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गुरुवार, 07 जून, 2007 को 22:40 GMT तक के समाचार
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सस्पेंडेड औरत

चित्रांकनः हरीश परगनिहा
चित्रांकनः हेम ज्योतिका

कहानी

आज मैं आपको कोई कहानी नहीं सुनाने जा रही, जैसा कि आमतौर पर लोग करते हैं... आप जाते हैं उनके घर एक कटोरी शक्कर लेने या एक कप स्पेशल चाय पीने तो वे आपको पकड़कर कहानी ही सुनाने लगते हैं. ऐसा मैंने कभी नहीं किया. बल्कि जब-जब आप आए हैं मेरे घर पर मुझसे कुछ कहने-शायद अपना दुख, अपनी नापसंदगी-अपनी कोई अधूरी अदम्य इच्छा... या टूटकर बिखर चुके अभिमान की व्यथा... या जब आपका मन ख़ूब जोर से हँसने या रोने का कर रहा हो... आप मेरा दरवाज़ा खटखटाते हैं और अंदर आ जाते हैं... हर घर में कुछ तन्हा कोने होते हैं जिन्हें आदमी बनाता ही अपने रुदन के लिए... पर कभी-कभी घर के अन्य सदस्य जो कहीं भी रो लेते हैं या जिन्हें कोनों की ज़रूरत नहीं पड़ती... दूसरों के बनाए कोनों में अपना सामान रख लेते हैं... तब आदमी दूसरों के घरों की तरफ़ भागता है... उनके कोनो में उनके साथ बैठ कर रोने के लिए...

आइए मैं आपका स्वागत करती हूँ... ये मेरा नितांत निजी कोना है... यहाँ मैं अकेली बैठकर रोती हूँ या शायद जिसे आप रोना भी नहीं कह सकते. रूदन एक अभाव से हो रही तकलीफ का नाम है. कई बार यह तकलीफ अपने भीतर से जन्मती है, कई बार इसे बाहर से लाना पड़ता है. आप कहेंगे क्यों? कभी आपने औरतों को खाली दुपट्टे पर सलमें-सितारे, गोटे-किनारी लगाते देखा है? इसके बाद वे सुंदर लगते हैं. वे औरतें सुंदर लगती है जिन्होंने उन्हें ओढ़ा होता है. तकलीफों के साथ भी कुछ ऐसा ही है उन्हें ज़रा सा सुंदर बनाना पड़ता है... अपने आँसूओं, एहसासों के मोती टाँक-टाँक कर...

आप आराम से बैठिए, संकोच करने की ज़रूरत नहीं है. क्या कहा? ये सब कहाँ गए हैं? अरे जनाब, वे सब मुझे ढूंढने गए हैं. मुझे...मुझसे बाहर....अब वे ऐसा ना करें तो क्या करें? आदमी आदमी को हमेशा ग़लत जगहों पर ढूँढता है.... भ्रम बना रहता है कभी मिल जाएगा मिलता नहीं. पर सोचिए, सही जगह ढूँढा और हम मिल गए तो आप कीजिएगा क्या? फिर अलग होने की तैयारी?

 सबसे बड़ा सुख पता है क्या है? यह कि कोई आपको सुन रहा है. उसी तल्लीनता से, जिससे आप कह रहे हैं. शब्द हमारी प्रत्येक भावना का साक्षी हैं, हमारे होने का भी. उसी तरह मिलिए इनसे, नदियों का पानी मिलता है जैसे... एक नदी का पानी भी कितनी नदियों के पानी से मिलकर बना है, कौन कमबख्त जानता है?

बहुत बरस पहले मैं उसे ऐसे ही ढूँढ़ा करती थी... फ़ोन कर-कर के... दोस्तों से पूछ-पूछ कर... तमाम दिन शहर की गलियों और रात को ख्वाबों में भटकती... पर जिस दिन मुझे पता होता था आज वह घर पर है मैं कभी नहीं जाती थी. वह है, वह रहे हमेशा... चाहे मैं उससे कभी न मिलूँ.

