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पुराना मुशायरों और नए मुशायरों का फ़र्क | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुशायरे का संबंध अच्छी और गंभीर शायरी से कितना है यह एक चर्चा का विषय है. हमारी संस्कृति में संतों की मौखिक परंपरा रही है. कबीर दास स्वयं को अपढ़ कहते थे, परंतु ढाई अक्षर प्रेम के काव्य रूप से वह संगत में बैठने वालों को ज्ञान प्रदान करते थे. ग़ालिब से पहले मीर और उनके बाद मीर दर्द के घरों में मुशायरे हुआ करते थे. इन सभाओं में शायर और श्रोता एक स्थान पर जमा होते थे और ग़ज़लें सुनाते थे, मीर दर्द, मीर तकी मीर के समकालीन सूफ़ी शायर थे. उनका युग 19वीं शताब्दी है, मीर दर्द के दौर में दिल्ली दो बार लूटी गई. एक बार ईरान के नादिर शाह के हाथों और दूसरी बार अफगानिस्तान के अहमद शाह दुर्रानी ने इसे वीरान किया. इन दोनों आक्रमणों ने केवल तबाही ही नहीं मचाई, औरंगज़ेब के बाद भारत में मुगल सल्तनत की दिन प्रतिदिन गिरती हुई साख़ को भी महत्वहीन बना दिया. इन हमलों से घबराकर मीर और उनके साथ कई और नामी गिरामी शायर दिल्ली छोड़ के वाजिद अली शाह के लखनऊ में जा बसे. अकेले मीर दर्द ही ऐसे थे, जो उजड़ती दिल्ली को छोड़ने को तैयार नहीं हुए. उन्हीं के घर मुशायरे में एक बार एक मुगल शहज़ादा भी शायरी के शौक़ में आ गया. वह टांगें फैलाए हुए था अचनाक मीर दर्द की नज़र उसकी इस असभ्य हरकत पर पड़ी, उन्होंने टोकते हुए उससे कहा, साहबज़ादे यह अदब की महफिल है और इसमें टांगे इस तरह फैलाकर बैठना बेअदबी है. शहज़ादे ने कहा, 'मैं मजबूर हूँ...मेरी टांगों में तकलीफ़ है', मीर दर्द ने फौरन जवाब दिया-'मियाँ तकलीफ़ को घर में आराम दिया जाता है, महफ़िल में, महफ़िल के आदाब का ख़्याल किया जाता है.' वो ज़माना-ये ज़माना उस ज़माने में मुशायर तहज़ीब के केंद्र हुआ करते थे. आख़िरी मुगल बहादुर शाह ज़फ़र के लालकिले के मुशायरे अब इतिहास का हिस्सा हैं...इन मुशायरों में ग़ालिब सुनाते थे और ज़ौक सुनते थे, बहादुरशाह जफ़र ग़ज़ल पढ़ते थे और सुनने वालों में मोमिन खाँ, ग़ालिब, शेफ्ता और युवा शायर दाग़ होते थे...उन दिनों सुनाने वालों और सुनने वालों के बीच में इतनी दूरी नहीं होती थी जितनी आज नज़र आती है.
