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गुरुवार, 19 अक्तूबर, 2006 को 13:29 GMT तक के समाचार
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हमके ओढ़ा दे चदरिया

रेखांकन: डॉ लाल रत्नाकर

हः हः की बोली बोलकर बैलों को खड़ा कर दिया कोकाई ने. हल की नास पहले ही सीधी कर ली थी.

बैल मूर्ति की तरह खड़े हो गए. कोकाई ने माथे से गमछा उतारा, पसीने से लथपथ अपना चेहरा पोंछा, घनी खिचड़ी मूँछें सँवारी फिर बैलों की पीठ सहलाने लगा.

‘‘बड़ी गर्मी है न. तुम्हारे मुँह से फेन निकलने लगा, अच्छा बेटे अब घर ही चलते हैं. आराम से पीना ढेर सारा पानी, नाद भर खाना खल्ली-भूसा, कल तक करते रहना पागुर.’’ बैलों ने अपने कान हिलाए. मालिक का हाथ बदन पर आल्हादित कर रहा था. कोने के धूर पर खड़े कोकाई ने देखा पूरा खेत जुत चुका है. वाह, क्या सम पर सारे सीत खड़े हैं, एक जगह भी बेउरेब नहीं. कोकाई का कमाल है, बड़े मालिक हरदम कहा करते थे, ‘‘खेत जोतना कोकाई जानता है, बीज डालना कोई इससे सीखे. जब धान का पौधा बित्ता भर का होता है तब खेत की लुनाई देखते ही बनती है. क्या स्वाभाविक कलाकार है कोकाई.’’ उनके कहने से उत्साह बढ़ता इसका. ओह, क्या थे बड़े मालिक. सुना था कि कोकाई का पिता इसे माँ के गर्भ में छोड़कर ऊपर चला गया. माँ को चाचा-चाची ने संभाल लिया. कोकाई चाची की गोद में पल कर बड़ा हुआ. जब पाँचेक साल का था तब बैल ने आँख में सींग मार दिया. बड़े मालिक पटना तक ले जाकर इलाज कराते रहे आँखे ठीक नहीं हुईं. ताज़िंदगी एक आँख के सहारे काम करता रहा. अब क्या कट गई इतनी, आगे भी कट जाएगी. ज़मीन का यह टुकड़ा मालिक ने स्वेच्छा से लिख दिया था. पुराने सेवक का बाल बच्चा था कोकाई, न लिखते ज़मीन तो सीलिंग में जाती. जो भी हो यह जी उठा एकबारगी.

गाँव के लोग पहले पूरब धन कमाने जाया करते थे अब पश्चिम जाने लगे. कोकाई अपने युवा काल में एक बार संगी साथियों के साथ चौमासा काटने, कुछ धन कमाने पूरब गया था पर उसे रास नहीं आया. वहाँ पाट धोने के क्रम में तलुओं में कोई धारदार वस्तु गड़ गई. दवा लेने और ठीक होने में काफ़ी दिन लग गए. कोई कमाई भी नहीं हुई उलटे स्वास्थ्य की हानि हुई. डेढ़ मन का बोरा अकेले पीठ पर उठाकर चल देने वाला कोकाई दो अढ़ैया भी उठा नहीं पाता. उसने कान उमेठे अपने- ना, कभी ढाका-बंगाला कमाने नहीं जाएँगे.

बाद के दिनों में जब बेटे पश्चिम जाने लगे तब बड़ा दबाव डाला. ‘‘बाउ, पश्चिम की बात ही कुछ और है. बड़ा साफ़ काम है. क्या करोगे चौमासा में घर में रहकर? वहाँ धन रोपनी करना! देस देखोगे’’
‘‘नहीं रे, मुझे नहीं सहता पूरब-पश्चिम हम कहीं नहीं जाएंगे. और ये क्या बोलता है कि क्या करोगे? काम का कोई टोटा पड़ा है? ढेर काम है. चौमासा भर घर छबाई का काम है. अकेले कारीगर हैं हम. तुम लोग सब गाँव छोड़कर चले जाते हो रह जाती है सिर्फ़ झोटिया पंच लोग. उन्हीं लोगों को पुल्ला फेंकना पड़ता है छप्पर पर. काम नहीं है बोलता है ?” देर तक बड़-बड़ करता रहता कोकाई. बेटे सोचते, सच ही तो कहता है बाउ इसे काम की क्या कमी है.

