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कहानी - बुआ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बुआ जब तक रहीं उन्होंने पिता समान सदैव हमारी देखभाल की, क्योंकि वर्षों पूर्व कैंसर रोग के कारण अंतिम सांस लेते हुए पिताजी ने हमारी माताजी का हाथ उनके हाथ में सौंपते हुए कहा था, ‘‘अब तक तुम दोनों के बीच ननद-भाभी का रिश्ता रहा है किंतु अब तुम्हें अत्यंत सावधानी से पिता के कर्तव्य का पालन करना होगा. इसका, इसके लड़कों का...’’ पिताश्री अपना वाक्य पूरा नहीं कर सके. आयु का वे अंतिम वाक्य भी पूरा नहीं कर सके किंतु बुआ ने हमें कभी भी पिता का साया उठ जाने का अहसास नहीं होने दिया. गत माह में जब उन्होंने भी आँख मूंद ली तो हमें यह अहसास हुआ कि इस संसार में पिता भी कोई चीज़ होती है! माताजी ने नौ-नौ आंसू बहाते हुए कहा, ‘‘प्रकाश, वास्तविक वैधव्य तो मेरा अब प्रारंभ हुआ है. तुम सब जब नन्हें-नन्हें बालक थे और पिताश्री इस संसार से चले गए, तब मैं अपने आपको इतनी असहाय नहीं मानती थी जैसा कि मुझे आज अनुभव हो रहा है...’’ माँ की बात में कोई झूठ नहीं था. बुआ को सदा के लिए गए एक माह भी नहीं हुआ होगा कि हमें ऐसा अकेलापन, सूनापन लगा कि वास्तव में हम असहाय से हो गए थे. उनके आशीर्वाद से घर में सब कुछ है. अब तक हम तीनों ही भाइयों को नौकरियाँ मिल चुकी थी. बहनों की शादियों की नेग की रस्में अदा हो चुकी थीं, और हमने सोसाइटी में फ्लैट भी ले लिए. पुरानी हवेली को मौक़ा मिलते ही बेचकर बाहर खुले विस्तार में खुली हवा व प्रकाश में मकान बनाने का प्लान चल ही रहा था कि पीतपान की भाँति बुआ इस संसार से सदैव के लिए चली गई. अभी कल तक माँ में असीम जोश था. किंतु बुआ की अर्थी उठते ही वह बूढ़ी दिखाई देने लगी और गत एक डेढ़ माह से तो वह मरने सी ही हो गई है. ‘‘मैं कहती हूँ कि मुझे अब बुढ़ापे ने घेर लिया है. बुआ सदैव ढाल बनकर मेरी रक्षा करती रही...अब तो मैं भी उनके पीछे-पीछे...’’ माँ बार-बार आंसू बहाकर बुआ को याद करती रहती. पड़ोसियों ने तेरह दिन बाद जब माँ को शोक समाप्त करने को कहा तो आपे से बाहर हो गई,‘‘सवा महीने पहले ऐसी बात कोई मुँह से नहीं निकाले! तुम्हारे लिए तो वह मात्र बुआ ही थी, किंतु मेरे लिए तो...’’ आगे माँ कुछ भी नहीं बोल सकी. किंतु गली-मोहल्ले वाले सब माँ के मन की व्यथा को समझते थे, जानते थे. बुआ ने हमारे लिए तथा हमारे घर के लिए क्या नहीं किया? आज बुआ की गैरहाजिरी में मैं इस प्रश्न से काँप उठता हूँ और मुझे न जाने कुछ-का-कुछ होने लगता है...वैसे यह बताना उचित होगा कि बुआ पिताजी की सगी बहन कब थी? वैसे यदि भाट से वंशावली सुनी जाए तो संभवतः सात पीढ़ी में भाग्य से ही कोई संबंध मिल सके! बुआ के नजदीक के परिवारजनों ने तो उनके पिता के समय से ही उनसे रिश्ता तोड़ लिया था. मेरे पिता ने उन्हें धर्म बहन बना लिया, क्योंकि उनकी अपनी कोई बहन नहीं थी; बुआ के कोई भाई नहीं था. और बुआ ने फिर कोई शादी भी नहीं की...