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गुरुवार, 25 जनवरी, 2007 को 13:03 GMT तक के समाचार
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रेखांकन- लाल रत्नाकर
कहानी

यह बरसाती पानी के बाढ़ से बौराई, गदराई और उपलाई गंगा ही थी जिसे देखकर जीवन में पहली बार भय खाने जैसी कोई अनुभूति हुई थी.

अपने विस्तार, प्रसार और तरंगों की रफ़्तार से इठलाती...कि ठठाकर अट्टहास करते हुए हम बच्चों को भयाक्राँत करती गंगा. जब मैंने पहली बार इसके इस विराट उन्मादिनी रूप के दर्शन किए थे, महीनों गली में चलने वाले ‘घघ्घो रानी कितना पानी’ जैसे मनोरंजक खेल के नाम पर भी सिरपिटाने लगा था.

लेकिन फिर थोड़ा बड़े होने पर गंगा का यही रूप भय की जगह कौतुहल पैदा करने लगा. तब हम गंगा के इस रूप को भूतनी या चुड़ै़ल की संज्ञा देते और प्रत्येक संध्या अपने दैनिक अनुभवों का आपस में विनिमय करते.

‘‘आज मैंने एक गाय और भैंस देखा बहते हुए !’’

‘‘पता है, आज मल्लाहों ने नीलगाय के एक जीवित बच्चे को छानकर निकाला. एकदम किनारे से होकर बहता चला जा रहा था.’’

‘‘और मैंने देखा एक बहता छप्पर...और उस पर फन काढ़कर बैठे दो-दो गेहुँअन.’’

अमूमन सावन-भादो के महीने में जब तेज़ पुरवा बहती रहती, गंगा अपने मटमैले जल में ऊँची उठती गिरती लहरों के बीच खरपतवार, जलकुंभी और कई तरह के वनस्पतियों के साथ-साथ फूस का छप्पर, माल मवेशी और कभी-कभी तो आदमियों के शव तक बहा ले आती. तब नदी किनारे अपनी नावों और जालों की मरम्मत करते मछुआरे आस-पास के किसी गाँव के कटाव की चपेट में पड़ जाने का गहरा अफ़सोस देर तक प्रकट करते रहते.

लेकिन बरसात के इन दो-तीन महीनों को छोड़कर गंगा वाकई हमारे जीवन की एक विशिष्ट सहचरी थी. बाबूजी अलस्सुबह इसके किनारे टहलने जाते. जब वह लौटकर आते, उनका माथा गंगा जल की बूंदों की तरह चमकता दिखता.‘‘एकदम से समझ लो कि प्राणवायु मिलती है वहाँ...जिसके माध्यम से अमृत प्रवेश करता है शरीर में...’’ बाबूजी हमें प्रलोभन देने के साथ-साथ ललकारते...धिक्कारते...मगर ऊँ...हूँ. कौन जाए सुबह-सुबह गंगाजी की ओर. घर की मुर्गी जो ठहरी...दाल बराबर गंगा.

शाम होते ही हम गंगा तट की ओर भाग छूटते. वहीं तरह-तरह के खेल जमते. कबड्डी, फुटबॉल और कभी-कभी क्रिकेट भी. कुछ बड़े लोग भुरभुरी मिट्टी में कुश्ती जमाते. फिर तट पर बने एक सुनसान मंदिर में भाँग छानते और घंटों वहीं गप्पें मारते रहते. भीषण गर्मी में हम तट पर खेलने की जगह गंगा के आँचल में जा लिपटते. यहाँ घुटने भर से लेकर कमर तक के पानी में हम खूब धमाचौकड़ी मचाते. मैंने इसी दौरान तैरना सीखा और जीवन का पहला रोमांच या कुछ कर दिखाने जैसा हौसला इसी गंगा ने ही मुझे दिया. वह जून महीने की शाम थी और हम आठवीं में पहुँच चुके थे.

