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गुरुवार, 23 नवंबर, 2006 को 23:08 GMT तक के समाचार
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दबी हुई एक लहर

रेखांकन: डॉ लाल रत्नाकर

कहानी

वह मनहूस शाम. घटाटोप अंधेरा. मरघट की खामोशी को तोड़ती ताबड़तोड़ बारिश. मन के सूनेपन को हर पल गहराती वातावरण की सर्द उदासी. विशेषकर उनकी, जो जीवन की सर्द उदास और लंबी यात्रा के दौरान जमकर बर्फ़ हो गए हों. ऐसी ही कुछ मैं सोच रहा था कि एकाएक किसी की चीख़ ने विचारों की तंद्रा को झंझोड़ डाला. क्या हुआ? क्या हुआ? के गगनभेदी गर्जन के साथ एक ही साँस में हम ऊपर पहुँचे.

‘‘बुआ ने निशा पर काँच का गिलास दे मारा.’’ शिरिष का गला इतना भर्रा आया था कि लगा अभी रो ही देगा.

‘‘बु...आ...ने’’

कानों पर सहसा विश्वास नहीं हुआ. बुआ, जिसका जीवन एक अंतहीन मरुस्थल के सिवा कुछ न था और तिस पर भी जिसने जीवन में कभी अपने दुख को वाणी नहीं दी. बुआ का निशा पर वार करना, एकदम अविश्वसनीय, अप्रत्याशित घटना थी हमारे लिए. असंभव. बुआ की आवाज़ तक भी इन वर्षों में शायद ही किसी ने सुनी हो.

पूरे घर भर में लोगों के बीच वह लोगों से दूर थी. भीड़ में भी सबसे अकेली. शुरू शुरू में तो वही लोगों से कतराती थी. एकदम अलग-थलग छत के पीछे वाले कमरे में दिन भर पड़ी रहती. सिर्फ़ खाने के समय नीचे आती. बाद में लोगों ने भी धीरे-धीरे उसके अस्तित्व को भुलाना शुरू कर दिया. वह कब उठती, कब सोती, कब नहाती, कब खाती किसी को कुछ पता नहीं रहता.

 ईश्वर ने उसकी तरफ सभी ओर से आँखें मूंद ली थीं. बुद्धि ही नहीं सौंदर्य का कोठा भी रीता ही धर दिया था. चौकोर, चपटा चकला सा चेहरा, भद्दी चौकोर पहाड़ी भिंडी सी उँगलियाँ, बाहर को निकले विकराल गजदंत और घास जैसे रूखे-सूखे अव्यवस्थित बाल. ऐसी थी वह!

सिर्फ़ बच्चे कभी-कभी कौतूहलवश उसके छोटे से कोठरीनुमा कमरे में ताक-झाँक कर आया करते थे. कभी-कभी उसकी चीज़ें उथल-पुथल कर दिया करते थे. घर भर में उसका अस्तित्व ऐसा था जैसे कमरे में रखी हुई मेज़ या कुर्सी हो. अतिथि उसे रहस्यमय कौतूहल से देखते पर बाद में वे भी उसकी उपस्थिति से ऐसे ही अनभिज्ञ हो जाते जैसे कि घर के दूसरे लोग. कभी-कभार कोई उसका नाम भी लेता तो ऐसे जैसे कोई कभी प्लेट या चाकू छुरी का नाम लेता हो.

उसकी उम्र 35-36 की थी, पर सुदीर्घ एकाकी प्रवास से उसे उम्र से ज़्यादा प्रौढ़ दिया था. ईश्वर ने उसकी तरफ सभी ओर से आँखें मूंद ली थीं. बुद्धि ही नहीं सौंदर्य का कोठा भी रीता ही धर दिया था. चौकोर, चपटा चकला सा चेहरा, भद्दी चौकोर पहाड़ी भिंडी सी उँगलियाँ, बाहर को निकले विकराल गजदंत और घास जैसे रूखे-सूखे अव्यवस्थित बाल. ऐसी थी वह! पिताजी से सुनते आए हैं कि करीब 15-16 वर्ष पू्र्व एक बार उसने आत्महत्या करने की असफल चेष्टा की थी. वह नदी में कूद पड़ी थी पर तुरंत ही पता लग जाने से बचा ली गई थी. लोगों ने उससे आत्महत्या का कारण पूछा पर उसने किसी को कुछ नहीं बताया और तभी से उसने स्वयं को एक कमरे की चारदीवारी में क़ैद कर लिया था.

