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घाल मेल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहानी सुशील कुमार में कुछ नई आदतों का विकास होने लगा था. मसलन, वह देर-देर तक शीशे में चेहरा देखने लगा था. अब भाई के छोटे हो गए कपड़ों को पहनते समय उसका मन विद्रोह से भर उठता था. फ़िल्मी अत्रिनेत्रियों की तस्वीरें उसे शिद्दत से आकर्षित करतीं. उसने क्रीम-पाउडर ख़रीदकर एक झरोखे में रख लिया था. सुबह कॉलेज जाते समय कमरा बंद कर लेता और पोतने लगता. इस वक़्त उसमें अपरमपार सनसनी भरी रहती. हालाँकि घर वाले उसकी इस रहस्य करतूत को जान गए थे. और कमरा बंद होते ही मुस्कुराने लगते थे, किंतु वह यही समझता कि लोग कौशल से अनभिज्ञ हैं. कलयुगी लड़कों की तरह अभी उसके पंख नहीं लगे थे. वह भोला-भाला और आदर्शवादी था. हालाँकि गीता नाम की लड़की से उसका चक्कर था. सुशील कुमार क्लर्क पुत्र था. उसके किराए के मकान के सामने एक इंजीनियर का आलीशान बंगला था. इंजीनियर के पास कुछेक ट्रक, कार और एक लड़की थी अमृता. वह छात्रा थी. उसने अपने सामने के बालों को थोड़ा कतर दिया था. वह भावुक उपन्यासों को पढ़ने लगी थी और चाट की शौकीन हो गई थी. कोई नया फैशन उसकी सहेली उससे पहले अपना लेती तो वह आग-बबूला हो उठती. बंबइया फ़िल्मों में उसकी गहरी रुचि थी. एक दिन उसने कत्थक सीखने का फ़ैसला कर डाला. इंजीनियर साहब ने एक बूढ़ा गुरू तलाश करवा ही लिया. वह कत्थक सीखने लगी. सुशील कुमार जीव विज्ञान की एक शाखा जंतु विज्ञान की कॉपी पर चित्र बना रहा था कि तबले की थाप सुनी. उसके कान खड़े हो गए. वह चौकन्ना हो गया. इंजीनियर साहब के घर से आवाज़ें आ रही थीं. एक दिन, दो दिन सप्ताह बीत गए-रोज़ तबले की थाप, घुंघरुओं की झनक, कभी-कभी हँसी. उसके भीतर का आदर्शवादी नौजवान पीड़ा से कराह उठा,‘तो अमृता से उसका बाप वेश्यावृति करा रहा है. इतना पैसा होने के बाद भी इस नरपिशाच की हवस पूरी नहीं हो सकी है.’ उसने प्रण किया, ‘‘मैं अमृता को इस नर्क से बाहर निकालूँगा.’’ अगले दिन वह अमृता के स्कूल जाने वाले रास्ते में खड़ा हो गया. क्रोध और शौर्य कि प्रतिमूर्ति लग रहा था, वह उस समय. अमृता ने अपनी छत से उसे कई बार देखकर उसके भीतर यह इच्छा उठी थी कि वह लड़का उसे घूरे-घारे लेकिन सुशील कुमार उस दौरान अपने पिता के दोस्त की पाँचवी कुंवारी बेटी गीता के मामले में गंभीर रोग का शिकार हुआ था. वह गीता को दहेज के दानव से आज़ाद कराने के सपने देखता और गीता को चाँद-तारे तोड़कर देने के वादे करता. कहने का मतलब यह कि उसने अमृता को ख़ास घूरा-घारा नहीं सो अमृता उसे रोगी मानकर भूल गई थी. आज रास्ते में देखता पाया, तो चकित रह गई. वह करीब पहुँची, तो उसने कहा, ‘‘ज़रा सुन लीजिए.’’ वह इठलाती और मुस्कराती हुई आगे बढ़ गई. सुशील कुमार खड़ा रह गया. कह नहीं सका कुछ. उसने तय किया कि ऐसी बातें कहने से बेहतर होगा कि लिखकर दी जाएँ. उसने पत्र में लिखा,‘‘तुम बड़ी सुंदर हो. तुम्हें एक नहीं हज़ार अच्छे लोग मिल जाएँगे, फिर तुम क्यों इस तरह की ज़िंदगी जी रही हो. तुम्हारी यह दशा देखी नहीं जाती. तुम्हारा दुख दूर करने के लिए जान की बाज़ी लगा दूँगा. तुम बताओ, तुम्हें कैसे घर से बाहर निकालूँ. वैसे मेरे दिमाग़ में भी योजनाएँ हैं.’’ पत्र पाकर अमृता मुस्कराने लगी और बोली,‘‘परसों जवाब ले लेना.’’ अमृता ने लिखा,‘‘मेरे सुशील! तुम बड़े एक्सपर्ट निकले! अभी प्यार शुरू किया और अभी घर से भागने के लिए कहने लगे. और तुम बताओ, तुमने मेरे मन की दशा कैसे जान ली.’’ कहाँ सुशील कुमार चला था अमृता का उद्धार करने और कहाँ फंस गया प्रेम में. उसने अपने पिता के दोस्त की पाँचवी कुंवारी कन्या गीता को भुला दिया और अमृता के प्रेम के झूले पर झूलने लगा. गीता ने उसकी बेरुख़ी पर पहले ताने दिए, फिर गुस्सा दिखाया, फिर रोई और आख़िर में हार मानकर ख़ामोश हो गई.
सुशील कुमार के घर एक दिन सत्यनारायण की कथा थी. गीता ने अपनी अम्मा से सिर दर्द का बहाना बनाया और नहीं आई. इधर सुशील कुमार अमृता के घर निमंत्रण देने गया, तो सेंध लगा बैठा! घर में घुसने की जुगत बना ली. दो-चार दिनों में ही सड़क-छाप कुत्ते की तरह परक गया. रोज़ जाने लगा. अमृता के भाई का पाँचवर्षीय लड़का उसकी ढाल था. वह कहता,‘‘इस बच्चे से खेले बिना उसका खाना नहीं हज़म होता.’’ अमृता की आज्ञा और निषेधाज्ञा का वह गंभीरता पूर्वक पालन करने लगा था. वह उस के संकेतों को तत्काल समझ लेता. उसकी मौजूदगी में अमृता बाहर से पसीने में लथपथ आती, तो वह कूलर की स्पीड तेज कर देता. वह कोई चीज़ तलाश करती होती तो बिना बताए वह समझ लेता और कहता,‘‘क्या उसे तलाश रही हो, देखो वहाँ पड़ा है.’’ वह दिखाता ज़रूर मगर उठाकर ख़ुद नहीं देता. अमृता गदगद थी. अब शीशे के सामने वह अपने को अधिक ‘ब्यूटी-फुल’ पाने लगी. इधर उसमें शोखी का प्रवेश हो गया था. इनके अलावा बात-बात पर हाथ-पैर झटकने-पटकने लगती थी. नहाते समय देर लगाती और गाना गाती. इन सब बातों को देखते हुए मम्मी-पापा का शंकालु हो जाना स्वाभाविक था, लेकिन वे शंकालु की जगह कृपालु हो गए थे. अमृता की पाकेट मनी बढ़ा दी. उसका सेंट-वेंट अलग से खरीदा जाने लगा. मम्मी-पापा जन्मजात कुलीन नहीं थे, इसलिए अमृता की वर्तमान दशा देखकर मगन होते कि बिटिया ख़ूब तरक्की कर रही है. कितनी एडवांस है.... हालाँकि मम्मी-पापा यह नहीं जानते थे कि उनकी पुत्री की सुशील से पट रही है. उनका विश्वास था कि क्लर्क का लड़का ऐसा सोचने की हिम्मत नहीं कर सकता. वैसे