यानी कि मिडिल स्कूल की चहारदीवारी लांघ हाई स्कूल में. मन में वैसे ही जोश भरा रहता था. इसी जोश में गंगा के इस तन्वंगी रूप को देख हमने अचानक ठान लिया कि हम इसे तैरकर पार करेंगे. बाकायदा शर्त लग गई कि कौन उस पार को छूकर सबसे पहले इस पार आ पहुँचता है. हम कुल पाँच जन थे. लेकिन एकदम शांत और पस्त सी दिखती गंगा के बीचो-बीच पहुँचते ही हम हाँफने लगे. हममें से तीन ने तत्काल लौटने का निर्णय लिया. वे लौट भी गए. केवल नसीम और मैं. वह हौसलेबाज़ था और मैं कहीं से भी उससे कमतर नहीं रहना चाहता था. आज़ भी जब कभी हम मिलते हैं, उस रोमांचक दिन की याद ज़रूर ताज़ा कर लेते हैं. हम किसी तरह उस पार पहुँचे थे और वहीं ज़मीन पर लहालोट होकर आधे घंटे तक पड़े हाँफते रहे थे. जब तक साँसे कुछ दुरूस्त हुई, शाम एकदम से घिर आई थी.

चटककर भूख लग चुकी थी, सो अलग. बदन का एक-एक जोड़ दुख रहा था और पुनः तैरकर उस पार, घर जा पहुँचने की हिम्मत कहीं से भी पनप नहीं पा रही थी. अंततः उस पार हमारे न पहुँच पाने के कारण साथियों ने हमारे अभिभावकों तक संवाद पहुँचाया. देखते ही देखते पूरे मोहल्ले में अफरा-तफरी फैल गई. क्या हिंदू क्या मुसलमान दोनों तबके के बड़े बुजुर्ग घाट किनारे. एकदम से अंधेरा घिरने से पहले एक नाव अपनी ओर आती नज़र आई हमें. उस रात तमाम बुजुर्गों ने हमें बुरी तरह डाँटा फटकारा लेकिन इस डाँट-फटकार का एक फ़ायदा यह मिला कि घर में हम पिटने से बच गए. कान पकड़कर उठक-बैठक लगानी पड़ी, बस. लेकिन इसके एवज़ में हम घर और मोहल्ले के हीरो भी बन बैठे. अम्मा और जिज्जी ने उस रात रो रोकर खूब दुलारा, पुचकारा. हफ़्ते भर बाद हाई स्कूल में पढ़ने वाली ज़रीना जब एक क़िताब लेने आई, अपनी चुन्नी के सीने से ढ़लकने की जरा भी परवाह न करते हुए उसने सीने पर हाथ मारते हुए कहा था,‘‘या अल्लाह!...कहीं तुम डूब जाते तब?’’

आज जब यह सब याद कर रहा हूँ, पता नहीं कौन-कौन से दुख-सुख याद नहीं आ रहे हैं ! गंगा का अभिन्न जुड़ाव हमारे जीवन के पल-पल, क्षण-क्षण से था. याद आ रही है मुझे अपनी सबसे छोटी बहन. वह केवल चार साल की होकर नहीं रही थी. एक दिन जब सुबह सोकर उठा तो...! समूचे घर में कोहराम मचा हुआ था. पिछले महीने भर से पीलिया से ग्रस्त होने के बावजूद उसकी तोतली भाषा कभी मंद नहीं पड़ी थी. तब मैं उससे पाँच वर्ष बड़ा था. लेकिन गंगाजी में उसे जल समाधि देने गए अपने पिता के मित्रों के पीछे-पीछे मैं भी था. बाबूजी स्वयं नहीं गए थे. मैंने इन्हीं आँखों से देखा था वह कारुणिक दृश्य. शव को घड़े से बाँधकर नाव द्वारा गंगा में पहुँच उसे मछलियों के हवाले कर दिया गया था. उसी दिवंगता को, जिसके माथे पर काजल का दिठौना लगा, अम्मा और दादी ने अपने आँसुओं से नहलाकर जिसे विदा किया था.

 वह अपने हारमोनियम के साथ-साथ बड़े भैया का तबला भी नाव पर रखवा लेते. ग़ज़ल गायकी के नवसिखुओं की एक शानदार महफ़िल सज जाती. बाबूजी तक ‘लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में’ के माध्यम से हमारी रूह में उतर जाते

उस दिन पहली दफ़ा नाव पर चढ़ा था. मगर नाव पर चढ़ने का वह प्रथम अनुभव और रोमांच गौण हो गया था और...! ठीक जैसे कि बाबूजी की मृत्यु की सूचना पाकर हवाई जहाज पकड़ राँची से पटना आना पड़ा था. पूरे रास्ते अपने भारी और दुखते सर का वजन संभालते, आंसू पोंछते मैंने यह घंटे भर की पहली हवाई यात्रा कैसे पूरी कर ली थी, आज इसका जरा भी रोमांच स्मृति में नहीं. लेकिन गंगा किनारे बाबूजी के चिता की चटकती लकड़ियों का एक-एक मंजर मेरे ज़ेहन में आज भी सुरक्षित है.

