फोन की घंटी बजती है, फोन उठाया जाता है – ‘‘कौन है बे?’’ यह मोंटी है. ‘‘क्या कर रहा है साले?’’ सौरभ ‘‘कुछ नहीं, बोल.’’ ‘‘भारत माता में फेट है, चल चलते हैं.’’ ‘‘कितने बजे?’’ ‘‘आठ बजे?’’ ‘‘नहीं बे, आठ बजे के बाद तो लड़कियाँ चलीं जाती हैं.’’ ‘‘कुछ दस बजे तक भी घूमती रहती हैं.’’ ‘‘वो नहीं चाहिए. जो चल्दी घर जाती हैं, वो चाहिए.’’ ‘‘नहीं बे, मार खाने का शौक नहीं है.’’ ‘‘अच्छा जल्दी आ, मेथी भी आ रहा है.’’ ‘‘मेथी?’’ चल आज उसके लिए ‘सेट’ करते हैं. ‘‘अपने लिए नहीं?’’ ‘‘अबे हम वो नहीं, जो ढूंढ़ते हैं. हम वो हैं, जिन्हें जमाना ढूंढ़ता है.’’ ‘‘अच्छा-बंडल मत मार. जल्दी आ’’ मोंटी फटाफट पंद्रह मिनट में तैयार हो जाता है. ‘‘ममा, मैं फेट में जा रहा हूँ, थोड़ी देर में आ जाउंगा, टेंशन मत लेना.’’ ‘क्यूं? अपने पुराने स्कूल को देखने या यादें ताजा करने?’’ ‘‘यादें ताजा करने मॉम, देखूं तो सही, मेरे जाने के बाद क्या-क्या चेंजेस आएं हैं.’’ ‘‘उसके लिए तो किसी भी वक़्त जाया जा सकता है, आज ही क्यों?’’ ‘‘ओ मॉ...आज में क्या है? जो आज होता है न, कल नहीं होता.’’ ‘‘तेरे पेपर चल रहे हैं, आज ही पढ़ने के लिए है, कल नहीं? मना कर दें.’’ ‘‘कोई नहीं मागेना मॉम, देखना घर आ जाएंगे सब. आपकी जान खा जाएंगे तो आपको भी हॉ करनी पड़ेगी.’’ ‘‘अच्छा जा, जल्दी आना, खाना घर आकर खाना, खाने के लिए नहीं तो घंटे और लेगा...’’ ‘‘मैं फोन कर दूंगा.’’ मोंटी ने गाड़ी स्टार्ट की और सीधा ‘भारत माता’ की ओर भागा. गेट पर ही पहचाने चेहरे मिल गए...जो कभी बच्चे थे, अब बड़े हो गए हैं... ‘‘हलो सर!’’ ‘‘हॉय.’’ ‘‘बड़े स्मार्ट लग रहे हैं सर.’’ ‘‘क्यूँ बे, खूब लड़कियाँ पटा रहा है.’’ ‘‘कहाँ सर? लड़कियाँ अभी तो आपको याद करती है, कहती है...मोंटी सर दुर्ग क्या चले गए, सब सूना हो गया. स्कूल की तो रौनक ही आप थे सर.’’ ‘‘चल बे टेलर मत दे.’’ ‘‘माँ कसम सर, आपको देखने के बाद लड़कियाँ तो हमको भाव ही नहीं देती.’’ ‘‘छोड़ बे, बता कितनी पटाई?’’ ‘‘सर ऐसे ही... आपके लायक नहीं है.’’ ‘‘छोड़ फिर...? मोंटी अंदर चला गया.’’ अंदर घुसते ही रवि, सौरभ, मिथिल, आकाश, अनिल, सनी सभी से घिर गया... ‘‘माँ कसम, बड़ा बन-ठन के आया है.’’ ‘‘अबे तो फेट में बंगा आ जाउं.’’ ‘‘उसमें भी जंचेगा.’’ चारों तरफ ठहाके गूंज उठे. खाते-पीते, आने-जाने लोगों का केंद्र बन गए वे... चारों तरफ खाने- पीने की चीज़ों से सजे स्टाल...अपने स्टालों के पीछे-खड़े चुस्त-दुरुस्त लड़के... ‘‘अबे मोंटी, एक ही लड़की बची है यार, सब चली गईं, सेट कर दे ना मेरे लिए.’’ यह मेथी है. ‘‘तू बात करेगा न.’’ ‘‘साले सेट तेरे को करनी है, बात मैं करूँ.’’ ‘‘मैं बाद में करूँगा.’’ ‘‘अच्छा चल... कोई मेरे पीछे नहीं आएगा. तुम सब सालों तब तक खाओं-पीओं... चल मेथी.’’ दोनों एक लड़की का पीछा करते हैं. लड़की थोड़ी ही देर में समझ जाती है. उन्हें घूरना शुरू कर देती है. वे भी घूरते हैं. एक स्टाल से दूसरे स्टाल वे उसके पीछे-पीछे घूमते हैं. घूमते-घूमते अचानक वे दोनों और लड़की आमने-सामने आ जाते हैं... ‘‘एक्सक्यूज मी, मुझे आपसे फ्रेंडशिप करनी है.’’ ‘‘क्यूँ?’’ ‘‘क्यूँ कि आप स्मार्ट दिखती हैं.’’ ‘‘किसे करनी है आपको या आपके दोस्त को.’’ ‘‘मेरे दोस्त को...’’ ‘‘अगर मैं मना कर दूँ तो?’’ ‘‘हम चलें जाएँगें.’’ लड़की सोचनें की मुद्रा में है. तभी मोंटी के फोन की घंटी बजती है... ‘‘अबे क्या कर रहा है वहाँ, बाहर आ, हम जा रहे हैं.’’ मोंटी के मुँह से गाली निकलते-निकलते बची... ‘‘थोड़ी देर रुक जा.’’ ‘‘नहीं एक मिनट में आ, हम जा रहे हैं.’’ सौरभ था दोनों पटने के कगार पर खड़ी लड़की को वहीं छोड़ बाहर की और भागते हैं... सौरभ अपनी बाइक के पास खड़ा था... ‘‘क्या नाटक है बे? बस पटने ही वाली थी कि तूने फोन कर दिया.’’ मोंटी बिगड़ा ‘‘अबे, वो तुम लोगो के लायक नहीं है.’’ ‘‘अबे तो मिथिल को कौन सा शादी करनी है, बात ही तो करनी थी.’’ सौरभ ने मिथिल का उतरा मुँह और उखड़ा मुड देखा... ‘‘अबे मेथी के लिए मेरे पास बहुत है. वो साली ठीक नहीं लग रहीं थी.’’ ‘‘माँ कसम.’’ ‘‘आज इसके लिए सेट कर देते है यार, बहुत दिनों से कह रहा है.’’ ‘‘चल खाना खाने चलते हैं, वहीं सेट कर देंगे.’’ ‘टेम्पटेशन’ में वे एक बड़ी सी टेबल घेर कर बैठ जाते हैं... |  फ्रेश माल चाहिए तो बाल विवाह करना पडेगा...स्कूल से निकलो शादी कर लो. तुम अगर बीई, एमबीए और डॉक्टरी के चक्कर में पड़े तो बेटा दोपहर हो जाएगी...फिर अपनी पसंद का माल नहीं मिलता. फिर जो मिल जाए, उसी से काम चलाना पड़ता है  |
