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कवि की फाँसी न देने की गुहार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तमिलनाडु की जेल में बंद कैदी राधाकृष्णन को मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है लेकिन अब उनकी कविताओं ने साहित्यकारों और नेताओं को प्रभावित किया है और उनकी सज़ा कम करने की अपील की जा रही है. राधाकृष्णन ने 1994 में एक अदालत में एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी, तब उनकी उम्र 26 वर्ष थी. 'कारा के मोती' नाम के उनके तमिल कविता संग्रह की काफ़ी तारीफ़ हो रही है. राधाकृष्णन की अपील को अदालत ने ठुकरा दिया है और अब उनकी तरफ़दारी कर रहे लोगों की उम्मीद है कि शायद शौक़िया कविता लिखने वाले राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम उन्हें क्षमादान दे दें. राधाकृष्णन के संग्रह के प्रकाशक ने बताया है कि पचपन रूपए मूल्य की इस किताब की बिक्री से होने वाली आय अनाथ बच्चों के कल्याण के लिए काम करने वाली एक संस्था दे दी जाएगी. उनकी कविताओं में इराक़ की लड़ाई से लेकर श्रीलंका की स्थिति तक की चर्चा है. नेता प्रभावित लेखन से जुड़े रहे द्रमुक पार्टी के नेता और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम करूणानिधि ने भी उनकी कविताओं की प्रशंसा की है. भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रह चुके जना कृष्णमूर्ति को भी राधाकृष्णन की कविताएँ बहुत पसंद आईं. वे कहते हैं, "यह बहुत चौंकाने वाली बात है कि जिस व्यक्ति को फाँसी दी जाने वाली हो उसके हृदय से ऐसे साहित्यक रचनाएँ फूट रही हों." जना कृष्णमूर्ति ने एक भावुक बयान में कहा है, "उनकी कविताएँ पढ़ने के बाद प्रार्थना करने को जी चाहता है कि उन्हें फाँसी न दी जाए. उनके रचनात्मक दिमाग़ को काम करते रहने दिया जाए." राधाकृष्णन ने एक ऐसे व्यक्ति की हत्या कर दी थी जिसके ऊपर उनके एक दोस्त के मवेशियों को मारने का आरोप था. सलेम जेल में बंद राधाकृष्ण एमए पास हैं और कंप्यूटर विज्ञान की उनकी पढ़ाई अब भी जारी है. उनकी फाँसी की कोई तारीख़ अभी तय नहीं हुई है. चौदह अगस्त को धनंजय चटर्जी को कोलकाता में फाँसी दिए जाने के बाद भारत में मृत्युदंड को लेकर बहुत चर्चा और बहस होती रही है. |
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