अपने पिता की मृत्यु के बाद वे हमारी ही हवेली में रहने लगी थी...बस, यही बहुत दूर का हल्का सा संबंध! परंतु कितना प्रगाढ़! पिताजी कहा करते थे, बुआ पूर्वजन्म में मेरी माँ के उदर से जन्मी सगी बहन ही होगी! नहीं तो इतनी प्रगाढ़ भावनाएं भला कैसे पैदा होती! बुआ उनकी रोगी, क्षीण काया को टुकर-टुकर देखती रहती. उनके सूखे ओठों पर हल्की कंपकंपी सदैव फैली रहती. पर इस कंपकंपी में छिपे मर्म को मैं कभी नहीं जान पाया. बुआ के नेत्रों में काली निराशा देख मुझे कुछ-का-कुछ होने लगता. किंतु छोटे मुंह से बड़ी बात भला मैं कैसे कहता? पिताजी के विवाह के समय हमारे घर की परिस्थिति इतनी अच्छी नहीं थी. बुआ कहती थी कि मेरी माँ बड़ी सगुणी है. इसने घर की दहलीज लांघकर जैसे ही अंदर पाँव रखा कि एक चमत्कार हुआ...! उसी दिन से रोजगार में बरकत होने लगी. ‘भाई’ की ग्रहदशा में रातों-रात सुधार होने लगा. शादी से पहले उसे 20 हज़ार का कर्ज़ा देना था. पर धंधा ऐसा चला कि दीवाली आते-आते सारा कर्ज़ा चुकाने के पश्चात भी 10-20 हज़ार बचत हो गई. मृत्यु की विगत रात तक घर की तिजोरी की कुंजी बुआ के ही हाथ में थी. पिताजी भी उन्हें ‘वित्त मंत्री’ के नाम से ही संबोधित करके बुलाते थे. तो वह हँसकर यह कहा करती कि तुम अपने ‘गृहमंत्री’ को समझा लो, मैं तो इसी समय उन्हें तिजोरी की चाबियाँ सौंपने को तैयार हूँ... मुझे यह अच्छी तरह से याद है कि इतना कहने के बाद उनकी आँखों में भीगापन आ जाता था. पिताजी यह देख मौन हो जाते और इधर-उधर की बातें करके बात विषय बदलने की कोशिश करते. माँ को ‘भाई-बहन’ का यह मिठास भरा झगड़ा अच्छा नहीं लगता, अतः वे कहती,‘‘जब तक बुआ जीवित हैं ये ही वित्त मंत्री रहेंगी! जब ये नहीं रहेंगी तो पता लग जाएगा...सब दिन एक से नहीं रहते! यह किसको पता है कि घर में रहने वाले किस व्यक्ति के भाग्य से हम सुख व चैन से रह रहे हैं...’’ ‘‘भाभी, भाग्यशाली तो तुम ही हो’’ कहते हुए बुआ का मुँह गुलाब-सा खिल उठता. तुमने जिस दिन से मेरे भाई के आंगन में कदम रखा है, तब से ही यह आंगन नंदन कानन बन गया है! लोग कहते थे कि सेठ शामल का दरवाज़ा सदैव के लिए बंद हो जावेगा? पर आज उस घर के बदले तीन-तीन घर हो गए...दुनिया चाहे जो भी कहे अंततः यह सब तुम्हारे कारण है. यह सब कहते हुए उनकी आँखें सावन-भादों-सी बरसने लगतीं. माँ यह देखकर उनका मुँह अपनी गोदी में लेकर बड़ी देर तक सहलाया करती. उसके रूदन में वास्तविक वात्सल्य बराबर बहता रहता. माँ भी बुआ को रोते देख सिसकियाँ भरने लगती. ‘‘बहन, यह सब आपके आशीर्वाद का ही फल है,’’ कहते हुए बुआ को शांत करने के लिए हिचकियाँ देने लगती और उन्हें शांत रखने का प्रयास करती. दो प्रौढ़ाओं का यह पारस्परिक स्नेह देख मुझे अतीव शांति मिलती. परंतु मन के किसी कोने की गहराई में एक संदेह भी जाग उठता था कि जिस दिन यह जोड़ी टूटेगी, खंडित होगी उस दिन शेष रहे की क्या स्थिति होगी! संभव है वह रो-रोकर ही मर जाएगी...