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अपनी होली तो बस हो ली! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
होली का नाम आते ही वह बचपन के दिन आँखों के सामने आ खड़े होते हैं. क्या दिन थे, क्या ज़माना था और क्या उत्साह था होली खेलने का. सुबह-सवेरे ही घर से निकल कर, हम बच्चों की टोलियाँ घर-घर जातीं और दोपहर तक रंगों में सराबोर हो कर अपने घरों की राह लेतीं. चेहरे इतने पुते हुए होते कि कई बार तो माएँ मुँह धुलाने के बाद ही जान पातीं कि यह किसी और का बच्चा है. ख़ैर, वे दिन तो हवा हुए और एक ज़माना वह आया कि नौकरी की शुरुआत हुई.
अब नौकरी का यह मतलब तो नहीं कि होली के त्योहार को ही बिसरा दो. लेकिन हुआ कुछ ऐसा ही. होली से तीन-चार दिन पहले ही यह क़वायद शुरू हो जाती कि उस दिन दफ़्तर कौन संभालेगा. रेडियो का मामला- वह तो चलेगा ही! दिल्ली दफ़्तर में सबकी नज़रें मेरी तरफ़ उठ जातीं और हमें भी शुरू से ही कुछ शहीदों में नाम दर्ज कराने का शौक़ रहा है, तो हम भी जल्दी से हाथ उठा देते. 'हाँ-हाँ, सब बेफ़िक्र रहो. मैं संभाल लूंगी. मैं हूँ न...'(ख़िचड़ी सीरियल के प्रफ़ुल्ल की याद तो नहीं आने लगी आपको?) तो होली की छुट्टी- सब रंगों का त्योहार मना रहे हैं.-और हम हैं कि दफ़्तर में बैठे इंतज़ार कर रहे हैं धमाकेदार ख़बरों का. दिल्ली दफ़्तर में सुबह आने वाले को एक डायरी भेजनी पड़ती थी. (अब भी भेजनी होती है). तो- एक होली पर दिल तो जला हुआ था ही. हम ने डायरी में शायरी ही कर डाली. लिखा... 'दुनिया खेल रही है होली डाल-डाल कर रंग बस, उसके कुछ दिन बाद लंदन आना हो गया. और यहाँ तो क्या होली क्या दीवाली. क्या ईद और क्या बक़रीद. सब बराबर है. हाँ ऐसे मौक़ों पर यह ज़रूर होता है कि वे पुरानी गलियाँ, पुराने चौबारे आँखों के आगे घूमने लगते हैं और दिल से एक आह निकलती है कि... कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन... |
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