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गुरुवार, 01 मार्च, 2007 को 22:21 GMT तक के समाचार
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होली के रंग नज़ीर के संग

होली
नज़ीर अकबराबादी की शायरी में होली के रंग भरे थे
भारत में होली को एक परंपरा के रूप में देखा जाता है. पूरा माहौल मस्ती से झूम उठता है.

शायद यही वजह थी कि होली से नज़ीर अकराबादी जैसे शायर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे.

उन्होंने कहा -
मुँह लाल गुलाबी आँखें हों
और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को
अँगिया पर तककर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों
तब देख बहारें होली की

वैसे तो उर्दू में एक से एक बेहतरीन शायर हुए हैं लेकिन नज़ीर अपना अलग स्थान रखते हैं.

नज़ीर को सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल माना जाता है.

उन्होंने होली से लेकर लगभग सभी हिंदू मुस्लिम त्योहारों पर अपनी कलम चलाई.

माना जाता है कि नज़ीर के जीवन का ज़्यादातर हिस्सा आगरा में बीता.

नज़ीर लिखते हैं-
परियों के रंग दमकते हों
खूं शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे में छकते हों
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की

नज़ीर पर होली का पूरा रंग चढ़ता था. उनकी रचनाओं से ये साफ़ है.

सबमें मची होली अब तुम भी ये चरचा लो
रखवाओ अबीर ऐ जां और मय को भी मंगवा लो
हम हाथ में लोटा लें तुम हाथ में लुटिया लो
हम तुमको भिगो डालें तुम हमको भिगो डालो
होली में यहीं धूमें लगती हैं बहुत भलियां

नज़ीर के कलम से होली का एक और रंग देखिए.

इस दम तो मियाँ हम तुम इस ऐश की ठहरावें
फ़िर रंग से हाथों से पिचकारियाँ चमकावें
कपड़ों को भिगो डालें फिर ढंग कई लावें
भीगे हुए कपड़ों से आपस में लिपट जावें
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियाँ

नज़ीर की शायरी इतने रंगों में है कि उसे समेटना मुश्किल है.

हम नई कविता की बात करते हैं लेकिन लगभग 150 साल पहले नज़ीर की रचनाएँ हमें इससे रूबरू कराती है.

यही वजह है कि उन्हें जनकवि मियाँ नज़ीर अकबराबादी कहा जाता है.

होली पर नज़ीर की एक और बानगी देखिए.

तुम रंग इधर लाओ और हम भी उधर आवें
कर ऐश की तय्यारी धुन होली की बर लावें
और रंग के छीटों की आपस में जो ठहरावें
जब खेल चुकें होली फिर सीनों से लग जावें

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