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शुक्रवार, 29 जून, 2007 को 11:00 GMT तक के समाचार
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मेरी जगह

चित्रांकनः हरीश परगनिहा

कहानी

कॉलेज में मौक़ा मिलते ही पीरियड गोल कर जाने में माहिर लेखा व्यास न जाने कैसे अध्यापन के क्षेत्र में जा घुसी. एक साल जैसे-तैसे यही सोचते गुज़रा कि जो वो समझा रही है, वह सामने बैठी छात्राओं के दिमाग में धँस क्यों नहीं रहा. छात्राएँ इसके बावजूद लेखा को अपनी सबसे फेवरिट टीचर माननें में संकोच नहीं करती थीं. वो थी ही ऐसी, दिखने में स्मार्ट और मिलनसार इतनी कि छात्राएँ उसे अपना राज़दार बनाने में ज़रा नहीं हिचकतीं. लड़कियाँ बड़ी उम्मीद से कहतीं, अभी मैम नई है, देखना अगले साल अच्छा पढ़ाएँगी.

पर अगला साल होते न होते मैम अपना प्यारा शहर जोधपुर छोड़ शादी रचाकर मध्यप्रदेश के हरे भरे इलाके में स्थानांतरित हो गईं. पतिदेव जब दिन भर ऑफ़िस में होते़, किताबों से दिल बहलाती लेखा, पर एक दिन उसने फिर से टीचरी संभाल ली.

इस बार कॉलेज के लड़के-लड़कियों से वास्ता पड़ा. अंग्रेज़ी की दुर्दशा पर लेखा को बड़ा रोना आया. बीए तक ये लोग पहुँच कैसे गए इस विषय पर लगा शोध करनी चाहिए. पर समय तो उड़ा जा रहा था और उसे सामने बैठे चट्टान से चेहरों को आर के नारायण की ‘गाइड’ समझाने का गुरुतर भार मिला हुआ था. देश की शिक्षा पद्धति को लेकर तभी से लेख में एक विद्रोह जागा. भला इस तरह अंग्रेज़ी कौन पढ़ा सकता है. एक दिन मन में पूरा संकल्प लेकर वह प्रिंसपल गौड़ साहब के सामने जा बैठी. ‘‘सर, आपसे कुछ कहना है’’ गौड़ साहब मुस्कराए अपनी कुर्सी पर ज़रा ठीक से बैठते हुए मीठे स्वर में बोले, ‘‘कहिए मैडम, क्या बात है.’’ लेखा ने एक दम विषय पर आ जाना ही ठीक समझा, ‘‘सर, जिन छात्रों को इस समय मैं आरके नारायण की गाइड पढ़ाने की कोशिश कर रही हूँ, वो तो गो का पास्ट टेंस वैंट तक नहीं जानते, वे यहाँ तक पहुँचे कैसे सर?’’ गौड़ साहब के चेहरे पर एक राजनैतिक मुस्कान फैल गई, ‘‘मैडम, इन सब बातों में पड़ने से कोई लाभ नहीं होने वाला. हमारे सामने तो बस एक ही लक्ष्य है, इन छात्रों को किसी तरह गंगा पार उतारना.’’ ‘‘लेकिन सर’’ लेखा अपनी बात पर अड़ी रहीं, ‘‘मैं उन्हें चरित्र चित्रण जैसे प्रश्नों को हल करने का कौन सा नुस्खा बताऊँ, उसमें तो कम से कम वाक्य बनाने की ज़रूरत होती है.’’ गौड़ जी ने लेखा की ओर ऐसे देखा मानों वह ज़िद पर अड़ी एक नादान बच्ची हो ,‘‘मैडम आप उन्हें ऐसे प्रश्नों के उत्तर तैयार करके लिखवाइए, रटने में माहिर हैं हमारे छात्र.’’ गौड़ साहब की तरफ से मुलाक़ात का समय समाप्त हो गया था. लेखा को उठना पड़ा.

