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ग़ज़ल का सफ़र और फ़िराक़ एक मंज़िल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुज़री हुई बीसवीं सदी, जीवन के हर क्षेत्र में, बड़े-बड़े नामों से रौशन है. वह बड़े नामों और बड़े कामों का दौर था. जो अब हमारा इतिहास है.
रघुपति सहाय फ़िराक़ इसी इतिहास का हिस्सा हैं. वह शायर थे और ग़ज़ल उनकी प्रिय काव्य विधा थी. यह कई देशों का लंबा सफर तय करके भारत में आई थी. 13-14वीं सदी में इसके पहले दीदार, हिंदुस्तानी भाषा के पहले शब्दकार अमीर ख़ुसरो ने किए थे. अमीर ख़ुसरो, सूफी निज़ामुद्दीन के मुरीद थे, लेकिन आध्यात्म के साथ सीने में आशिक-मिज़ाज दिल भी रखते थे. वह ग़ज़ल के सौंदर्य से प्रभावित हुए भला कैसे रह सकते थे. उन्होंने अरब के रेगिस्तानों और ईरान के गुलिस्तानों से आने वाली इस सुंदरी को हिंदुस्तानी आभूषणों से सजाना शुरू कर दिया...हिंदुस्तानी भाषा में पहली ग़ज़ल यहीं से शुरू होती है. ख़ुसरो की ग़ज़ल का मतला है जो यार देखा नैन भर, दिल की गई चिंता उतर ख़ुसरो के बाद, संत कवि कबीर दास ने इसके रूप को निहारा और इस के रंग रूप को अपने प्रेम-दर्शन से सँवारा... हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या और इस तरह ‘ग़ज़ल’ ख़ुसरो की दिल्ली से कबीर के मगहर गई, और वहाँ से ‘भागमति’ की शक्ल में, गोलकुंडा के बादशाह मुहम्मद कुली क़ुतुबशाह के सामने आई तो नौजवान बादशाह उसका परस्तार हो गया और उसने अपनी प्रेमिका के रूप में इसे और निखारा और उसमें भागमति के नृत्य के घुंघरूओं की खनखनाहट पिरो दी. पिया बाज़ प्याला पिया जाए ना गोलकुंडा से, मुगल सम्राट शाहजहाँ के युग में, ग़ज़ल गोलकुंडा से चल करके दखन में औरंगाबाद आई और वहाँ से उसने वली को अपना हमसफ़र बनाया...और वली ने इसके साथ दिल्ली का वह सफ़र किया, जो ग़ज़ल के इतिहास का एक कारनामा माना जाता है. वली तक आते-आते, ग़ज़ल को भारत में आए काफी अरसा गुज़र चुका था. उसकी चाल ढाल और बनाव श्रृंगार के विदेशीपन में देशीपन आ चुका था. वली के साथ ग़ज़ल का अंदाज यूँ था - मत ग़ुस्से के शोले सूँ जलते को जलाती जा फ़िराक़ की ग़ज़ल ग़ज़ल का यही देसीपन जो मीर और ग़ालिब से होता हुआ, फ़िराक़ तक आया था वह फ़िराक़ के साथ उस तहज़ीब का तस्वीर बन गया जिसे गंगा-जमनी तहज़ीब के नाम से याद किया जाता है.
यह वही संस्कृति है जिसे पंडित नेहरू ने अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में 'हिंद-इस्लामी कल्चर' का नाम दिया है. वली के साथ उस ग़ज़ल की शुरूआत होती है, जिसका तरक्कीयाफ़्ता रूप फ़िराक़ के यहाँ नज़र आता है. वली के साथ, बैलगाड़ी में चलकर, ग़ज़ल का यह रूप जब औरंगजेब के युग में दिल्ली पहुँचा तो दिल्लीवालों ने न सिर्फ उसे गले लगाया, बल्कि फ़ारसी छोड़ कर इसे ही अपना आदर्श बनाया, लेकिन फ़िराक़ साहब की महानता यह है कि उन्होंने ग़ज़ल के इस बदले हुए लिबास तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखा. लिबास के साथ इसका शरीर और आत्मा भी बदली, और इसमें वह विस्तार जगाने की कोशिश भी की जो भारत की साढ़े चार हज़ार साल की तारीख़ की शान है. इन साढ़े चार हज़ार वर्षों में वह समय-खंड भी शामिल है जो भारत में इस्लाम के आगमन से प्रारंभ होता है. फ़िराक़ ने अपनी ग़ज़ल को इस कल्चर से सँवारा है, जो सांप्रदयिक राजनीति की परिभाषा के अनुसार महदूद नहीं है, ज़िंदगी के फैलाव की तरह लामहदूद है. फ़िराक़ की ग़ज़ल में वह भारत जागता हुआ महसूस होता है, जो उनसे पहले, कबीर की शब्दावली में जगमगाता था, गुरू ग्रंथ साहब में मुस्कुराता था, अकबर के दीन-ए-इलाही में झिलमिलाता था या नजीर अकबराबादी