हक़ीकत यह थी कि उन्हें प्यार-व्यार के जंजाल में बेटी का पड़ना कतई पसंद नहीं था. वे बस इतना चाहते थे कि उनकी बेटी लोगों पर कहर ढाती रहे. अमृता ‘एडवांस’ का शरीर अभी पूरी तरह विकसित हुआ ही था, साथ ही दिमाग़ भी पूरी तरह समर्थ हो चुका था. सुशील कुमार की आज्ञाकारिता उसे बड़ी भली लगती. अब वह ख़ुद ही हुकुम चला देती थी, ‘‘ज़रा मेरी प्रेक्टिकल की कॉपी का डिजाइन बना दो न.’’ या, ‘‘मेरी सहेली के यहाँ यह स्वेटर पहुँचा आओ न’’ यद्यपि अमृता के घर पर सरकारी कर्मचारी नौकर के तौर पर काम करते थे किंतु उससे काम कराने में वह हार्दिक सुख अनुभव करती. वह पूरी लगन और मेहनत के साथ अमृता के काम करता था. अमृता की इच्छाएँ उसके लिए ज़िंदगी का सबसे बड़ा मकसद बन गई थीं. एक दिन मेज़ के दोनों किनारों पर रखी कुर्सियों पर वे दोनों बैठे थे. उनके पैर अपना काम कर रहे थे लेकिन मुँह पर भोलापन विराजमान था. मम्मी भी वहीं बैठी थीं. यकायक बिजली गोल हो गई. दोनों ने पैर हटा लेना उचित समझा, कहीं मम्मी से रगड़-घिन्नी न हो जाए. बिजली आने पर अमृता ने कहा,‘‘तुम लाइट कलर के कपड़े क्यों नहीं पहनते? ’’ अंधेरे में बड़े ख़राब लग रहे थे. ‘मैं पहनूँगा.’ उसकी आत्मा में तूफान मच गया. वह सीधे घर पहुँचा. उसने फरमाइश रख दी. कपड़े खरीदना और सिलवाना पहली तारीख़ को भी एक समस्या थी, फिर आज तो चौबीस तारीख़ हो गई थी. पिता ने साफ मना कर दिया लेकिन वह नंगई पर उतर गया. गर्जन-तर्जन पर उतर गया. घरवालों ने समझा, इसका दिमाग़ सनक गया है. कर्ज़ से कपड़े ले देना ही मुनासिब लगा उन्हें. पिता ने मकान मालिक का किराया रोक कर कपड़ा ले दिया. एक बार अमृता ने उससे कहा,‘‘तुम कुछ दुबले हो.’’ उसने अपनी ख़ुराक बढ़ा दी. वह अमृता की ख़ुशी में बढ़ोतरी के लिए नए-नए तरीके सोचता रहता था. इस अभियान में उसकी कल्पनाशीलता उपजाऊ हो गई और वह कविता करने लगा. उस की कविताएँ दो प्रकार की होतीं. एक, जिसमें प्रेम की भावनाएँ हिलोरें लेतीं और दूसरे खस्ताहाल घर की तकलीफ़ों का जिक्र होता. अमृता पहली तरह की कविताएँ पसंद करती और वह दूसरी तरह की. वैसे सच्चाई यह थी कि दोनों में से कोई भी पसंद करने लायक नहीं थीं. एक तो करेला, उस पर नीम चढ़ा. सुशील कुमार कविता और लड़की के फांस में इस तरह उलझा कि थर्ड डिविजन में पास हुआ. दूसरी तरफ अमृता फर्स्ट डिविजन में पास हुई. उसके फर्स्ट डिविजन में पास होने के दो कारण थे. पहला, उसने प्रेम को खिलाड़ी भावना से लिया था. हर काम करने के बाद शाम को मुहब्बत की भी थोड़ी प्रैक्टिस कर लेती थी. दूसरे उसके पिता ने प्रेक्टिकल में सर्वाधिक अंक दिलवाने से लेकर कॉपी जाँचने वालों को पटाने में कोई कसर न छोड़ी. दसों दिशाओं में ठेकेदारों को छोड़ दिया था. फर्स्ट आने के बाद अमृता में एक परिवर्तन हुआ. अब सुशील कुमार उससे मिलता तो उपदेश देने लगती,‘‘तुम पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दो. तुम्हें एक बहुत बड़ा आदमी बनना है. जो हुआ सो भूल जाओ.’’ सुशील कुमार इन बातों को सुनकर झुंझला उठता. कई बार मन में आया कि कह दे, ‘‘बड़ा आदमी बनने के लिए बाप का धनवान होना ज़रूरी है.’’ लेकिन वह शांत रहा. क्योंकि उसने एक कैलेंडर में पढ़ा था कि क्रोध समस्त पापों का मूल है. वैसे भी अमृता फर्स्ट थी, तो थी. दोनों के बीच डिवीजन की विभाजक रेखा नई-नवेली दुल्हन के सिंदूर की तरह खुल्लमखुल्ला चमक रही थी. वह अमृता से मुँह छिपाता फिरता. वक़्त सब घावों को भर देता है. तीन-चार महीनों में सुशील कुमार के भी घाव भर गए. उसने अमृता के साथ अपना कारोबार शुरू कर दिया. बल्कि अब वह थोड़ा दुस्साहसी हो गया था. अकेला पा कर चूम भी लेता था. दो-चार बार असफल प्रतिरोध करने के बाद अमृता अब इस काम में भी उससे आगे बढ़ गई थी. सुशील कुमार परम प्रसन्न रहने लगा था. यदि वह थोड़ा और होशियार होता, तो अमृता को ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ का आशीर्वाद दे देता. वैसे मौक़ा-बे-मौक़ा उसकी परम प्रसन्नता भंजित भी होती और वह मसूस करने लगता कि अमृता उसे सच्चा प्यार नहीं करती. कई बार ऐसा हुआ कि वह अमृता के घर गया, तो घर में कुछ लोगों ने फ़िल्म का प्रोग्राम बनाना चाहा. अमृता उसके और फ़िल्म के बीच फ़िल्म का चुनाव करती. उसकी कविताओं और चाट में दूसरे को ज़्यादा महत्वपूर्ण मानती वह सुशील कुमार पीड़ा से कराह उठता. वह बौखला जाता था.
सुशील कुमार की एक कविता छपी. वह दौड़ता हुआ अमृता के घर पहुँचा. उसे हंफनी आ गई थी. किसी तरह वह सूचित कर सका. अमृता ने कविता पढ़कर उसकी तरफ प्रशंसा भरी आँखों से देखने की जगह कहा,‘‘कुछ खिलाओ-पिलाओ इस खुशी में.’’ ‘बिल्कुल-बिल्कुल.’ वह हड़बड़ा गया और एक बार फिर बोला,‘बिल्कुल’ तो लाओ पैसे, मँगाते हैं बर्गर सर्वेंट से, अरे भगत... ‘‘नहीं, मैं ही ले आता हूँ. बढ़िया.’’ बिना जवाब सुने वह बाहर निकल आया, रुपयों की खोज में. वह गैस भरे गुब्बारे की तन गया था. वह बुदबुदाया,‘मैं तुम्हारा सर्वेंट हूँ अमृता.’ संयोग से आज महीने का आख़िर था, जिसमें पंद्रह-बीस रुपए दुर्लभ ही होते हैं. दोस्तों से पहले काफी कर्ज ले चुका था. क्या करे? उसने घर से दो किताबें हाथ में लीं और आध घंटा के भीतर बेच कर खाद्य सामग्री से लैस हो गया. अमृता से घरवालों ने खाया और कहा,‘‘चटनी टेस्टी नहीं है.’’ सुशील कुमार का सिर शर्म से झुक गया. जैसे कहा गया हो कि वह चोर है. इस प्रेम-प्रसंग ने सुशील कुमार को तो क़र्ज़दार बनाया ही, साथ ही आर्थिक मोर्चे पर पिता को अधिक बड़ा योद्धा बना दिया. कपड़ों और पॉकेट मनी की माँग ने पिता को और चिड़चिड़ा बना डाला. इतने तक ग़नीमत थी, यहाँ तो गाहे-बगाहे घर से रुपए भी लापता हो जाते. पिता परेशान थे, माँ दुखी. एक बार माँ की पुड़िया में सहेजी गई कील गायब होकर अमृता के कान की शोभा बढ़ाने लगी, तो पिता की अच्छी-खासी डायरी में अमृता फ़िल्मी ग़ज़लें लिखने लगी. घर की बिगड़ी स्थिति ज़्यादा बिगड़ रही थी. घर का लड़का सुशील कुमार बिगड़ रहा था. वह नई काट के कपड़े पहनने लगा था. कपड़ों पर सेंट छिड़कने लगा था. चश्मा भी खरीद लिया था. पैंट की पिछली जेब में रुमाल खोंसे रहता था. पट्ठे को अब पंख लग गए थे. लेकिन वह बेहद परेशान भी था. उधार देने वाले अब धमकियाँ देने लगे थे. एकाध बार सरेआम बेइज़्ज़त भी हो चुका था. दूसरी परेशानी की बात वह महसूस करता कि ख़ुद उसके प्यार में जो गहराई, ऊँचाई और पक्कापन था, उसका एक चौथाई भी अमृता के प्यार में नहीं था. जैसे, कभी-कभी वह अमृता के घर निर्धारित समय पर पहुँचता तो पता चलता कि वह सो रही है. इतने तक भी ठीक था. किसी-किसी छुट्टी के दिन उम्मीदें लेकर जाता, थोड़ी देर वह बातचीत करती फिर जमुहाई लेकर कहती,‘‘भई अपन तो चले सोने.’’ और सुशील कुमार उसके पाँचवर्षीय भाई के लड़के को खिलाता रह जाता. ऐसे में उसे अपने भूतपूर्व प्रेम की नायिका की याद आती. कैसे वह शाम को छत से देखती और दौड़ती हुई नीचे आकर दरवाजा खोलकर मुस्कराने लगती थी. वह कभी जल्दी वापस लौटता तो उसकी आँखों में कितनी शिकायत भर उठती. तक़लीफ में जीने के बावजूद लालच ज़रा भी नही था. एक बार उसने क़ीमती पेन भेंट किया तो उसने कसम दिला दी कि आइंदा से कभी महंगी चीज़ न दे. गीता की याद के रूप में बहुत सी चीज़ें थीं उसके पास. कितने सारे रूमाल थे. उसके हाथों का बना स्वेटर वग़ैरह. अमृता के प्यार ने सुशील कुमार को गीता से ही दूर नहीं किया था बल्कि ख़ुद अपने घर वालों से भी दूर कर दिया. वह घर वालों से कोई मतलब नहीं रखता था और घर वाले उससे कोई मतलब नहीं रखते थे. संबंध केवल खाने-पीने-सोने तक का रह गया था. अम्मा-बाबू को उसकी वेश-भूषा, चाल-ढाल सभी से पराएपन की बू आती. शुरू में वे दुखी होते थे लेकिन अब संतोष कर लिया था, कभी-कभी ही पीड़ा उठती थी. और सुशील कुमार तो इस तरह घर-फरामोश हो गया था कि अमृता के सामने घर की बातचीत करने से बचता रहता. सब कुछ लस्टम-पस्टम चल रहा था. पहले सुशील कुमार भी और लोगों की तरह लफूझन्ना था किंतु अमृता की मोहब्बत ने उसे छैल छबीला बना दिया था. वह घर की बात पर इसलिए कटता था कि उसके घर की हैसियत गई-बीती थी. उसके पिता कचहरी में बाबू होने के साथ-साथ बाबुओं की पोशाक कमीज़-पायजामा भी पहनते थे. थोड़ा चढ़ा हुआ पायजामा. अम्मा नाक सुकड़ने वाली महिला थी. जबकि अमृता