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शुक्रवार, 06 अप्रैल, 2007 को 08:30 GMT तक के समाचार
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महानगर के पति

चित्रांकन-हरीश परगनिहा
चित्रांकन-हरीश परगनिहा

कहानी

हममें से किसी के पास समय नहीं था कि हम अपने जीवन के असली नाटकों को जी सकें, जो हमारी नियति में लिखे थे. यही चीज़ हमें बूढ़ा बनाती है सिर्फ़ यह और कोई नहीं. हमारे चेहरों की झुर्रियाँ और सलवटें उन विराट कहानी

दरवाज़ा काफ़ी देर बाद खुला. एक बार नहीं...दो बार नहीं...पूरी तेरह बार दस्तक देने के बाद. यूँ सामान्यतः दरवाज़ा एक हल्की सी दस्तक में ही खुल जाता है. इस कारण आज थोड़ा आश्चर्य अवश्य हुआ.

दरवाज़ा भाभी जी ने ही खोला था हमेशा की तरह. मुस्कराई, जबरन यंत्रवत्.

मैं भी मुस्कराया. पर चाहकर भी स्नेहिल एवं आत्मीय मुस्कान नहीं दे सका हमेशा की तरह.

देखा चेहरे पर बरस चुके मेघों की सी शून्यता है उनके. खालीपन है. खामोशी है. रो-धोकर चेहरे को अच्छी तरह से धो-पोंछकर सामान्य करने की भरसक चेष्टा की गई है एक असफल कपटी चेष्टा. पर आँखों के कोर में अभी भी नमी शेष थी. पलकें कहीं-कहीं से असावधानी से छूट गए गीले कमरे के कोनों की तरह आर्द्र थीं. पपोटों में अभी भी सूजन थी. उन्नत नासिका का अग्रिम भाग आरक्त था.

लगा खूब रगड़-रगड़कर मुँह पोंछा गया है. चेहरा कुछ ज़्यादा सुंदर एवं सुथरा लग रहा था. पर साड़ी एकदम अस्त-व्यस्त एवं सलवटों से भरी थी. बाल भी बिखरे हुए थे.

आसपास नज़रें दौड़ाई-किसी सतर्क जाँच अधिकारी सदृश. शायद इस मूक क्रंदन का कुछ सुराग मिल सके.

सभी कुछ उलट-पुलट था. तकिए ज़मीन पर औंधे पड़े थे. कार्नर टेबिल पर पडा हुआ एक ज़माना पुराना रंग उड़ा एवं कई जगह से धचके खाया हुआ नाइट लैंप ज़मीन पर पडा था, जिसका बल्ब सदगति प्राप्त कर चुका था. खाने से भरी हुई थाली ज़मीन पर उलटी पड़ी हुई थी. पानी का गिलास एक और लुढ़का पड़ा था (शायद खाते-खाते गुस्से में खाली फेंक दी गई थी!)

सभी कुछ सद्यः समाप्त गृहयुद्ध की सूचना देते से लगे.

बीच में सुना था, प्रभात भैया की नौकरीछूट गई है, पर अब तक तो शायद...फिर यह झगड़ा-टंटा क्यों? इन दोनों में तो बड़ा अच्छा प्रेम था. मैंने मन ही मन अटकलें भिड़ाने लगा.

‘पिंकी कहाँ है...?’ खामोशी पर आघात करते हुए पूछा मैंने.

‘घूमने गई है...तुम्हारे भैया के साथ...’

‘तबीयत ठीक नहीं है...क्या?’ मैने कुछ टटोलने के से अंदाज में पूछा.

‘हाँ...सिर में बेहद दर्द है. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है.’ बड़ी चतुराई से किसी चालू छोकरी की तरह असलियत पर आवरण डालते हुए उन्होंने जवाब दिया.

मैं समझ गया-दर्द है ज़रूर पर...कहाँ‘? लक्ष्य को भेद नहीं पा रहा था.

कुछ पल स्तब्धता...

आज भाभी सचमुच बहुत ही अनमनी लग रही थीं. बातचीत करने के मूड में एकदम नहीं थीं. फिर ध्यान से देखा-चेहरा सचमुच एकदम निस्तेज था उनका, किसी दिशाहारे यायावर सा. एक सघन उदासी...विषाद भरा चेहरा.

बड़ी दया आई मुझे उन पर.

