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शनिवार, 06 मार्च, 2004 को 17:24 GMT तक के समाचार
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होली के रंग निराले रे
होली के रंग
रंगों के सागर में डूब जाना अच्छा लगता है
हर साल की तरह इस साल भी होली का रंग जमा है. भारत के किसी भी कोने में चले जाइए, वहाँ एक अनोखा रंग और निराली छाप मिलेगी.

यह छाप है विभिन्न त्यौहारों और संस्कृतियों की. भारत एक ऐसा विशाल देश है जहाँ कुछ मील के फ़ासले पर भाषा बदल जाती है और साथ ही बदल जाते हैं त्यौहार और उन्हें मनाने की विविधता.

फिलहाल अगर सिर्फ़ होली की बात करें तो रंगों का यह त्यौहार भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीक़े से मनाया जाता है.

सबसे मस्त और मज़ेदार होली होती है बरसाने की जहाँ मुक़ाबला होता है पिचकारी और लाठी का.

लाठी महिलाओं के हाथों में और पिचकारियाँ पुरुषों के हाथों में.

इस मज़ेदार मुक़ाबले में महिलाएं मर्दों की टोली पर लाठियाँ बरसाती हैं और मर्द उन लाठियों से बचते हुए उन्हें अपनी पिचकारियों से सराबोर करने की पूरी कोशिश करते हैं.

होली के रंग

और यह मुक़ाबला इतना मज़ेदार होता है कि होली की ख़ास शैली ही नहीं एक परंपरा बन चुका है.

राजस्थान की शेखावटी होली, मधुबनी की होली तो वहाँ की चित्रकारी में भी नज़र आती है.

बनारस का ठलुआ क्लब तो होली की परंपरा कुछ अनोखे ही अंदाज़ में जारी रखे हुए हैं.

होली के मौक़े पर पकोड़ियों में भांग मिलाकर खिलाना, या शरबत में ही भांग मिला देना, यानी तरह-तरह की छेड़ख़ानियाँ करना, सबका अपना-अपना आनंद है.

बहरहाल होली के रंग बहुत सारे हैं और हमने उन रंगों की कुछ झलकियाँ समेटने की कोशिश की है.

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