चित्रांकन - हरीश परगनिहा
चित्रांकन - हरीश परगनिहा

अंग्रेज़ी पढ़ाने का उसका यह अनुभव उसे एक अजीब विद्रोह से भर गया. पर चारा ही क्या था, इसी विषय में मास्टर्स डिग्री लेकर उसने अपने पैरों पर आप कुल्हाड़ी मार ली थी. इसके बाद लेखा जगह-जगह घूमी, पतिदेव के तबादलों के साथ उसका भी स्टेटस घटता-बढ़ता रहा. कभी मिडिल क्लासेज़ तो कभी हाई स्कूल तो कभी कॉलेज में, वह आठ साल अंग्रेज़ी का ज्ञान बाँटती रही. तभी एक साल वो ऐसे एक शहर में पहुँची जहाँ किसी को भी उसकी मास्टर्स डिग्री से कुछ लेना-देना न था. यहाँ कोशिश करने पर भी ‘कहीं’ जब ऐंट्री नहीं मिली तो लेखा ने चैन की सांस ली. पाँच साल कब गुज़र गए पता ही नहीं चला.

लेकिन कहते हैं न ‘‘वन्स ए टीचर ऑलवेज़ ए टीचर’’, लेखा पर यह कहावत खरी उतरी. बिलासपुर में अभी सामान खोला ही था कि एक साथ दो स्कूलों में जैसे उसी के लिए जगह खाली होने का नोटिस लग गया. मन फिर बहकने लगा. बच्चे तीनों स्कूल जानें लगे थे घर में नौकरानी थी खाना बनाने के लिए तो ऐसे में कोशिश क्यों न की जाए. अर्जी भेजी गई दोनों जगह और मज़ा ये की दोनों जगह साक्षात्कार में उसे क़ाबिल पाया गया.

अब सवाल ये था कि गुजराती स्कूल में अपर डिवीजन टीचर का पद संभाला जाय या बंगाली स्कूल में लोअर डिवीजन का प्रस्ताव स्वीकार किया जाए. पति सुयश का नज़रिया साफ़ था ‘‘जहाँ ज़्यादा अच्छी सैलरी हो, आगे प्रमोशन के चांस हों वहीं जाओ, इसमें सोचना क्या है?’’ लेखा ने जैसे अपने आपसे दोहराया- यानी गुजराती स्कूल ठीक रहेगा. पर दुविधा में है कि मुझे बंगाली स्कूल का माहौल बेहतर लगा. जिन्होंने साक्षात्कार लिया वे लोग भी पढ़े लिखे लोग थे, बाहर खेल रहे बच्चे भी सभ्य से लगे...और गुजराती स्कूल में ...? सुयश ने बात समझने की कोशिश की... ‘‘लेखा कुछ याद करके मुस्कराई-’’ मालूम है, गुजराती स्कूल में मुझसे पूछा गया था,‘‘व्हाट आर द सिंपटम्स ऑफ ए गुड टीचर?’’ कहते कहते वह हँसी से दोहरी हो गई. मानों टीचर न हुई कोई बीमारी हो गई, जिसके लक्षण दूर से दिखाई दे जाने चाहिए. खूब हँसी हुई इस बात पर. लेकिन ग्रेड का सवाल था लेखा गुजराती स्कूल के स्टाफ़ में शामिल हो गई. उसे भरोसा दिया गया कि वह जल्दी ही लेक्चरार बना दी जाएगी.