बहुत तेज़ बारिश हुई और रोपनी खत्म हो गई हो तो टेरूआ लेकर सुतली कातने बैठता कोकाई सुतली कती होती तो गोवर्धन पूजन के वक़्त गाय-बैलों के लिए रस्सी बनाने में देर नहीं होती. बरसात में ही कोकाई सुतली का जाबी बना लेता जो धान दौनी के वक़्त बैलों के मुँह पर जाली की तरह बाँधना होता. इन दिनों कुछ लोग कोकाई से वह बनवाने भी लगे थे. कोकाई कोई मेहनताना नहीं लेता. बनवाने वाला अपना पाट दे जाते वह बना देता. अलबत्ता कोई अपने घर बैठाकर तुतली कतवाता और जाबी-रस्सी बनवाता तो मजूरी देनी पड़ती. काम से लिए समय ही बचता ही कहाँ है और ये मूरख लहेंगड़े कहते हैं कि चौमासा में घर पर रहकर क्या करोगे?’’

अरे घर पर रहकर देखो कि क्या किया जाता है. हर साल बाढ़ में खेत खलिहान डूब जाता है. गाय बैल के लिए घास क्या अकेली औरत बेलसंडी वाली काटेगी? अब अलौंत ब्यायी गायों को हरे चारे के बिना चंगा कैसे रखा जा सकता है? बहुओं को घास काटने भेजें? वे भी तो बच्चे वाली हैं. कोकाई यह सब सोच विचार कर गाँव नहीं छोड़ता. ऐसा ही है यह. उस बार की सर्वग्रासी बाढ़ में जब गाँव छोड़ने की बारी आई तब कोकाई ने नावों पर ढोर-डंगर और औरतों बच्चों को ढोया था दिन भर तटबंध तक. अब भी वह दृश्य यादकर सिहर उठता है कोकाई. प्रलय था प्रलय. गाँव के सारे नवयुवक, अधेड़ परदेस गए थे मात्र स्त्रियाँ और वृद्ध बच्चे थे. कौन समझदार व्यक्ति एकदम से गाँव छोड़कर चला जाएगा? ये नई पौध दूसरे की बगिया महकाने जाते हैं अपनी भूमि को छोड़ दिया. ज़मीन को सुला दिया है.

अचानक ठंढ़ी हवा का झोंका आया. कोकाई को अच्छा लगा! उसने आकाश की ओर निहारा. घने काले मेघ घिर आए हैं. वाह, रोहिणी के आते ही मेघ! बड़ा अच्छा संकेत है, आज जल बरसा तो साल भर बरसेगा. फसल अच्छी होगी, साधुओं के भंडारा का इंतजाम हो जाएगा. कोकाई भंडारा अपने बाहुबल की कमाई से देना चाहता है. कबिरहा है न! खुदमुख्तार है. देखा दोनों बेटे दौड़े आ रहे हैं. मेघ की छाया से धरती सँवला गई थी. कैसे जान बेजान दौड़े आ रहे है छोकरे.
‘‘बाउ, हो बाउ!’’
‘‘क्या है रे?’’
‘‘बाउ, घर चलो, आँधी तूफान का रंग है.’’
‘‘चल बैलों का मुन्ही छिटका, खोल दे. हल खेत में पार दे. जल्दी कर!’’ लड़के उधर दौड़े. कोकाई को हँसी आई-आँधी तो नहीं आएगी बारिश होगी. आँधी के वक़्त आकाश का रंग भूरा हो जाता है, यह तो काला कुच-कुच हो गया गया है. अनुभव का थोड़ा है बेटवा सब. ख़ुद समझेगा, अभी तो हम हैं न, आकाश बने हुए. सोचता है कोकाई.

‘‘अरे हो कोकाई का, खेत से भागे. झोपड़ी में आओ पहिला मेघ है ठनका उनका गिरेगा तो तुम ही...’’ मनीजरा अपने मचान के नीचे से आवाज़ दे रहा था.

