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गुरुवार, 05 अक्तूबर, 2006 को 14:26 GMT तक के समाचार
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उसका चेहरा--कहानी

रेखांकन: डॉ लाल रत्नाकर

कहानी

हवा इतनी ठंडी और तेज़ थी कि विपरीत दिशा में चलना सुख की तरह था. दिनेश की इच्छा पान खाने की हुई. पान की गुमटी के पास बलदेव खड़ा था. दिनेश ने बलदेव को देखते ही कहा-"मुझे ज़मीन मिल गई."

बलदेव की आँखें आश्चर्य-मिश्रित औपचारिकता में फैलीं और फिर आगे सुनने के लिए स्थिर हो गईं. इसी बीच, बगल में चाय की गुमटी के पास खड़ा आदमी गिरते-गिरते अचंभे की तरह दिनेश के सामने खड़ा हो गया.

"कहाँ है? कहाँ है?" उसने कुछ इस तरह पूछा जैसे वह ज़मीन पर नहीं, हवा में लटका हो.

"बसंत बिहार में है. बाज़ार बमुश्किल आधा किलोमीटर होगा. मैं बहुत दिनों से ज़मीन के लिए भटक रहा था."

दिनेश का कहा सुनकर वह बिना कुछ बोले चुपचाप चला गया. उसकी चाल में एक अव्यक्त दृढ़ता थी. वह नीली बध्धियों वाली हवाई चप्पल पहने था और उसका पैजामा सामान्य से कुछ ऊँचा था. पैजामा कम कपड़े की वजह से कुछ ऊँचा सिला होगा जो पहली ही धुलाई में सिकुड़कर कुछ और ऊँचा हो गया होगा. धुलने से पैजामे का कद ऊँचा हो गया था लेकिन आदमी की स्थिति कुछ गिर-सी गई थी जिसे उसकी मनःस्थिति ने संभाल लिया था. वह अस्वाभाविक नहीं लग रहा था. चलते-चलते वह अपने पहनावा दिखने और होने से बहुत दूर निकल गया था.

दिनेश ने उस दिशा की सड़क को देखा जिसमें वह ओझल हो गया था.

आज दिनेश को शहर की भीड़ से उकताहट नहीं हो रही थी. उसने चलते-चलते पान की पीक छोड़ी जो सरकारी अस्पताल की टूटी दीवार के उस पार तक गई. उसे अपने फेफड़ों में अधिक हवा का होना अनुभव हुआ. वह लंबे-लंबे कदम बढ़ाता घर की ओर चल दिया.

घर में बैठक की खिड़की खुली थी और पर्दा हवा में उड़ रहा था. सामने की दीवार पर कलैंडर टंगा था जिसमें एक सुंदर मकान की तस्वीर थी. हवा में कलैंडर के साथ-साथ मकान भी उड़ रहा था. दिनेश को तस्वीर का मकान किसी शिशु की तरह दिखा, जिसे कोई हवा में उछाल-उछाल कर खिला रहा हो.

 जिसकी अपनी ज़मीन नहीं होती वह किसी तरह भी नहीं बचता. बस बचा हुआ-सा दिखता है. पेड़ों की अपनी ज़मीन होनी चाहिए, वे अकाल मौत मर रहे हैं. जहाँ आज तुम खड़े हो, 12 वर्ष पहले यहाँ घना जंगल था. शाम के बाद आने में डर लगता था लेकिन यह ज़मीन उन पेड़ों की नहीं थी सो वे नहीं रहे

निदेश को रात में पेशाब के लिए बाहर जाना पड़ता है. बिस्तर का चादर ठीक करते-करते वह सोचने लगा, मकान में अपने बेडरूम से अटैच बाथरूम बनवाऊँगा, पेशाब के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा.

कपड़े चेंज करने के लिए वह पैजामा खोजने लगा. जैसे ही उसने पैजामा पहना तो उसे लगा पैजामा कुछ ऊँचा है और वह अजीब-सा दिख रहा है. उसने नाड़ा खोलकर पैजामे को नीचे खिसकाकर फिर से बांधा और संतुष्ट हो गया.