कभी इसी गंगा ने अदभुत सुख और सुकून भी दिया था. ‘‘शौकत शय्या पर दुग्धधवल...लेटी है श्रांत क्लांत निश्चल’’ जैसी काव्यमयी गंगा की निश्चलता को गर्मियों की चाँद रात में, अक्सर हमारी मौका के चप्पुओं की आवाज़ भंग करती रहती. दस रुपए फी घंटे के हिसाब से किराए पर ली गई नाव द्वारा दो घंटे के पारिवारिक आमोद-प्रमोद का एक मस्त कार्यक्रम बन जाता. एक बड़ी बाल्टी में बर्फ़ मिली दही की लस्सी भी संग रखी जाती. नाव खेने वाले तक एक-एक गिलास छककर तर हो लेते. इस कार्यक्रम की शुरुआत जीजा जी ने की थी.

वह अपने हारमोनियम के साथ-साथ बड़े भैया का तबला भी नाव पर रखवा लेते. ग़ज़ल गायकी के नवसिखुओं की एक शानदार महफ़िल सज जाती. बाबूजी तक ‘लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में’ के माध्यम से हमारी रूह में उतर जाते. और बीच-बीच में अचानक पसर जाने वाली चुप्पी के बीच कोई अनाम सी प्रतिभा प्रस्फुटित हो जाती. केवल दसवें वर्ष को छूती हमारी भतीजी ने ‘अजीब दास्तां है ये’ सुनाकर तब इसी तरह अपनी पहली उपस्थिति दर्ज कराते हुए हमें चमत्कृत और आशांवित किया था. सबसे अंत बारी आती नाव खेने वालों की. उनके सुर के सम्मोहन से बंधी नाव धीरे-धीरे तट की ओर आकर कब लग जाती, हमें पता ही न चल पाता.

गंगा तट पर बसे होने के कारण हम प्रत्येक वर्ष बहुत आसानी से यह सुख कई-कई बार उठाते. जीजाजी और जिज्जी तो बच्चों समेत केवल इसी एक अनिवर्चनीय सुख की खातिर जयपुर और फिर भोपाल की अपनी भागमभाग ज़िंदगी से ऊबकर, प्रत्येक वर्ष इतनी लंबी दूरी को फलांगते, सबसे पहले पधारते. उनका साथ देने को किसी साल फूफा, कभी मौसा तो कभी कोई और. सबसे अधिक तो बाबूजी के दुलरूआ और अम्मा की आँखों के ज्योति हमारे प्रिय मामा श्री. कई वर्षों तक तो वह गर्मियों में लगातार आते रहे. एक तो उनके शहर कानपुर की सूखी गंगा. तिसपर उनके मोहल्ले गोविंद नगर से उतनी दूर. सो वह पटना की अपेक्षाकृत ज़्यादा तंदरूस्त गंगा को मुग्ध भाव से निहारते रहते. तब गंगा छत से दिखती थी हमारे. अब नहीं. क्योंकि हमारे पड़ोसी का मकान तीन तल्ला हो चुका है. कुल्ला चाय के उपरांत मामाजी मेरा हाथ थाम गंगा जी की ओर निकल जाते. लौटती में अजीबोगरीब भोजपुरी और मगही फेंटकर बनाई गई अपनी मनोरोचक बिहारी बोली से, वह घाट किनारे के ऊपजाऊ खेतों के मालिकों का इतना शुद्ध मनोरंजन करते कि हमारे दोनों हाथ ताज़ा सब्जियों को संभालने में अझुराए रहते.

मामा ज़बरदस्त बेसुरे थे. फिर भी नौका विहार की एक संगीतमय संध्या में ज़बरन हस्तक्षेप करते हुए उन्होंने इसे अपने एक गीत से नवाज़ा. सबों ने हँसते खिलखिलाते हुए उनके ‘हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ को बर्दास्त किया था. उस वर्ष वह हमारी नई नकोरी मामी को लेकर आए हुए थे. अम्मा मामी को अपने संग ही सुलाती थीं. हमेशा की तरह मामाजी का बिस्तर बाबूजी के कमरे में लगवातीं.

