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बुधवार, 23 अगस्त, 2006 को 02:55 GMT तक के समाचार
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'इस्मत चुग़ताई आज़ाद औरत की पहचान'

इस्मत चुग़ताई
इस्मत चुग़ताई ने स्त्री और पुरुष की वर्षों पुरानी सीमाओं को लेकर साहित्यिक प्रयोग किए थे
वर्ष 1960-62 के दरमियान जब मैं समुंदरों, नारियलों, हाजी अली और सिद्धि विनायक के नगर बम्बई आया, उस वक़्त इस्मत चुग़ताई, इस्मत चुग़ताई से इस्मत आपा बन चुकी थीं.

राजेंद्र सिंह बेदी, कृशन चंदर, जाँनिसार अख़्तर, कैफ़ी आज़मी, धर्मवीर भारती और साहिर सब उनके नाम के साथ आपा लगाते थे.

उनके नाम के साथ ‘आपा’ का जुड़ाव दो तीन कारणों से था. पहला कारण उनकी उम्र थी. दूसरी वजह उनके क़लम की वह ‘बोल्डनेस’ थी जो सआदत हसन मंटो से भी एक क़दम आगे थी.

मंटो तो स्त्री-पुरुष के रिश्तों तक ही सीमित थे. इस्मत ने ‘लिहाफ़’ लिखकर औरतों के आपसी संबंधों को भी बेनक़ाब किया. इस कहानी पर अंग्रेज़ी हुकूमत के दौरान उन पर अश्लीलता का मुक़दमा भी चल चुका था.

तीसरी वजह यह भी कि वह बम्बई के सारे प्रगतिशील साहित्यकारों को अपना परिवार मानती थीं और उनके दुख-सुख में शरीक रहती थीं. वह एक जीती जागती अदालत थीं. जिनके फ़ैसलों का सब एहतिराम करते थे.

तराशे हुए बिना चोटी के बहुत सारे सफ़ेद बाल, पानों के मुसलसल इस्तेमाल से रंगी हुई बुढ़ापे की कम उम्र लाल मुस्कुराहट, पुराने चश्में से झाँकती नई आँखें और मेरठ की तेज़धार कैंची की तरह चलती तेज़ ज़बान, जिसमें स्त्री पुरुष की बातचीत के दायरे हमेशा एक दूसरे को लाँघते-फलाँगते रहते थे.

 उनकी शख़्सियत की ख़ास पहचानें थीं. वह जिस जगह होती थीं बोलने का हक़ सिर्फ़ उन्हीं को होता था. जो इस अनुबंध को तोड़ने का साहस करता था तो उनके किसी जुमले का ऐसे शिकार होता था कि वह कई दिनों अपनी मर्दानगी पर शक करता था

उनकी शख़्सियत की ख़ास पहचानें थीं. वह जिस जगह होती थीं बोलने का हक़ सिर्फ़ उन्हीं को होता था. जो इस अनुबंध को तोड़ने का साहस करता था तो उनके किसी जुमले का ऐसे शिकार होता था कि वह कई दिनों तक अपनी मर्दानगी पर शक करता था.

इस्मत आपा ने ‘मैं क्यों लिखती हूँ’ नामक लेख में लिखा है, ‘‘मुझे रोती, बिसूरती, हराम के बच्चे जनती, मातम करती औरत से नफ़रत है. बेकार की शर्मोहया और वे सारी ख़ूबियाँ जो औरत का ज़ेवर समझी जाती हैं मुझे लानत मालूम होती है.’’

इस्मत आपा ने स्त्री और पुरुष की वर्षों पुरानी सीमाओं को गड्ड-मड्ड करने का जो साहित्यिक प्रयोग किया है वह उनका एक तारीख़ी कारनामा है. वह ग़ुलाम हिंदुस्तान में आज़ाद औरत की ज़िंदा पहचान थीं.

मुलाक़ात

यूँ तो उनसे कई बार मिलना हुआ. कभी किसी गोष्ठी में कहानी सुनाते, कभी किसी साहित्यकार के घर में घरेलू झगड़ा निपटाते, कभी अपनी चटखदार जुमलों से मर्दों को शर्माते और औरतों को हँसाते, कभी मुशायरों में अनूठे संचालन से श्रोताओं को झुमाते.