के काव्य में. फ़िराक़ ने तहज़ीब की जिस आत्मा से अपनी ग़ज़ल को सजाया था उसके संबंध में खुद उनका शेर है, सरज़मीने हिंद पर अक़बामे आलम (दुनिया की कौमें) के फ़िराक़ फ़िराक़ साहब सिर्फ शायर नहीं थे. अपने समय के बड़े आलोचक भी थे. शास्त्रीय शायरों पर उनके लेख, साहित्य को नए सिरे से पढ़ने और समझने की कामयाब कोशिशें मानी जाती है. फ़िराक़ को देखना फ़िराक़ के ज़हन को कई भाषाओं की रौशनियों ने रौशन किया था. इनमें हिंदी, उर्दू, फ़ारसी और संस्कृत के साथ अंग्रेज़ी का भी नाम है. वह महात्मा गाँधी, पंडित नेहरू, अबुल कलाम अजा़द, मौलाना हसरत मोहानी, महाकवि निराला, डॉ राधाकृष्ण आदि के युग की एक बड़ी शख़्सियत थे. क़ुदरत की इस मेहरबानी का उन्हें एहसास भी था. आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों मैं उन खुशक़िस्मत लोगों में हूँ, जिन्होंने फ़िराक़ गोरखपुरी को देखा भी था, सुना भी था, उनसे चर्चा भी की है और उनके साथ मुशायरा भी पढ़ा है. शायरी और आलोचना के अलावा उनकी बातचीत करने का तरीक़ा हर बार नया तजुर्बा होता था. वह गुफ़्तगू को हास्य की ज़हानत और व्यंग्य की हसरत से ऐसे मिलाते थे कि सुनने वाले लोट-पोट हो जाते थे. मैं जब उनसे मिला था तब वह उम्र की उस मंज़िल में दाख़िल हो चुके थे, जब वह कहीं खुद नहीं आते थे लाए जाते थे, जहाँ वह बैठते थे वहाँ बिठाए जाते थे, जहाँ से वह उठना चाहते थे वहाँ से उठाए जाते थे. लेकिन इस बुज़ुर्गियत के बावजूद, उनके हाथ से सिगरेट, बदन से शेरवानी, गोल गोल घूमती हुई आखों से हैरत, बातचीत से ज़हानत कभी रुख़सत नहीं हुई. फ़िराक़ की अदा दिल्ली में डीसीएम का मुशायरा था. सदारत उन दिनों के राष्ट्रपति फख़्ररुद्दीन अली अहमद फ़रमा रहे थे. राष्ट्रपति ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख देख कर, अपने हाथ से एक काग़ज़ पर दो जुमले लिख कर फ़िराक़ साहब तक पहुँचाए. जुमले थे, "फ़िराक़ साहब, मुझे एक सरकारी मीटिंग में जाना है, लेकिन जाने से पहले आपको सुनना चाहता हूँ." फ़िराक़ साहब ने अपने सामने फैले हुए सिगरेट के धुएं को हटाते हुए इन जुमलों को पढ़ा... और लिखकर जवाब देने के बजाए जहाँ बैठे थे वहीं से, श्रोताओं की तरफ मुँह करते हुए, ऊँची आवाज़ में कहा... साहब अच्छा शेर सुनना बड़े से बड़े सरकारी काम से ऊँचा होता है. फ़िराक़ अपने मुक़ाम से ही पढ़ेगा...फ़िराक़ साहब की बात सुनकर भारत के राष्ट्रपति को उस वक़्त तक मुशायरे में उस समय तक इंतज़ार करना पड़ा जब तक अनाउंसर ने पढ़ने के लिए फ़िराक़ साहब का नाम नहीं पुकारा. उस रात फ़िराक़ साहब थोड़ा शराब के सुरूर और अपनी अज़मत के ग़ुरूर में थे. उस वक़्त उन्होंने बिना डायरी देखे कुछ ऐसे शेर सुनाए, जो मीर और गालिब के बाद सिर्फ फ़िराक़ ही लिख सकते थे. और जिनकी वजह से रघुपति सहाय, फ़िराक़ बने... मुद्दतें गुज़रीं तेरी याद भी आई न हमें ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो और कहाँ का वस्ल तनहाई ने शायद भेस बदला है फ़िराक़ साहब कलकत्ता के एक मुशायरे में एक नए रूप में दिखाई दिए. शेर सुनाते हुए श्रोताओं में किसी के दाद देने के तरीक़े से ऐसे नाराज़ हुए कि सारे श्रोताओं की तरफ पीठ करके ग़ज़ल के बाक़ी के शेर सिर्फ स्टेज पर बैठे शायरों को सुना दिए. इसी मुशायरे में किसी नौजवान शायर का एक शेर पूरा का पूरा फ़िराक़ की नक़ल था. किसी ने उसे रोका तो उसने कहा, 'मुआफ़ कीजिए टकरा गया.' फ़िराक़ जो खामोशी से सुन रहे थे... फौरन बोले, भाई सायकिल को मोटर से टकराते तो सुना था...लेकिन साइकिल हवाई जहाज़ से भी टकरा सकती है यह पहली बार सुना. |
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