सड़क के किनारे फुटपाथ पर पेड़ों की पौध बेचने वाला बैठा था. दिनेश को वही चाय की गुमटी वाला आदमी पौधों के पास खड़ा दिखा.

दिनेश ने उसके पास जाकर कहा, "कैसे हो?"

"ठीक हूँ"

"क्या पौधे ले रहे हो?"

"नहीं! देख रहा हूँ. लेकर क्या करूँगा...कहाँ लगाऊँगा?"

"क्यों तुम्हारी ज़मीन नहीं है?"

"नहीं, मेरी कोई ज़मीन नहीं है और न ही मेरे पिता की कोई ज़मीन थी. मुझे आश्चर्य होता है कि बिना ज़मीन के हम कैसे पैदा हो गए?"

वह एक स्वस्थ नीम के पौधे को हाथों में लिए था जिनमें से एक सुंदर पेड़ का आकार आने वाले समय में फैल रहा था. उसने पौधे को देखते हुए कहा, "यह कितना सुंदर है."

दिनेश ने उसका मन रखने के लिए कहा, "इसे ले लो, जहाँ रहते हो वहीं किसी खाली जगह में लगा देना."

उसने दिनेश की आँखो में देखते हुए कहा, "इससे क्या होगा? क्या यह जिंदा रहेगा? जिसकी अपनी ज़मीन नहीं होती वह किसी तरह भी नहीं बचता. बस बचा हुआ-सा दिखता है. पेड़ों की अपनी ज़मीन होनी चाहिए, वे अकाल मौत मर रहे हैं. जहाँ आज तुम खड़े हो, 12 वर्ष पहले यहाँ घना जंगल था. शाम के बाद आने में डर लगता था लेकिन यह ज़मीन उन पेड़ों की नहीं थी सो वे नहीं रहे."

उसकी बातें सुनकर दिनेश को विश्वास नहीं हुआ. यह सब जो उसने अभी-अभी सुना है उसे वही चाय की गुमटी वाले आदमी ने ही बोला है. वह विस्मय से इसे देखता रह गया और फिर कुछ देर बाद महज बात को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उसने कहा, "आज न जाने कितने आदमियों के पास रहने के लिए एक कमरे की जगह नहीं है, पेड़ों के लिए ज़मीन की चिंता कौन करेगा?"

"चिंता तो करनी पड़ेगी. पेड़ों की अपनी ज़मीन नहीं होगी तो लोगों को बिना पेड़ों के रहना पड़ेगा और यह आत्महत्या ही होगी." दिनेश को उसकी बात समझ में नहीं आई.

उसने दिनेश की आँखों में देखते हुए फिर कहा, "क्या तुम्हे पता है कि यह पेड़ जिसके नीचे हम खड़े हैं, क्यों ज़िंदा है? क्योंकि यह आदमी के आदेश से खड़ा है. जो स्वतंत्र होगा, उसे कभी भी मारा जा सकता है. तुमने गर्मी के दिनों में प्याऊ में पानी पिलाते किसी बूढ़े, बच्चे या स्त्री को देखा होगा. यह पेड़ वैसा ही है इसलिए ज़िंदा है. एक दिन तुम देखना यह सड़क चौड़ी होगी और यह पेड़ नहीं रहेगा."

"सड़क का चौड़ा होना ज़रूरी है. आए दिन एक्सीडेंट होते रहते हैं. अपने ही शहर में औसतन चार-पाँच आदमी रोज़ मरते हैं."

 आज तक आदमी अपने लिए ही करता आ रहा है फिर भी उसका मन नहीं भरा. उसने हवा, पानी, अन्न सभी कुछ दूषित कर दिया. यहाँ तक कि अपना चित्त भी. मुझे उसकी वैज्ञानिक दृष्टि और विकास की अवधारणा कुछ भी समझ में नहीं आती. वे इस तरह इकहरी और विखंडित हैं कि समूची सृष्टि को एक अंतहीन असंतुलन की ओर धकेल रही हैं. उसके जुटाए तथ्य मुझे एक डरावने घपले की तरह लगते हैं और उसकी गढ़ी तमाम परिभाषाएँ झूठी नज़र आती हैं

"ठीक है लेकिन इसके लिए पेड़ ज़िम्मेदार नहीं. लोग अपनी मौत ही मर रहे हैं."

