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सब कुछ खोने का दर्द शायर की ज़बानी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जगन्नाथ आज़ाद, भारतीय साहित्य का जाना पहचाना नाम है. शायरी विरासत में मिली थी, उनके पिता डॉक्टर इक़बाल के समकालीन और अच्छे शायर थे...त्रिलोकचंद महरूम...मेरे बचपन के स्कूल के कोर्स में उनकी एक कविता थी जिसकी दो पंक्तियाँ आज भी याद हैं. रब का शुक्र अदा कर भाई पाकिस्तान बनने के बाद आज़ाद साहब भी कथाकार राजेंद्र सिंह बेदी और शायर पंडित हरिचंद अख्तर की तरह पाकिस्तान के पंजाब से उखड़कर, हिंदुस्तान के दिल्ली में बसे थे.
आबादी के इधर से उधर और उधर से इधर होने का इतिहास इतना ही पुराना है जितना यह ज़माना है. आदमी के द्वारा आदमी के शोषण की रोकथाम के लिए हर युग में, विभिन्न धर्मों में नए-नए आदर्श बनाए, नर्क-स्वर्ग के नक्शे दिखाए, मगर आदमी में छिपे जानवर फिर भी बाज़ न आए. पाकिस्तान से हिंदुस्तान आने वाले शायरों के तीन शेर उन दिनों हर जगह सुनाई देते थे. इन तीनों शेरों के शायरों के नामों को भले ही वक़्त की धूल ने धुंध ला दिया हो मगर इनमें छुपा दर्द आज भी सर्द नहीं हो पाया... काव्य में प्रभाव उस तनाव से जागता है जिससे कलाकार गुज़रता है. अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों से कटी-फटी दिल्ली को अपनी आँखों से देखने वाले मीर तक़ी मीर थे, अपनी ग़ज़लों के बारे में एक जगह कहा था- हमको शायर न कहो मीर कि साहिब हमने महान कवि व्हिटमेन की तरह गाता तो अपने ग़म को है लेकिन गाने का अंदाज़ ऐसा होता है कि आपबीती जगबीती बन जाती है, मीर का ग़म पूरी दिल्ली का ग़म बन गया था और उन तीन शेरों में भी, उन तीन शायरों के ग़म में हिंद-पाक विभाजन की पूरी त्रासदी झाँकती नज़र आती है. इंसानी ख़ून से लाल होती रेलगाड़ियाँ, माँओं से बिछड़ी संतानें, जलते-झुलसते इंसानी शरीर, ईश्वर-ख़ुदा के पाक नामों पर भेंट चढ़ती बस्तियाँ... इन सबको सआदत हसन मंटो की ‘खोल दो’ राजेंद्र सिंह बेदी की ‘छोकरी लूट’, भीष्म साहनी की ‘अमृतसर आ गया’, ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘सरदार जी’ आदि जैसी कहानियों में भी देखा जा सकता है, लेकिन कहानियों को पढ़ने में समय लगता है वहीं शेर दो पंक्तियों में तीर की तरह दिलो-जिगर को छेद देता है. ग़ज़ल का शेर ‘दोहा’ की तरह होता है, दो लाइनों में पूरे युग की अभिव्यक्ति होती है, कवि बिहारी के दोहों के बारे में इसीलिए कहा गया है. सतसाइया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर इन तीन शेरों में एक पाकिस्तानी शायर का है और दो भारतीय शायरों के. लेकिन इनमें कहा गया दर्द शक्लों से भले ही अलग-अलग हो, इस दर्द की कसक, सरहदों के पार होकर, एक ही जैसी है. पहला शेर पाकिस्तान के मशहूर शायर अब्दुल हमीद अदम का है, बड़े रंगीले शायर थे. पाकिस्तान बनने के बाद कई बार भारत के मुशायरों में आए, लेकिन जब भी आए, जहाँ भी आए होश घर में रख कर आए. इस बेहोशी को जब कभी होश आया था, (जो ईद के चाँद की तरह कम ही जगमगाता था) तब उनको पता लगता था, वह किस शहर में थे या किस देश के कोने से किस शहर को जा रहे हैं. अपनी इस शराबनोशी के डिफेंस में उन्होंने एक जगह एक शेर लिखा था. मैं मयकदे की राह से होकर गुजर गया शराब पीना समाज की नज़रों में बुरा ज़रूर है लेकिन अदम के सिलसिले में यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि शराब ने उन्हें कुछ ज़्यादा ही अच्छा इंसान बना दिया था. अच्छे इंसान से मुराद उस इंसान से है जो इंसानियत को हर धर्म से ऊँचा मानता है, और उसी रोशनी में दूसरे इंसान को पहचानता है.