लेकिन आख़िरी बार जब उनसे मिला था, उसकी याद दर्दनाक भी है और हैरतनाक भी. उस वक़्त उनकी लंबी उम्र सिमट कर वही कमसिन बच्ची बन गई थी.

जिसका ज़िक्र कभी उन्होंने यूँ किया था, ‘‘घर में सबसे छोटी थी और साँवले रंग की वजह से सब मुझे कल्लो के नाम से पुकारते थे. सीना-पिरोना, खाना-पकाना सीखने के बजाए मैं दिन भर गुल्ली-डंडा, कबड्डी या पेड़ों पर गिलहरी की तरह उतरने-चढ़ने में खोई रहती थी. भाइयों के साथ छतों, मुडेरों पर बंदरों की तरह मुझे कूदती-उछलती देखतीं मोहल्ले की बड़ी बूढ़ियाँ एक दूसरे से कहतीं - यह नुसरत (माँ का नाम) की लौंडिया है या मुआ बिजार, तौबा.’’

इस्मत आपा फिर से अपना बचपन जीने लगी थीं. मैं उनसे उन्हीं पर बनने वाली डाक्यूमेंट्री के सिलसिले में मिला था.

 वह किसी जगह स्थिर नहीं बैठती थीं. थोड़ी सी बात कहतीं, फिर चुप होकर ख़ाली आँखों से इधर-उधर देखने लगतीं और फिर अचानक छज्जे पर उतर के नाचने लगतीं. कभी गैलरी में रखे गमलों के फूलों और बेलों से किसी अजनबी भाषा में बात करतीं

वह किसी जगह स्थिर नहीं बैठती थीं. थोड़ी सी बात कहतीं, फिर चुप होकर ख़ाली आँखों से इधर-उधर देखने लगतीं और फिर अचानक छज्जे पर उतर के नाचने लगतीं. कभी गैलरी में रखे गमलों के फूलों और बेलों से किसी अजनबी भाषा में बातें करतीं.

अब वह अगला-पिछला सब कुछ भूल चुकी थीं. उनकी बातचीत अब असंभव और ‘सुरियलिस्टिक’ हो चुकी थी. मेरे सवाल कुछ होते उनके जवाब कुछ होते.

सवाल उनकी एकल पात्रीय कहानियों के बारे में होता. जवाब में वह उस कश्मीरी शाल की कहानी सुनाने लगतीं, जो उनकी बेटी सीमा ने आकर उन्हें इस वक़्त उढ़ाई थी.

वह मेरी ओर देखते हुए कहने लगीं, “मालूम है तुम्हें यह शाल किसकी है? तुम क्या जानो, तुम तो जदीद शायर हो, प्रगतिशीलों के मुख़ालिफ़. (उस समय साहित्य जदीद और तरक्कीपसंद खानों में बँटा हुआ था.) फ़्राँस का बादशाह एक बार मुझे जहाज़ में मिला था. गोरा सुर्ख... मुझे देखकर वह मुस्कुराया. मैं कहाँ चूकने वाली थी. मैंने भी दाँत दिखा दिए. बस दोस्ती हो गई. पुराना ज़माना थोड़े ही था, जो दोस्ती में बरसों लग जाएँ. हाँ, तो उसने मेरी शाल ख़ुद ओढ़ ली और अपनी शाल मुझे पहना दी. यह उसकी मुहब्बत का तोहफ़ा है.”

महिला और राजनीति का रिश्ता

मैंने सवाल किया, महिला और राजनीति का रिश्ता किस स्तर पर क़ायम होना चाहिए.

और जवाब में वह पंडित नेहरू से अपनी मुलाक़ात का जिक़ करने लगीं. “पता है तुम्हें, पंडित जी से मैं कब मिली थी. उस वक़्त मैं पाँच साल की थी. मैं अपने बंगले के बाग में थी. मैंने एक नीम के नीचे से एक बिनौली उठाई और उससे दूसरा नीम उगा रही थी. फिर क्या देखती हूँ. दो गोरे-गोरे खरगोशों जैसे दो पाँव मेरे क़रीब आकर रुक गए. सर उठाकर देखा तो सामने नेहरू जी. उन्होंने मुझे काम करते देखा तो मेरा हाथ बँटाने लगे. पंडित जी ने क्यारी में ख़ुद पानी दिया. उनका वक़्त बहुत क़ीमती था. लेकिन वह मुझसे मिलने आए.”

