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जो जीए सो खेले फाग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीस साल की उम्र में पति बन जाने से उत्साहित मेरा तन-मन अपनी ससुराल में फागुनी बयार से कितना बौराया था आज बत्तीस साल बाद भी याद है मुझे. बिहार के मिथिलांचल में ब्राह्मणों की एक विशाल बस्ती बनगाँव में पैदा हुई मेरी पत्नी श्यामा ने अपनी सहेलियों के बीच मुझे घेरे में लेकर ‘ससुराल की होली’ का जो पहला स्वाद चखाया था उसका रोमांच अब स्मृति शेष बन कर रह गया है. वो दिन गए. अपनी उस ‘पगली होली’ का सौंदर्य बोध लिए हुए मैं होली के मौके पर जब कभी अपने गाँव या बिहार के अन्य गाँवों में जाता हूँ तो राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती पत्रकारिता के दबाव और तनाव को रंग में भंग की तरह पाता हूँ. ‘जो जीए सो खेले फाग’ यानी होली को ज़िंदादिली का त्योहार कहा जाता है. इसका अनुभव मुझे व्यक्तिगत तौर पर उस समय ज़्यादा होता है जब मैं ढोल, मृदंग, मजीरा बजाते लोगों को मस्ती में नाचते गाते और ‘बुरा न मानो होली है’ के नुस्ख़े से तनाव मुक्त होते देखता हूँ. लालू की होली ऐसा ही नज़ारा होता है राजनीतिक हास्य रस के अवतार पुरूष लालू प्रसाद के आवास पर.
होली के दिन वहाँ ‘कपड़ा फाड़ मस्ती’ देखने वालों की भीड़ जुटती है और तब शरमाती हुई मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को अपने पति के असली गँवई रूप का दर्शन कैसा लगता है इस बार मैं उनसे ज़रूर पूछूँगा. लेकिन यहाँ मैं बताता चलूँ कि भंग और रंग की तरंग में डूबे रहकर भी लालू अपना ये पसंदीदा राजनीतिक जुमला कभी नहीं भुलते कि ‘सांप्रदायिकता को भगाना है देश को बचाना है.’ भाँग के प्रसंग में मुझे एक बात याद आ गई. प्रसिद्ध उपन्यासकार और कथाकार स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु की द्वितीय पत्नी लतिका रेणु मेरे पड़ोस में रहती हैं. उनसे बातें करते हुए एक दिन मैने रेणु जी की कुछ ख़ास आदतों के बारे में जानना चाहा. लतिका जी ने बताया कि जब कभी रेणु कहते कि लतिका भाँग पीसो तो मैं समझ जाती कि रेणु लिखने के मूड में आ गए हैं. उनकी कई प्रसिद्ध कहानियों (तीसरी क़सम समेत) के सृजन का संबंध भाँग से रहा है. ये जानकर नए लेखकों को भाँग सेवन की प्रेरणा न मिले ऐसी कामना लतिका जी की इसलिए है क्योंकि उन्होने रेणु जी का स्वास्थ्य बिगड़ते देखा था. लेकिन फागुन की मस्ती क्या भंग की पिनक से कम होती है ? |
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