"जो भी हो, पहले आदमी अपने बचने के लिए जो ज़रूरी है वही करेगा. बाद में दूसरी बातों के बारे में सोचेगा." दिनेश की बात सुनकर उसने थोड़े आवेश में आकर कहा, "आज तक आदमी अपने लिए ही करता आ रहा है फिर भी उसका मन नहीं भरा. उसने हवा, पानी, अन्न सभी कुछ दूषित कर दिया. यहाँ तक कि अपना चित्त भी. मुझे उसकी वैज्ञानिक दृष्टि और विकास की अवधारणा कुछ भी समझ में नहीं आती. वे इस तरह इकहरी और विखंडित हैं कि समूची सृष्टि को एक अंतहीन असंतुलन की ओर धकेल रही हैं. उसके जुटाए तथ्य मुझे एक डरावने घपले की तरह लगते हैं और उसकी गढ़ी तमाम परिभाषाएँ झूठी नज़र आती हैं." कहते-कहते वह चुप हो गया.

दिनेश का कहा सुनकर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान की छाया आई जिसे दिखने के पहले ही उसके चेहरे ने सोख लिया. उसने अपने हाथ के पौधे को ज़मीन पर रख दिया. पौधा रखते ही, एक पल में उसका चेहरा अपनी पुरानी आकृति में लौट आया. उसे देखकर दिनेश की आँखें सहज हो गईं. उनमें वही पुरानी पहचान लौट आई जो पहले से दिनेश की आँखों में थी. देखते-देखते उसके चेहरे में अजीब उदासी का भाव आया और वह चल पड़ा.

उसकी भाव दशा देखकर दिनेश को पक्का विश्वास हो गया कि वह सामान्य नहीं है. उसके उपर किसी प्रेत की छाया तो नहीं? हो सकता उसके ऊपर ज़मीन या पेड़ के प्रेत की छाया हो. यह कैसे हो सकता है? वह मन ही मन बुदबुदाया, "प्रेत तो केवल आदमी का होता है."

दिनेश घर लौटा तो पत्नी ने मकान के नक्शे के बारे में पूछा. वह नगर निगम जाना भूल गया था. उसने कहा, "कल पता करूँगा." सोते समय दिनेश की आँखों में एकाएक उसी आदमी का चेहरा आ गया. एक पल को उसे लगा कि कहीं वह आदमी उसका पीछा तो नहीं कर रहा है. फिर वह अपनी सोच को उलटा करके सोचने लगा. कहीं मैं स्वयं ही तो उसके पीछे नहीं पड़ गया हूँ. उसके चेहरे से कब दिनेश अपने चेहरे को खोज में बीते हुए जीवन में निकल गया उसे पता नहीं चला.

एक दिन दिनेश के मकान का नक्शा पास हो गया लेकिन उसे खुशी नहीं हुई, बस राहत भर महसूस हुई. वह नगरनिगम की औपचारिकताएँ पूरी करते-करते इतना थक गया था कि नक्शा पास होने की खुशी कब छीज गई पता नहीं चला.

नक्शा पास होने के बाद दिनेश मकान के लिए ऋण के वास्ते बैंक जाने लगा. बैंक दूसरी दिशा में होने के कारण उसके आने-जाने में बदलाव आ गया. उसके अंदर अजीब-सी रिक्तता, थकान और ऊब घिरने लगी जिसे वह स्वयं नहीं समझ पा रहा था.

