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गुरुवार, 12 जनवरी, 2006 को 11:53 GMT तक के समाचार
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एक मज़दूर कवि का दर्द

जीवन ठाकुर
जीवन ठाकुर की कविताओं में संघर्षमय जीवन की झलक दिखाई देती है
जीवन ठाकुर ने पूरब के मैनचेस्टर कहे जाने वाले अहमदाबाद को बरबाद होते देखा है. उन्होंने इस प्रक्रिया को मिल मज़दूर और एक कवि दोनों के नज़रिए से देखा है.

उन्होंने देखी है मिल बंद होने के बाद बेरोज़गार हुए मज़दूर की दुर्दशा और उतारा है उसे कागज़ पर.

उनके शब्दों में कहें तो उन्होंने कलम के ज़रिए आक्रोश व्यक्त किया है क्योंकि मज़दूर को सरकार, मिल मालिक और यूनियन सबने उनके हाल पर छोड़ दिया है.

ठाकुर अपनी पसंदीदा पंक्तियाँ गुनगुनाते हैं-मरते हुए मैनचेस्टर की मरी हुई मिलों की लाश के पास, मैं एक कामदार कवि, मैय्यत उठाने वालों की राह देखते हुए, आँसू भरी आँखों से कविता लिख रहा हूँ.

जीवन ठाकुर बताते हैं कि उन्हें बचपन से पढ़ने का शौक था और वी शांताराम की नवरंग फ़िल्म के रास ने उन्हें जीवन में रंग भर दिया तो उन्होंने लिखना शुरू कर दिया.

पर मिल की नौकरी और आर्थिक बोझ ने उनसे लेखन छीन लिया. पर उनका कहना है कि 1980 के दशक में बेरोज़गार होने पर उन्हें उनकी कविता वापिस मिल गई.

 मरते हुए मैनचेस्टर की मरी हुई मिलों की लाश के पास, मैं एक कामदार कवि, मैय्यत उठाने वालों की राह देखते हुए, आँसू भरी आँखों से कविता लिख रहा हूँ
कवि जीवन ठाकुर

ठाकुर कहते हैं कुछ दोस्तों ने मुझे ज़ोर देकर कहा लाचार मज़दूर की बात मैं नहीं लिखूँगा तो कौन लिखेगा.

तब से लिखने का सिलसिला फिर शुरू हो गया. उन्होंने 70 मिलों की गिनती घटकर 15 होती देखी है.

उनका एक बेटा एक छोटी मिल की नौकरी करता है तो दूसरा छोटा मोटा काम करता है.

उनका कहना है कि उनकी कविता केवल मज़दूर और आम आदमी के लिए है और वह हिंदू मुस्लिम एकता की बात कहती है.

यह पूछे जाने पर कि बेकारी और परेशानियों के बावजूद 2002 जैसे दंगे क्यों होते हैं, उनका जवाब था जब मिलें चालू थीं तो हिंदू और मुसलमान क़रीब थे. एकदूसरे को लेकर आँखों की शरम थी.

इच्छा शक्ति की कमी

 खों...खों... खास्ते, कराहते, मज़दूर की छाती में, फेफड़ों में,मशीनों से तराशी हुई, सिद्दी सईद की जाली को, देखते देखते मैं कविता लिख रहा हूँ.
जीवन ठाकुर

मिलें बंद होने के साथ ही वो शरम भी चली गई. आज किसी में इच्छाशक्ति ही नहीं है. हरतरफ राजनीति की रोटी सेंकी जा रही है.

पुराने वक्त की याद करते हुए वो कहते हैं कि पहले के मिल मालिक मज़दूरों के बारे में थोड़ा सोचते थे. पर एक के बाद एक मिल बंद होते देखकर उन्होंने भी मुंह फेर लिया.

अहमदाबाद के पुरानी मिलों के अपने घर में दिन गुजारते हुए वो कहते हैं आज इस हिस्से की किसी को चिंता नहीं. सब सुविधाएं और ध्यान दूसरी ओर हैं.

ठाकुर कहते हैं आज टीवी इंटरनेट और कंप्यूटर जैसे साधन आ गए हैं. कवि और कविता को कोई नहीं पूछता. यह बताने पर कि मैं एक कवि हूँ कोई बैठाने को कुर्सी तक नहीं देता.

आखिर ग़रीब आदमी कहाँ से इंटरनेट और कंप्यूटर लाएगा. ठाकुर की प्रगतिशील कविताएं और लेख गुजराती में लिखे गए हैं.

वे ख़ुद ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं. उनकी शैली का कवि गुजरात के मौजूदा दौर में ढूंढ पाना बहुत मुश्किल है. अंत में वो कुछ और पंक्तियाँ गुनगुनाते हैं.

खों...खों... खास्ते, कराहते
मज़दूर की छाती में, फेफड़ों में
मशीनों से तराशी हुई
सिद्दी सईद (अहमदाबाद की एक ख़ास इमारत) की जाली को
देखते देखते मैं कविता लिख रहा हूँ.

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