 पर एक ऐसी विभूति थी जो शायद ही कभी स्टाफ़ रूम में कुछ बोलती हो. मुश्किल से पाँच फुट हाइट के सैनी सर जब खड़े होते तो लगता है आगे को पेट निकाल कर खड़े हैं, पीछे एक क्लैफ्ट सा बन जाता. कुछ पीले से रंग की पैंट और गुलाबी रंग की बुशर्ट इनकी पेटेंट ड्रेस थी. उनके चेहरे पर एक अजीब निरीहता थी, और थी बेचारगी. संस्कृत के विद्वान और एक बेहद ईमानदार शिक्षक होने के बावजूद, स्टाफ़ में जैसे उनके वजूद को ही नकारा जाता था

दो चार दिन में ही लेखा को लग गया कि उसका फ़ैसला सही नहीं था. कक्षाओं में अनगिनत छात्र, अनुशासन का नाम नहीं और फिर मैनेजिंग कमेटी का हर बात में हस्तक्षेप. एक बार आठवीं कक्षा में एक अंग्रेज़ी कविता पढ़ाते-पढ़ाते उसे कमेटी के एक सदस्य का स्वागत भी करना पड़ा. उन्होंने पोयम देखी और पूछा, ‘‘मेडम हम तो चंदा को मामा कहते हैं यहाँ उसे क्वीन यानी रानी क्यों कहा जा रहा है? ’’ ख़ासी कोफ़्त हुई लेखा को उन्हें भिन्न देशों की मान्यताओं को समझाने में, उसे समझ यही नहीं आया कि कमेटी के आदरणीय सदस्य उसका टेस्ट ले रहे हैं या वाकई जिज्ञासू हैं.

और उस दिन तो हद हो गई जब उससे साफ़ तौर पर कहा गया कि महिला स्टाफ़ को महिलाओं के साथ ही बातचीत करना चाहिए, मेल स्टाफ़ से घुलने मिलने की प्रथा यहाँ नहीं है.

लेखा उस दिन सीधी सुयश के ऑफ़िस जा पहुँची. नहीं करना उसे इस स्कूल में काम, वह बंगाली स्कूल में ही काम करेगी अगर वे लोग उसे अपर ग्रेड दे दें. सुयश झुंझलाया-अब उनके यहाँ जो जगह खाली हो, वहीं तो तुम्हें रखेंगे, या तुम कुछ ख़ास हो जो, तुम्हारे लिए जगह बनाएँगे लेखा फिर भी अड़ी रही. सुयश ने बंगाली स्कूल की मैनेंजिंग कमेटी के सेकेट्री से बात की और एक सप्ताह बाद अख़बार में उसी स्कूल के लिए अपर डिवीजन टीचर की पोस्ट विज्ञापित हुई. कहना न होगा लेखा चुन ली गई और अपने पसंदीदा स्कूल में जा पहुँची.

चित्रांकन - हरीश परगनिहा
चित्रांकन - हरीश परगनिहा

यहाँ माहौल वाकई बेहतर था. प्राचार्य दत्ता गंजे सिर और बड़ी-बड़ी लाल आँखों वाले, स्टाफ़ में ख़ास लोकप्रिय नहीं थे, यह उसे पहले दिन से ही पता लग गया था. अंग्रेज़ी के जिन टीचर की जगह उसने ली थी वे काफ़ी दिन से बीमार चल रहे थे और छात्रों के साथ-साथ स्टाफ़ में भी बड़े सम्मान से याद किए जाते थे. स्टाफ़ रूम से दूर-दूर रहने वाले श्रीवास्तव प्राचार्य को फूटी आँख नहीं सुहाते थे, पर छात्र उन्हें बेहद प्यार करते थे. गणित के सर फिज़िक्स भी लेते थे नाम था बग्गा सर और वे बड़ी ख़ूबी से प्राचार्य और उनकी मुखालफत करने वालों दोनों को प्रसन्न रखते थे. टेढ़ी माँग निकाले हमेशा कुर्ता पजामा पहनने वाले हाज़रा सर, हमेशा हँसते और प्राचार्य पर फ़ब्तियाँ कसते रहते थे. छुट्टी कब कैसे करवाना है वे, ख़ूब जानते थे और इस मामले में हमेशा छात्रों के साथ रहते थे. ऊँची, बुलंद आवाज़ के मालिक चौधरी सर पक्के ईगोइस्ट थे. अपनी प्रशंसा सुनना और सुनाना दोनों उन्हें बहुत अच्छा लगता था. और भी तमाम लोग थे शर्माजी मुखर्जी, मित्रा, ठाकुर. पर एक ऐसी विभूति थी जो शायद ही कभी स्टाफ़ रूम में कुछ बोलती हो. मुश्किल से पाँच फुट हाइट के सैनी सर जब खड़े होते तो लगता है आगे को पेट निकाल कर खड़े हैं, पीछे एक क्लैफ्ट सा बन जाता. कुछ पीले से रंग की पैंट और गुलाबी रंग की बुशर्ट इनकी पेटेंट ड्रेस थी. उनके चेहरे पर एक अजीब निरीहता थी, और थी बेचारगी. संस्कृत के विद्वान और एक बेहद ईमानदार शिक्षक होने के बावजूद, स्टाफ़ में जैसे उनके वजूद को ही नकारा जाता था. प्राचार्य तो उनसे हमेशा ही खार खाए रहते.