शाम को आसमान में हल्की बदली छाई हुई थी जिसमें सूरज की किरणें डूबने से पहले रंग और प्रकाश के अनगिन खेल खेल रही थीं. बिजली के तारों पर कुछ चिड़ियाँ कतार में बैठी थी और एक नीलकंठ आकाश में अपनी उड़ान के करतब दिखा रहा था. बरामदे की कुर्सी पर बैठा दिनेश कुछ समय के लिए अपने से छिटककर हो रही शाम में खो गया.

पत्नी की आवाज़ से दिनेश अपने में लौट गया. पत्नी के हाथों में चाय के दो प्याले थे. एक प्याला चाय दिनेश की ओर बढ़ाकर वह पास ही में पड़ी खाली कुर्सी पर बैठ गई. चाय का घूँट लेकर पत्नी ने कहा, "मैं मिसेज गुप्ता का नया मकान देखने गई थी, अच्छा बना है. ‘लक्ष्मी बिल्डर्स’ ने बनाया है. तुम भी देख लो और अगर पसंद आ जाए तो बात कर लो."

पत्नी की बात सुनकर दिनेश ने कहा, "ठीक है, गुप्ता जी से बात कर लूँगा" अंदर किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई तो पत्नी उठकर अंदर जाने लगी. जाते-जाते गहरी साँस ली और कहा, "कब वह दिन आएगा जब अपने घर के बरामदे में बैठकर चाय पियूँगी."

दूसरे दिन दिनेश गुप्ता जी के यहाँ से लौट रहा था. एकाएक उसकी नज़र बगल वाली गली में चली गई. गली में वही चाय की गुमटी वाला आदमी दिखा. उसके पीछे कुत्ते लगे थे और वह बदहवास हवा में भाग रहा था. दिनेश सड़क से उतरकर गली की ओर दौड़ा. गली में वह दूर-दूर नज़र नहीं आया. कुछ देर तक वह यूँ ही खड़ा रहा फिर चुपचाप लौट आया. लौटते हुए वह सोचने लगा उसे ज़मीन नहीं मिली है, ज़मीन मिल जाए तो उसका भटकना थम जाएगा. ज़मीन के लिए पैसे चाहिए. पास में पैसे हों तो किसी की भी ज़मीन ख़रीदी जा सकती है.

रेखांकन - डॉ लाल रत्नाकर

उसने चारों ओर कुछ इस तरह देखा जैसे वह मनुष्य जाति की अर्जित ज़मीन को किसी विराट दृष्टि से देख रहा हो. उसके देखने में एकाएक पास खड़े आदमी की छींक सुनाई दी, नज़र मिलते ही उसने कहा, "माफ़ करना, मुझे धूल-धुएं से एलर्जी है."

उसकी बात सुनकर दिनेश अपने स्वभाव के विपरीत अकारण-सा कुछ तीखे स्वर में बोला, "आप कह रहे हैं सो ठीक है लेकिन आपको ठीक-ठीक पता नहीं. मैं बताता हूँ, आपको धूल-धुएं से नहीं आदमी से एलर्जी है. यह धूल-धुआँ आदमी का ही है. जैसे कुछ दिनों से मुझे ख़ुद अपनेआप से एलर्जी होती जा रही है. चूँकि मैं भी एक आदमी हूँ तो मुझे भी आदमी से ही एलर्जी हुई न. यह बहुत त्रासद स्थिति है. हो सकता है यह कुछ न हो सिवाय एक तरह के मनोरोग के या इसका उपचार एकदम भिन्न हो. अबूझ, हमारे सामर्थ्य से बाहर और हम एक एलर्जिक जीवन जीने के लिए अभिशप्त हों. यह भी हो सकता है हम इस तरह अभ्यस्त हो जाएँ कि हमें कभी अभिशप्तता ही महसूस न हो और हम उम्र दर उम्र एक ही तरह के सुखों में सुख और एक ही तरह के दुखों में दुख ढूँढते रहें."

छींकने वाले आदमी की साँस अंदर नहीं जा रही थी. वह सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था. उसने पैंट की जेब से ‘इन-हेलर’ निकाला और तीन चार स्ट्रोक लिए और फिर इस तरह चल दिया जैसे उसका दिनेश से किसी प्रकार का संवाद ही न हुआ हो.