एक समय था-जबकि भाभी की उपस्थिति मात्र से ही हर चीज़ में जीवन झलकने लगता था. उनकी हास्य लहरी से दसों दिशाएँ अनुगूंजित हो उठतीं थीं घर की. और मैं..तो उनके सा्न्निध्य में जैसे मन की मुक्तावस्था को ही पहुँच जाता था...अंतर का सारा कलुष, अवसाद एवं विषाद एक ही बहाव में परनाले सा बह जाता था.

पर आज वे स्वयं विषाद एवं वेदना की मूर्ति बनी हुई थीं.

कदाचित् उन्हें एकांत की ज़रूरत थी. लेकिन यूँ अकस्मात् उठकर चले जाने की इच्छा नहीं हुई. शायद बुरा लगे...बुरा नहीं तो भी अटपटा ज़रूर लगेगा. शायद...खुदगरजी भी लगे.

चित्रांकन-हरीश परगनिहा

सोचा दो-चार इधर-उधर की बातें और कर लूँ और यदि संभव हो तो उन्हें ख़ुश करने की चेष्टा करूँ... और फिर चलता बनूँ. खट्...खट्...खट्...

फिर दस्तक हुई. दरवाज़ा मैंने खोला. गनीमत थी कि भैया नहीं थे. नहीं तो क्या पता मेरे सामने ही फिर दोनों भिड़ जाते...

कोई सेल्स गर्ल थी. काम चलाऊ सुंदरी. मुझे देखते ही खट् से टेप रिकॉर्डर शुरू कर देने के अंदाज में समस्वर में बोलने लगी ‘हम जॉनसन एंड जॉनसन की तरफ से आए हैं’ कंठ स्वर सुरीला था. पर बेजान. क्लांत.

एक धैर्यशील श्रोता की तरह मैंने उसकी पूरी बात सुनी क्योंकि वह अविराम बोलती जा रही थी और अब वह उत्साहित हो-होकर अपने कंधे पर लटके कपड़े के थैले से अद्भुत चीज़ें निकालकर दिखाले लगी कि मैंने उसे रोक दिया. जब कुछ लेना ही नहीं है तो बेकार देखने से क्या फायदा? वह निराश होकर नाम पता लिखकर चली गई.

भाभी तब तक चाय बनाकर ला चुकी थीं. वही यत्नपूर्वक संभालकर रखी हुई पाँच साल पुरानी ट्रे और वही कप-प्लेट. चमक अब थोड़ी-थोड़ी मंद पड़ने लगी थी उनकी.

अब कुछ सामान्य सी लग रही थीं वे. चेहरे पर से उदासी का प्रथम संस्करण हट चुका था. शायद स्वयं को सहेज भी चुकी थीं अब तक.

चाय की चुस्कियों के बीच बातचीत आत्मीय स्तर पर आ गई थी कुछ-कुछ. पहले का सा रूखापन नहीं रहा था. चिकनी-चुपड़ी बातें होने लगीं. तरह. माँपदार.

‘इस बार तो क़ाफी दिनों बाद आए...नरेंद्र!’

‘हाँ. समय ही नहीं मिल सका...’

‘ऐसा भी क्या काम था.!’

‘नई-नई नौकरी है न! पचासों झंझट हैं.’

‘बॉस थोड़ा सैडिस्ट मैंटिलिटि का है. बिना कारण ही सबके सामने अपमानित करने में आनंद पाता है.’ मैने अनायास ही अपने अंदर का गुबार निकाल डाला.

‘कैसे...?’ लगा उन्हें सहयात्री का सा अहसास सुख हुआ.

 तुम लोग तो फिर भी लड़के हो. हम लोगों को देखो. दो-दो बॉसों का सामना करना पड़ता है. कभी घर का कभी ऑफ़िस का