लेखा को पढ़ाने में आनंद आ रहा था साथ ही स्कूल की दूसरी गतिविधियों में भी वह पूरे उत्साह से भाग ले रही थी. उसे कई बार लगता कि सैनी जी उससे कुछ कहना चाहते हैं, पर तभी कोई और बात छिड़ जाती और सैनी जी ताकते रह जाते. लेखा को ये भी लगता कि सैनी उसके क्रियाकलापों पर सूक्ष्म नज़र रखते हैं. एक दिन उन्होंने अपने मन की बात कुछ यों व्यक्त की, ‘‘बहुत थोड़े दिन में ही आपने स्टाफ़ और छात्रों के बीच अच्छी जगह बना ली है मैडम’’ यह कह कर वे बेचारगी से हँसे थे. लेखा को लगा जैसे ये कहते हुए वे कुछ व्यथित हो उठे थे. पर क्यों यह तो लेखा समझ ही नहीं पाई.

दिन सालों में बदल गए, लेखा का प्राचार्य के साथ अजीब लव हेट का रिश्ता चलता रहा. प्राचार्य लेखा की ईमानदारी, छात्रों के प्रति प्यार और समर्पण सभी से प्रभावित थे, पर उसकी हाज़िर जवाबी और स्पष्ट बोलने की आदतों से परेशान भी हो उठते थे. सैनी पर उनका डंडा चलता ही रहता था, पर संस्कृत एक ऐसा विषय था जिसमें वे दखलंदाज़ी नहीं कर सकते थे. फिर भी सालाना परीक्षा के दौरान एक बार लेखा किसी काम से प्राचार्य के दफ़्तर पहुँची तो सैनी जी को कटघरे में खड़ा पाया. सामने प्राचार्य के किसी ख़ास मित्र के बेटे की उत्तर पुस्तिका खुली पड़ी थी और वे सैनी पर बरस रहे थे ‘‘बताइए इस लड़के ने जब सब सही लिखा है तो इसे 10 में से 8 नंबर ही क्यों दिए गए, पूरे 10 क्यों नहीं?’’ सैनी ख़िसियाए खड़े थे, उनकी ज़ुबान तालू से चिपकी हुई थी. अपने विषय के एक मात्र महारथी वे अपने पक्ष में कुछ भी बोल नहीं पा रहे थे. लेखा से रहा नहीं गया वह बोल पड़ी, सर, सैनी सर किसी को टयूशन पढ़ाते हैं? नहीं. वे किसी छात्र से रंजिश रखते हैं? नहीं, तो बताइए वो क्यों कम नंबर देंगे किसी भी छात्र को. इसके जवाब में ज़रूर कोई कमी होगी तभी न नंबर पूरे नहीं मिले, ‘‘प्राचार्य ने लाल आँखों से लेखा को देखा, अब सैनी ने साहस करके एक वाक्य पर अंगुली फेरी’’ ‘‘...यह अनुवाद पूरा ग़लत है. इस वाक्य का यह मतलब नहीं होता’’...इसके आगे वे कुछ भी बोल नहीं पाए. प्राचार्य ने अब कुछ न कह कर कॉपी उन्हें वापस कर दी और सैनी लेखा के पीछे-पीछे कमरे से बाहर आ गए.

