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यूँ ही फ़िराक़ ने की उम्र बसर... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़िराक़ साहब रिक्शे पर कुछ इस अंदाज़ से बैठा करते थे गोया कोई बड़ा ओहदेदार मातहतों के कामकाज की देखभाल के लिए दौरे पर निकला हो. उनके हाथ की छड़ी ऐन मौक़ों पर उनके काँधे पर जा बैठती थी और वे अपनी गोल-गोल आँखें चारों ओर घुमाते हुए सलाम करने वाले हर शख़्स को पहचानने की अक्सर नाकामयाब और कभी-कभी कामयाब कोशिश करते रहते थे. वे बैंक रोड के अपने बंगले से पैदल टहलते हुए भी यूनिवर्सिटी तक आराम से आ सकते थे और अक्सर आते भी थे मगर खास मौक़ों पर रिक्शे की सवारी ही उन्हें पसंद थी. ऐसा ही ख़ास मौक़ा उस मुशायरे का था जब फ़िराक़ साहब रिक्शे से उतरे और सीधे मंच पर ले जाए गए. इत्तेफाक से इस मुशायरे में ऐसे नौवक़्त शोअरा ज़्यादा थे जो तरन्नुम के ज़ोर पर अपनी फीकी ग़ज़लें चला लेना चाहते थे. फ़िराक़ साहब पहलू बदलते रहे और कई बार उठकर जाने पर भी आमादा हो गए मगर उन्हें किसी तरह रोके रखा जा रहा था. फिर फ़िराक़ साहब का नाम पुकारा गया और वे माइक पर तशरीफ़ लाए. एक तेज़ और सख़्त निगाह उन्होंने सामने बैठे उन शायरों पर डाली जिन्होंने उन्हें इतनी देर से परेशान किया था और फिर बोले,‘‘हजरात! आप अब तक कव्वाली सुन रहे थे. अब कुछ शेर सुनिए!’’ और महफिल के कहकहों के डूबने का इंतजार किए बिना उनकी खनकदार आवाज़ गूंजने लगी. ये नकहतों की नर्म रवी ये हवा ये रात जब मैं वर्ष 1961 में इहालाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने आया तो फ़िराक़ साहब विश्वविद्यालय के अत्यंत प्रतिष्ठित प्राध्यापकों में गिने जाते थे. वे प्राध्यापक तो अंग्रेज़ी के थे मगर हिंदी और उर्दू विभागों में भी उनका असर-रसूख वैसा ही था. वे तरह-तरह की गोष्ठियों में शामिल होते थे और उनकी तकरीर में हमेशा कोई न कोई बात ऐसी रहती थी जो सोच के नए दरवाज़े खोल देती थी. एक प्रोफेसर के रूप में वे सीमाओं से बाहर की चीज़ थे. क्लास-रूम में पढ़ाते वक़्त भी वे ऐसे नई उदभावनाएँ व्यक्त कर देते थे कि हर कोई चकित रह जाता था. निराला, पंत, महादेवी, हरिवंश राय बच्चन और रामकुमार वर्मा जैसी हिंदी के महान प्रतिभाएँ भी उनके व्यंग्य बाणों का शिकार हुआ करती थीं और अपने सहयोगी प्राध्यापकों प्रोफ़ेसर सतीश चंद्र देव, डॉक्टर अमरनाथ झा, प्रोफ़ेसर ईश्वरी प्रसाद आदि के बारे में उनकी कटूक्तियाँ अक्सर इलाहाबाद के बुद्धिजीवी समाज में चर्चित होती रहती थीं. ऐसा ही एक प्रसंग है... उन दिनों... इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में हर किसी को फ़िराक़ साहब और उनके यशस्वी सहपाठी(जो बाद में विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर भी रहे) डॉ अमरनाथ झा के बीच अघोषित प्रतिस्पर्धा का एहसास था. उस दिन की गोष्ठी में फ़िराक़ और झा साहब दोनों की ही तकरीर होने वाली थी. पहले झा साहब बोले. उनका ज्ञान अप्रतिम था और उस दिन का भाषण लाजवाब. झा साहब के बाद फ़िराक़ साहब के बोलने की बारी थी मगर बीच में ही एक साहब खड़े हो गए और लगे कहने ‘‘फ़िराक़ साहब तो बेवजह अपने को झा साहब के बराबर का समझते हैं जबकि हर बात में वे झा साहब से कमतर हैं. झा साहब अंग्रेज़ी, उर्दू और हिंदी तीनों ज़ुबानों में फ़िराक़ साहब से कहीं आगे की जानकारी रखते हैं.’’ फ़िराक़ फौरन खड़े हो गए और बोले,‘‘भाई, अमरनाथजी मेरे बड़े गहरे दोस्त हैं. मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ. उनमें एक ख़ास खूबी है कि उन्हें अपनी झूठी तारीफ बिल्कुल पसंद नहीं है.’’ फ़िराक़ की हाज़िर जवाबी उन हजरत का मिज़ाज बिल्कुल दुरूस्त कर गई. फ़िराक़ साहब में गजब का ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ था. ज़िक्र अलीगढ़ के एक मुशायरे का है. हर शायर के लिए ज़रूरी था कि वह अपनी रचना खड़े होकर पढ़े और पढ़ते वक़्त उसके सर पर टोपी भी हो. डॉक्टर शिवानंद नौटियाल ने इस वाकए का ज़िक्र बड़े दिलचस्प अंदाज़ में किया है. फ़िराक़ साहब ने बैठे-बैठे ही पढ़ने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की तो आवाज़े उठने लगीं जनाब खड़े होकर पढ़िए, खड़े होकर पढ़िए. थोड़ी देर तक फ़िराक़ साहब उनसे जिरह करते रहे, फिर अचानक बैठे-बैठे ही उन्होंने माइक से ऐलान कर दिया कि ‘हज़रात! मेरे पजामे का इज़ारबंद टूट गया है. फिर भी अगर आप चाहें तो मैं खड़ा हो जाऊ.’ हंगामा मच गया और फ़िराक़ साहब को बैठे-बैठे ही पढ़ने का इजाजत मिल गई. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पंडित जवाहरलाल नेहरू तशरीफ़ लाए. म्योर सेंट्रल कॉलेज में उनका लेक्चर हुआ. जैसे ही पंडित जी ने अपना भाषण ख़त्म किया यूनीवर्सिटी के एक प्रोफेसर जो इतिहास के ही विशेषज्ञ थे, खड़े हो गए और बोले, ‘‘पंडित जी आपने अपने भाषण में जिस घटना को अमुक सन में हुआ बताया है वह तब की नहीं बल्कि फलां सन की है.’’ जवाहरलाल जी तमतमा गए मगर जवाब दिया फ़िराक़ ने, ‘‘बैठ जाओ प्रोफेसर! तुम इतिहास पढ़ाते हो जवाहरलाल इतिहास बनाते हैं.’’ पंडित जी मंद-मंद मुस्कुराए और फ़िराक़ के फिकरे ने सबको ख़ुश कर दिया. हिंदी बनाम उर्दू हिंदी की नई कविता के विख्यात कवि और अंग्रेज़ी के प्राध्यापक विजयदेव नारायण साही एक बार फ़िराक़ साहब का टेलीविजन के लिए इंटरव्यू ले रहे थे. साही जी काफ़ी देर तक इस बात की कोशिश करते रहे कि फ़िराक़ साहब किसी तरह उर्दू-हिंदी विवाद के मुद्दे पर आ जाएँ तो बहस कुछ रोचक हो जाए मगर फ़िराक़ उस दिन इस दिन इस विवाद में उलझने को तैयार नहीं थे. अंततः साही जी ने उलझाने वाला यह सवाल पूछ ही लिया कि अच्छा फ़िराक़ साहब आप यह बताएँ कि सूरदास की कौन की लाइन आपको सबसे ज्यादा पसंद है. फ़िराक़ साहब बौखलाए मगर उनकी हाज़िरजवाबी ने फिर उनका साथ दिया. बोले, ‘‘क्या सवाल पूछा है आपने? आप बताइए कि आपको गंगा की कौन सी लहर सबसे ज़्यादा पसंद है? या सूरज की कौन सी किरण आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है?’’ साही साहब का तीर खाली गया. फ़िराक़ साहब के एक दोस्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफ़ेसर थे- भगवत दयाल. उनकी पढ़ाई-लिखाई विलायत में हुई थी और वे अंग्रेज़ों की ही तरह रहते और बोलते भी थे. एक दिन फ़िराक़ साहब ने उनसे कहा कि ‘‘भगवत दयाल अब तुम बोलते हो तो तुम्हारी अंग्रेज़ी कुछ-कुछ समझ में आने लगी है. एक बार तुम फिर से विलायत हो आओ.’’ फ़िराक़ का यह जुमला लंबे अर्से तक यूनिवर्सिटी में कहकहे जगाता रहा. फ़िराक साहब के इलाहाबाद वाला यूनीवर्सिटी के बंगले पर हर शाम महफ़िल जमा करती जिनमें शेरो-शायरी से लेकर लतीफ़ों और कहकहों तक का सफ़र शामिल रहता था. एक बार इहालाबाद के ही एक शायर फ़िराक़ साहब को अपनी उसी दिन कही हुई एक ग़ज़ल सुनाने तशरीफ़ ले आए. उनके शेर में एक मिसरा फ़िराक़ साहब का था. फ़िराक़ ने टोका तो शायर साहब कहने लगे, कभी-कभी ख़्याल टकरा जाते हैं. फ़िराक़ ने तुरंत जवाब दिया कि ‘‘भाई साइकिल से साइकिल टकरा जाए तो यह टकराना समझ में आता है मगर साइकिल हवाई जहाज़ से तो नहीं टकरा सकती?’’ बात 1973 के आसपास की है और पटना की है. मुशायरे की सदारत फ़िराक़ साहब कर रहे थे. आयोजकों से मेरी निकटता थी और फ़िराक़ साहब से इलाहाबाद के दिनों का पहचान लिहाज़ा मैं भी पहली क़तार में हाजिर था. मुशायरा वहाँ के एक बड़े प्रेक्षागृह में हो रहा था. आमंत्रित शायरों के बाद अंततः फ़िराक़ साहब ने अपना कलाम सुनाना शुरू कर दिया. शुरूआत उन्होंने अपनी एक रूबाई से की. आँसू भरे-भरे वो नैना रस के फ़िराक़ साहब ने अभी ये दो ही पंक्तियाँ पढ़ी थीं कि नज़ीर बनारसी ने वाह-वाह की झड़ी लगा दी. थोड़ी देर तो फ़िराक़ साहब सुनते रहे मगर उनके चेहरे से ज़ाहिर था कि उनके ‘आर्ट ऑफ़ रीडिंग’ में आया यह खलल उन्हें बे-बरदाश्त लग रहा था. वे फट पड़े और नज़ीर बनारसी से बोले कि शायर हो तो कहने से पहले सुनने का शऊर पैदा करो. बड़ी मुश्किल से वे शाँत हुए और तब आगे की पंक्तियाँ आई. ...ये चाँदनी रात, ये बरखा की लड़ी नज़ीर बनारसी फिर बेसाख़्ता वाह-वाह करने लगे मगर इस बार फ़िराक़ साहब ने कोई डाँट-डपट नहीं बल्कि नज़ीर की ओर देखकर मंद-मंद मुस्कुराते रहे. नज़ीर ने उठकर उनके क़दमों में माथा टेक दिया. (लेखक इन संस्मरणों के कुछ अंशों के लिए स्वर्गीय डॉक्टर शिवानंद नौटियाल, अली सरदार जाफ़री और डॉक्टर रामकमल राय के आभारी हैं. लेखक 'दिनमान' और 'स्वतंत्र भारत' के पूर्व प्रधान संपादक हैं) | इससे जुड़ी ख़बरें एक ग़ालिब और एक रघुपति सहाय फ़िराक़03 मार्च, 2007 | पत्रिका ग़ज़ल का सफ़र और फ़िराक़ एक मंज़िल28 सितंबर, 2006 | पत्रिका सब कुछ खोने का दर्द शायर की ज़बानी20 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका 'इस्मत चुग़ताई आज़ाद औरत की पहचान थीं'23 अगस्त, 2006 | पत्रिका शोषित वर्ग के शायर थे कैफ़ी आज़मी 15 अगस्त, 2006 | पत्रिका ग़ालिब और इज़ारबंद की गाँठें01 अगस्त, 2006 | पत्रिका मजाज़: कुछ अनछुए पहलू04 दिसंबर, 2005 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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