‘‘आते हैं आते हैं, बहुत गर्मी थी जरा ठंढाने दो.’’ सचमुच ठनका काले रंग पर गिरता है, भैंस, हाथी लोग छुपा लेते हैं, उसके बाद बचा कोकाई, पक्के रंग का. कई बार चाची जी मजाक करती हैं-‘‘रे कोकबा, तू मेघ-बुन्नी में खेत में न जाया कर काला पाथर जैसा है बिजलौटा गिर जाएगा.’’
‘‘अरे खोल न रे बैलों को निकल घर हम भी चलते हैं. ई रोहिणी की बूंद देह को हल्का ही करेगी.’’ टोकरी गैंती समेट कर छोटे बेटे को बढ़ाते हुए कोकाई रपेटता है बड़े बेटे को. बहुत गुम्म की हवा, बड़ा आतप था भारी. धरती की गर्मी रोहिणी मैया हरने आ रही है.

अम्मा को जाने कौन जानलेवा बीमारी, ग्रसित कर लिया था, निज कोकाई के गौने के दिन चल बसी. इसे तो टुग्गर बना ही गई बेलसंडी वाली ने सास का सुख ही न देखा. बेलसंडी वाली पहले से टुग्गर थी. उसके माँ-बाप हैजा-टुनकी में चल बसे थे. मामा- मामी के घर पली थी वो. कोकाई कम से कम माँ के साए का सुख तो भोग सका था. माँ का बेटा होने के नाते इसके पल्ले गृहस्थी का गहरा ज्ञान आया, यह कायदे का खेतिहर और मितव्ययी गृहस्थ हो गया. कबिरहा होने के कारण ऊपर से स्वयं फक्कड़ और अंदर से बहता निर्मल सोता रहा. बेलसंडी वाली ने एक के बाद एक दो बेटे जने, बेटी नहीं. बिना किसी दवा-दारू के दो बच्चों के बाद तीसरा पैदा ही न हुआ. उसने गाँव भर की छोटी बच्चियों के लिए कई बार रंगीन क्लिप और फुदने खरीद कर अपनी साध पूरी की.

नियम क़ानून को मानने वाला कोकाई हर साल अपना बैल बदल लेता. नई खेती पर नया बैल खरीददता. पुराना बैल बैचकर जो पैसे हाथ में आते उसमें और लगाकर नया पुष्ट बैल खरीद लेता. तीन साल पहले जो बैल इसने हाट पर चढ़ाया था उसका ख़रीददार इलाके में शिकायत करता पाया गया कि कोकाई ने बेकार बैल उसे थमा दिया है, वह खेती के काम का नहीं, वह उसे बेच देगा. कोकाई ने इस कान से सुना उस कान से उड़ा दिया. अगहन में जब गोंसाई साहब गाँव पधारे तो यह भी चढ़ावा लेकर साहेब बंदगी करने पहुँचा. गुरू ने पहुँचते ही आड़े हाथों लिया.

‘‘कोकाई तूने बैल कसाई को बेचा सुना है, पराच्छित करना पड़ेगा.’’ उन्होंने फरमान जारी किया.
‘‘नही गोंसाई साहेब, नहीं हम नवेला गाँव के किसान के हाथ बैल बेच कर आए थे.’’

‘‘गलत बात, तेरा बैल कसाई ले जा रहा था दस मुंड देखा है. बोलो कौन कौन देखा है.’’ सचमुच कुछ लोग उठ खड़े हुए कि उन्होंने देखा है. कोकाई हक्का बक्का रह गया. उसने कहा कि वह उस किसान को ढूंढ लाएगा जिसे बैल खरीदा पर सुनवाई न हुई. सज़ा सुना दी गई. सज़ा को कोई कबिरहा नकार ही नहीं सकता गोसाई साहब की दी हुई सज़ा जो थी.

‘‘इस बार फसल अच्छी नहीं हुई गोसाईं साहेब. सज़ा बख्श दीजिए.’’वह गिड़गिड़ाया.
‘‘सज़ा, जब फसल अच्छी हो तभी पूरी करना, समय सीमा है साहेब के पास जाने तक की. चादर मैली लेकर जाओगे?’’ पैरों पर गिरे कोकाई से साहब ने कहा था.