आज मुझे मेरा यह संदेह सच होते दिखाई दे रहा था. मैं देखता हूँ कि माँ सुबह से शाम तक चुपचाप मौन बैठी रहती है. पूरी रात कमरे में करवटें बदलती रहती है. तीन-तीन बहुए घर में हैं. पर कोई तनिक भी बुआ की जगह नहीं ले सकी? बुआ कहाँ और ये कहाँ. माँ के जीवन की कल्पना बुआ के बिना कैसे हो! क्योंकि जब माँ ने घर में पैर रखा तो बुआ को सास मानो तो वह सास थी और ननद मानो तो वह ननद थी. ससुराल में स्त्री केवल एक ही तो थी...और पिताजी तो मानो कोई अमरत्व के संदेश-सा सदैव दोहराते थे बुआ हमारे घर के प्राण ही हैं. जिन दिन बुआ नहीं रहेंगी उस दिन यह घर नहीं रहेगा, वह शमशान बनन जाएगा. प्रकृति के सामने भला किसकी चल सकी है? पिताजी कमजोर होने लगे और अहमदाबाद के डॉक्टरों ने कैंसर का निदान किया, तब बुआ की मनोव्यथा मैंने समीप से देखी. यदि उनका वश चलता तो वो पिताजी के लिए अपने प्राण भी दे देने में नहीं हिचकतीं! पर पिताजी की मृत्यु ने इनको पृथक कर दिया, तो बुआ यकायक बदल गई. उनके चेहरे पर आने वाले उत्तरदायित्व की चुनौती को स्वीकार कर लेने की दृढ़ता की लकीरें उभर आई. अब उनकी आँखों में आंसुओं के स्थान समभाव ने लिया था. अब उनमें स्त्रित्व भाव मिटकर पुरुषत्व भाव आ गया था...एक भरे-पूरे परिवार को टूटने से बचाना था...बुआ ने यह कार्य बहुत भली प्रकार निर्वहन किया, निभाया. हम छह भाई-बहनों को छाती से लगाकर बड़ा किया. हमारे घर बसाए. माँ इन सब कार्यों में गौण सी रही. माँ के उत्तरदायित्व के बारे में पिताजी ने अपनी मृत्युपूर्व ही सब स्पष्ट कर दिया था. समस्या का समाधान पिताजी ने मृत्युपूर्व ही कर दिया था. बुआ गई; और विगत वर्षों में जो घटित हुआ, ऐसा लगा सब कुछ अभी ही हुआ हो. समय कितनी जल्दी बीत गया है ऐसा लगा. आज बुआ को परमधाम पहुँचे सवा महीना हो गया था. हमने उनका शोक उठाने के लिए सवेरे जल्दी से ही सारे काम करने शुरू कर दिए थे. माँ पूरी रात बैठी रही. बिस्तर में बैठे-बैठे बुआ और पिताजी को याद करके वह रातभर आंसू बहाती रही. ऐसा करने के बाद भी उसका गला भला कैसे साफ होता! उसका रोग कैसे रुकता! इसलिए हमने उसे कुछ भी नहीं कहा. बुआ मर्यादा पालती थी. उनके ठाकुरजी के दर्शन हम घरवालों को भी दूर से ही करने होते थे. आजीवन बुआ ने हमसे यदि कुछ छिपाया तो वह थे मात्र उनके भगवान...! बुआ के मरनोपरांत एकमात्र उनकी विरासत ‘ठाकुरजी’ की हमें बहुत ही सावधानी से सार-संभाल रखनी थी...हमारा यह प्रयत्न था कि ठाकुरजी को कहीं ऐसा न लगे कि बुआ के मरणोपरांत सेठ शामल की हवेली में उनका कोई महत्व ही नहीं रहा... माँ ने स्नान कर ब्रह्ममुर्हूत में बुआ के ‘‘मंदिर’’ में प्रवेश किया. धूप-दीपक करके हाथ में माला लेकर वह ठाकुरजी से चिरौरी कर रही थी, कि यकायक उनकी नजर वहाँ पर रखी पिताजी की एक फोटो पर पड़ी. फोटो ठाकुरजी की बगल में रखी थी. माँ ने फोटो पर जमी मिट्टी की परतों को साफ करने के