अरे यह क्या, मैंने भी अपनी कहानी शुरू कर दी आज तो तय है कि मैं नहीं आप कहेंगे. तो इधर आइए सबसे पहले मैं आपको शब्दों का तकिया दे देती हूँ, इस पर सिर रखो और पहले रो लो, हल्के हो जाओ. ये नहीं कि ऐसे तकिए सिर्फ़ मेरे पास है- बाज़ार में खुले आम मिलते हैं... पर बाज़ार के बने तकियों और मेरे तकियों में काफ़ी फर्क हैं... बाज़ार में जिस तरह के शब्दों को भरा जाता है, वह शब्दों की भूसी है... निःसत्व... वे जो चलन में ज़्यादा होते हैं... पर जिनका अर्थ नहीं होता कुछ.

रोज़मर्रा के जीवन में देखा होगा आपने, ऐसे शब्दों को जो पैदा होते ही मरने लगते हैं... बहुत छोटी उम्र होती है उनकी. मैं अपने तकिए शब्दों को चुनकर बनाती हूँ. किसी जौहरी को देखा है-हीरे के बड़े से ढेर के सामने अपनी चिमटी पकड़कर बैठे. वह एहतियात से छाँट-छाँट कर अपने काम के हीरे अलग करता है उसकी तराश देखता है, गठन क़ीमत- यह भी कि किस गहने के लिए, कितने कौन से मौजू हैं. बाक़ी छोड़ देता है किसी अगले वक़्त के लिए. नहीं ‘वक़्तों’ के लिए. आप कहेंगे, यह सिंगुलर है, प्लूरल नहीं. आप ठीक कहते है-पर जिस तरह ‘सुपर माइंड’ एक है, ‘माइंड’ अनेक उसी तरह वक़्त भी एक है- शाश्वत् वक़्त. उसमें हम सबके ‘वक़्त’ अलग-अलग और बहुत सारे हैं. हमें ‘वक़्तों’ में जीते मरते हैं ‘वक़्त’ में नहीं. जिस दिन ‘वक़्त’ में जीना आ गया उस दिन मरेंगे क्यों?

तो मैं आपको तकियों का फ़र्क बता रही थी. मैं बिल्कुल उस जौहरी की तरह शब्द छाँटकर तकिए बनाती हूँ- बड़े ही नर्म-नाजुक. मेरी अहसासों में डूबी ऊंगलियाँ उन्हें छूती हैं तो वे अहसास भी उनके भीतर उतर जाते हैं और जनाब, जौहरी की तरह मैं उन्हें चिमटे से नहीं पकड़ती... न ये हीरों की तरह बेजान हैं. वैसे तो एक अर्थ में हीरे भी बेजान नहीं हैं- ये बोलते तब हैं, जब आपके ज़िस्म के किसी हिस्से में सज जाएं. शब्दों को पकड़ते, इन्हें तकिए में भरते, उनका रंग और महक मेरी ऊंगलियों से लिपट जाते हैं... ऊँगली से होते हुए सारे शरीर में उतर जाते हैं...

चित्रांकन - हेम ज्योतिका
चित्रांकन - हेम ज्योतिका

मैं मज़ाक नहीं कर रही... आप मुझे सुबह ही धूप में, दुपहर और फिर शाम को ढलती रोशनी में या छाँव में या बारिश में ध्यान से देखिए... हज़ारों इंद्रधनुषीय रंग मुझमें झिलमिलाते नज़र आएंगे... नहीं-नहीं, यह मेरी कारीगरी नहीं, न ‘उसकी’ रहमत है. ये शब्दों के अपने रंग हैं... मैं तो पारदर्शी काँच हूँ सिर्फ...अपने ख़ूब सारे पैरों से भीतर उतरकर वे ये फिर उस खाली जगह में घूमते हैं. जितनी खाली जगहें उन्हें मनुष्य के भीतर मिलती है, उतनी बाहर नहीं. बाहर तो बस ये भटकते हैं... प्रेतात्माओं से... अनदिखते नाजुक अहसासों से सराबोर... आपने सोचा नहीं कि चट से गिरा आपकी खाली खोपड़ी में... फिर उसे एक ख़ास वक़्त के लिए मैं अपने अंदर पलने-पुसने को छोड़ देती हूँ... भीतर शब्दों की अंतःक्रिया होती है... अंडे होते हैं, फिर बच्चे... वह सब मैं आपको किसी और वक़्त बताऊंगी...