के बाप गर्मी में भी सूट पहनने वाले शूरवीर थे. अमृता की माँ जाड़ों के दिनों में भी तीन-चार बार काँखों में सेंट छिड़क लेती थीं. दोनों घरों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ था. मगर घरों के बच्चे थे कि दावा करते थे, उन्हें एक-दूसरे से मुहब्बत है. यह प्रेम सुचारू ढंग से चलाता भी रहता किंतु हफ्ता दस दिनों में कोई ऐसी घटना हो जाती कि सुशील कुमार का दिल कर्रsss से फट जाता. जैसे कि एक अधेड़ व्यक्ति इंजीनियर साहब के घर आए. वह कोई फ़िल्म बना रहे थे, ऐसा उनका कहना था. अमृता उसे भूलकर उसके आस-पास मंडराने लगी. वह तो पिछले महीने आए बुजुर्ग को मादक निगाहों से देखने लगी थी. क्योंकि उन्होंने उसे उम्मीद दिलाई थी कि दिल्ली आने पर अमिताभ बच्चन के साथ उसकी फोटो खिंचवा देंगे. शायद यही कारण था कि सुशील कुमार जीवन में कई चीज़ें बनने के ख़्वाब देखता था. कभी वह टॉप क्लास का हीरो बन जाता, तो कभी आईएएस ऑफिसर, कभी मंत्री बनना चाहता तो कभी घुड़सवार. इसी क्रम में उसने पति बनने का स्वप्न देखा. उसने सोचा, अमृता प्रस्ताव से बहुत खुश होगी. सुशील कुमार पर वज्रपात हुआ. अमृता ने ख़ुशी नहीं ज़ाहिर की. उसने जो कुछ कहा, उसका निचोड़ यह था,‘‘कि मम्मी पापा नाराज़ हो जाएँगे.’’ सुशील कुमार गहरे ग़म में डूबा ही था कि पाया, उसकी निरीक्षण शक्ति तेज़ हो गई है. उसने ध्यान दिया, अमृता के बाप उसकी शादी के लिए दौरा करने लगे थे. सुशील कुमार के सामने सारे रहस्यों से पर्दा उठने लगा, अमृता उसके सामने ही फोटो खिंचवाने चली गई थी. हँसी-खुशी के साथ. ठसके के साथ कार में बैठकर दरवाजा बंद कर लिया था बेवफ़ा ने. घर में कोई शादी की बात करता, तो अमृता खुश होती और सुशील कुमार के हृदय पर तलवारें चलने लगतीं. वह बहुत मौक़ा ताड़ रहा था कि एकाँत पाकर अमृता से कुछ पूछे किंतु वह पुट्ठे पर हाथ नहीं रखने देती, हमेशा दूर-दूर रहने लगी थी. मम्मी के संग उसकी घनिष्ठता यकायक बढ़ गई थी. आख़िर उसे अवसर मिल ही गया. मम्मी किसी आवश्यक कार्य से पड़ोस में गई थीं. अमृता को देखते ही उसने उसका हाथ पकड़ लिया,‘‘आख़िर तुम मुझसे अलग हो ही गई. मुझसे शादी कर लो अमृता.’’ वह रुआँसा हो गया. ‘‘ये तो मम्मी पापा की बात है इसमें मैं क्या कर सकती हूँ. मेरी तो मैरिज भी सेटिल्ड हो गई है. डॉक्टर है लड़का.’’ लेकिन एक दिन अमृता नरम हो गई. इस बार वह मौक़ा ताड़ रही थी. उचित समय आने पर उसने सुशील कुमार की हथेलियाँ अपने हथेलियों में ले लीं और कहा,‘‘सुशील तुम्हारी यह दशा देखी नहीं जा रही है. लेकिन क्या करूँ. मैं भी मजबूर हूँ. ख़ैर तुमसे एक बात करनी है?’’ "क्या?" ‘‘मेरी चिट्ठियाँ वापस कर दो. वे अब तुम्हारे किस काम की?’’ और एक दिन सुशील कुमार से अमृता ने कहा,‘‘सब ख़त्म हो गया अब मेरे घर मत आया करो. क्या फ़ायदा?’’ इन सब बातों से उसे इतना सदमा पहुँचा कि वह सिगरेट पीने लगा. उसने दाढ़ी बढ़ा ली. मौक़ा पाते ही घर के सामने कुर्सी निकालकर बैठ जाता और अमृता के घर की तरफ घूरने लगता. जब कोई लाभ न होता तो कहता,‘ओ बेवफ़ा.’ और भीतर आ जाता. वह पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता,‘‘भगवान मुझे दंड दे रहा है. मैंने गीता के साथ बेवफ़ाई की. अब अमृता ने मेरे साथ बेवफ़ाई की.’’ वह गीता की दी हुई कोई रूमाल निकाल लाता और कहता,‘‘मैं कितना विचित्र इनसान हूँ.’’ लेकिन जल्द ही वह गीता के ख़्याल को झटककर अमृता को खोने के दुख में रोने की कोशिश करने लगता. वह रोता था, कुछ इसलिए भी कि उसकी धारणा थी कि बिना रोए उसके प्यार की सच्चाई साबित नहीं होगी. वह आँखें दबा-दबाकर आँसू निकालता. करवट के बल लेट जाता, जिससे आँख का आँसू कोरों की ढलान पाकर आसानी से लुढ़क जाए. वैसे कभी-कभी पूरी मशक्कत के बाद न निकलते कमबख्त. वह इस समय उबड़-खाबड़ मनःस्थिति में जी रहा था. अमृता के विवाह को लेकर वह ईश्वर से प्रार्थना करता कि उसे लाखों में एक पति मिले किंतु मन में इच्छा यह उठती कि उसका पति काला-कलूटा-कुरूप हो. एकाध कान ही न हो साले के पास. या गंजा निकल जाए ससुरा. उसके मन में समूचे डॉक्टर समुदाय के प्रति घृणा भर गई थी. डॉक्टरों को वह संसार का नीच और भ्रष्ट प्राणी मानने लगा था. उम्र और दिन बीतते देर नहीं लगती, 21 अक्टूबर को गाजे-बाजे बजने लगे. सुशील कुमार के घर भी निमंत्रण आया. उसके पिता ने जाकर 11 रुपए न्यौता दे दिया. अमृता के घर पर कारों, स्कूटरों का तांता लगा हुआ था. नेता, अफसर और ठेकेदार गर्व से अकड़े हुए थे. सुशील कुमार अपनी सूनी-सूनी उदास आँखों से देख रहा था सब कुछ. वह सोच रहा था, उसका संसार उजड़ गया है. दुनिया लुट गई है. वह जान-बूझकर अमृता की सहेलियों के सामने आ जाता, कहीं अमृता ने उसे बुलाने के लिए न भेजा हो. लेकिन जैसे कोई शराबी देखकर बगल हट जाता है, वैसे वे उसे देखकर करतीं. वह हताश और दुखी मन लिए मंडरा रहा था. दूल्हा सुंदर नहीं तो कुरूप भी नहीं था. पीड़ा से भर उठा वह. लेकिन आर्दश प्रेमी की तरह उसने ईश्वर से प्रार्थना की,‘‘अमृता का जीवन सुखी रखना.’’ मगर थोड़ी ही देर में वह संतप्त हो उठा,‘‘अमृता का पति शराबी-कबाबी निकल जाता, पीटता उसको. तब देवी जी मुझे याद कहतीं और अपनी भूल पर पछतातीं. या अमृता का पति चरित्रहीन हो, डॉक्टर तो नर्सो के साथ रंगरेलियाँ मनाते ही हैं. या हरामज़ादा नपुंसक होता.’ उसने सोचा, भगवान करे ऐसा कभी न हो लेकिन यदि दो-चार दिनों बाद उसका पति मर जाए. वह होती हुई उसके पास आए और कहे,‘‘सुशील मुझसे गलती हो गई थी. मुझे माफ कर दो सुशील. उसने तय किया कि वह उसे हृदय से लगाकर अपनी महानता का परिचय देगा.’’ अगले दिन नाश्ता-पानी के बाद बारात विदा होने लगी. सुशील कुमार गुस्से और तक़लीफ से भरा हुआ था. मन ही मन बारातियों को ग़ालियाँ दे रहा था. माँ बहन की गालियाँ. अमृता को-उसके पति को सभी को. अमृता की कार रेंगने लगी... थोड़ी देर में कार फुर्र हो गई. कार के जाते ही जाने क्या हुआ कि सुशील कुमार फफक पड़ा. आँखों में मोटे-मोटे आँसू भर आए. लोगों को निगाहों से बचने के लिए वह तेज़ कदमों से चलने लगा. एक सुनसान पार्क में घुस गया. जैसे उसके हृदय का कोई बांध टूट गया हो-रोता जा रहा था. गला सूख गया था, हिचकियाँ बंध गई थीं मगर वह रोता जा रहा था... एक दिन बीता. दो दिन बीते-वह रोज़ रोता. घर में पड़ा रहता, बाहर निकलने का मन नहीं होता. बार-बार इच्छा होती, माँ आकर बालों में हाथ फेर दे या बाबू उसे डाँटे या भइया आकर उसे जबरदस्ती उठा दें लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया. इधर बहुत दिनों से लोगों ने उसके प्रति अपनी आदतें बदल ली थीं. उसने लोगों को खो दिया था. चार-पाँच दिन बाद उसके आँसू सूखे, तो उसने सोचना शुरू किया. उसके मन में गीता का ख़्याल उभरा. वह पश्चाताप से भर उठा,‘‘अमृता के प्रेमजाल में फंसकर बेचारी गीता को धोखा दे बैठा.’’ वह बुदबुदाया,‘‘अमृता ने मुझ पर काला जादू कर दिया था. गीता मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया. मैं पापी हूँ गीता.’’ रात उसने गीता और अमृता के द्वंद्व में काटी. सुबह भी उसका वही हाल था. उसकी आत्मा उसे कचोट रही थी. उसने अपनी आत्मा से कहा,‘धिक्कारो, मेरी आत्मा धिक्कारो’ और सिगरेट पीने लगा. थोड़ी देर बाद वह धुएँ के गुच्छा बनाने लगा. इस निर्माण-कार्य में व्यस्त होने के बाद उसे शाँति मिलने लगी. लेकिन थोड़ी देर बाद वह पुनः बेचैनी से ग्रस्त हो गया. वह उदि्वग्न था. किसी काम में उसका दिल नहीं लग रहा था. अगले दिन उसने गीता के नाम एक पत्र लिखा. पत्र में ग़लितियों को माफ़ करने की प्रार्थना करते हुए प्यार को फिर से चालू करने की ज़िद की गई थी. गीता ने जवाब दिया,‘‘हम पाँच बहने हैं और पिता के पास पैसे नहीं है. अगर तुम दहेज न लो, तो मैं तुम्हारे साथ शादी कर सकती हूँ, लेकिन प्रेम नहीं. तुम प्रेम के काबिल नहीं. सच कहूँ तो घृणा के पात्र हो. हाँ, शादी करनी हो तो बताना. वैसे मुझे उम्मीद है कि अमृता का साथ पाकर रुपयों के पीछे भागना सीख गए होगे. मेरी एक सलाह है, कोई अच्छी-सी नौकरी पा लो. इससे तुम अपने को अधिक दाम में बेच सकोगे.’’ सुशील कुमार पत्र पढ़कर हतप्रभ था. उसे लग रहा था, पैरों तले ज़मीन नहीं है. उसका पूरा शरीर काँपने लगा. 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