एक और प्रश्न के बीच में वह रवीन्द्रनाथ टैगोर को ले आईं. “भई तुम्हें क्या बताऊँ, वह कैसे थे. मैंने उनकी कहानियाँ पढ़ी थीं. वह भी थोड़ा बहुत मुझे जानते थे.”

आप उनसे कहाँ मिलीं. मैंने उनसे पूछा तो कहने लगीं, “मैं उनसे मिलने शांति निकेतन गई. दबे-दबे पाँव धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़कर मैं उस कमरे में दाखिल हुई जहाँ गुरुदेव एक पुरानी बेंत की कुर्सी पर चुपचाप बैठे थे.”

 अपने चलते-फिरते गद्य, मानवीय वेदना और निडर होशियारी की वजह से वह प्रेमचंद के बाद के दौर की कहानी की ऐतिहासिक इमारत में, कृशन चंदर, बेदी, मंटो के साथ चौथे स्तंभ की हैसियत से आज भी जीवित हैं

उन्होंने आगे कहा, “कमरे की ख़ामोशी में चितकबरी रौशनी फैली थी. हवा तक चुप थी. फर्श पर उनके पाँव चमेली की ढेरियों से लगते थे. बहुत मुलायम और रेशमी थे वे. उनके लंबे-लंबे बालों में सिर के ऊपर एक छोटी-सी चिड़िया बैठी थी. उन्होंने मुझे आते देखा तो होठों पर उंगली रख कर मुझे रूक जाने को कहा. मैं रूक गई. उन्हें शायद डर था कि मेरे पैरों की आहट से वह छोटी-सी चिड़िया उड़ जाएगी. लगता है मेरी कहानी लिहाफ़ में पैरों की आहटें उन्होंने सुनी थीं.”

इस्मत आप की ऐसी बातें सुनकर डायरेक्टर घबराया हुआ था.

इस शूटिंग के कुछ दिन बाद ही इस्मत आपा बच्ची से फिर बूढ़ी होकर इंतकाल कर गईं. और पहले से लिखी उनकी वसीयत के मुताबिक़ उन्हें बम्बई के चंदनबाड़ी के श्मशान में आग के सुपुर्द कर दिया गया.

सब कुछ राख हो गया. बची रही एक मुट्ठी भर राख और उसी के साथ खरगोशों जैसे गोरे पाँव, चमेली के फूलों की ढेरियों जैसे पाँव, फ़्राँस के गोरे सुर्ख़ बादशाह की दी हुई शाल और गुरूदेव की जटाओं में पर समेटे बैठी हुई रंगीन-सी छोटी-सी चिड़िया, सब यादों की टेढ़ी मेढ़ी लकीरों में तब्दील हो गया.

उन असंबद्ध आकारों की ओट में उनकी शख्सियत के कौन-कौन से ख़ाली कोने झांकते हैं, वे कौन-कौन सी दबी आवाज़ें थीं जो अजीबो-ग़रीब खिलौने बनकर उन्हें बहला रहे थे. ये सारे रहस्य भी उनके पार्थिव शरीर की तरह आग की बंद मुट्ठी में विलीन हो गए.

अपने चलते-फिरते गद्य, मानवीय वेदना और निडर होशियारी की वजह से वह प्रेमचंद के बाद के दौर की कहानी की ऐतिहासिक इमारत में, कृशन चंदर, बेदी, मंटो के साथ चौथे स्तंभ की हैसियत से आज भी जीवित हैं.

कबीर दास की पंक्तियाँ हैं,

करनी की कथनी कहे अज्ञानी की जात
ज्यों कूकर भौंकत फिरै सुनी सुनाई बात

इस्मत आपा ने भी सुनी सुनाई को रद्द करके करनी को कथनी का हिस्सा बनाया था और इस सच में अपने लेखन में लंबी उम्र का जादू जगाया था.

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