अभी तो तकिया ही पूरी नहीं हुआ... तो इस तरह मैं शब्दों का तकिया बनाती हूँ कि जब आप आएं... अपनी पसंद का छाँट उसके निकट बैठ जाएं... उसके अर्थों की गर्मी आपके भीतर जमा हुआ दुख पिघला देगी और आप काफ़ी निर्भार महसूस करेंगे. मनुष्य के साथ एक हास्यप्रद बात यह है कि अपना कचरा वह ख़ुद इकट्ठा करता है और ख़ुद चिल्लाता है कि आओं, मुझे मुक्त करो. इस वक़्त आप कहिए...कहिए क्योंकि संवाद हमारी आत्मा की ज़रूरत है. हम देते हैं ख़ुद को उस दूसरे को अपने शब्द और अपने स्पर्श से और इसी देने की प्रक्रिया में उसे पाते भी हैं... न सिर्फ़ उसे, ख़ुद को भी...

सबसे बड़ा सुख पता है क्या है? यह कि कोई आपको सुन रहा है. उसी तल्लीनता से, जिससे आप कह रहे हैं. शब्द हमारी प्रत्येक भावना का साक्षी हैं, हमारे होने का भी. उसी तरह मिलिए इनसे, नदियों का पानी मिलता है जैसे... एक नदी का पानी भी कितनी नदियों के पानी से मिलकर बना है, कौन कमबख्त जानता है? उसी तरह आँखों से झरते नमकीन आँसुओं में किस-किस दुख का नमक है... यह तो ख़ुद रोने वाला भी नहीं बता सकता. बस समझिए सब एक है आँसू है कि पानी है कि बर्फ है... मनुष्य है कि प्रकृति है. तो इस एकात्मकता के बाद ही आप अपने से सुर्खरू हो सकते हैं. मैं आपके सामने थोड़े ही बैठी रहूँगी... मैं तो आपको वहीं अपने ड्राइंग रूम में छोड़ ख़ुद दीवार में लटके फ्रेम में चली जाऊँगी.

जी हाँ, आपने ठीक समझा. मैं तो बस कभी-कभी ही आ पाती हूँ बाहर... जब सामने समाज न हो, घर न हो, रिश्ते न हों ...मनुष्य हो सिर्फ़... शुद्ध मनुष्य... आवरणहीन... उस मनुष्य को सुनना... किसी दिन धूप नहीं निकलती या चाँदनी नहीं बहती तो भी वह बहता ही रहता है... या जैसे फल पकते हैं... आपको पता है, फल पकने की तरह मनुष्य होना भी एक प्रक्रिया है- इस प्रक्रिया से हम स्वयं को बाधित करते हैं-प्रकृति ही टहनी से ख़ुद को तोड़ जेले हैं समय से पहले और सड़ने लगते हैं. फल हों या मनुष्य, इनका ‘होना’ दूसरे में इनकी विलीनता से ही संभव है. जो ख़ुद को निरंतर बचाए रखना चाहते हैं...

 ध्यान से सुनिए... इन ईटों के जोड़ों से लगातार किसी के गाने की आवाज़ आ रही है... भारी, बोझिल, घिसटती हुई सी... जनाब, यह गीत नहीं... इन ईटों और गारे से किसी की सिसिकयों की आवाज़ आ रही है... जिसे आप हमेशा गीत समझते आए हैं. अगर आपको कुछ सुनाई नहीं दे रहा, तो भी कोई बात नहीं... दरअसल आप भीड़ से उठकर आ रहे हैं जहाँ सिर्फ़ शोर होता है