आज कच्ची उम्र की कन्याएँ, दूसरों से लिखवाई कविताएँ सुनाती हैं और छा जाती हैं, उनमें कुछ ऐसे शायर भी होते हैं जो छपी छपाई ख़बरों को कविता बनाकर सुनाते हैं और श्रोताओं से तालियाँ पिटवाते हैं, ऐसे मुशायरों में एक और बात देखने को मिलती है, और वह है भावुक क़िस्म की सांप्रदायिकता. अच्छी-सच्ची शायरी के दर्शन अब मुशायरों में कम ही होते हैं, शेर हो या कविता हो, उसे सुनकर समझने के लिए थोड़े समय की ज़रूरत होती है, और स्टेज से पढ़ी जाने वाली ग़ज़ल के लिए श्रोताओं के पास इतना समय नहीं होता, वे फास्ट फूड की तरह शीघ्र स्वाद की आदत के शिकार हैं. समय की बढ़ती स्पीड के अनुसार, श्रोताओं को भी ऐसी रचनाओं में आनंद आता है जिसको सुनने में, किसी प्रकार का मानसिक या शारीरिक कष्ट नहीं...! एक बार एक संयोजक ने मुझसे प्रश्न किया था आप मुशायरों में शरीक होने के लिए इतने ज़्यादा पैसे क्यों मांगते हैं, मेरा जवाब था, 'मैं इतनी रक़म की इसलिए डिमांड करता हूँ कि मुझे एक साथ दो काम करने पड़ते हैं-अपनी कविताएँ सुनाने के साथ दूसरों को सुनना भी पड़ता है. अगर मुझे सिर्फ़ अपनी कविताएँ सुनानी हों तो रक़म की डिमांड आधी भी हो सकती है.' मुशायरों की ऐसी हालत हर जगह नज़र आती है. कविताएँ कम सुनाई जाती है, हाव-भाव या गलेबाज़ी से दिखाई ज़्यादा जाती है जिसकी वजह से मुशायरा तमाशा बन जाता है. गहराई से देखने वाला शायर दो महीने पहले मुझे अरब में दोहा-क़तर जाने का इत्तिफाक़ हुआ था. भारत से साढ़े तीन घंटों के हवाई जहाज़ के सफ़र के बाद मुशायरा पढ़ना था. मैंने अपने उसूल के मुताबिक उतने ही पैसों की शर्त रखी थो जो मैं अक्सर डिमांड करता हूँ. लेकिन इस बार मुझे लगा कि हवाई जहाज़ के टिकट के अलावा इंडियन करंसी में 40 हज़ार में कम से कम दस हज़ार ज़्यादा लिए गए हैं. इस एहसास का कारण उस मुशायरे में शरीक एक शायर तैमूर हसन तैमूर की मौजूदगी और उसकी ग़ज़लें थी. दूसरे, कविताएँ दिखाने वाली लड़कियों या चीख पुकार करने वाले शायरों की भीड़ में वह एक ऐसा शायर था जिसका कलाम सुनकर मुझे पहली बार आनन्द मिला था और अपनी शायरी सुनाने से पहले उसके शेर सुनकर यूँ लगा था...सरहदें धरती पर बिछाई जाती हैं, दीवारें मिट्टी में उठाई जाती हैं, लेकिन अच्छी ग़ज़लें दिल में बनाई जाती है और दिल से सुनाई जाती है. दाग़ साहब के शागिर्द नूह नारवी थे, उनका कहना था-अच्छे शेरों का कोई धर्म, क्षेत्र या भाषा नहीं होती...वह जब भी सुनाया जाता है, सीमा को ठुकराता है...तैमूर पाकिस्तान में नई नस्ल के नए शायर है. उम्र से जवान है और नई ग़ज़ल में नए भाव और भाषा के पास्बान हैं. उनका अब तक एक संकलन ‘गलतफ़हमी में मत रहना’ के नाम से प्रकाशित हुआ है. उनके पुरखों की जन्म भूमि जम्मू कश्मीर में बारामूला के एक गाँव घाघरू है. 40 साल पहले उनका खानदान श्रीनगर से लाहौर गया और वहीं 1974 में जन्म हुआ...उनके कुछ शेर देखिए- सूरज हूँ तो होने दो नमूदार(ज़ाहिर) मुझे भी वह मेरा हौसला ऐसा बढ़ाया करता है मैं अपने हिस्से का हँस लू मेरी कहाँ है किस्मत दूसरों से तो लड़ लूंगा मैं जिसको देखों वही सफ़र में है तैमूर की कहन ही नई नहीं है, उसका कथ्य भी सदियों की रोती बिसूरती, दुनिया की शिकायत करती हुई, पत्रकारिता टाइप व्यंग्यों से दूर होकर संसार में जीने और जीने देने के साहस और शक्ति से भरपूर है. ये ग़ज़लें अनुभवों की आँच में तपी हुई, एक ऐसे नौजवान की रचनाएँ हैं जो ईश्वर की नाइंसाफी को भी स्वीकार करके अपने चिंतन को आकार देता है. तैमूर जन्म से नेत्रहीन है, लेकिन इस कमी के बावजूद उसने ब्लाइंड कॉलेज से उर्दू में एमए की डिग्री ली...और आज कल गवन्मेंट कॉलेज में प्रोफ़ेसरी कर रहा है...उसने गोल्ड मैडल के साथ एमए किया, शादी की... और बाप बना...वह आँखों के अभाव के बावजूद दुनिया को बहुतों से अधिक गहराई से देखता है. |
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