लेकिन उस रात बाबूजी ने पहल कर मामा-मामी के लिए एक पृथक कमरे की व्यवस्था करवाई थी. सचमुच अजीब है यह गंगा. इतनी पारिवारिक, इतनी हिली मिली...कि इसे याद करो नहीं कि घर का कैसा-कैसा अछूता प्रसंग सब नाटक की तरह सामने घटित होता प्रतीत होने लगता है. एक-एक दुख...हर एक तनाव...सबको सोखा है इस गंगा ने ही. मैं अपने जीविकोपार्जन की दौड़ धूप से जब भी निराश होता, इसी गंगा किनारे एकांत में जा बैठता. वहाँ गंगा की विशाल जल राशि को देख अपने आंसू तुच्छ जान पड़ते. किनारे से बार-बार टकराती लहरें पुनः और पुनः संघर्ष करने का जैसे संगीतमय पाठ पढ़ा जातीं. और इसी संगीत की अनुगुंज लिए मैं घर वापस आकर प्राण प्रण से पिल जाता.

फिर ऐसा हुआ कि अपने भविष्य को सँवारने के वास्ते मुझे गंगा से दूर जाना पड़ा. इधर कुछ लोगों को शहर के भविष्य संवारने की भी चिंता हुई. छोटा सा यह हमारा शहर देखते ही देखते महानगर में तब्दील होने लगा. अवागमन, जीवन की बुनियादी सुविधाओं और रोजी रोजगार की संभावना के चलते गाँव उजड़ते गए और शहरों में झुग्गी झोपड़ी का अंबार लगता गया. जहाँ भी खाली जगह नज़र आती, रातों रात झोपड़-पट्टियाँ बस जातीं. कम व्यस्त सड़कों के किनारे, पुल-पुलिया के नीचे, पार्क या खेल के मैदान के वास्ते छोड़ी गई जगहों में...और सबसे ज़्यादा तो गंगा के किनारे. इन तमाम लोगों के लिए गंगा एक तरह से वरदान थी. वे इसी के किनारे नित्य कर्म से निबटते. यहाँ कुल्ला दातून करते और फिर नहा धोकर इकट्ठे पूरी तरह फ़ारिग़ होकर लौटते. घाट जाने के रास्ते के दोनों बगल दूर-दूर तक गंदगी और बदबू का ढ़ेर पसरने लगा.

प्रत्येक वर्ष बरसात में गंगा इन तमाम गंदगियों को समेटकर ले जाती और फिर सालों भर वही कार्यकलाप चलते रहते. देखते-देखते गंगा किनारे गंदगी का एक विशाल साम्राज्य खड़ा हो गया. अब इस शहर के पुराने और शरीफ़ शहरी सुबह शाम की सैर सड़क पर, थोड़े-बहुत वाहनों के बीच कर लेना पसंद करते, बनिस्बत कि गंगा किनारे जाने के. शाम में अब यहाँ अवैध शराब की भट्ठियाँ चलने लगीं. नेपाल के रास्ते आने वाला तस्करी का सामान और गांजा, चरस आदि नाव द्वारा रात्रि में इन्हीं घाटों पर उतारा जाने लगा. अवैध हथियारों की खेप यहीं पर महीनों सुरक्षित रहती. शहर के जरायमपेशा लोग वारदात को अंजाम देने के बाद गंगा किनारे की इन झोपड़ियों में ही शरण लेने लगे. छुटभइये नेताओं की नेतागिरी यहीं पर खूब चमकने लगी. देखते ही देखते पूरा गंगा किनारा अवांछित लोगों के कब्जे में आ गया. अब शहर के आम नागरिक छठ जैसे महत्वपूर्ण पर्व पर ही गंगा के दर्शनों को आ पाते. इसके लिए भरपूर सफाई होती. चूने आदि का छिड़काव होता. फिर भी मुख्य रास्ते और घाट के आसपास बदबू का हल्का भभका उठता ही रहता.