अब ज़रा फ्रेम को ध्यान से देखिएगा... यहाँ एक घर है...काफ़ी बड़ा- ऊपर आसमान है, बादल है बारिशें हैं. यह जो कुछ भी है उसे छोड़े रखने के लिए मनुष्य ने घर बनाए हैं... बाहर एक बगीचा है, कतार में लगे वृक्ष हैं... वृक्षों की झुकी शाखाएँ बता रही हैं कि हवा चल रही होगी... आधे खिले फूल अपनी खिलने की प्रक्रिया के बीच ठहर गए हैं. हवा ज़रा सी तेज़ हुई नहीं कि इन फूलों और पत्तों को उड़ाती दूर ले जाएगी. अरे, हवा तो चलने लगी... नहीं-नहीं आप उन फूलों के पीछे मत भागिए... कोई फ़ायदा नहीं. आप इन लोगों में से तो नहीं जो सूखे फूल और सूखी तितलियाँ किताबों में टांक कर रखते हैं. कोई ज़रूरत नहीं जनाब, शब्द तो वहाँ पहले से ही हैं... फूलों और तितलियों की तरह...

आप मेरे साथ आइए...आइए इस घर में चुपके से प्रवेश करते हैं. कितना साफ़-सुथरा है यह मानों अभी-अभी किसी ने चमकाया हो. घरों को चमकाने वालों की हालत देखी है आपने, देखिएगा कभी... कितनी क़ीमत चुकाते हैं वे इसकी और आपको पता तक नहीं चलता. अब इधर देखिए हर चीज़ करीने से लगी अपनी जगह पर... पहचान रहे हैं इन चीज़ों को... कौन लाया है इन्हें...? कैसे इन्होंने मनुष्य के बीच इतनी जगह बना ली कि इनके लिए जगह बनाते-बनाते मनुष्य स्वयं हाशिए पर चला गया है. हद तो यह है कि वह स्वयं को भी इन चीज़ों से ही पहचानने लगा है. इस घर में आपको क्या दिख रहा है? चीज़ें या मनुष्य? और जहाँ से आप आए हैं...वहाँ? चलिए, रहने दीजिए...

इन कमरों से चलते हुए बाहर आइए...वहाँ रूकने का मन हो तो भी रूकिएगा नहीं... कोई फ़ायदा नहीं. उधर देखिए, उस नल से अभी भी पानी बह रहा है. बगल में साफ-सुथरे कपड़ों का ढेर है. यहीं पर लहू धोया जाता है, यहीं आँसू... लहूँ, आँसू और मैल रहते चाहे अलग-अलग है पर मनुष्य के भीतर ये सब एक ही जगह जाकर मिलते हैं, हम इनकी क़ीमतें अलग-अलग क्यूं न आँकते हों. इधर आइए...आई खुशबू कहीं से? वो गैस पर कुछ पक रहा है... कुछ नहीं... बहुत कुछ ...एक पूरा जीवन... एक पूरा भविष्य. इसकी पूरी प्रक्रिया आप देख भी न पाएंगे कि यह पक कर जल भी जाएगा. इस जल किचन को देखिए... गैस के पास खाली जगह है न, यह हमेशा खाली रहती है... ‘ब्लैक होल ’ है यह! जो भी जाता है इसमें, फिर वापस नहीं आता...

चित्रांकन- हेम ज्योतिका
चित्रांकन- हेम ज्योतिका

आप समझते हैं मैं मज़ाक कर रही हूँ, नहीं जनाब, आपका मेरा कोई मज़ाक का रिश्ता है? ध्यान से सुनिए... इन ईटों के जोड़ों से लगातार किसी के गाने की आवाज़ आ रही है... भारी, बोझिल, घिसटती हुई सी... जनाब, यह गीत नहीं... इन ईटों और गारे से किसी की सिसिकयों की आवाज़ आ रही है... जिसे आप हमेशा गीत समझते आए हैं. अगर आपको कुछ सुनाई नहीं दे रहा, तो भी कोई बात नहीं... दरअसल आप भीड़ से उठकर आ रहे हैं जहाँ सिर्फ़ शोर होता है. भीतर से निकली ध्वनियाँ धीमी सुनाई देती हैं... और जब आप नहीं सुन रहे होते, तब भी वास्तव में आप सुन रहे होते हो.