लिए उसे अपने हाथ में लिया तो अचानक वर्षों पहले के फ्रेम का काँच टूट गया. माँ की आँखें भर आई. दिवंगत पति को इतने वर्षों बाद क्या उनका स्पर्श अच्छा नहीं लगा? माँ ने दिल को कठोर करके मुझे पुकारा, जरा इधर आ, अपने पिताजी की इस छवि (तस्वीर) को ठीक कर. और वह सुबकियाँ लेने लगी. मैं बुआ के पूजागृह की ओर दौड़ पड़ा. पिताजी की छवि का कांच टूट गया था. फ्रेम की चौखट हटा कर मैंने उसमें से फोटो निकाल ली. मुझे यह जानकर विस्मय हुआ कि बुआ ठाकुरजी की पूजा-अर्चना के साथ पिताजी की भी पूजा करती रही होगी, इसकी जानकारी वर्षों बाद आज हुई...! पिताजी के वर्षों पुराने चित्र (फोटो) को मैं बार-बार ध्यान से देख रहा था, ठीक उसी समय मेरी नज़र उसके नीचे काले रंग में लिखे हुए अस्पष्ट अक्षरों पर जा ठहरी. लिखा था, ‘‘अज्ञानी थी, तब तक तुमसे शादी करने की लालसा थी...ज्ञान हुआ, समझ आई तो तुम्हारी शादी करके तुम्हारे घर की सुरक्षा देखभाल करने की इच्छा हुई...राखी के एक धागे से मैंने आजीवन अपना बनाए रखा इसका मुझे संतोष है. अंततः बहन का स्थान पत्नी की अपेक्षा लेशमात्र भी कम नहीं है...मुझे तुम्हारा सानिध्य अपेक्षित था. जिस स्वरूप में भी मुझे यह मिला स्वीकार कर लिया...और मैंने आजीवन तुम्हें इस बात का अहसास तक नहीं होने दिया...’’ मेरा रोम-रोम रोमांचित हो उठा. माँ की दृष्टि कहीं इस लिखावट पर न पड़ जाए अतः मैं चुपचाप बुआ के पूजागृह से बाहर निकल गया. मैं अपने कमरे में बैठा हुआ उस लिखावट के बारे में गहराई से विचारमग्न था तो उसी समय माँ बुआ के पूजा-गृह में भावविभोर होकर आरती गा रही थी, भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट क्षण में दूर करे...जय जगदीश हरे...कर्ण प्रिय घंटे की ध्वनि से सारे वातावरण में एक अनोखी चेतना संचरित हो रही थी. अगर बत्तियों की मंद सुगंध चारों ओर फैल रही थी. मैं अपने कानों को खोलकर माँ की आ रही आवाज में बुआ का आवाज को सुनने का प्रयास कर रहा था...कुछ क्षणों के लिए आवाज का स्वर बदलकर सवा महीने पूर्व के बुआ के स्वर में गुंजरित हो गया.... मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं. मेरी बंद आखों के सामने तीन चेहरे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, बीच में पिताजी थे और उनकी आजू-बाजू...अंततः बुआ और माँ के चेहरे एक दूसरे में विलीन हो गए...और!!! *************************** | इससे जुड़ी ख़बरें कहानी - बुआ01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका देखते-देखते25 जनवरी, 2007 | पत्रिका दो कलाकार18 जनवरी, 2007 | पत्रिका दरख़्त रानी11 जनवरी, 2007 | पत्रिका चश्मा05 जनवरी, 2007 | पत्रिका बड़ी होती बेटी29 दिसंबर, 2006 | पत्रिका मन्नो का ख़त15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका बयान10 नवंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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