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डॉम मॉरेस नहीं रहे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन में वे कई साल रहे. वे कहा करते थे कि उन्होंने अपनी शिक्षा पिता की अंग्रेज़ी साहित्य की क़िताबों से पाई. मॉरेस कभी भी भारत की किसी भी भाषा को प्रवाह से सीख नहीं पाए. लेकिन अंग्रेज़ी में उनका जवाब नहीं था. यूँ कहिए कि बचपन में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखानी शुरू कर दी थी. कविताओं की अपनी पहली क़िताब के लिए इंग्लैंड का मुख्य साहित्यिक पुरस्कार पाने वाले वे पहले ग़ैर ब्रिटिश व्यक्ति थे. और तब उनकी उम्र थी सिर्फ़ 19 साल. लंदन में उन्होंने एक स्वतंत्र विचार वाले लेखक की ज़िंदगी जी. फिर अपनी पत्नी को छोड़ा, दुनिया की सैर करते हुए ज़िंदगी काटने के लिए. बहुआयामी व्यक्तित्व मॉरेस एक पत्रकार रहे, हांगकांग और न्यूयॉर्क और में पत्रिकाओं का संपादन किया, और संयुक्त राष्ट्र में भी काम किया. उन्हें अकसर अंग्रेज़ी में भारत का सर्वश्रेष्ठ कवि कहा जाता था लेकिन यात्राएँ करते समय किया हुआ या कविता के अलावा उनका अन्य लेखन कम ही छपा है. मॉरेस के हिसाब से वे भारत की हिंसा और असहनशीलता को पसंद नहीं करते थे लेकिन अपनी ज़िंदगी के अंत में वे मुंबई में ही जा बसे, हालांकि यह कहते रहे कि उन्हें नहीं लगता कि वे यहाँ के हैं. उन्होंने 17 साल तक कविता नहीं की. यह कहते हुए कि “कविता तो जैसे आती और जाती है, और अब चली गई है.” लेकिन वो वापस आई और मॉरेस को फिर से उनके काम के लिए प्रशंसा भी मिली. जिसमें प्यार की बदकिस्मती और घर की तलाश का ज़िक्र था. उन्होंने एक बार कहा था. मेरे शब्द आपको यह बता देंगे कि मैं कहाँ हूँ. |
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