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मुश्ताक सिंह की दोस्ती और बंबई का संघर्ष | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तीसरा अंक... कॉलेज का यह कमरा भी जाता रहा. अब मैं मुश्ताक़ सिंह के साथ हूँ. मुश्ताक़ सिंह नौकरी करता है और पढ़ता है. वो कॉलेज की उर्दू एसोसिएशन का सद्र है. मैं बहुत अच्छी उर्दू जानता हूँ. वो मुझसे भी बेहतर जानता है. मुझे अनगिनत शेर याद हैं. उसे मुझसे ज़्यादा याद हैं. मैं अपने घर वालों से अलग हूँ. उसके घर वाले हैं ही नहीं. ... देखिए हर काम में वो मुझसे बेहतर है. साल भर से वो मुझसे दोस्ती खाने-कपड़े पर निभा रहा है यानी खाना भी वही खिलाता है और कपड़े भी वही सिलवाता है-पक्का सरदार है-लेकिन मेरे लिए सिगरेट ख़रीदना उसकी ज़िम्मेदारी है. मुश्ताक सिंह अब मैं कभी-कभी शराब भी पीने लगा हूँ. हम दोनों रात को बैठे शराब पी रहे हैं. वो मुझे विभाजन और उस ज़माने के दंगों के क़िस्से सुना रहा है. वो बुहत छोटा था लेकिन उसे याद है-कैसे दिल्ली के क़रोलबाग़ में दो मुसलमान लड़कियों को जलते हुए तारकोल के ड्रम में डाल दिया गया था और कैसे एक मुसलमान लड़के को... मैं कहता हूँ, "मुश्ताक सिंह! तू क्या चाहता है जो एक घंटे से मुझे ऐसे क़िस्से सुना-सुनाकर मुस्लिम लीग बनाने की कोशिश कर रहा है-ज़ुल्म की ये ताली तो दोनों हाथों से बजी थी-अब ज़रा दूसरी तरफ की भी तो कोई वारदात सुना." मुश्ताक़ सिंह हँसने लगता है..."चलो सुना देता हूँ-जग बीती सुनाऊँ या आप बीती" मैं कहता हूँ "आप बीती" और वो जवाब देता है, "मेरा ग्यारह आदमियों का ख़ानदान था - दस मेरी आँखों के सामने क़त्ल किए गए हैं..." मुश्ताक़ सिंह को उर्दू के बहुत से शेर याद हैं. मैं मुश्ताक़ सिंह के कमरे में एक साल से रहता हूँ. बस एक बात समझ में नहीं आती-"मुश्ताक सिंह तुझे उन लोगों ने क्यों छोड़ दिया? तेरे जैसे भले लोग चाहे किसी ज़ात किसी मज़हब में पैदा हों हमेशा सूली पर चढ़ाए जाते हैं, तू कैसे बच गया?"
...आजकल वो ग्लासगो में हैं. जब हम दोनों अलग हो रहे थे तो मैंने उसका कड़ा उससे लेकर पहन लिया था और वह आज तक मेरे हाथ में है और जब भी उसके बारे में सोचता हूँ ऐसा लगता है कि वो मेरे सामने हैं और कह रहा है, बंबई में... शहर बंबई...किरदार - फ़िल्म इंडस्ट्री, दोस्त, दुश्मन और मैं... 4 अक्टूबर 1964, मैं बंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा हूँ. अब इस अदालत में मेरी ज़िंदगी का फ़ैसला होना है. बंबई आने के छह दिन बाद बाप का घर छोड़ना पड़ता है. जेब में सत्ताईस नए पैसे हैं. मैं खुश हूँ कि ज़िंदगी में कभी अट्ठाईस नए पैसे भी जेब में आ गए तो मैं फ़ायदे में रहूँगा और दुनिया घाटे में. बंबई में दो बरस होने को आए, न रहने का ठिकाना है न खाने का. यूँ तो एक छोटी-सी फ़िल्म में सौ रुपए महीने पर डॉयलॉग लिख चुका हूँ. कभी कहीं असिस्टेंट हो जाता हूँ, कभी एक-आध छोटा-मोटा काम मिल जाता है, अक्सर वो भी नहीं मिलता. दादर एक प्रोड्यूसर के ऑफ़िस अपने पैसे माँगने आया हूँ, जिसने मुझसे अपनी पिक्चर के कॉमेडी सीन लिखवाए थे. ये सीन उस मशहूर राइटर के नाम से ही फ़िल्म में आएँगे जो ये फ़िल्म लिख रहा है. ऑफ़िस बंद है. वापस बांदरा जाना है जो काफी दूर है. पैसे बस इतने हैं कि या तो बस का टिकट ले लूँ या कुछ खा लूँ, मगर फिर पैदल वापस जाना पड़ेगा. चने ख़रीदकर जेब में भरता हूँ और पैदल सफ़र शुरू करता हूँ. कोहेनूर मिल्स के गेट के सामने से गुज़रते हुए सोचता हूँ कि शायद सब बदल जाए लेकिन ये गेट तो रहेगा. एक दिन इसी के सामने से अपनी कार से गुज़रूँगा. एक फ़िल्म में डॉयलॉग लिखने का काम मिला है. कुछ सीन लिखकर डायरेक्टर के घर जाता हूँ. वो बैठा नाश्ते में अनानास खा रहा है, सीन लेकर पढ़ता है और सारे काग़ज़ मेरे मुँह पर फेंक देता है और फ़िल्म से निकालते हुए मुझे बताता है कि मैं ज़िंदगी में कभी राइटर नहीं बन सकता. तपती धूप में एक सड़क पर चलते हुए मैं अपनी आँख के कोने में आया एक आँसू पोछता हूँ और सोचता हूँ कि मैं एक दिन इस डायरेक्टर को दिखाऊँगा कि मैं... फिर जाने क्यों ख़्याल आता है कि क्या ये डायरेक्टर नाश्ते में रोज़ अनानास खाता होगा? शेष अगले अंक में... (फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर का यह आत्मकथ्य उनके काव्य संग्रह 'तरकश' से लिया गया है) |
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