आप कभी-कभी चौंक पड़ते होंगे... कभी राह चलते हुए, कभी नींद में, कभी कुछ लिखते हुए, कभी प्रेम करते हुए... आप किसी का हाथ पकड़कर बैठे हैं और सोच रहे हैं... ये लम्हा आप पहली बार नहीं जी रहे, इसके पहले-कब- कहाँ. आपको याद नहीं आता. दरअसल हम जी चुके हैं सारे दुख, सारे सुख... अलग-अलग परिस्थितियों, अलग-अलग रास्तों पर एक बार और जीते हुए भी वही पुरानी अनुगूंज बनी रहती है भीतर... तो आपको वह आवाज़ नहीं सुनाई दे रही तो समझें आप एकदम ठीक जगह पर नहीं खड़े हैं... ठीक जगह पर खड़े रहना, यह एक हुनर है जनाब जो आसानी से नहीं आता और जब आता है... आता कहाँ है जनाब... मनुष्य की कहानी ही ग़लत जगह पर खड़े होने की कहानी है. ग़लत समय पर खड़े होने की कहानी.

आइए अब इस दूर और तनहा कमरे में -यहाँ कोई नहीं आता- कुछ दिखा... एक काँच के बक्से में लेटी हुई वह औरत... सर्दियों से इसी तरह है... श्रोंडिंगर की बिल्ली की तरह... वह न जीती है... न मरती है... सस्पेंडेड है... जिस दिन देख ली जाएंगी... या तो जी जाएंगी या मर जाएंगी... नियति है यह मनुष्य की -सस्पेंडेड रहना... जीना सुख की बात है- मरना भी- पर सस्पेंडेड रहना... मेरा मतलब समझ रहे हैं न आप?

तो आप जा रहे? आप को लगता होगा न, न करके मैंने भी आपको एक कहानी सुना दी. नहीं जनाब ये कहानी तो आपके भीतर थी. आप ही आपने कंधे पर रख मेरे खाली फ्रेम में चले आए थे. मैंने तो जब आपको थका हुआ देखा अपना कंधा आगे कर दिया. क्षण भर इसे मेरे कंधे पर रखिए... थोड़ा सुर्खरू होइए... फिर रखवा दूंगी दूसरे कंधे पर. जनाब, दो ही तो कंधे हैं हमारे... थक जाते हैं... तीसरा ढूंढने लगते हैं.

तो अब आप लीजिए वापस अपनी गठरी... बाहर जाते-जाते दरवाज़ा बंद करते जाइएगा वो जो सदियों से सो रही है काँच के बंद बक्से के भीतर... और जिसे अभी भी अपने देखे जाने की प्रतीक्षा है... किसके देखे जाने की? वह कौन है, जिसके देख लिए जाने के बाद या तो वह जी जाएगी या तो मर जाएगी. हर व्यक्ति की चाह होती है और तब तक उसकी यात्रा चलती रहती है, जब तक उसे उसका एक ऐसा एन्टी पार्टीकल न मिले, जहाँ वह अपनी अस्मिता खो दे. उसके मिलते ही उसकी यात्रा संपूर्ण हो जाती है. तो अभी उसे यूँ ही रहने दे उसी प्रतीक्षा में...

और ये शब्दों का तकिया भी मुझे वापस करते जाइए अगली बार आएंगे तब तक मैं कुछ और बना के रखूंगी... क्या कहा? मैं यह सब क्यूं कर रही हूँ? हर बात का कोई कारण ही हो ये कहाँ ज़रूरी है? बेवजह जैसे हवा चलती है, पंछी बोलते हैं, पहाड़ सरकते हुए एक दूसरे के निकट आ जाते हैं या बादल झुककर उन्हें चूमते हैं सब अकारण है. कारण सिर्फ़ मनुष्य बनाता है. तो आप यह न पूछे और अगर यह आपकी जिद है और मुझे कोई न कोई जवाब देना ही है तो कहूंगी कारण वहीं... आपके आने का जो है... मेरे कहने का भी... एक ऐसे एंटी पार्टीकल की तलाश... जिससे हाथ मिलाते ही मैं नष्ट हो जाऊँ...

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जया जादवानी
कस्तूरबा नगर, जरहा भाटा,
बिलासपुर, छत्तीसगढ़, 495 001

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