‘मेरी अच्छी तरह से बनाई हुई रिपोर्ट में भी बिना मतलब की ग़लतियाँ निकालना शुरू कर देगा. और कुछ नहीं मिलेगा तो अंग्रेज़ी की ही गलतियाँ निकालना शुरू कर देगा और वह भी त्रुटिपूर्ण. कभी-कभी तो लगता है कि अब अंग्रेज़ी भी फिर से सीखनी पड़ेगी....’ मैं अपनी ही रौ में बहने लगा था. चोट खाया पीड़ित अभियान अभिव्यक्ति की राह ढूँढ़ने लगा था‘एक बार कंपनी के किसी कार्यवश मुझे बाहर भेजा गया... कुछ पर्चेज ऑर्डर लाने के लिए. बाद में शायद बॉस ने अपना निर्णय बदल लिया था, मुझे फ़ोन पर सिर्फ़ इतना ही कहा,‘कम बैक...’ मैं पूछता ही रह गया क्यों-क्यों, पर बिना जवाब दिए ही उन्होंने फ़ोन रख दिया. मेरे लिए सफर का समय काटना मुश्किल हो गया. सहस्र-सहस्र शंकाएँ मुझे सर्प दंश-सी आक्राँत करने लगीं. कभी सोचता घर में कुछ अनहोनी हो गई है... इस कारण तुरंत आने को कहा है...दुबारा फ़ोन करने की हिम्मत नहीं हुई. आने पर पता चला कि बात कुछ भी नहीं थी. बिना कारण ही मानसिक यातना देना मेरे बॉस का शौक है. कल तो गुस्से में आकर मेरे मुँह पर ही फाईल पटक दी...’ मैं थोड़ा-थोड़ा रुआँसा हो गया, कल वाली घटना अपनी पूर्ण भयावहता के साथ साकार हो गई.

‘धीरे-धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा. वह तुम्हारा आदी हो जाएगा और तुम उसके.’ भाभी कुछ दार्शनिक लहजे में सांत्वना देने लगीं.

लेकिन मैं शायद उतने समय तक यहाँ नहीं टिक पाऊँ. मेरा बॉस आदमी की अनुभूति प्रवणता को जब तक एकदम कुचल कर उसे जानवर नहीं बना देता उसे चैन ही नहीं पड़ता है. ऐसे के अधीन कोई काम भी करे तो कैसे. उसका आतंक मेरे अवचेतन में इस कदर हर वक़्त समाया रहता है कि मेरा आत्मविश्वास तक वक़्त पर साथ छोड़ देता है और मैं हर वक़्त घबराया-बौखलाया सा ही रहता हूँ. एक बार कहता,‘सरदारजी की तो बारह बजे बारह बजती है...आपकी तो हर वक़्त ही बारह बजी रहती है...’’ हर तरह से आदमी को अपमानित करने में निष्णात है. बात मैंने कुछ इस ढंग से कही थी कि भाभी खुलकर हँस पडीं. बातचीत को काफ़ी हल्के-फुल्के ढंग से लिया था शायद. पर दूसरे ही क्षण मेरे मुँह पर नज़र पड़ते ही उन्हें अपनी भूल महसूस हुई.

बड़े प्यारे से फुसलाने के से स्वर में कहने लगीं,‘बुरा नहीं मानना नरेंद्र? आज बहुत दिनों बाद हँसी मेरे अंदर से फूट निकली है. एक तुम्हीं हो जिससे दो घड़ी मैं मन की बात कर सकती हूँ. बाकी सब तो...’

चित्रांकन - हरीश परगनिहा

वह धीरे-धीरे स्वयं को उघाड़ने की मनःस्थिति में आ रही थीं शायद. क्योंकि मैं अपने-आपको उनके सामने उघाड़ चुका था, अनायास ही. हँशी की जैसे उघाड़ने की प्रक्रिया भी संक्रामक होती है.

‘तुम लोग तो फिर भी लड़के हो. हम लोगों को देखो. दो-दो बॉसों का सामना करना पड़ता है. कभी घर का कभी ऑफ़िस का.’ बोलते-बोलते आत्मपीड़ा की हल्की-हल्की रेखाएँ चेहरे पर उभर आईं उनके.’

मैं सचमुच हैरान था. शादी के पहले तो सुना था भाभी सर्विस करती थीं. पर शादी के बाद तो स्वेच्छा से ही नौकरी से त्याग पत्र दे दिया था उन्होंने. उनका तो नारा ही था,‘होम-होम, स्वीट होम...’ तब फिर ये ऑफ़िस का बॉस कहाँ से आ धमका? और फिर प्रभात भैया तो भाभी के कदमों तले हर वक़्त कालीन से ही बिछे बिदे रहते थे. वे बॉस कब से बन गए?

सहस्र-सहस्र प्रश्न मेरे अंतर में उबलते पानी से खदबदाने लगे.