विभाजन के हंगामों में अदम ने भी बहुत कुछ खोया था. कई दोस्तों की मुस्कुराहट खोई थी, शेरो शायरी की महफिलों की जगमगाहट खोई थी, गंगा-जमनी तहजीब की सजावट खोई थी, इतना बहुत कुछ खोकर वह ख़ुदा से नाराज़ हो गए थे, वह इंसान के कुसूर को रहमान के सर थोपने लगे थे, इसी नाराज़गी में एक दिन उन्हें एक जगह एक वीरान मस्जिद नज़र आई. वह उसे देखकर ठहर गए और डायरी निकाल कर एक शेर यूँ लिखा...उन दिनों दोनों तरफ कई मंदिर-मस्जिद, ऐसी ही नाराजगी के शिकार हुए. दिल खुश हुआ है मस्जिदे-वीराँ को देखकर सियासत ने अदम से पंडित हरिचंद अख्तर की जाम टकराती सोहबत छीनी थी और अख्तर से अदम के साथ ‘जिसने लाहौर नहीं वेख्या’ जैसे खूबसूरत शहर की मुहब्बत छीनी थी. अदम की तरह वह भी इस निजी लूटमार के लिए कुदरत की लानत-मलानत करने लगे, अदम पाकिस्तानी थे, वह सिर्फ़ ख़ुदा से नाराज़ हो सकते थे. पंडित जी पाकिस्तान छोड़कर हिंदुस्तान आ गए थे, इसलिए वह ख़ुदा और परमात्मा दोनों से नाराज़ रहे. वह सोचते थे उनका जो नुक़सान हुआ है उसमें खुदा के साथ, भगवान भी बराबर का शरीक है. ख़ुदा तो खैर मुसलमाँ था उससे शिकवा क्या इस क्रम का तीसरा शेर भी ख़ुदा के संबंध में है, इस शेर के शायर जगन्नाथ आज़ाद हैं. आज़ाद ने भी अदम और पंडित हरिचंद अख्तर की भाँति इस सियासी तूफान में वह सब कुछ खोया, जिसे खोकर वह जीवन भर उसे तलाश करते रहे. वह जब पाकिस्तान के मुशायरों में जाते थे तो गज़ल पढ़ते थे, चरागाँ लेके आया हूँ बहाराँ लेके आया हूँ. जब पाकिस्तान से भारत लौटते तो भारत के मुशायरों में सुनाते--चरागाँ देके आया हूँ, बहाराँ देके आया हूँ..... फिराक़ साहब ने उनकी गज़ले सुनकर कहा था, भाई अजीब शायर है यह, कभी देके आता है, कभी लेके आता है. इस टिप्पणी पर नाराज़ आज़ाद साहब फिराक़ की महानता से इनकार करते रहे, आज़ाद की आँखों ने, इन्सानी ख़ून का दरिया देखा था, अपने दोस्त, नगर और डॉक्टर इक़बाल के मज़ार को छोड़ने (इक़बाल की शायरी के वह आशिक़ थे) का दुख उनके संपूर्ण लेखन का विषय था, आज़ाद के शेर में भी निशाना ख़ुदा पर साधा गया है. कहते हैं कि आता है मुसीबत में ख़ुदा याद यूँ तो ये तीनों शेर अच्छे हैं, लेकिन आज़ाद का शेर पिछले दिनों बार-बार याद आया. आज़ाद ने 1947 के विभाजन की पीड़ा को इसमें दोहराया था और मेरा दुख इसमें छह अक्टूबर को, बेल्जियम के एक नगर ब्रसेल्स की एक चलती सड़क पर जगमगाया था. मैं नेशनल बुक ट्रस्ट की तरफ से जर्मन वर्ल्ड बुक फेयर का मेहमान था. वहाँ कई स्थानों पर कविताएँ सुनने के बाद अंतिम काव्य पाठ के लिए फ्रैंकफर्ट से ब्रसेल्स भेजा गया था. मैं कार में था- इतने में एक साहब ने बाहर से द्वार खोला और मेरे पास रखा हुआ ब्रीफकेस लेकर नौ दो ग्यारह हो गए. उसमें मेरा वह सब कुछ था जिसके खोने का दुख भी आज़ाद के दुख से कुछ कम नहीं था, इसमें एक नई कविताओं की डायरी, कई साल पहले पाकिस्तान में क़ब्र बनी मेरी माँ की इकलौती तस्वीर और वह तहरीर थी जो एक प्रेमिका की आख़िरी निशानी थी. |
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