अंतर्मुखी तो वह प्रारंभ से ही थी पर इस घटना के बाद से तो उसने एकदम ही सहमी-सहमी सी चुप्पी धारण कर ली थी. धीरे-धीरे उसकी चुप्पी इस हद तक बढ़ती गई कि सारे दिन में मुश्किल से तीन-चार शब्दों तक ही उसकी बातचीत सीमित हो गई. वह सचमुच सबके बीच रहते हुए भी सबसे कटी हुई थी. लोगों ने उसे विक्षिप्त मनःस्थिति मानकर उसकी तरफ ध्यान देना ही छोड़ दिया था. उसका मानसिक संतुलन न बिगड़े इसलिए माँ प्रायः उसे किसी-न-किसी काम में व्यस्त रखी थी जिसे वह बिना बोले, बिना किसी प्रतिवाद के निरंतर करती रहती थी.

बाबूजी जब जिंदा थे, क्या नहीं क्या उन्होंने? गंडे, तावीज़, भभूत, झाड़पोंछ, व्रत, जाप, मनौतियाँ...लेकिन सब व्यर्थ. बहुत इच्छा थी बाबूजी की कि किसी भी प्रकार बुआ का घर बस जाए. बाबू जी यदि इतने अल्प समय में नहीं मरते तो शायद बुआ का घर बस भी जाता. बाबूजी के मरते ही हम जो टूटे कि जब तक संभले तब तक बुआ की शादी की उम्र निकल चुकी थी. ‘‘उसका ध्यान रखना, उसका दिमाग कमज़ोर है,’’ मरते वक्त भी पिताजी के प्रस्फुटित अधरों पर यही शब्द थे. पर जाने किस मनोग्रंथि या कुंठा के कारण बुआ कभी हम लोगों से घुल-मिल नहीं पाती थी.

घर भर में कुछ भी हो, चाहे किसी की छठी हो या किसी का श्राद्ध, पर न उनकी दिनचर्या में कोई अँतर आता न उनके हाव-भाव में. वह किसी भी प्रकार की अनुभूति या संवेदना से परे थी. घर में प्रायः चुनने-बिनने का सारा काम उसी के जिम्मे था जिसे वह यंत्रवत् करती रहती थी. उसे न कभी हँसते देखा गया था न रोते. और तो और पिताजी की मौत पर भी उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी. पिताजी के अंतिम दर्शन के लिए जब उसे बुलाया गया तब भी वह नीचे नहीं आई. कोई जवाब तक नहीं दिया. बस, शून्य में भावहीन सी ताकती रही. शायद वह मानवीय संवेदनाओं से शून्य हो चुकी थी.

‘‘कोई मुझसे तो नहीं पूछता तुम्हें ठंड तो नहीं लग रही’’ बुआ के सूखे पपड़ी पड़े प्रस्फुटित होठ झाग उगल रहे थे. उसकी अकथनीय पीड़ा उसके पोर-पोर में वृश्चिक दंश भर रही थी. आँखों में ज्वालामुखी फूट रहा था, मानों वह आँखों-ही-आँखों निशा पर दनादन गोलियाँ दाग रही थी. यह क्या वही बुआ थी, जो इतनी भयभीत एवं त्रस्त रहती थी कि किसी के सामने ही नहीं पड़ती और यदि कभी पड़ भी जाती तो चूहे भाँति बिल खोजने लगती!

हम समझ नहीं पा रहे थे कि बुआ का इतना आक्रोश निशा पर ही क्यों? यह ठीक था कि इतने वर्षों में जब से पिताजी की मृत्यु हुई है हम लोगों ने कभी भी यह जानने की चेष्टा नहीं की कि बुआ क्या खाती है, क्या पहनती है. उनकी भी कोई नारी सुलभ इच्छा है?

 हम लज्जा उन्हीं से अनुभव करते हैं जिनके प्रति हमारे हृदय में लेशमात्र भी आदर हो. बुआ को तो कभी किसी ने जीता-जागता अस्तित्व ही नहीं समझा तो उससे लज्जा भी कैसी?

निशा उस दिन तुरंत ही आई थी. इधर कुछ दिनों से घर में काफी चहल-पहल मची हुई थी. निशा शादी के बाद पहली बार ही आई थी. शिरिष भी उसके साथ ही आया था. शिरिष कुछ दिनों बाद ऑस्ट्रेलिया वापस जाने वाला था, इसलिए निशा और शिरिष का सारा समय प्रायः साथ घूमने-फिरने में ही निकल जाता था.