‘क्या प्रभात भैसा सर्विस छूटने के दौरान तुमने सर्विस की?’मैंने स्वाभाविक जिज्ञासावश पूछा.

‘हाँ तब तो करना सचमुच ज़रूरी था. अस्तित्व ही संकट में पड़ गया था. हालाँकि हालत मेरी तब भी ऐसी नहीं थी कि मैं सर्विस करूँ. पिंकी बहुत ही छोटी थी मात्र 13 महीने की.’

‘अरे. नहीं. वहाँ वैकेंसी नहीं थी.’ उन्होंने निराशा से हाथ मलते हुए कहा,‘वहाँ तो इज्जत भी बहुत थी मेरी. स्टॉफ भी बहुत अच्छा था. प्रिंसिपल, सेक्रेटरी, प्रेसीडेंट सभी अच्छे ते. पर एक बार छूटने पर इतनी अच्छी जगह जल्दी अवसर कहाँ मिल पाता है.’ अफसोस की एक गाढ़ी सी परत चढ़ गई थी उनके चेहरे पर.

‘अभी जहाँ पर मैं हूँ वह एक ट्रैवलिंग एजेंसी है. वहाँ पर मैं टेलिफ़ोन ऑपरेटर कम रिसेप्शनिस्ट हूँ. बड़ा शानदार ऑफ़िस है. देशी-विदेशी सभी तरह के लोग आते हैं. वेतन भी अच्छा ही देते हैं. पर वातावरण यहाँ का अच्छा नहीं. कम से कम मेरी मानसिकता के तो बिल्कुल भी अनुकूल नहीं. बॉस की नीयत भी ठीक नहीं है, किसी न किसी बहाने मुझे जान-बूझकर देर तक ऑफ़िस में ही अटकाए रखता है, बिना मतलब मेरे इर्द-गिर्द मंडराया करता है... भई, मैं तो एक सीधी-सादी औरत हूँ...पढ़ी-लिखी हूँ...पर संस्कार मेरे परंपरागत ही हैं. हल्कापन मुझे किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है.’

वे फिर चुप हो गईं. उँगली के नाखूनों से मेजपोश पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनाने लगीं. मैं कनखियों से उन्हें देखने लगा. भरा-पूरा लुभावना चेहरा. हल्का सा पीलापन लिए शांत, स्निग्ध, स्वच्छ सौंदर्य.

कुछ बोलना ज़रूरी थी. मेरी चुप्पी उन्हें हतोत्साहित कर सकती थी, इकलिए बोला, ‘भैया क्या कहते हैं?’

‘तुम्हारे भैया तो इस सर्विस से बेहद ख़ुश हैं. कहते हैं तुम अब पहले से कहीं ज़्यादा स्मार्ट लगती हो. बड़े-बड़े लोगों के संपर्क में आ रही हो न!’ व्यक्तित्व भी तुम्हारा पहले से काफ़ी निखर गया है. अच्छा है संपर्क का फ़ायदा कभी न कभी तो मिलेगा ही. आजकल के जमाने में सोर्स इज फोर्स.’

‘पिंकी...!उसे तकलीफ नहीं होती है?’

‘तकलीफ..?’ भाभी थोड़ी तुनककर बोलीं,‘‘उसे चाइल्ड केयर में रखना पड़ रहा है जो कि घोर मानसिक यंत्रणा है. रोज़ सुबह नौ बजे मैं उसे छोड़कर आती हूँ और शाम को ऑफ़िस से लौटकर वापस लेती हूँ. अभी तो फिर भी वह उतना प्रतिवाद नहीं करती. पर शुरू-शुरू में तो बहुत रोती थी. जाना एकदम पसंद नहीं करती थी. मेरी गर्दन को कसकर पकड़ लेती थी. मुझे जबरन उसे रोती हुई छोड़कर जाना पड़ता था.’ कहते-कहते भाभी के चेहरे पर गहन पीड़ा की लकीरें उभर आईं. मुँह अजीब सा बन गया.

‘अब तो बोलना सीख गई है. रोज़ सुबह उठते ही पहली बात यही कहेगी, ‘‘ममा मत जाओ... आज मत जाओ.... अच्छा दोपहर को छोड़ आना...इतनी सुबह-सुबह नहीं.’’