दिनेश भी अपने घर की ओर चल दिया. यह एक तरह से ठीक ही रहा कि छींकने वाला आदमी दूसरी दिशा में गया नहीं तो बहुत दूर तक दिनेश के दिलो-दिमाग़ में अटका रहता. आजकल दिनेश में अजीब परिवर्तन आया है. कभी-कभी तो उसे स्वयं की उपस्थिति भी किसी दूसरे जन्म की स्मृति-सी अनुभव होती है और कभी बहुत पास का व्यक्ति बहुत दूर से गुज़रता हुआ-सा दिखता है.

कई दिनों के बाद एक दिन दिनेश की उम्र में उसका मकान कभी देखे गए सपने में से निकलकर सामने आ गया. अजीब बात है, अब जब मकान सामने है तो उसे अपने सपने का मकान विहीन हो जाना एक दुख की तरह घेरने लगा. वह हैरान है, जीवन में कितनी तेज़ी से बहुत कुछ घट रहा है, उजागर हो रहा है, झीज रहा है.

दिनेश के यहाँ अपने मकान में रहने का सुख धीरे-धीरे शांत होकर कम हो गया. बारिश में बैठक की छत में शीलन उतरकर बूँद-बूँद टपकने लगी जिसमें दिनेश की छोटी बेटी को एक खेल मिल गया. वह बड़ी उत्सुकता से छत में झिलमिलाती बूंदों को देखती रहती और जैसे ही वे गिरतीं, वो उन्हें लपकने की कोशिश करती. दिनेश का बेटा गीले फर्श पर फिसलकर बार-बार गिर जाता. वह जब भी गिरता, दिनेश की बिटिया बूँदों को लपकना छोड़ ताली बजाकर हँसने लगती.

पत्नी जब कहते-कहते थक गई तो एक दिन दिनेश छत ठीक करवाने के लिए किसी कुशल कारीगर की तलाश से बाहर निकला. आसमान में बादल थे, हल्की बूँदा-बाँदी हो रही थी. जब वह ‘काल-पहाड़ी’ के पास से गुज़रा तो उसकी नज़र पहाड़ी के शिखर पर गई. पहाड़ी के ऊपर आधारशिला पर वही चाय की गुमटी वाला आदमी खड़ा था. दिनेश का मन उसे आवाज़ देने को हुआ लेकिन फिर यह सोचकर रूक गया कि वहाँ आवाज़ कहाँ पहुँचेगी. वह बहुत देर तक खड़ा रहा. उसे उम्मीद थी कि वह नीचे की ओर देखेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वह दूर ही देखता रहा. बारिश तेज़ हो गई तो दिनेश वहाँ से चल दिया. चलते-चलते उसने एक बार फिर ऊपर देखा तो बारिश में कुछ दिखाई नहीं दिया.

 उसे लगा यह चप्पल उसी आदमी की है और वह चप्पल पहने पूरा का पूरा ज़मीन में धंसा है. उसने चप्पल सीधी की तो वह आदमी ज़मीन से निकलकर एक पल के लिए सामने खड़ा हो गया. दिनेश की तंद्रा टूटी. किसी के हँसने की आवाज़ थी. उसने झटके से चप्पल को वहीं छोड़ा और तेज़ चलता हुआ दूर निकल गया. वह न जाने कहाँ-कहाँ यूँ ही चलता रहा. उसे शहर में जगह-जगह छूटी हुई चप्पलें मिली. वह सकते में आ गया, उसकी आँखें फट-सी गईं

रात में मूसलाधार बारिश हुई. सुबह अख़बार में ख़बर छपी कि बारिश में काल पहाड़ी की आधारशिला ढह गई लेकिन कोई जनहानि नहीं हुई. दिनेश ख़बर पढ़कर काल पहाड़ी की ओर दौड़ा. अभी भी हल्की बारिश हो रही थी. सड़क के ऊपर पहाड़ी का मलबा पड़ा था. न जाने क्यों दिनेश को लग रहा था कि जनहानि हुई है. मलबे में वही आदमी दबा है जो दूर-दूर तक देख रहा था. कुछ भ्रम सच्चाई के इतने पास होते हैं कि जीवन में अटक जाते हैं. वह पहाड़ी से नीचे उतरती बस्ती में चला गया. इस आस में कि किसी से पूछने पर शायद कुछ पता चले.

