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लखनऊ से अलीगढ़ तक का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोग जब अपने बारे में लिखते हैं तो सबसे पहले यह बताते हैं कि वो किस शहर के रहने वाले हैं- मैं किस शहर को अपना शहर कहूँ? पैदा होने का जुर्म ग्वालियर में किया लेकिन होश संभाला लखनऊ में, पहली बार होश खोया अलीगढ़ में, फिर भोपाल में रहकर कुछ होशियार हुआ लेकिन बम्बई आकर काफ़ी दिनों तक होश ठिकाने रहे, तो आइए ऐसा करते हैं कि मैं अपनी ज़िंदगी का छोटा सा फ़्लैश बैक बना लेता हूँ. इस तरह आपका काम यानी पढ़ना भी आसान हो जाएगा और मेरा काम भी, यानी लिखना. शहर लखनऊ... किरदार- मेरे नाना, नानी दूसरे घरवाले और मैं... मेरी उम्र आठ बरस है. बाप बम्बई में है, माँ क़ब्र में. दिन भर घर के आँगन में अपने छोटे भाई के साथ क्रिकेट खेलता हूँ. शाम को ट्यूशन पढ़ाने के लिए एक डरावने से मास्टर साहब आते हैं. उन्हें पंद्रह रुपए महीना दिया जाता है (यह बात बहुत अच्छी तरह याद है, इसलिए कि रोज़ बताई जाती थी). सुबह ख़र्च करने के लिए एक अधन्ना और शाम को एक इकन्नी दी जाती है, इसलिए पैसे की कोई समस्या नहीं है. सुबह रामजी लाल बनिए की दुकान से रंगीन गोलियाँ खरीदता हूँ और शाम को सामने फ़ुटपाथ पर ख़ोमचा लगाने वाले भगवती चाट पर इकन्नी लुटाता हूँ. ऐश ही ऐश है. अमीर बनने का सपना स्कूल खुल गए हैं. मेरा दाख़िला लखनऊ के मशहूर स्कूल कॉल्विन ताल्लुक़ेदार कॉलेज में छठी क्लास में करा दिया जाता है. पहले यहाँ सिर्फ़ ताल्लुक़ेदारों के बेटे पढ़ सकते थे, अब मेरे जैसे कमज़ातों को भी दाख़िला मिल जाता है. अब भी बहुत महँगा स्कूल है... मेरी फ़ीस सत्रह रुपए महीना है (यह बात बहुत अच्छी तरह याद है, इसलिए कि रोज़...जाने दीजिए). मेरी क्लास में कई बच्चे घड़ी बाँधते हैं. वो सब बहुत अमीर घरों के हैं. उनके पास कितने अच्छे-अच्छे स्वेटर हैं. एक के पास तो फाउन्टेन पेन भी है. यह बच्चे इन्टरवल में स्कूल की कैंटीन से आठ आने की चॉकलेट ख़रीदते हैं (अब भगवती की चाट अच्छी नहीं लगती). कल क्लास में राकेश कह रहा था उसके डैडी ने कहा है कि वो उसे पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजेंगे. कल मेरे नाना कह रहे थे... अरे कमबख़्त! मैट्रिक पास कर ले तो किसी डाकख़ाने में मोहर लगाने की नौकरी तो मिल जाएगी. इस उम्र में जब बच्चे इंजन ड्राइवर बनने का ख़्वाव देखते हैं, मैंने फ़ैसला कर लिया है कि बड़ा होकर अमीर बनूँगा... अलीगढ़ में शहर अलीगढ़... किरदार-मेरी ख़ाला, दूसरे घरवाले और मैं... मेरे छोटे भाई को लखनऊ में नाना के घर में ही रख लिया गया है और मैं अपनी ख़ाला के हिस्से में आया हूँ जो अब अलीगढ़ आ गई हैं. ठीक ही तो है. दो अनाथ बच्चों को कोई एक परिवार तो नहीं रख सकता. मेरी ख़ाला के घर के सामने दूर जहाँ तक नज़र जाती है मैदान है. उस मैदान के बाद मेरा स्कूल है... नौवीं क्लास में हूँ, उम्र चौदह बरस है. अलीगढ़ में जब सर्दी होती है तो झूठमूठ नहीं होती. पहला घंटा सात बजे होता है. मैं स्कूल जा रहा हूँ. सामने से चाक़ू की धार की जैसी ठंडी और नुकीली हवा आ रही है. छूकर भी पता नहीं चलता कि चेहरा अपनी जगह है या हवा ने नाक-कान काट डाले हैं. वैसे पढ़ाई में तो नाक कटती ही रहती है. पता नहीं कैसे, बस, पास हो जाता हूँ. इस स्कूल में, जिसका नाम मिंटो सर्किल है, मेरा दाख़िला कराते हुए मेरे मौसा ने टीचर से कहा... ख़्याल रखिएगा, इनका दिल पढ़ाई में कम फ़िल्मी गानों में ज़्यादा लगता है. दिलीप कुमार की उड़न खटोला, राजकपूर की श्री चार सौ बीस देख चुका हूँ. बहुत से फ़िल्मी गाने याद हैं, लेकिन घर में ये फ़िल्मी गाने गाना तो क्या, सुनना भी मना है इसलिए स्कूल से वापस आते हुए रास्ते में ज़ोर-ज़ोर से गाता हूँ (माफ़ कीजिएगा, जाते वक़्त तो इतनी सर्दी होती थी कि सिर्फ़ पक्के राग ही गाए जा सकते थे) शेष बाद में... (फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर की यह आपबीती उनके काव्य संग्रह 'तरकश' से ली गई है) |
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