टेबिल पर मोबाईल... ‘‘चल आज सनी के लिए भी एक सेट कर देते हैं, अकेला है बेचारा...’’ ‘‘मुझे नहीं चाहिए बे. तुम लोग अपनी फिक्र करो.’’ ‘‘अबे सनी को लड़किया अच्छी नहीं लगती, इसको लड़के अच्छे लगते हैं...वो देख...खिड़की के पास वाली टेबल पर एक स्मार्ट लड़का बैठा है...बुलाऊँ...’’ ‘‘बस...हो गया न...सुलग गई मेरी धुआँ निकल रहा है. अब मेथी की फिकर कर...’’ सौरभ ने अपनी मोबाईल से एक सुंदर लड़की का मोबाईल नंबर ढूंढ कर देता है...बताया की ये रायपुर में रहती है...फोन मिलाया जाता है...माइक ऑन... ‘‘नुपूर बोल रही है.’’ ‘‘हॉय मैं सोनू बोल रहा हूँ.’’ ‘‘तो?’’ ‘‘पहचाना.’’ ‘‘नहीं.?’’ ‘‘हम मिले थे.?’’ ‘‘नहीं पहचाना.?’’ ‘‘ओ असल में तुम मुझे नहीं पहचान पाओगी, पर मैं तुम्हें जानता हूँ.’’ ‘‘तो?’’ ‘‘ऑय वांट टु डू फ्रेंडशिप विथ यू.’’ ‘‘बट ऑय डोंट वांट...?’’ ‘‘व्हाय, एनी रीजन?’’ ‘‘तुम एक रीजन बताओं कि तुम्हें क्यूं करनी है.’’ ‘‘ऑई व सीन यू, यू आर गुड लुकिंग...मुझे लगा तुम फ्रेंडशिप के लायक हो.’’ ‘‘कहाँ देखा?’’ ‘‘सदर बाज़ार में...’’ ‘‘कौन सा? रायपुर या बिलासपुर? ‘‘मेरे ख्याल से मैंने तुम्हें दोनों जगह देखा है. बड़ी मुश्किलों से तुम्हारा नंबर मिला है.’’ ‘‘मुझे नहीं करनी.’’ ‘‘इतनी शराफत से कह रहा हूँ, फिर भी नहीं करनी...’’ ‘‘कैसी शराफत? सीधा-सीधा कर रहे हो मुझे फ्रेंडशिप करनी है.’’ ‘‘ऑय थिंक, दिस इज द राइट वे टु डू फ्रेंडशिप विथ यू. अगर मैं गाड़ी रोककर रास्ते में बोलूं या पैरेंट्स के सामने बोलूं तो क्या वो सही होगा.?’’ ‘‘मादर... फोन रख सालें.’’ सौरभ गुस्से में आकर फोन पर चिल्लाया... ‘‘भा़ड़ में जा साली.’’ मोंटी ने घबराकर फोन काट दिया... ‘‘क्या नाटक है बे? बढिया सेट हो रही थी.’’ ‘‘कहाँ बे? साली भाव खा रही है.’’ ‘‘अबे इतना भी नहीं खाएगी तो लड़की काहे की? पहली बार में बोल देगी कि हाँ, करनी है?’’ ‘‘छोड़ बे, बहुत मिल जाएंगी और...’’ ‘‘मेथी, या तो तेरी किस्मत खराब है या हमें लड़किया पटाना नहीं आता.’’ मोंटी ने मिथिल की तरफ देखकर कहा...  | | |
‘‘एक हमारा अनु है साला. घरवालों के साथ ब्यास गया सत्संग सुनने... लड़की पटा के ले आया भी ऐसी कि शादी कर ली. उससे पूछ जरा...ब्यास जाने का सही सीजन कौन सा है.’’ कुछ भी कहो यार लड़की अच्छी पा गया साला. ‘मेथी हसरत से बोला,‘हमारे सामने कोई उसकी बात नहीं करता.’ ‘‘फटती होगी ना बे, दोस्तों पर भरोसा नहीं आता होगा.’’ खूबसूरत बीबी मतलब सारी उमर चौकीदारी करो हर हफ्ते कहता है, बिजनेस बदल देंगा. हर महीने कार बदल देता है-बातें बड़ी-बड़ी. पार्टी में खाली जेब लेकर आता है, पूछो तो कहेगा, सब बीबी को दे दिया-साला पत्निव्रता. सौरभ मुँह बनाकर बोला. वह अभी भी मोबाइल पर किसी लड़की का नंबर ढूंढ रहा है... ‘‘देखो यारों, लड़की और सब्ज़ी अगर ताजी लेनी हो तो एकदम सुबह मिलती है...दोपहल तक तो मुरझा जाती है और अगर शाम हो गई तो छठी हुई मिलेगी... जो दिन भर के नहीं बिक पाती.’’ मोंटी बोला. ‘‘इसका मतलब बाल विवाह कर लें.’’ ‘‘फ्रेश माल चाहिए तो बाल विवाह करना पडेगा...स्कूल से निकलो शादी कर लो. तुम अगर बीई, एमबीए और डॉक्टरी के चक्कर में पड़े तो बेटा दोपहर हो जाएगी...फिर अपनी पसंद का माल नहीं मिलता. फिर जो मिल जाए, उसी से काम चलाना पड़ता है.’’ ‘‘छोड़ बे साले, टेलर मत दें.अनु को देखा है, कैसे डरता है अपने ससुराल वालों से. ससुर को देखता है तो फट के हाथ में आ जाती है-जैसे कि आकर चीन लेगा अपनी बेटी.’’ अबे, एक बात बताऊँ, गाँव वालों को हमेशा शहरी लोगों से डर लगता रहता है-जैसे किसी शहर में नहीं चाँद पर होते हों जहाँ सिर्फ़ वही पहुँच सकते हैं.  |  अबे पहले तो मैं माता का दिल रखने के लिए पढ़ता था, फिर अब मुझे अच्छा लगने लगा है. कम से कम पता तो है कि आगे क्या करना-क्या नहीं करना...ये साली लड़कियों के चक्कर में चारों तरफ अँधेरा ही दिखता है  |