बस्ती झोपड़पट्टी की थी जिसकी गलियों में नाले का उलट पानी बह रहा था. एक बुजुर्ग अपनी अधबुझी बीड़ी को बार-बार सुलगा रहा था लेकिन वह जल नहीं रही थी. उसकी तलब में इतनी तंगी थी कि उससे कुछ पूछना संभव नहीं था. बगल के घर से एक महिला नंग-धड़ंग बच्चे को टांगे हुए निकली और उसने बच्ची को पानी की धार में टट्टी करने बैठा दिया. दिनेश को पानी में चलने से घिन आने लगी और वह पानी की धार से तेज़ चलता हुआ ऊपर सड़क पर आ गया.

दिनेश सड़क पर चला जा रहा था. सड़क किनारे उसे नीली बध्धी वाली हवाई चप्पल उलटी पड़ी हुई दिखाई दी. वह रूक गया, उसे लगा यह चप्पल उसी आदमी की है और वह चप्पल पहने पूरा का पूरा ज़मीन में धंसा है. उसने चप्पल सीधी की तो वह आदमी ज़मीन से निकलकर एक पल के लिए सामने खड़ा हो गया. दिनेश की तंद्रा टूटी. किसी के हँसने की आवाज़ थी. उसने झटके से चप्पल को वहीं छोड़ा और तेज़ चलता हुआ दूर निकल गया. वह न जाने कहाँ-कहाँ यूँ ही चलता रहा. उसे शहर में जगह-जगह छूटी हुई चप्पलें मिली. वह सकते में आ गया, उसकी आँखें फट-सी गईं. उसने एक आदमी को रोककर पूछा.

"क्या शहर में कोई दंगा-फसाद हुआ है."

उस आदमी को उसके पूछने से आश्चर्य हुआ. उसने कहा, "नहीं, कुछ होता तो अख़बार में नहीं आता. तुम किस शहर की बात कर रहे हो?"

"इसी शहर की"

"कहाँ के रहने वाले हो?"

दिनेश ने कुछ हकलाकर कहा, "..यहीं...यहीं का. बसंत विहार में रहता हूँ."

उस आदमी ने दिनेश को घूर कर देखा और कुछ सोचने लगा, कहीं यह पागल तो नहीं है.

दिनेश कुछ देर तक चौराहे पर खड़ा रहा. लोग तेज़ी से आ-जा रहे थे. इस आदमरफ्त में एक आदमी ने सड़क इस तरह पार की जैसे पूरी सड़क सूनी हो. एक साथ कई वाहन झटके से रूक गए. भद्दी-भद्दी गालियाँ बकते लोग अपने भिंचे जबड़ों और घूरती आँखों के साथ फिर असंगत तेजी से चल पड़े.

न जाने कब सड़क दिनेश को घर ले आई. रास्ते में उसे किसी ने नहीं पहचाना. मुँह धोकर जैसे ही उसने ‘वॉश-बेसिन’ के आइने में देखा तो उसे विश्वास नहीं हुआ...उसमें उसी चाय की गुमटी वाले आदमी का चेहरा पहले से था. वह शिथिल होकर चौकी पर लेट गया. कुछ देर बाद उसने अपने को सांत्वना दी. मेरे आइने में उसका चेहरा कैसे हो सकता, मुझे भ्रम हुआ होगा. दिनेश के चेहरे पर मुस्कान आई जो ऊपर फैलकर छत के बराबर हो गई. छत से पानी का एक बूंद टपकी जिसे उसने बीच में ही लपक लिया.

फर्श पर किसी के गिरने की आवाज़ थी.

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