चित्रांकन - हरीश परगनिहा
चित्रांकन - हरीश परगनिहा

लेखा को उस दिन प्राचार्य के साथ-साथ सैनी पर भी बहुत गुस्सा आया,‘‘ये आदमी अपना पक्ष भी नहीं रख सकता, कैसे इतने साल से नौकरी कर रहा है इस मगरमच्छ के राज्य में.’’

उस दिन सैनी ने लेखा को अकेला पा ही लिया, बोले,‘‘आप कैसे इतना स्पष्ट बोल लेती हैं, मैं तो घबरा कर हकलाने लगता हूँ. ठीक ही किया जो आपको मेरी जगह दे दी आप हैं ही इस क़ाबिल.’’ लेखा ने चौक कर उनकी ओर देखा-आपकी जगह मैं? वो कैसे? आप संस्कृत पढ़ाते हैं और मैं तो अंग्रेज़ी के लिए रखी गई हूँ – सैनी की आँखों में जैसे पानी उतर आया तो आप अब तक नहीं जानती मैडम कि आपको अकोमोडेट करने के लिए मुझे अपर ग्रेड से लोअर ग्रेड में भेज दिया गया था, तभी न आपके लिए अपर डिवीज़न टीचर की जगह बनाई गई थी- लेखा स्तब्ध थी. इतना अन्याय हुआ था इस व्यक्ति के साथ और आज तक वह उसके अधिकारों को पैरों तले कुचलती मज़े से चलती रही है.

उस दिन लेखा ठीक से सो न सकी. सुयश को बताया तो बोले ये सब राजनीति चलती ही रहती है शिक्षण संस्थाओं में तुम भी क्यों गिल्टी फील कर रही हो, तुमनें तो जानकर कुछ किया नहीं. पर अगर वह गुजराती स्कूल में ही एडजस्ट कर लेती तो एक भरी पूरी ग्रहस्थी वाले व्यक्ति की आर्थिक और मानसिक दोनों स्तर पर ज़लील न होना पड़ता. ‘डिमोशन’ शब्द ही कितना तिरस्कारपूर्ण है, लेखा अपने को सैनी की जगह रखकर उनके जज़बातों को समझने की कोशिश करती रही और एक अजीब यातना से रात भर गुज़रती रही.

 गर्ग साहब अगर आप चाहते हैं तो मैं आपके स्कूल से जुड़ने को तैयार हूँ. बताइए कब इस्तीफ़ा दूँ, इस जगह से? सुयश और गर्ग साहब दोनों आश्चर्य से मुँह बनाए उसकी ओर देख रहे थे और वह चुपचाप चाय के घूंट पीती जा रही थी. नहीं इसे शहादत तो नहीं कहेंगे, दूसरी नौकरी हाथ फैलाए उसे पुकार रही है. पर हाँ उसके प्यारे छात्र, उनके साथ पुस्तकों पर चर्चा, नाटक, डांस, गाना सब में रमा उसका मन किस तरह इस बदलाव को स्वीकार कर पाएगा, वह नहीं जानती