‘‘मैंने देखा है बे, बीबीओं के सामने अच्छे-अच्छों की फटी पड़ी रहती है.’’ ‘‘अच्छा छोड़, अब क्या कर रहा है’’ मोंटी ने पूछा. कुछ नहीं बे, अगले हफ्ते फाइनल इग्जाम्स हैं. अभी तक यह नहीं पता, कोर्स में क्या है? सौरभ ‘’15 हज़ार दे आया उसे?’’ ‘‘हाँ बे, इसमें तो देर ही नहीं करता.’’ ‘‘तो डरता क्यों है, पूरा पेपर दे देगा तेरे को दो दिन पहले.’’ ‘‘पेपर वाले क्वेश्चन तो पढ़ने पड़ेंगे न. माँ कसम, बिलकुल पढ़ने में मन नहीं लगता. पता नहीं तू बीई कैसे कर रहा है.?’’ ‘‘अबे पहले तो मैं माता का दिल रखने के लिए पढ़ता था, फिर अब मुझे अच्छा लगने लगा है. कम से कम पता तो है कि आगे क्या करना-क्या नहीं करना...ये साली लड़कियों के चक्कर में चारों तरफ अँधेरा ही दिखता है.’’ ‘‘और तुझे लगता है कि तू इनके चक्कर में कभी नहीं पड़ेगा.’’ ‘‘अभी तक तो यही लगता है.’’ ‘‘चल-चल साले. ये सब बातें अपनी माओं के सामने कहने में अच्छी लगती है, दोस्तों के सामने नहीं. साला, उल्लू दा पट्टा-. तेरे जैसी शक्ल ऊपर वाले ने हमें दी होती तो पता नहीं क्या करते यारों...साला मैं तो मॉडलिंग के लिए निकल जाता...चारों तरफ लड़कियाँ ही लड़कियाँ...हॉय...!’’ सौरभ आह भरते हुए वहीं टेबिल पर ढेर हो गया. ***************** शाम को सौरभ का फोन आता है मोंटी के पास- ‘‘अबे, एक लड़की से दोस्ती हो गई.’’ ‘‘कहाँ से पाया?’’ ‘‘नंदर दिया था विक्की ने.’’ ‘‘कैसी है?’’ ‘‘अबे, यही तो दिक्कत है, अभी तक देख नहीं पाया हूँ.’’ ‘‘अब क्या करेगा?’’ ‘‘वोई तो यार. ऐसी वैसी निकल गई तो बेकार के पैसे खर्च करने का क्या फायदा?’’ ‘‘यहीं की है न?’’ ‘‘हाँ.’’ ‘‘कल देख लो.?’’ ‘‘हाँ, अच्छा रखता हूँ. हग्गू आ रही है.’’ ‘‘मेरे को भी आ रही है.’’ ***************** मोंटी ने रवि के सेल से दिवा का नंबर उड़ाया, मिलाया- ‘‘हॉय, मोंटी बोल रहा हूँ.’’ ‘‘बोलो.’’ ‘‘मुझसे फ्रेंडशिप करोगी?’’ ‘‘ऐसा क्या है तुममें?’’ ‘‘नहीं देखा है तभी ऐसा कह रही हो, देखोगी तो मानोगी.’’ ‘‘तुमने मुझे देखा है?’’ ‘‘हाँ, देखा है. तभी फोन कर रहा हूँ.’’ ‘‘तो क्या ख्याल है.’’ ‘‘अच्छी हो, गुडलुकिंग हो.’’ ‘‘पढ़ते हो?’’ ‘‘बीई कर रहा हूँ. थर्ड ईयर है.’’ ‘‘मेरे घर वालों को यह सब पसंद नहीं.’’ ‘‘क्या, पसंद नहीं?’’ ‘‘यही लड़कों से दोस्ती करना.?’’ ‘‘किसी के घरवाले पसंद नहीं करते, पर लड़कियाँ दोस्ती करती तो हैं.’’ ‘‘-----------’’ ‘‘ठीक है फिर...रखता हूँ.’’ ‘‘नहीं, मुझे मंजूर है.’’ ‘‘दैट्स लाईक ए गुड गर्ल’’ ‘‘मैं तुम्हे देखूंगी कैसे?’’ ‘‘तुम अपने घर के बाहर निकलकर फोन करो, मैं आता हूँ.’’  | | |
‘‘तुम्हारी पहचान?’’ ‘‘रेट टी शर्ट, रेड बाइक.’’ ‘‘मैं अपने छत पर खड़ी रहूँगी.’’ उसने पूरा पता बताया. ओके. आई एम कमिंग. ‘‘तैयार होकर बाहर निकलने ही वाला था कि सौरभ और मिथिल आ गए-अबे एक लड़की को सेट कर लिया है.’’ ‘‘कहाँ रहती है?’’ ‘‘यहीं. ये ले पता.’’ ‘‘अबे, ये तो वही है, जिसने मुझे बुलाया है.’’ ‘‘अच्छा तुमको भी बुलाया है. हम दोनों को भी बुलाया है.’’ ‘‘अभी.’’ ‘‘नहीं, बुलाया तो शाम को था. हमने सोंचा झड़ी लगाके आते हैं.’’ ‘‘चल, मैं अपनी बाइक नहीं उठाता.’’ तीनों एक साथ, एक बाइक पर. मोंटी ब्लैक शर्ट में. लड़की के घर तक. लड़की छत पर है. तीनों मुड़ते हुए देख लेते हैं. मोंटी को पसंद नहीं आती. ‘‘अबे, मुझे पसंद नहीं है. तुम लोग रख लो.’’ ‘‘पक्का.’’ ‘‘पक्का.’’ घर आते ही लड़की का फोन. ‘‘आप आए नहीं’’ ‘‘हाँ, मैं निकल नहीं पाया, पढ़ रहा हूँ.’’ ‘‘तो कब आएँगे?’’ ‘‘पेपर खत्म होने के बाद.’’ ***************** कॉलेज में- ‘‘हैलो सर.’’ मोंटी के पास उसके जूनियर का फोन. ‘‘बोल बे.’’ ‘‘बड़ा जबरदस्त माल है सर, दीप्ति शर्मा.’’ ‘‘देखा नहीं हूँ.’’ ‘‘देख लीजिए सर. आपके लायक है.’’ ‘‘तू कैसे जानता है?’’ ‘‘हमारे ग्रुप का एक लड़का है, शान्तनु. घूमा रहा था.’’ ‘‘पट गई है, तो नहीं पटाउंगा’’ ‘‘सर, आपको देख लेगी, तो उसे छोड़ देगी.’’ ‘‘वैसे है कौन?’’ ‘‘जूनियर है आपसे, कॉलेज में डांस किया था, मेरी सेल में उसकी फोटो है.’’ ‘‘फोटो भेज’’ ‘‘अभी भेजता हूँ सर.’’ ‘‘तेरी नज़र तो नहीं है.’’ ‘‘माँ कसम सर. मुझे तो वो घास भी नहीं डालेगी.’’ ‘‘चल देखते हैं फिर...’’ ***************** ‘‘हेलो.’’ दीप्ति ने अपना सेल उठाया. ‘‘हॉय’’ ‘‘कौन?’’ ‘‘मोंटी’’ ‘‘मोंटी हूँ’’ ‘‘मोंटी सायनी’’ ‘‘फ्राम बिलासपुर?’’ ‘‘या...डू यू नौ मी?’’ ‘‘तुम्हें कौन नहीं जानता? लड़कियाँ अक्सर तुम्हारी बातें करती हैं.’’ ‘‘ओ... मुझे पता नहीं था.’’ ‘‘न पता हो, यही अच्छा है.’’ ‘‘ओके. मैं आपसे दोस्ती करना चाहता हूँ.’’ ‘‘मैं भी...’’ ***************** बिना देखे दो महीने बात चलती है-एसएमएस... एसएमएस... एसएमएस... मिलना तय हुआ संडे शाम को. संडे को मोंटी का प्रेक्टिकल, वायवा के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा में आकर खड़ा था. दो लड़कियाँ उसके आसपास चक्कर काट रहीं थीं. फ्रेंड ने टोका- ‘‘ए देख, तेरे को देख रही है.’’ ‘‘कौन है?’’ ‘‘दीप्ति शर्मा...अपने फ्रेंड के साथ.’’ ‘‘ये है.’’ ‘‘और क्या बे? पटा ले.’’ ‘‘पटाने लायक तो माल ही नहीं है बे, अब तो पीछा छुड़ाना पड़ेगा.’’ ‘‘क्या बे. ठीक तो है. हमारे कॉलेज में तो सबसे अच्छी है.’’ ‘‘मुझे नहीं चाहिए.’’ ‘‘यहाँ ऐसा ही माल मिलेगा.’’ ‘‘तू रख ले.’’ ‘‘बात करवा दे ना.’’ ‘‘करवा दूंगा. तेरी तारीफ भी कर दूंगा.’’ ‘‘चुप कर आ रही है.’’ दीप्ति शर्मा पास आती है- ‘‘हॉय.’’ ‘‘हॉय.?’’ ‘‘दीप्ति शर्मा.’’ ‘‘मोंटी.’’ ‘‘आज वायवा है?’’ ‘‘हाँ.’’ ‘‘बेस्ट ऑफ लक.’’ ‘‘थैंक्स’’ ‘‘आज शाम हम घूमने जा रहे हैं.’’ ‘‘नहीं, आज नहीं. मैं बताउंगा.’’ ‘‘ओके.’’ ***************** एक महीने बाद ‘‘क्या बात है, फोन नहीं करते,’’ दीप्ति ‘‘समय नहीं मिलता. पढ़ रहा हूँ’’ ‘‘कहीं मिले.?’’ ‘‘परीक्षा के बाद.’’ ‘‘कोई बात है तो बताओ. नाराज लगते हो.’’ ‘‘नाराज तो हूँ.’’ ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘गर्ल्स हॉस्टल से रियूमर उड़ा है कि मेरा तुम्हारा चक्कर है. मुझे दोस्ती में ये सब घाल-मेल पसंद नहीं. बेहतर हो, हम बात करें.’’ ‘‘मुझे इसकी जानकारी नहीं है और कॉलेज में तो ऐसी बातें होती रहती हैं. तुम्हें क्या पसंद नहीं.’’ ‘‘अपना नाम किसी से जोड़ा जाना.’’ ‘‘बहाना तो नहीं ढूंढ रहे हो दूर भगाने का.’’ ‘‘ये तो तुम्हें समझना होगा. आई एम सॉरी. बॉय.’’ ***************** ‘‘अबे मोंटी एक लड़की मिल गई है.’’ सौरभ है. ‘‘कहाँ से पाया?’’ ‘‘सनी ने बताया.’’ ‘‘उसे अपने लिए तो नहीं मिलती, तेरे को क्या बताएगा.?’’ ‘‘अबे आ न बात करेंगे.’’ ‘‘आता हूँ’’ ***************** ‘‘हलो, क्या आप कंचन बोल रही हैं?’’ ‘‘हॉ, कंचन बोल रही हूँ.’’ ‘‘मैं सौरभ बोल रहा हूँ.’’ ‘‘कौन सौरभ?’’ ‘‘सौरभ सरकार.’’ ‘‘कहाँ देखा मुझे?’’ ‘‘गोल बाज़ार में.’’ ‘‘सबसे यही कहते हो?’’ ‘‘सब गोल बाजार नहीं आती. कुछ खास लड़कियाँ आती हैं’’ ‘‘कहाँ रहते हो?’’ ‘‘अबे मोंटी, पता पूछ रही है.’’ सौरभ बगल में खड़े मोंटी से बोला. ‘‘मत बता बे. फंसा न दे.’’ ‘‘नहीं बे, ऐसे ही पूछ रही होगी.’’ फिर फोन में बोला- ‘‘गीतांजली विहार में.’’ ‘‘पापा का क्या नाम है?’’ ‘‘अबे मोंटी, पापा का नाम पूछ रही है.’’ ‘‘मत बता साले, मरेगा.’’ ‘‘नहीं बे, ऐसे ही पूछ रही होगी.’’ फिर फोन में- ‘‘महेंद्र सरकार.’’ ‘‘घर का फोन नंबर बताओ’’ ‘‘अबे मोंटी, नंबर पूछ रही है.’’ ‘‘मरना है तो बता दे.’’ ‘‘अबे, ऐसे ही पूछ रही होगी.’’ फिर फोन में ‘‘429757 अब मैं पूछूं. ’’ ‘‘पूछो.’’ ‘‘घर में कौन-कौन हैं?’’ ‘‘हम दो बहिनें.’’ ‘‘कोई लोचा तो नहीं है ना.’’ ‘‘मतलब?’’ ‘‘कुछ नहीं. ऐसे ही पूछ रहा था.’’ ‘‘ओके. मम्मा बुला रही है. रखती हूँ.’’ ‘‘ओके. दोनों पीसीओ से बाहर आ जाते हैं.’’ ‘‘मरेगा साले. सब बता दिया.’’ ‘‘कु नहीं होगा बे. आवाज़ बड़ी मीठी थी.’’ ‘‘असली स्वाद घर जाके पता लगेगा. मैं चलूँ.’’ ‘‘ओके बॉय.’’ ***************** ‘हेलो.’ मोंटी ने फोन उठाया. ‘‘अबे मोंटी तू ठीक बोल रहा था. वो कंचन नहीं, कंचन की बड़ी बहिन थी.’’ ‘‘क्या किया उसने?’’  |  बिना देखे दो महीने बात चलती है-एसएमएस... एसएमएस... एसएमएस... मिलना तय हुआ संडे शाम को. संडे को मोंटी का प्रेक्टिकल, वायवा के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा में आकर खड़ा था. दो लड़कियाँ उसके आसपास चक्कर काट रहीं थीं  |
‘‘घर फोन कर दिया बे. नौकर ने उठाया. आसपास कोई नहीं था. उसने भी कह दिया मैं सौरभ का बड़ा भाई बोल रहा हूँ. जो सुनाना था, उसी को सुना दिया.’’ ‘‘अब?’’ ‘‘माँ कमस बे, बच गया. कुछ दिनों के लिए लाईन डेड करवा देता हूँ.’’ ‘‘तूने आवाज़ नहीं पहचानी.’’ ‘‘नहीं बे, एक बार ही तो बात की थी. इन सब सालियों की आवाज़ एक ही लगती है. माँ कसम, अब कभी सच नहीं बोलूंगा-झूठा बाप, झूठे नंबर. मेरी तो सेल में सारी लड़कियों के नंबर भरे पड़े हैं. किसी दिन पापा ने देख लिया तो तड़ीपार कर देंगे.’’ ‘‘ तू नाम से क्यों भरता है बे?’’ ‘‘तो?’’ ‘‘मेरा एक दोस्त पापा-1, पापा-2, पापा-3, मम्मी-1, मम्मी-2, भाई-1, भाई-2 ऐसे भरता है. घर के लोगों के नाम पर.’’ ‘‘किसी को पता नहीं चलता.’’ ‘‘आज तक तो नहीं चला.?’’ ‘‘अच्छा हुआ, बता दिया, तू नई-नई बाते बता दिया कर, आसानी होती है.’’ ***************** ‘‘हेलो.’’ सौरभ अपना सेल उठाता है. ‘‘हॉय?’’ ‘‘कौन?’’ ‘‘गोल बाज़ार में क्या कर रहे थे?’’ ‘‘कब?’’ ‘‘रोज़ जाते हो क्या?’’ ‘‘अक्सर’’ ‘‘मैं कल की बात कर रही हूँ. आपके साथ कौन था?’’ ‘‘दौस्त है मेरा.’’ ‘‘आप उससे ज़्यादा अच्छे हैं.’’ ‘‘हो सकता है.’’ ‘‘हैं. नान नहीं पूछेंगे.’’ ‘‘मैं सोंच ही रहा था. आप पूरी इन्क्वारी कल लें तो मैं पूछूं.’’ ‘‘अब आपकी बारी है, मैं तो आपको जानती हूँ. नाम कहाँ पूछा मैंने आपसे.’’ ‘‘और देख भी लिया है.’’ ‘‘हाँ. मेरा नाम रश्मि है, फाइनल ईयर में पढ़ रही हूँ. एंड आई वांट टू डू फ्रेंडशिप विथ यू.’’ ‘‘लड़की बोले तो अच्छा लगता है. ’’ – सौरभ हँसने लगा. ‘‘लड़की बोले तो बात पक्की है’’ ‘‘बिलकुल पक्की है.’’ ‘‘वैसे हमेशा लड़के ही क्यों बोले? लड़की भी तो चुन सकती है.’’ ‘‘चुनती वही है, हम तो सिर्फ़ बोलते रह जाते हैं. कहाँ मिलोगी?’’ ‘‘जहाँ बोलो, जहाँ कोई न हो.’’ ‘‘मतलब.’’ ‘‘लड़कियों को बहुत सोचना पड़ता है.’’ ‘‘सोचना तो लड़कों को भी पड़ता है. वैसे आज शाम ‘किंग पार्क’ में मिल सकते हैं. मेरे घर से भी दूर है, और तुम्हारे...’’ ‘‘मेरे घर से सब कुछ बहुत दूर है.’’ ‘‘ओ के. सी यू देन.’’ ***************** मोंटी के सेल की घंटी बजती है. ‘‘क्या है बै?’’ ‘‘अबे मोंटी, लड़की का फोन आया था.’’ ‘‘क्या बात करता है?’’ ‘‘सही बोल रहा हूँ बे. डिफाल्टर तो नहीं है?’’ ‘‘पहले बात कर ली, तो डिफाल्टर हो गई.’’ ‘‘ऐसा ही होता है, शरीफ लड़कियाँ ऐसे बात नहीं करतीं.’’ ‘‘क्या नाम बताया.’’ ‘‘रश्मि.’’ ‘‘चल, पता करते हैं.’’ ‘‘तू कर. मेरा नाम मत लेना.’’ ‘‘डरता क्यूँ है बे? राहुल सब लड़कियों को जानता है, दो मिनट में बता देगा. शुरू से लेकर आखिर तक.’’ ‘‘तू पूछ के बताएगा.’’ ‘‘पर अभी तो मैं दुर्ग में हूँ. संडे को आउँगा’’ ‘‘हाँ ठीक है, आज मैं उससे ‘किंग पार्क’ में मिल रहा हूँ. आईसक्रीम खिला के भेज दूँगा, फिर तू आएगा, तो देखेंगे.’’ ‘‘ओ के.’’  | | |
‘‘तू बढ़िया है बे. हंस-बोल सबसे लेता है, चक्कर में किसी के नहीं पड़ता.’’ ‘‘अबे पड़ो उसके पीछे, जो मेहनत से मिले, दौड़ा-दौड़ा के, पसीने बहा के... जो हमें दो मिनट में मिल जाती है, वो तो किसी को भी दो मिनट में मिल सकती है. और वैसे भी यार-. वक़्त गुजारने के लिए और होती है. जीवन गुजारने के लिए कोई और.’’ ‘‘जीवन गुजारने के लिए ढूंढ दूँ.?’’ ‘‘अभी नहीं यार. अभी मुझे एमबीए भी करना है. मैं सबको निराश कर सकता हूँ. अपनी माता को नहीं. अच्छा खैर, मेरे कॉलेज का टाईम हो गया है. रखता हूँ.’’ ‘‘ओ के बॉय’’ ***************** दो दिन बाद मोंटी के सेल की घंटी बजती है- ‘‘कौन है बे?’’ मोंटी सेल उठाता है. ‘‘पता किया बे?’’ ‘‘किया न, संभलकर रहना, दो और लड़को से चक्कर चल रहा है, वो भी दोनों दोस्त है.’’ ‘‘कैसे? उनको नहीं मालूम? ‘‘मालूम होता तो दोस्त होते.’’ ‘‘तीसरा मैं हूँ.’’ सौरभ हँसा. ‘‘तीसरा बकरा. क्या किया उस दन किंग्स पार्क में.’’ ‘‘कुछ नहीं बे. आईसक्रीम खाई बस. डर भी लग रहा था, कोई देख न लें.’’ ‘‘क्या बात हुई?’’ ‘‘कुछ खास नहीं. शुरू-शुरू में तो फटती है बे. बस वही स्कूल, कॉलेज, दोस्त वगैरह की. फिर...’’ ‘‘किर क्या?’’ ‘‘तू चिल्लाएगा तो नहीं?’’ ‘‘चिल्ला के क्या उखाड़ लूगाँ? बोल न साले, क्या कर दिया?’’ ‘‘क्या करुँगा बे? हमारे देश में प्रेमियों के लिए कोई जगह महफूज नहीं.’’ ‘‘प्रेमियों के लिए? तेरा दिमाग तो ठीक है साले.’’ ‘‘नहीं, प्रेमियों के लिए नहीं, लाइन मारने के लिए.’’ ‘‘कहाँ गया था?’’ ‘‘यूनिवर्सिटी...?’’ ‘‘तो देख लिया होगा लड़को ने.’’ ‘‘हाँ बे, साले पता नहीं किधर से आ गए...बंद कॉच खटखटाने लगे जोर-जोर से... बाहर से चिल्ला रहे थे... मेरी तो फटी...मैने गाड़ी रिवर्स गेयर में ली और भागा...वहाँ से...’’ ‘‘वो लड़की...’’ ‘‘लड़कियाँ साली क्या? वो तो लड़को को मुसीबत में डाल ख़ुद आराम से बैठी रहती है.’’ ‘‘एक बात है बे. दोस्ती का पूरा रिस्क हम लेते हैं. करते सब हम है... उन सालियों को कभी कुछ करना नहीं पड़ता.’’ ‘‘हाँ बे, इसके बाद तो उसके घर के बाहर उसे उतार कर भागा मैं...’’ ‘‘अब?’’ ‘‘अब क्या बे? मैं कौन सा सीरियस हूँ उसके साथ. जब तक पटी-पटी, नहीं तो कोई और...कौन सा अकाल पडा है यहाँ...?’’ ***************** ‘‘क्या बात है, आजकल आप मेरे से अच्छे से बात नहीं कर रहे?’’ रश्मि का फोन सौरभ के लिए. ‘‘करता तो हूँ.’’ ‘‘नहीं, उस दिन घर छोड़ के जाने के बाद एक बार भी आपने ठीक से बात नहीं की.’’ ‘‘कभी-कभी मुझे डर लगता है.’’ ‘‘मुझसे’’ ‘‘लड़कियों से... हमेशा मुसीबत में डालती है.’’ ‘‘मैं आम लड़की नहीं हूँ.’’ ‘‘समय बताएगा’’ ‘‘आजमा लो.’’ ‘‘नहीं, मुझे आजमाने से भी डर लगता है’’ ‘‘कैसे लड़के हो? अपने सारे दोस्तों में तुम्हीं सबसे ज़्यादा डरपोक होगे.’’ ‘‘एक और भी है.’’ ‘‘कौन?’’ ‘‘वही जिसके साथ तुमने मुझे पहली बार देखा था मिथिल. हम उसे प्यार से ‘मेथी’ कहते हैं’’ ‘‘लड़कियों को ऐसे लड़के अच्छे नहीं लगते, जो डरते हों.’’ ‘‘तो? लड़कियों को क्या ऐसे लड़के अच्छे लगते हैं, जो हर वक़्त तलवार लिए खड़े हों.’’ ‘‘हाँ रफ-टफ हो. घिसे हुए कपड़े पहने, दाढ़ी बढ़ी हो, बाल बिखरे हों, स्मोक करता हो. बाइक में दिन भर घूमता हो.?’’ ‘‘अरे, मैं तो सोचता था...लड़कियों को ऐसे लड़के पसंद है जो दिखने में ठीक हो, ढंग के कपड़े पहनता हो, कार में घूमता हो मोबाइल हो अच्छा वाल, बड़ी होटलों में जाता हो.’’ ‘‘तुम ठीक कहते हो, मैं मजाक कर रही थी.’’ ‘‘मजाक?’’ ‘‘हाँ, मुझे तुम्हारे जैसे लड़के अच्छे लगते हैं. आय लब यू.’’ ‘‘....................’’ ‘‘कुछ बोल नहीं रहे’’ ‘‘मैं इस पर सोच लूँ.’’ ‘‘इसमें सोंचने को कुछ नहीं है बुद्धु.’’ ‘‘लड़की कहे तो सोंचना पड़ता है.’’ ‘‘तुम्हारे जैसे बुद्धु समय खराब कर रहें हों तो कहना ही पड़ता है.’’ ‘‘.................’’ ‘‘कहाँ मिलोगे? फ़िल्म चलें.’’ ‘‘किसी ने देख लिया तो?’’ ‘‘मंगल ग्रह पर चलें. वहाँ कोई नहीं होगा.’’ ‘‘मजाक मत करो.’’ ‘‘मैं रो रही हूँ. मुझे तुमसे मिला है बस, इसी संडे को.’’ ‘‘नहीं, इस संडे मुझे का महै.’’ ‘‘मुझे ज़िंदा देखना चाहते हो.’’ ‘‘मतलब’’ ‘‘इस संडे को. नहीं तो मैं अपना हाथ काट लूंगी या तुम्हारे घर आकर बैठ जाउँगी.’’ फोन डिस्कनेक्ट. ***************** कुछ दिनों बाद...मोंटी के पास सौरभ का फोन- ‘‘भाई कुछ कर न’’ ‘‘भाई बोलता है तो बता क्या करूँ’’ ‘‘पीछा छुड़ाना है यार.’’ ‘‘कोई और ढूंढेगा’’ ‘‘हाँ यार. जितना टाईम पास करना था, कर लिया. अब बोर मारने लगी है साली. रात ग्यारह बजे के बाद फोन लगाती है, तीन-तीन बजे तक बात करती है. घरवालों को शक हो गया है. महीने का कार्ड हफ्ते में खत्म हो जाता है. कुछ हो, इससे पहले पीछा छुड़ा लूँ...पर छुड़ाउं कैसे? धीरे-धीरे बात कर करता हूँ. एकदम से बंद कर दूँगा, तो घर आ जाएगी.’’ ‘‘ठीक है, कोई दिक्कत हो तो मिस कॉल मारना, मैं समझ जाउँगा.’’ ‘‘दिक्कत तो है न यार. उस दिन मिलने से मना कर दिया, तो हथेली काटने की धमकी दे दी.’’ ‘‘चल बे, वो ऐसा कुछ नहीं करेगी. चूतिया बना रही है तुझे.?’’ ‘‘कर लिया हो-’’ ‘‘जा फिर मिलने, तू सुधरने वाला नहीं है.’’ ‘‘क्या करूँ बे, सोंचता हूँ न जाऊँ. पर मन नहीं मानता. अच्छा चल, इस बार नहीं जाता. सेल ऑफ रखता हूँ आज.’’ ***************** अगले दिन मिथिल का फोन सौरभ के पास- ‘‘क्या कर रहा है बे?’’ ‘‘क्या करूँगा साले. घर पर हूँ.’’ ‘‘रश्मि का फोन आया था.’’ ‘‘क्या कह रही थी.’’ ‘‘तू मिलने नहीं गया तो नाराज है. मुझे कह रही थी कि मैं अपनी कार में उसे बैठाकर तेरे पास आऊँ. तुझे लेकर कहीं दूर चलूं और फिर तुम दोनों को अकेला छोड़कर कहीं फूट लूँ.’’ ‘‘चल बे, लड़की होके ऐसा कहेगी?’’ ‘‘माँ कसम बे. मुझे सुनके डर लग रहा था.’’ ‘‘तूने क्या कहा?’’ ‘‘मैने कहा-देखूँगा.’’ ‘‘छोड़ उसे, भूल जा. मैं संहाल लूँगा.’’ ‘‘बात ज़रूर कर लेना बे. नहीं तो मेरी जान खाती रहेगी. और बुलाती है तो चला जा न. क्या जाता है अपना? फोकट में....’’’’ ‘‘चुप बे साले-.’’ ***************** आखिर एक दिन रश्मि पा ही जाती है सौरभ को- ‘‘हलो सौरभ, मुझे अभी मिलो अभी.’’ ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘तुम मेरा फोन नहीं उठा रहे. इस बात का फायदा तुम्हारे दोस्त उठाते हैं.’’ ‘‘मेरे दोस्त, कौन?’’ ‘‘मिथिल.’’ उधर से रोने की आवाज़. ‘‘क्या क्या मिथिल ने.’’ ‘‘मिलो, तो बताती हूँ.’’ ‘‘नहीं मैं नहीं आ सकता. फोन पर बताओ.’’ ‘‘अच्छा मैं आ रही हूँ.’’ ‘‘मैं घर पर नहीं हूँ.’’ ‘‘तुम्हें पता है मिथिल मुझे अपनी कार में बैठा कर ले गया. उसने कहा-वह मुझे तुमसे मिलवाने ले जा रहा है और आउटर में मेरे साथ...’’ ‘‘मेरे साथ...क्या’’ ‘‘जरबदस्ती की.’’ उधर से रोने की आवाज़. ‘‘नानसेंस. मिथिल ऐसा नीं कर सकता.’’ ‘‘मेरी बात का यकीन नहीं है.’’ ‘‘बिलकुल नहीं.’’ ‘‘तो मिथिल को लेकर मेरे पास आओ. तुम्हारे मैं उसे कबूल करवाउँगी. बस.’’ ‘‘तुम झूठ बोल रही हो.’’ ‘‘तुम्हारे सर की कसम. अगर तुम नहीं आए तो मैं मिथिल के घर चली जाउँगी और उसके पैरेंट्स से.’’ ‘‘बताओ, कहाँ आना है, मिथिल को लेकर आ जाउँगा.’’ ‘‘रात आठ बजे कंपनी गार्डन में.’’ ‘‘आठ बजे?’’ ‘‘अँधेरा रहता है. ओ के?’’ रात आठ बजे कंपनी गार्डन में तीनों मिलते हैं.- ‘‘सौरभ- मिथिल ने कहा कि सौरभ आ रहा है मुझसे मिलने. चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें ले चलता हूँ. सौरभ से मिलवाकर तुम्हें वापस घर भी छोड़ दूंगा. मुझे ले गया और..’’ वह रोने लगी. ‘‘सौरभ, ये झूठ बोल रही है. मैं इसे लेकर कहीं गया ही नहीं. बल्कि इसी का फोन आता रहा-सौरभ मुझसे नाराज है, बात करवा दो. तुम उसके अच्छे दोस्त हो. मैं तो बल्कि बात करवाने के लिए तुम्हें ढूंढ रहा था.’’  |  सौरभ- मिथिल ने कहा कि सौरभ आ रहा है मुझसे मिलने. चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें ले चलता हूँ. सौरभ से मिलवाकर तुम्हें वापस घर भी छोड़ दूंगा. मुझे ले गया और..  |
‘‘सौरभ, ये झूठ बोल रहा है. ये इतना सीधा नहीं जितना दिखाई देता है. क्यूँ? तुमने नहीं कहा था, मैं तुम्हें अच्छी लगती हूँ. तुम्हारा जी कर रहा है तुम मुझे सौरभ से छीन लो.’’ ‘‘यूँ ब्लडी बिच.’’ मैंने तुम्हें ऐसा कब कहा? मैं तो तुमसे मिलता तो भी न कहता. मैं पहले ही जानता था, तू बहुत बड़ी हरामजादी है. पता नहीं, कितने लड़कों से तेरे चक्कर चल रहे हैं.’’ ‘‘सौरभ-देखो तुम्हारे सामने.’’ वह फिर रोने लगी. ‘‘मिथिल, तू चूप हो जा.’’ ‘‘क्यूँ चुप हो जाऊँ बे? ये क्या इसलिए झूठ बोल सकती है कि ये लड़की है, और इसलिए इसकी बात पर विश्वास कर लेगा.’’ ‘‘मैं इसकी बात पर विश्वास नहीं कर रहा.’’ ‘‘और क्या कर रहा है तू? ते ये लड़कियाँ सारी मादर... होती हैं. इन्हीं की वजह से सिर-फुटौव्वल होती है दोस्तों में...’’ ‘‘मैं कहा न तू चुप कर. रश्मि तुम घर जाओ.’’ ‘‘नहीं, आज तुम्हें कहना पड़ेगा, तुम मुझे बहुत चाहते हो. मैंने तुम्हारे कारण बहत बेज्जती सही है.’’ ‘‘तुम घर जाओ, मैं तुमसे बात में बात करूँगा’’ ‘‘नहीं जाऊँगी’’ ‘‘तो हम जा रहे हैं. चल मिथिल?’’ ‘‘पर मुझे घर छोड़ेगा कौन?’’ ‘‘रिक्शा वाला...’’ ‘‘रश्मि चली जाती है. सन्नाटें में सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ आती है और हवा के फड़फड़ाते पत्तों की...’’ ‘‘साला, क्या नौंटकी है यार. ये साली लड़कियाँ...थूँ...’’ मिथिल ने थूंक दिया. ‘‘अबे, अच्छा हुआ मामला यही खत्म हो गया. मेरे घर में पता चल जाता तो मेरा सिर काट देते...बहुत खतरनाक थी यार.’’ ‘‘मैं पहले ही कहता था, इसके दो और हैं.’’ ‘‘तो भी इसी के जैसे मादर...है क्या?’’ ‘‘पता नहीं. अलग-अलग टाईप पे सबको निपटाती होगी. माँ कसम बे, आज के बाद किसी लड़की से बात नहीं करूँगा.’’ ‘‘फिर शादी कैसे करेगा?’’ ‘‘शादी तो मैं अपनी माँ के पसंद से करूँगा. ऐसी लड़कियाँ घर बसाने के लायक हो ही नहीं सकती. घर मतलब घरेलू...’’ ***************** ‘‘अब तो तौबा कर साले, मरते मरते बचा है...’’ ‘‘की न की. अब किसी लड़की की तरफ देखूँगा भी नहीं.’’ ‘‘अच्छा, चल घर चलें.’’ ‘‘अबे मोंटी, क्या कर रहा हूँ?’’ सौरभ का फोन मोंटी के पास. ‘‘कुछ नहीं बे, पढ़ रहा हूँ.’’ ‘‘छोड़ बे, क्या रखा है पढ़ाई में, एक लड़की ढूंढ कर दे न...’’ ‘‘कैसी चाहिए?’’ ‘‘इस बार थोड़ी अलग चाहिए...जो जरा सी टिकें.’’ ‘‘बड़ी जल्दी खाली हो गया तेरा पेट. मैं तो समझता था, तू साल भर लड़कियों से दूर रहेगा.’’ ‘‘बड़ी जल्दी खाली हो गया तेरा पेट. मैं तो समझता था, तू साल भर लड़कियों से दूर रहेगा.’’ ‘‘छोड़ बे. एक बार का भर पेट कितने दिन चलेगा. भूख तो रोज लगती है न.’’ ***************** ‘‘मोंटी.’’ सौरभ ‘‘बोल बे.’’ ‘‘बापू शादी कर रहा है.’’ ‘‘तो करने दे न, तेरे को नई माँ मिल जाएगी.’’ ‘‘अबे, बापू मेरी शादी कर रहा है.’’ ‘‘माँ कसम.’’ ‘‘माँ कसम.’’ ‘‘लड़कियाँ तो सामूहिक आत्महत्या कर लेंगी बे.’’ ‘‘छोड़ साले, वो तेरी शादी में करेंगे.’’ ‘‘मेरी शादी तक तो सब के दो-दो बच्चो हो जाएँगे. मुझे मामा कहेंगे.’’ ‘‘मामा क्यूँ बे?’’ ‘‘अबे लड़कियाँ ऐसी ही होती है, कहती है हमारे साथ रहो बस... कुछ भी बन के... चाहो तो मर के...इसीलिए तो मरे हुए ज़्यादा आसानी से साथ रहते हैं.?’’ ‘‘पर अब मैं क्या करूँ?’’ ‘‘तेरे को पहले ही बोला था बे, पढ़ने बाहर चला जा, बच जाएगा, पर नहीं, अब मर.’’ ‘‘कोई उपाय बता न बे.’’ ‘‘उपाय कोई नहीं. सिर झुका ले. लड़की देखी हैं.’’ ‘‘माँ और दीदी देख कर आई है, चाची.’’ ‘‘और तेरे बापू...’’ ‘‘वो कहते हैं, माँ कहती है ठीक है तो ठीक है.’’ ‘‘देखना साले, मेरी सारी दोस्तियाँ चलेगीं.’’ ‘‘पता है साले, बीबी के साथ रेस्टोरेंट के किसी कोने में बैठा होगा...बोर होता...मन हो न हो उसी के साथ बात करनी है, उसी के साथ सोना है...शादी यानी उम्र कैद...हम फोन करेंगे तो कहेगा, अबे तेरी भाभी को शॉपिंग कराने ले जाना है.’’ ‘‘अंकल को तो समझ दूंगा पर आंटी को नहीं समझा सकता.’’ ‘‘क्यूँ? माँ तो और सीधी हैं.’’ ‘‘इसीलिए.वो कुछ समझेंगी थोड़े ही...माँ इतनी इमोशनल होती हैं कि उनसे कुछ व्यवहारिक बात की ही नहीं जा सकती. चल बता, क्या तैयारी करवाऊँ? सब लड़कियों को कार्ड देने मैं जाऊँगा. देखूं तो सही, सालियों पर क्या बीतती है.’’ ‘‘जूते मारेंगी तुझे’’ सौरभ हँसता है. ‘‘जूते? खींच के गले लगा लेंगी. कहेंगी, अब तक कहाँ थे?’’ ‘‘साले तू नहीं सुधरेगा, अच्छा रखता हूँ.’’ ‘‘भाभी की फोटो कब दिखाएगा.’’ ‘‘फोटो देख के क्या करेगा, सीधा शादी में आना.’’ ‘‘अबे कुछ गड़बड़ हो गई तो लड़की बदल लेंगे.’’ ‘‘चल बे साले.’’ ‘‘अबे तू देख लेगा तो मेरे को भी बताना, कैसी है?’’ ‘‘बता दूँगा, अच्छा रखता हूँ.’’ ‘‘ओ के बॉय........’’ ***************** ‘‘हॉय मोंटी.’’ ‘‘अबे कहाँ से बोल रहा है गोवा से.’’ ‘‘नहीं बे आज सुबह आया हूँ.’’ ‘‘कैसा रहा हनीमून?’’ ‘‘शानदार.....’’ ‘‘देख, मैंने अच्छी जगह सुझाई न.’’ ‘‘हाँ, अब तेरी बारी मैं सुझाउँगा. वैसे एक बात बता. प्रीति तुझे कैसे जानती है?’’ ‘‘भाभी ने कुछ कहा क्या.’’ ‘‘नहीं, उसने कुछ कहा नहीं.....पर जब मैं अपने दोस्तों के बारे में बता रहा था..... उसने तेरे बारे में इस तरह के कमेंट्स किए कि लगा, तुझे जानती है.’’ ‘‘अच्छे कि बुरे?’’ ‘‘पहले मेरी बात का जवाब दे.’’ ‘‘तूने पूछ लिया होता.’’ ‘‘अबे, हनीमून में. अच्छा नहीं लगता.’’ ‘‘छोड़ फिर...मजे कर.’’ ‘‘नहीं बे-बता न-’’ ‘‘छोड़, दस बातें सोंचेगा फिर.’’ ‘‘नहीं सोचूँगा, बता.’’  |  भाभी का सेलेक्शन नहीं हुआ...बहुत वक़्त तक डिप्रेशन में रहीं. लड़के को भी जितना टाईम पास करना था कर लिया...उसकी बेरुखी से तंग आकर उन्होंने पढ़ाई छोड़ी या अपने पैरेंटस के दवाब में, मुझे नहीं मालूम  |
‘‘भाभी मेरी सीनियर थीं. मैं रिसेप्शन पर देखते ही पहचान गया था. उन्होंने कुछ नहीं कहा तो मैंने भी कुछ नहीं कहा...’’ ‘‘तूने मुझे क्यों नहीं बताया.?’’ ‘‘क्या बताता.... वो भी रिसेप्शन पर. और उससे क्या होता?’’ ‘‘अबे सब ठीक होगा न, ये लड़कियाँ....?’’ ‘‘और ये लड़के.... कभी अपने बारे में भी सोंच’’ ‘‘अबे, हमारी बात और है.’’ ‘‘और क्यों’’ ‘‘भाषण मत दो. तू पूरी रिपोर्ट बताएगा या मैं ख़ुद पता करूँ.’’ ‘‘क्या पता करेगा बे- शर्म कर साले.’’ ‘‘इसलिए कहता हूँ, तू बता दे...प्रीति ने लास्ट सैन के पेपर क्यूँ नहीं दिए थे- तुझे तेरी माँ की कसम.’’ ‘‘सातवें सैम में उनका ब्रैक लग गया था.’’ आठवें सैम की तैयारी वो नहीं कर पाई होगी, छोड़ दिया.’’ ‘‘सच बात बता सच...इधर-उधर की मत हाँक...’’ ‘‘सौरभ...इस सबसे कुछ हासिल नहीं होगा.’’ ‘‘मैंने कहा न साले, भाषण मत दे.’’ ‘‘अपनी ही क्लास के किसी लड़के से दोस्ती थी उनकी...सातवें में थी वें...उसकी बैंगलोर में जॉब लग गई...सुना था. दोनों का मन था कि एक ही शहर में जॉब मिले...भाभी का सेलेक्शन नहीं हुआ...बहुत वक़्त तक डिप्रेशन में रहीं. लड़के को भी जितना टाईम पास करना था कर लिया...उसकी बेरुखी से तंग आकर उन्होंने पढ़ाई छोड़ी या अपने पैरेंटस के दवाब में, मुझे नहीं मालूम...पर वे अपनी बीई कंपलीट नहीं कर पाईं.’’ ‘‘और वो लड़का.’’ ‘‘बैंगलोर चला गया.’’ ‘‘नाम बता.’’ ‘‘हूँ, अच्छा रखता हूँ.’’ ‘‘साले अब मैं तुझे मारूँगा.’’ ‘‘...................’’ ‘‘क्या सोच रहा है तूँ? एक ही नियम हमारे लिए सही, लड़कियों के लिए गतल. क्यूँ? हम कौन-कौन सी कमीनगियाँ नहीं करते? और फिर अपना बोया हम नहीं काटेंगे तो और कौन काटेगा? चाँदनी मैली होती है क्या छूने से? लड़कियाँ चाँदनी होती हैं यार.... किसी भी रूप में हों, वे हमें कुछ न कुछ देती ही हैं. बदले में हम क्या देते हैं....आदर तक नहीं. फंस गई तो मादर... नहीं फंसी तो मादर...आखिर हम लोगों को क्या चाहिए यार?’’ फोन डिसकनेक्ट हो जाता है. *********************************************** | | |