 अब भी वह दृश्य यादकर सिहर उठता है कोकाई. प्रलय था प्रलय. गाँव के सारे नवयुवक, अधेड़ परदेस गए थे मात्र स्त्रियाँ और वृद्ध बच्चे थे. कौन समझदार व्यक्ति एकदम से गाँव छोड़कर चला जाएगा? ये नई पौध दूसरे की बगिया महकाने जाते हैं अपनी भूमि को छोड़ दिया

आकाश का यह काला रंग रोहिणी नक्षत्र की बूँदे आशा का संचार करती हैं. अपनी एक रौशन एक निस्तेज़ आँखों से आकाश की ओर निहारा. खुशी से खिले चेहरे के स्वामी के पोपले मुख में एकमात्र दाँत बिजली सी अभूत पूर्व कौं और एक गड़गड़ाहट, फेकना-बुधना, मनीजरा कान में उंगली डाल धरती की ओर मुँह झुका कर बकने लगा, ‘‘साहोर साहोर’’. पूँछ उठाकर भागते बैलों की जोड़ी थम गई. बारिश की मोटी-मोटी बूँदे भिगोने लगीं धरती को. बैल चलते हुए आकर अपने हलवाहे के पास खड़े हो गए. फेकना बुधना और मनीजरा दौड़कर पास आ गया. कोकाई गिरा पड़ा था झुलसे हुए पेड़ की तरह, उसके पैरों के पास एक विराट गढ़ा हो गया था. कोकाई की खुली आँखें आकाश निहार रही थीं, शरीर का रंग काला न रहकर भूरा हो गया था. वह निःस्पंद, निस्पृह धरती पर लेटा हुआ था.

‘‘बाउ, बाउ, कोकाई का’’ के आर्त्त स्वर से उसमें कोई हलचल नहीं हुई. अपने अपने मचान और खेतों से दौड़े हुए ग्रामीण आए. वयोवृ्द्ध यदु ने कहा,‘‘ठनका यहीं गिरा है, कोकाई चपेट में आ गया. देखते क्या हो? खाट लाओ आंगन ले चलो. आधे घंटे की बारिश ने मौसम बदल दिया था. उमस भर गई थी.

कोकाई के संस्कार के बाद बेटों ने जैसा कि अक्सर होता है उधार लेकर भंडारा का आयोजन किया. भंडारा चूँकि साधुओं का था सो शुद्ध घी का हलुआ पूड़ी बुंदिया दही का प्रसाद रहा. संस्कार के वक़्त ही साधु के प्रतिनिधि ने बड़े बेटे फेकना से कहा-
‘‘तुम कोकाई को अग्नि कैसे दोगे? साँकठ जो हो. पहले कंठी धारण करो, साधु को पैठ होगा वरना...’’

रोता हुआ अबूझ सा फेकना कंठी धारण कर बैठ गया. बारहवीं का भोज समाप्त हुआ. गले में गमछा डालकर फेकना बुधना साधुओं के सामने खड़ा हुआ.!

‘‘साहेब, हम ऋण से उऋण हुए कि नहीं?’’ कान उऋण सुनने के लिए बेताब थे. साधु घी की खुशबू में सराबोर थे, कीर्त्तनिया भाल-मृंदग बजाकर गा रहे थे,‘‘मैली चादर ओढ़के कैसे द्वार तेरे मैं जाऊँ.?’’

‘‘नहीं रे फेकना तेरी ऋणमुक्ति कहाँ हुई. गोसाई साहेब ने दो साल पहले पचहत्तर मुंड साधु का भोज दंड दिया था. नहीं पूरा कर पाया बेचारा. यह तो तुझे ही पूरा करना पड़ेगा. उऋण होना है तो यह सब करना पड़ेगा.’’
‘‘पचहत्तर मुंड साधु? क्या कहते हैं, हम ऐसे ही लुट गए अब कौन देगा ऋण भी हमको! ’’ रोने लगा फेकना.
‘‘क्या? तेरा बाप का पाप कैसे कटित होगा?’’
‘‘आप लोग अन्याय कर रहे हैं. कबीरदास सभी रूढियों के ख़िलाफ़ थे, उनका नाम लेकर रुढ़िवाद की पराकाष्ठा पर चले गए हैं.’’ गाँव के एक मैट्रिक पास युवक ने आगे आकर कहा.
‘‘तुमसे कौन पूछता है? यह फेकना के उऋण होने की बात है, उसे बरगला कर पाप के भागी बनने पर मजबूर न करो.’’