दूसरे दिन स्टाफ़ रूम में बड़ी चहल-पहल थी. नए शिक्षा सत्र के टेन प्लस टू लागू होने वाला था और ख़ास बात ये कि संस्कृत अब 10 वीं कक्षा तक पढ़ाई जाने वाली थी. सैनी जी के चेहरे पर जमी धूल पहली बार कुछ साफ़ होती नज़र आई थी. चाय के समय जब प्राचार्य स्टाफ़ रूम में आए तो यही चर्चा उठी. सभी का कहना था कि अब तो सैनी जी की भी पदोन्नति हो जाएगी, आख़िर 10वीं तक की कक्षाएँ अब वे अकेले ही पढ़ाएंगे. सैनी जी के दांत पहली बार ही जैसे होठों पर परदा हटा कर बाहर झाँके थे कि प्राचार्य का तिरस्कारपूर्ण शब्द कमरे में फैल गए पदोन्नति तो तब होगी जब अपर डिवीजन टीचर की जगह खाली होगी. फिलहाल तो ऐसा कोई प्रावधान है नहीं, आगे सालों में होगा तो देखेंगे. सैनी जी की ओर देखने की ताव लेखा में नहीं थी. वही तो बैठी थी इनकी जगह और उठने का नाम ही नहीं लेती थी.

घर आई तो देखा उसके एक छात्र के पिता मिस्टर गर्ग इंतज़ार में बैठे हैं, सुयश भी साथ हैं, चाय का दौर चल रहा है. गर्ग साहब छोटे बच्चों के लिए एक स्कूल खोलना चाह रहे थे. वे गाहे बगाहे लेखा से इस बारे में चर्चा कर लेते थे और चाहते थे कि वही उनके स्कूल में प्राचार्य का पद संभाल लें. लेखा उनको कई बार कह चुकी थी कि उसे छोटे बच्चों में कोई दिलचस्पी नहीं है. उसमें उतना धीरज है ही नहीं. इसके अलावा वो अपनी स्कूल में बहुत ख़ुश हैं इसलिए बेहतर होगा कि गर्ग साहब कोई दूसरी प्राचार्या तलाश लें.

गर्ग साहब को बैठा देख लेखा भी वहीं बैठ गई. उसने धीरे से बात चलाई, ‘‘तो गर्ग साहब आपको अपने स्कूल के लिए उपयुक्त कैंडीडेट मिली या नहीं?’’

गर्ग साहब ने मायूसी से उसकी ओर देखा अब आप तो इस पर ग़ौर भी करना नहीं चाहतीं, ‘‘वरना आप से उपयुक्त और कौन होगा?’’ लेखा ने अपने कप में चाय डाली और कुर्सी से टेक लगाकर आराम से बैठ गई. बिना सुयश की ओर देखे वह बोली-गर्ग साहब अगर आप चाहते हैं तो मैं आपके स्कूल से जुड़ने को तैयार हूँ. बताइए कब इस्तीफ़ा दूँ, इस जगह से? सुयश और गर्ग साहब दोनों आश्चर्य से मुँह बनाए उसकी ओर देख रहे थे और वह चुपचाप चाय के घूंट पीती जा रही थी. नहीं इसे शहादत तो नहीं कहेंगे, दूसरी नौकरी हाथ फैलाए उसे पुकार रही है. पर हाँ उसके प्यारे छात्र, उनके साथ पुस्तकों पर चर्चा, नाटक, डांस, गाना सब में रमा उसका मन किस तरह इस बदलाव को स्वीकार कर पाएगा, वह नहीं जानती. लेकिन मन के एक कोने में एक प्यारी सी अनुभूति भी ज़रूर सुख दे जाएगी कि उसने किसी की जगह पर डाका नहीं डाला हैं, वह कहीं अनाधिकार डेरा डाले नहीं बैठी है. सैनी जी की मुस्कराहट देखने के लिए स्टाफ़ रूम में एक बार ज़रूर जाएगी. उनकी जगह उन्हें सौंपने का आनंद निराला होगा, यह उसे पता है.

बाद में पता चला कि भूगोल के सर की पदोन्नति हो गई थी और सैनी सर की जगह अब कोई और आ बैठा था. सैनी सर अपना बायाँ हाथ उठाकर आज भी बच्चों में संस्कृत का ज्ञान बाँट रहे थे अपनी जगह खाली होने की प्रतीक्षा में.

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वीरा चतुर्वेदी
102/32 सिल्वर ओक्स,
डीएलएफ, फेज़-I
गुड़गाँव (हरियाणा) 122002

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