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शुक्रवार, 10 नवंबर, 2006 को 12:36 GMT तक के समाचार
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बयान

रेखांकन: लाल रत्नाकर

कहानी

हफ्ते भर बाद नींद से टूटी. वर्दी शरणार्थी शिविर में मेज लगाए पीड़ितों से उनकी फ़रियाद सुन रही थी.
रिपोर्ट लिखी जा रही थी.

सामने पेश हुई औरत को हिचकियाँ घेरे हुई थीं. वर्दी के आश्वासन से निर्भय होने की चेष्टा करती हुई वह मुँह खोलने की कोशिश करती कि लगातार उफ़ान झेलती...आँखों का ज्वार उसकी ज़ुबान पर मुट्ठी कस देता.

घुटी-घुटी सी चीखों में औरत की थर्राती देह भँवर लेने लगती. वर्दी झुँझलाई. औरत बोलेगी नहीं तो वे भला कब तलक उसका मुँह खुलने की बाट जोहते अन्य पीड़ितों की पीड़ा से मुँह फेरे रहेंगे? उजड़ी, फुँकी, तबाह बस्तियों में से कोई एक घर-देहरी भर ही तो उनके जिम्मे नहीं. दसियों दफ़े पुचकारा, समझा चुके. अब डर कैसा? वह है न! जो भी घटा उसे सिलसिलेवार बेख़ौफ़ बताएँ. न्याय मिलेगा उसे.

औरत ने मुँह खोलने की एक और असफल कोशिश की.

वर्दी ने फुर्ती से उसके आशय को शब्द दिए.

तुम यही कहना चाहती हो न, दंगाइयों का शोर जीना पार कर जैसे ही तुम्हारे दरवाज़े पहुँचा. दहशत से काँपते तुम सब लोग सोने वाले कमरे में जाकर बंद हो गए? तुम, तुम्हारा मर्द, तुम्हारा बेटा और तुम्हारी कमसिन बेटी...ख़ूबसूरत बेटी. लिख लें?

दंगाइयों ने दरवाज़ा खुलवाने को पहले आवाज़ें लगाईं. थापें दी, लातों से कूटा, दरवाज़ा न खुला तो फिर उसे कुल्हाड़ी से चीर कर धराशाई कर दिया. दाखिल हुई भीड़ ने घर के कोने-कोने को टोहा. सोने वाले कमरे की सिटकनी चढ़ी पाई तो उस दरवाज़े को भी चिर गिराया. पहली नज़र अलमारी की आड़ में छिपे खड़े तुम्हारे बेटे पर पड़ी. उनकी कुल्हाड़ी उठने से पहले ही बेटे ने बालकनी से छलांग लगा दी. तीसरे माले से नीचे गिरते ही उसने आँखें मूंद लीं. दिल का मरीज़ तुम्हारा मर्द यह हादसा न झेल पाया और उनकी कुल्हाड़ी उठने से पहले की कूच कर गया. सही है न, लिख लें?

रेखांकन - लाल रत्नाकर

तुम पर नज़र पड़ते ही तुम्हारे मुँह में उन्होंने तकिए का गिलाफ ठूँस बड़ी बेदर्दी से तुम्हें बालों से घसीटते हुए ले जाकर गुसलखाने में बंद कर दिया. सिर से पल्ला हटाकर जरा अपने बाल दिखाओ? बड़े मजबूत हैं! हाँ, तो तुमने गुसलखाने से लगातार बेटी की चीखें सुनीं. पुकार रही थीं तुम्हें,‘‘अम्माँ हमें बचा लो!’’ तुम्हारा अनुमान है, छह-सात लोगों से कम ने उसके साथ कुकर्म नहीं किया होगा. गुत्थी सुलझ नहीं पा रही. छह-सात लोगों ने उसके संग जबरई की होती तो बेटी लाश बनी पड़ी मिलती. घर के अन्य सदस्यों की लाशें बरामद हो गईं- तुम्हारी बेटी की लाश बरामद नहीं हुई. दंगइयों के जाने के बाद डेढ़-दो घंटे बाद ही पुलिस गुसलखाने से मुक्त करा तुम्हें शरणार्थी शिविर ले आई थी. यही हुआ था न! तनिक सोच कर बताओ, आख़िर वह कहाँ गई होगी, कहाँ जा सकती है, उसे हम कहाँ ढूँढें?...

‘‘हमारा ख़्याल है...’’

‘‘ठहरिए दरोगा जी, हमारे मुँह में ज़ुबान है...’’

मेज़ के उस ओर बैठी वर्दी को औरत की ख़ून भरी आँखों ने घूरा.

वर्दी ने अचानक औरत की आँखों से उछले ख़ून के कुछ छींटों को सकपका कर वर्दी से झाड़ा.

‘‘वाह! तुम तो बोल सकती हो. हम समझे थे कि तुम गूंगी हो. बहरहाल, मुँह में ज़ुबान है तो बिना समय नष्ट किए जल्दी से बताओ...तुम्हारी बेटी आख़िर कहाँ होगी?’’

‘‘आपके घर में दरोगा साहब!’’

‘‘तेरा दिमाग तो नहीं चल गया औरत?’’

औरत गरजी,‘‘क्यों, आपके घर में बेटी नहीं है?’’

‘‘मेरे घर में मेरी बेटी है...’’

‘‘न, वो मेरी बेटी है...मेरी बेटी की चलती फिरती लाश! घर जाइए दरोगा साहब और उस बच्ची को ग़ौर से देखिए. मेरी बेटी बरामद हो जाएगी...’’

शिविर में सन्नाटा छा गया...

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चित्रा मुदगल
बी-105, वर्धमान अपार्टमेंट्स
मयूर विहार फेस-1
दिल्ली-110091

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