यूँ भी शिरिष काफी घुमक्कड़ प्रवृत्ति का था और फिर विदेश जाने के हर पल के अहसास ने उसे और भी यायावर बना दिया था. वह जैसे विदेश जाने से पहले यहाँ के सभी दर्शनीय स्थलों को अंतिम सलाम देना चाहता था. शिरिष के आने के बाद से ही सारे दैनिक कार्यक्रम उलट-पुलट हो चुके थे. एक तो जमाता और ऊपर से सुदीर्घ काल के लिए विदेश प्रवास की उसकी योजना हम जैसे उसकी आवभगत में कुछ भी कसर नहीं रख छोड़ना चाह रहे थे. इतनी महँगाई के युग में मैं एक ज़माने से टैक्सी में नहीं बैठा था. अंतिम बार भी अपनी शादी के समय ही बैठा था, पर शिरिष के आने के बाद से तो मेरे लिए जैसे टैक्सी ही एकमात्र आवागमन का साधन रह गई थी. और यही हाल हमारे भोजन के स्तर का भी था. शिरिष के आने के बाद से ही हमारे भोजन के उच्च स्तर और विविधता को देखकर मुझे अनायास ही बाबूजी के ज़माने की याद आने लगती.

उस दिन काफी ज़ोर से वर्षा हुई थी. निशा और शिरिष घूम कर लौटे तो पूरे पानी से तरबतर. हम इंतजार कर रहे थे कि दोनों कपड़े बदलकर लौटें तो खाना शुरू किया जाए. निशा और शिरिष को हम लोगों ने उसकी ‘‘प्राइवेसी’’ का ध्यान रखते हुए छत पर ही ठहराया था. छत पर पूरा एकांत था, सिर्फ़ बुआ को छोड़कर और बुआ का होना न होना हमारे लिए एक समान था. बुआ के मामले में शिरिष ने भी बिना किसी औपचारिकता के शीघ्र ही घरवालों का रवैया अपना लिया था. उस दिन दिनभर इनका कमरा बंद था. बुआ सफ़ाई नहीं कर पाई थी. अभी उनका कमरा खुला देख वह झाड़ू लगाने आई थी कि निशा अपनी भुवन मोहिनी हँसी बिखेरती कपड़े बदलकर लौटी. शिरिष ने उसे बहुत प्यार से सहलाते हुए कहा,‘‘अहा...निशा, कबूतर जैसे नन्हें सफेद पैरों को शीघ्र पोंछ लो, सर्दी लग जाएगी.’’ और पत्नी के प्रति प्रणय प्रदर्शन का एक भी अवसर न चूकने को आतुर शिरिष बुआ के सामने ही स्वयं उसके पैरों को पोंछने लगा.

हम लज्जा उन्हीं से अनुभव करते हैं जिनके प्रति हमारे हृदय में लेशमात्र भी आदर हो. बुआ को तो कभी किसी ने जीता-जागता अस्तित्व ही नहीं समझा तो उससे लज्जा भी कैसी? शिरिष की यह भूल मेरी नज़रों में अक्षम्य नहीं थी और तभी निशा का आर्तनाद सुनाई दिया और हम सब ऊपर भागे. देखा, निशा की कनपटी से खून बह रहा था और इतनी ठंड में भी एक झीनी-सी साड़ी में खड़ी बुआ रोष से थर-थर काँप रही थी. बुआ ने न जाने किस उन्माद में काँच का गिलास निशा पर उस समय दे मारा जब शिरिष उसके पाँव को पोंछ रहा था.

दुष्ट मन! जो बुआ के अतीत को कुरेद रहा था या आहत सम्मान! पर कभी बुआ ने आत्महत्या की चेष्टा की थी. जाने कौन-सा उन्मादित क्षण रहा होगा वह. पर आज कदाचित् बुआ की दुखती रग पर अनायास ही किसी का हाथ पड़ गया था या अनजाने ही कोई अतृप्त अतीत और उपेक्षित वर्तमान के दो पादों के बीच कसमसाती बुआ को अंदर तक चीरकर रख दिया था.

बुआ ने फिर एक बार आत्महत्या की असफल चेष्टा की.

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मधु कांकरिया
द्वारा-अशोक कुमार सुनील कुमार
54, एजरा स्ट्रीट
कोलकाता-700001

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