यह तो खैर गंगा के मलिन होने का दौर था. वर्षों तक रखने पर भी जिसके जल में कभी कीड़ा नहीं पड़ता, कोई बदबू नहीं उठती, उस गंगा के लिए तो खैर यह अग्नि परीक्षा का दौर था. लेकिन फिर लोगों का दिल इतने से भी नहीं भरा. देखते-देखते गंगा के किनारे बड़ी-बड़ी चिमनियाँ सुलग उठीं. विशाल और गहरे गड्ढे खोदे जाने लगे और भवन निर्माण के लिए ईंट बनाने के वास्ते यही जगह सबसे उपर्युक्त लगी सरकार के कुछ खास प्रिय पात्रों को. अब गंगा के किनारे छोटा नागपुर क्षेत्र से आए आदिवासी मजदूरों के भी झोपड़े आबाद हो उठे. अवैध शराब की भट्ठियों का कारोबार और भी चमक उठा. जुए के छोटे-मोटे अड्डों और सस्ती वेश्याओं का अभ्यारण्य बन उठा गंगा किनारा.

एक कारोबार चमका तो उससे बहनापा रखने वाले अन्य कारोबार भी इर्द-गिर्द पसरने लगे. घाट किनारे अब बालू के टाल भी खुल गए. छर्रियों और सीमेंट के एजेंट भी यहीं से अपना ग्राहक तलाशने लगे. अम्मा के दाह-संस्कार के बाद जब दसवां एवं एकादश का विधि विधान संपन्न करने घाट किनारे गए था, बड़ी मुश्किल से कोने में साफ-सफाई कर ठाकुर ने जगह बनाई थी. जैसे-तैसे विधि-विधान संपन्न कर विवशता भरी दो-दो डुबकी लगा जब हम घर पहुँचे, लगा किसी गंदे नाले से नहाकर आए हैं. घर आकर नल के नीचे साबुन से मल मलकर एक-एक ने नहाया, तब जाकर कहीं लगा कि हम कुछ ठीक-ठाक हालत में आ सके हैं.

मैंने नसीम से बात की. वह एक स्वयं सेवी संस्थान में कार्यरत है और सर्व शिक्षा अभियान से जुड़ा है. गली में खड़े होकर हमारी बातचीत के दरम्यान तीन ट्रैक्टर गुजरे. हमें एकदम से एक मकान के ओटे पर चढ़कर बचना पड़ा. ‘‘सबसे ज़्यादा मुसीबत तो इन भारी वाहनों से है ! पूरी गली की सड़क के साथ-साथ उसके सामाजिक जीवन को भी दरका दिया है इन वाहनों ने. पहले जिस गली में हम खेल कूद भी लेते थे, आज वहाँ अपने बच्चों को बाहर निकलने देने में भी माएँ भय खाने लगी हैं...! और सबसे बड़ी बात यह कि इस बहाने अवांछित लोगों की आवाजाही और उनका हस्तक्षेप भी बढ़ गया है मोहल्ले में. मोहल्लेवासी अब घरों में दुबके रहते हैं और घर के बाहर के तमाम सार्वजनिक स्थलों पर इन्हीं लोगों का दबदबा है.’’

नसीम बड़े ध्यान से मुझे सुन रहा था. उसके मुँह से बेसाख़्ता निकल पड़ा, ‘‘और यह सब केवल इस एक दरिया की वजह से...क्यों...?’’

कोई मामूली दरिया नहीं...गंगा...! हमारी संस्कृति, हमारी अस्मिता की पहचान... गंगा... ‘‘उस शाम मैं काफी भावुक हो उठा था. मैंने नसीम को बतलाया कि आज की गंगा मुझे ठीक उसी तरह दिखती है, जैसे आज़ादी के पूर्व भारत माता की छवि दिखती थी’’ हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़ी. हमें गंगा को इससे मुक्त कराने को कुछ करना चाहिए.

 एक चैनल पर एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने सन 2035 तक गंगा पूरी तरह विलुप्त हो जाने की घोषणा की थी. जितना अधिक गाद भर चुका है इसके गर्भ में...औद्योगिक एवं अन्यान्य प्रदूषण लगातार जिस तेजी से बढ़ते जा रहे हैं...कुछ भी हो जाना असंभव नहीं. सुनने में तो यह भी आया है कि उत्तरांचल में बांध बांधने के कारण गंगा की मुख्य धारा भी काफ़ी संकरी हो गई है

‘‘कोई फायदा नहीं! सब करके देख चुके हैं कुछ पर्यावरणविद और एनजीओ वाले. ’’ नसीम ने बुझे स्वर में कहा,‘‘इन लोगों के तमाम कागजात दुरूस्त हैं और सारे टैक्स भी नियम से जमा करते हैं यह लोग ! यह सब लोग काफ़ी चौकन्ने और ताकतवर हैं.’’