 बैल ने आँख में सींग मार दिया. बड़े मालिक पटना तक ले जाकर इलाज कराते रहे आँखे ठीक नहीं हुईं. ताज़िंदगी एक आँख के सहारे काम करता रहा. अब क्या कट गई इतनी, आगे भी कट जाएगी. ज़मीन का यह टुकड़ा मालिक ने स्वेच्छा से लिख दिया था. पुराने सेवक का बाल बच्चा था कोकाई, न लिखते ज़मीन तो सीलिंग में जाती

‘‘बड़का पढ़ुआ बने हो.’’ लेकिन प्रतिकार करने भी बहुत सारे लड़के इकट्ठे हो गए. अच्छा हंगामा मच गया. फेकना ने मेट साधु के पैर पकड़ लिए. बुधना रो-रो कर हलकान हो गया. बेलसंडीवाली को गश पर गश आने लगा.
‘‘ये प्राणी, अपनी माँ को बुलाओ, हम उसी से पूछेंगे अपने आदमी को परलोक में किस स्थान पर रखना चाहती.’’ उनकी निर्मम गर्जना ने फेकना के अंदर साहस का संचार किया. वह ग्रामीणों की ओर मुड़ा अपने आँसू पोंछे और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया.
‘‘कहिए चाचाजी, भैयाजी लोग इस गरीबों की मदद कैसे करेंगे आप?’’

‘‘कहने की बात है जाते हैं साहुजी के पास सब सामान गिरवा देते हैं. तुरत काम होगा’’ एक खुर्राट ग्रामीण ने कहा. साहुजी दौड़े हुए सामान गिरा गए. हलुआई बैठ गए बारहवीं से लेकर तेरहवीं तक सत्तर मुंड साधुओं का जीमने लगा. यह अतिरिक्त मुंड प्रायश्चित का था. कीर्तिनिया आलाप ले रहे थे.

‘‘हमके ओढ़ा दे चदरिया
हो चलने की बेरिया’’

‘‘बाबुआ फेकन, इस लिस्ट पर दसखत कर दो, मेरे पास रहेगा. कमा कर देते रहना दोनों भाई. पढ़ लो ठीक से ’’ साहुजी ने कहा. फेकन ने टो टा कर पढ़ लिया,‘‘दो पैसा सैकड़ा सूद.’’ भरी आँखों से सकल समाज की ओर देखता रहा फिर दस्तखत कर दिए.
‘‘आह, बापू का काम संपन्न हुआ. दंड भी पूरा किया. वाह बेटा.!!! खुर्राट ग्रामीण ने कहा. धीरे-धीरे अतिथि जाने लगे. फेकना भारी कदमों से गश खाती माँ के पास आ खड़ा हुआ. धीमे बैठा. माँ ने उसकी ओर कातर निगाहों से देखा.

‘‘माँ कल भोरे गाँव से निकलना है, होश करो. बुधना खेत संभालेगा. तुम पीठ पर रहना. बाउ के काम का कर्ज जब तक नहीं उतारेंगे उनके ऊपर चादर कैसे ओढ़ाएंगे? बाउ यहीं कही रहेगा पैठ नहीं होगा.’’ बेटे से लिपटकर जी भर रो चुकी बेलसंडी वाली फिर कभी होश नहीं खो सकी.

बनारस में डबल शिफ्ट रिक्शा चलाता फेकन हलकान होकर कबीर चौरा चौक पर सो जाता है कुत्ते की नींद और जगता है बिल्ली की नींद.

कीर्तन के उदास स्वर हवा में तैरते रहते हैं-‘‘हमके ओढ़ा दे चदरिया हो...’’
रिक्शे पर पैडिल जोर से मारने लगता है फेकन, कर्ज़ की कई किस्तें बाकी हैं.

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