|
शेर लिख कर सुलह की एक बाग़ी बेटे ने | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
18 अगस्त 1976 को मेरे बाप की मृत्यु होती है(मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आख़िरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उसपर लिखा था-"जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे." (उन्होंने ठीक लिखा था). अब तक तो मैं अपने आपको एक बाग़ी और नाराज़ बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हूँ. मैं अपने-आपको और फिर अपने चारो तरफ़, नई नज़रों से देखता हूँ कि क्या बस यही चाहिए था मुझे ज़िंदगी से. इसका पता अभी दूसरों को नहीं है मगर वो तमाम चीज़ें जो कल तक मुझे खुशी देती थीं झूठी और नुमाइशी लगने लगी हैं. अब मेरा दिल उन बातों में ज़्यादा लगता है जिनसे दुनिया की ज़बान में कहा जाए तो, कोई फ़ायदा नहीं. शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है. लड़कपन से जानता हूँ कि चाहूँ तो शायरी कर सकता हूँ मगर आज तक की नहीं है. ये मेरी नाराज़गी और बग़ावत का एक प्रतीक है. 1979 में पहली बार शेर कहता हूँ और ये शेर लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है. इसी दौरान मेरी मुलाक़ात शबाना से होती है. कैफ़ी आज़मी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ़ लौट रही है. उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी नहीं सोचा था. कोई हैरत नहीं कि हम क़रीब आने लगते हैं. धीरे-धीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है. फ़िल्मी दुनिया में जो मेरी पार्टनरशिप थी टूट जाती है. मेरे आसपास के लोग मेरे अंदर होनेवाली इन तब्दीलियों को परेशानी से देख रहे हैं. 1983 में मैं और हनी अलग हो जाते हैं. (हनी से मेरी शादी ज़रूर टूट गई मगर तलाक भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सकी. और अगर माँ-बाप के अलग होने से बच्चों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ़ बहुत ज़्यादा है. हनी आज एक बहुत कामयाब फ़िल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त. मैं दुनिया में कम लोगों को इतनी इज़्ज़त करता हूँ जितनी इज़्ज़त मेरे दिल में हनी के लिए है.) मैंने एक क़दम उठा तो लिया था मगर घर से निकल के कई बरसों के लिए मेरी ज़िंदगी "कटी उम्र होटलों में मरे अस्पताल जाकर" जैसी हो गई. शराब पहले भी बहुत पीता था मगर फिर बहुत ही ज़्यादा पीने लगा. ये मेरी ज़िंदगी का एक दौर है जिस पर मैं शर्मिंदा हूँ. इन चंद बरसों में अगर दूसरों ने मुझे बर्दाश्त कर लिया तो ये उनका एहसान है. बहुत मुमकिन था कि मैं यूँ ही शराब पीते-पीते मर जाता मगर एक सबेरे किसी की बात ने ऐसा छू लिया कि उस दिन से मैंने शराब को हाथ नहीं लगाया और न कभी लगाऊँगा. आज इतने बरसों बाद जब अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ तो लगता है कि पहाड़ों से झरने की तरह उतरती, चटानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूँढ़ती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भँवर बनाती, तेज़ चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई है.
मेरे बच्चे ज़ोया और फ़रहान बड़े हो गए हैं और बाहर की दुनिया में अपना पहला कदम रखने को हैं. उनकी चमकती हुई आँखों में आने वाले कल के हसीन ख़्वाब हैं. सलमान, मेरा छोटा भाई, अमेरिका में एक कामयाब साइकोएनालिस्ट, बहुत-सी किताबों का लेखक, बहुत अच्छा शायर, एक मोहब्बत करने वाली बीवी का पति और दो बहुत ज़हीन बच्चों का बाप है. ज़िंदगी के रास्ते उसके लिए कुछ कठिन नहीं थे मगर उसने अपनी अनथक मेहनत और लगन से अपनी हर मंज़िल पा ली है. और आज भी आगे बढ़ रहा है. मैं खुश हूँ और शबाना भी, जो सिर्फ़ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है. जो एक ख़ूबसूरत दिल भी है और एक क़ीमती ज़हन भी. "मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत हैं"- ये पंक्ति अगर बरसों पहले मज़ाज़ ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता. आज यूँ तो ज़िंदगी मुझ पर हर तरह से मेहरबान है मगर बचपन का वो एक दिन, 18 जनवरी 1953 अब भी याद आता है. जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर-रोती हुई मेरी ख़ाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढे छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती हैं जहाँ फ़र्श पर बहुत सी औरतें बैठी हैं. तख़्त पर सफ़ेद कफ़न में लेटी मेरी माँ का चेहरा खुला है. सिरहाने बैठी मेरी बूढ़ी नानी थकी-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं. दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं. मेरी खाला हम दोनों बच्चों को उस तख़्त के पास ले जाती हैं और कहती है, अपनी माँ को आख़िरी बार देख लो. मैं कल ही आठ बरस का हुआ था. समझदार हूँ. जानता हूँ मौत क्या होती है.
मैं अपनी माँ के चेहरे को बहुत ग़ौर से देखता हूँ कि अच्छी तरह याद हो जाए. मेरी ख़ाला कह रही हैं-इनसे वादा करो कि तुम ज़िंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करों कि तुम ज़िंदगी में कुछ करोगे. मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूँ और फिर कोई औरत मेरी माँ के चेहरे पर कफ़न ओढ़ा देती है- ऐसा तो नहीं है कि मैंने ज़िंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर ये ख़्याल आता है कि मैं जितना कर सकता हूँ उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख़्याल को दी हुई बेचैनी जाती नहीं. समाप्त (फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर का यह आत्मकथ्य उनके काव्य संग्रह 'तरकश' से लिया गया है) |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||