, पाकिस्तान सहित दुनिया के दूसरे देशों से आए शायरों में यह बहस छिड़ गई कि किस देश की शायरी बेहतर है.

ये मुशायरा दिल्ली के जश्न-ए-बहार ट्रस्ट की तरफ से आयोजित किया गया था.

भारत और पाकिस्तान की शायरी की तुलना करते हुए पाकिस्तानी शायर स्वर्गीय बहज़ाद लखनवी के पोते अज़्म बहज़ाद ने भारत और पाकिस्तान की शायरी के बारे में कहा, "भारत में मुशायरे की शायरी हो रही है जो कुल मिलाकर अपूर्ण है. यहाँ के शायर कुछ ख़ास जज़्बाती विषयों पर शायरी करके दाद हासिल करते हैं, जबकि पाकिस्तान में बेहतर शायरी हो रही है."

पत्रकारों ने जब इसी बात का ज़िक्र करते हुए पाकिस्तान के अहमद फ़राज़ से बात की तो उनका विचार कुछ अलग था.

उन्होंने कहा, "लोगों के अपने-अपने विचार हो सकते हैं लेकिन यह हकीक़त नहीं है. भारत में भी आला दर्ज़े की शायरी हो रही है."

 पाकिस्तान की शायरी अभी फ़ारसी के असर से बाहर नहीं निकल सकी है. भारत की शायरी दूसरी भाषाओं के मेल से बहुत मज़बूत हुई है और अवाम की शायरी है
निदा फ़ाज़ली, शायर

इसी सवाल का जवाब देते हुए भारत के शायर निदा फ़ाज़ली ने कहा, "जितने मुँह उतनी बातें. लेकिन सच्चाई तो यह है कि पाकिस्तान की शायरी अभी फ़ारसी के असर से बाहर नहीं निकल सकी है. भारत की शायरी दूसरी भाषाओं के मेल से बहुत मज़बूत हुई है और अवाम की शायरी है."

उन्होंने यह भी कहा कि मुशायरे से बाहर की शायरी को लोग पढ़ते नहीं हैं इसलिए इस प्रकार की बात कह देते हैं.

इसी पर चर्चा करते हुए क्लासिकी हास्य कवि साग़र ख़य्यामी ने कहा, "पाकिस्तान में तो सिर्फ़ दो सौ शब्दों में शायरी हो रही है वह भारत की शायरी के फैलाव के सामने कहाँ टिकती है. यहाँ के 16 साल के बच्चे के शेर में वह गहराई है जो वहाँ के 60 वर्ष के शायरों में देखने को नहीं मिलती है. यहाँ की देसी भाषाओं और बोलियों ने इसमें यह ख़ूबी पैदा की है."

पाकिस्तान की हास्य कवियत्री रुख़्साना नाज़ी ने कहा कि भारत में उम्दा किस्म की शायरी हो रही है और उसे किसी भी प्रकार कम नहीं आंका जा सकता है.

विरोध की शायरी

अहमद फ़राज़ ने एक बार कहा था कि पाकिस्तान में विरोध की शायरी दम तोड़ चुकी है.

जब इस बारे में उनसे सवाल किया गया कि जनता तो लगातार विरोध कर रही है तो शायर ही चुप क्यों हैं. इस पर उन्होंने कहा, "हमने पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान सरकार को लौटा दिया मगर फिर भी शायरी में अब वह विरोध देखने में नहीं आता है."

पाकिस्तानी शायर अहमद फ़राज़
फ़राज़ का कहना था कि पाकिस्तान में विरोध की शायरी दम तोड़ चुकी है

जब यही सवाल पाकिस्तान से आने वाली शायरा गुलनार आफ़रीं और रुख़्साना नाज़ी से पूछा तो उन्होंने कहा कि जनता तो विरोध कर रही है लेकिन शायर डरा हुआ है और वह कुछ लिखने से घबराता है कि न जाने कब क्या हो जाए.

बहरहाल सारे लोगों ने भारत और पाकिस्तान के अच्छे रिश्ते की बात की. निदा फ़ाज़ली ने भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर एक शेर कहा:

ये काटे से नहीं कटते, ये बाँटे से नहीं बँटते,
नदियों के पानी के सामने आरी कटारी क्या

इस मुशायरे में सउदी अरब से उमर सालेम अल-ऐदरूस और अफ़ग़ानिस्तान से राहबीन ख़ुर्शीद जैसे अन्य देशों के शायर भी आए थे.

अल-ऐदरूस ने कहा, "ग़ज़ल ख़ास हमारी चीज़ है और इसका अर्थ है लड़की से बात करना. लेकिन यहाँ इसमें दूसरे विषय भी शामिल कर लिए गए हैं जबकि हमारे यहाँ यह अभी भी उसी रूप में है. बाक़ी चीज़ों के लिए दूसरी शैलियाँ हैं."

उन्होंने इस संदर्भ में भारत के शायर जिगर मुरादाबादी और ख़ुमार बाराबंकी को सर्वश्रेष्ठ क़रार दिया.

अफ़ग़ानिस्तान के राहबीन ख़ुर्शीद ने कहा कि उनके यहाँ उर्दू के लिए कुछ ख़ास नहीं हो रहा है. उन्होंने क्लासिकी रंग में डूबी हुई एक ग़ज़ल में अफ़ग़ानिस्तान का हाल इस तरह बयान किया:

देखो गली में सूरते फ़रयाद है बहार,
दो-चार दिन का जश्न परिज़ाद है बहार.

ताजमहल

सउदी अरबी की शायरी
 ग़ज़ल का अर्थ है लड़की से बात करना. लेकिन यहाँ इसमें दूसरे विषय भी शामिल कर लिए गए हैं जबकि हमारे यहाँ यह अभी भी उसी रूप में है. बाक़ी चीज़ों के लिए दूसरी शैलियाँ हैं
उमर सालेम अल-ऐदरूस, अरबी शायर

ताजमहल को दुनिया के सात अजूबों में शामिल किए जाने पर ताज महल के बारे में शायरों ने कविता और कई शेर पढ़े. दिल्ली के शायर इक़बाल अशर ने ताज महल के शीर्षक से एक नज़्म पढ़ी और लोगों का दिल जीत लिया.

मैं वक़्त की दहलीज़ पे ठहरा हुआ पल हूँ
क़ायम है मेरी शान कि मैं ताजमहल हूँ.

मुशायरे के लोकप्रिय शायर मनव्वर राना ने भी ताज महल के बारे में एक शेर कहा.

काग़ज़ के बने ताजमहल बेच रहे हैं
जो बाग़ के मालिक थे वो फल बेच रहे हैं.

मुशायरा ग़ालिब, मीर और मोमिन के शहर दिल्ली में हो और वह उनके ज़िक्र से ख़ाली रहे यह कैसे मुमकिन है. मलिका नसीम ने इस बारे में एक शेर पढ़ा.

कभी गुफ़्तारे-ग़ालिब और कभी गुलकारिए-मोमिन
नसीम अक्सर वो नज़रें मीर का दीवान लगती हैं.

शायरी का अनुवाद
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