मैं निराश होकर घर लौट आया. घर के भीतर इस पुश्तैनी मकान को बेच देने के विषय पर गरमागरम बहस छिड़ी हुई थी. सभी की राय एक समान थी. अम्मा के नहीं रहने के बाद इस मकान से अब किसी का कोई भावनात्मक संबंध शेष नहीं रहा था. जिज्जी तक ने दबे स्वर में ही सही, पर प्राप्त होने वाली रकम के एक हिस्से में अपनी दावेदारी दर्ज़ की. जीजा जी की शाबाशी भरी नज़रों ने उन्हें पुचकारा.

मैंने सबसे छोटे भाई की ज़ानिब देखा. वह इसी मकान में रहता है. उसकी नौकरी भी इसी शहर में है. बावजूद इसके इन बदली परिस्थिति में वह भी इस मकान और मोहल्ले में रहने को इच्छुक नहीं. यहाँ से उसका कार्यालय, बच्चों के स्कूल, सभी दूर जो पड़ते हैं.

लेकिन अगले दिन अख़बार में छपी एक सरकारी उदघोषणा ने सबों की राय पलट दी. मुख्य पंक्ति में गंगा के किनारे बॉम्बे के मेरिन ड्राइव की तर्ज पर सड़क बनाने की घोषणा नगर विकास मंत्री के सौजन्य से की गई थी.

‘‘अभी इस घर को बेचना निरी बेवकूफी होगी’’, बड़े भैया ने अर्थ संबंधी अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए कहा,‘‘सड़क बनने की शुरूआत होते ही इस प्रॉपर्टी की कीमत दुगनी-तिगुनी हो सकती है.’’

सबों ने सर हिलाकर इस मामले में सहमति व्यक्त की. मैं सपरिवार अपनी नौकरी पर लौट आया.

एक रात समाचार चैनलों के बीच छलांग लगाते हुए मैं बुरी तरह आतंकित हो उठा. एक चैनल पर एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने सन 2035 तक गंगा पूरी तरह विलुप्त हो जाने की घोषणा की थी. जितना अधिक गाद भर चुका है इसके गर्भ में...औद्योगिक एवं अन्यान्य प्रदूषण लगातार जिस तेजी से बढ़ते जा रहे हैं...कुछ भी हो जाना असंभव नहीं. सुनने में तो यह भी आया है कि उत्तरांचल में बांध बांधने के कारण गंगा की मुख्य धारा भी काफ़ी संकरी हो गई है.

इस समाचार के बाद एक दूसरे चैनल पर एक विज्ञापन देखा. देश का एक महानायक आसन्न चुनाव के मद्देनजर अपने प्रदेश का गुनगान करते हुए अपना अगला जन्म भी इसी गंगा के पावन तट पर होने की कामना कर रहा था!

रात में सोते वक़्त मैं बहुत बेचैन था. झपकी आती नहीं कि यही एक प्रश्न झकझोर कर फिर जगा देता-क्या सचमुच एक दिन विलुप्त हो जाएगी गंगा हमारे जीवन से ? जैसे इस पृथ्वी से बिला गए डायनासोर. ...मिट गई पुराणों में वर्णित सरस्वती नदी! और देखते-देखते किसी ढोर-डंगर की लाश को चट कर जाने वाले हमारे महाबुभुक्षु गिद्ध! क्या इसी तरह एक दिन सचमुच हमारी गंगा भी...? जैसे कि देखते ही देखते हमारी आँखों के आगे से ओझल हो गए टिहरी...और हरसूद...

अलस्सुबह नींद में ही मैं प्रार्थना कर रहा था,‘‘मुझ अभागे की पत रख लेना हे गंगे ! इसके पहले कि तू मेरी आँखों से ओझल हो, मुझे भी अपने संग समेट ले जाना गंगे... मेरी अस्थियों और राख को...जहाँ मेरे बाबूजी हैं...अम्मा हैं...और जहाँ हमारे तमाम ऋषि, महात्मा, देवपुरुष...हर आम और खास...’’

सुबह नींद टूटने के बाद भी मैं कँपकँपा रहा था.

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संतोष दीक्षित
दुलीघाट, दीवान मोहल्ला
पटना-800008

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