जाने के पहले तक बहुत लाड़ लड़ाएगी. लेकिन घर से निकलते ही एकदम उदास हो जाएगी. सारे रास्ते एकदम बात नहीं करेगी क्योंकि ममा ने उसकी बात नहीं मानी. मन सचमुच बड़ा भारी हो जाता है. उसे बेबी सिटिंग में छोड़ते हुए.

 याद आया कभी ये ही प्रभात भैया थे जो अपनी युवा बहनों को शाम के समय बालकनी तक में नहीं खड़े होने देते थे. पर प्रत्यक्षतः मैंने भाभी से अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कहा और उनसे इजाज़त लेकर लंबे-लंबे डग भरता अपने घर की राह ली. पर भगवान ही जानता है...उस दिन किसी अच्छे-भले की शक्ल देखकर ही निकला था कि सही सलामत पूरा का पूरा हंड्रेड परसेंट घर तक पहुँच गया वरना जाने कितनों से टकराया, कितनों से भिड़ा

‘‘हर रात सोते वक़्त ज़िद करेगी ममा कहानी सुनाओ. रविवार या छुट्टी के दिन तो मैं उसको कहानी सुनाने केलिए दिन में बच्चों की एक से एक सुंदर कहानी पढ़कर रात को उसे सुनाते-सुनाते सुला देती हूँ. पर काम के दिन,...दिन-भर भाग दौड़, घर का काम, बाहर का काम...इस हद तक मैं थककर चूर-चूर हो जाती हूँ कि बिस्तर पर पड़ते ही जड़ सी हो जाती हूँ. ऐसे में क्या तो मैं उसे कहानी सुनाऊँ...और क्या थपकियाँ दूँ... पता नहीं मेरे इस रवैए का क्या प्रभाव पड़ेगा उस पर, बड़ी अभागी है बेचारी.’

भाभी फिर चुप हो गईं. नीची नज़र किए ज़मीन देने लगीं.

भाभी की स्थिति बहुत कुछ मेरे सामने स्पष्ट हो चली थी. फिर भी आज के गृहयुद्ध का कोई भी सूत्र पूरी तरह से हाथ न लगा था मेरे, अभी तक. मन ही मन मैंने स्वयं को धिक्कारा भी-अपनी इस भेदिया टाइप मनोवृत्ति के लिए. पति-पत्नी हैं... झगड़े के सौ कारण हो सकते हैं...किसी के व्यक्तिगत मामलों में इस हद तक दिलच्सपी! सब लानत है मुझ पर भी. पर प्रभात भैया और भाभीजी की बात साधारण पति-पत्नियों से समचुद अलग थी. उनकी जोड़ी चंद आदर्श जोड़ियों में ही गिनी जाती थी. गिरीश भैया तो उन्हें सदैव कबूतर-कबूतरनी का जोड़ा ही कहा करते थे. उच्च धरातल पर रहने वाले दंपति! धरती की धूल, बैर-वैमनस्य से कोसों दूर...!

मन में बार-बार कुछ घुमड़ रहा था. जानने को जितना नहीं, जितना इस विश्वास को पुष्ट करने को कि सचमुच इन दोनों के मध्य भी इस हद तक कटुता जैसी कोई चीज़ पनप सकती है.

‘तो फिलहाल तो बेबी सिंटिंग और ट्रैवलिंग एजेंसी दोनों ही अपनी-अपनी जगह कायम हैं...क्यों?’ मैंने कुछ हिचकते हुए पूछा.

‘भई, बेबी सिटिंग में तो पिंकी को रखना ही पड़ेगा...मजबूरी है... अपने वश में तो कुछ भी नहीं है...’ उन्होंने दीर्घ निश्वास खींचते हुए कहा...‘पर यहाँ मैं हर्गिज अब काम नहीं करूँगी...मैंने कल से ही जाना छोड़ दिया... और आज सुबह जाकर त्याग-पत्र भी फेंक आई हूँ...बॉस के मुँह पर...’ बोलते-बोलते चेहरा अनायास तमतमाया आया था भाभी का.

मैं विस्फरित आँखों से देखे जा रहा था उन्हें. कुछ-कुछ‘ये भी सचमुच एक चीज़ हैं-के भाव से.

चित्रांकन - हरीश परगनिहा

कुछ पल की स्तब्धता के बाद वे फिर से बोलने लगीं, कुछ-कुछ उत्तेजित-उद्विग्न स्वर में,‘अरे...मेरा इस्तीफ़ा ही तो सब झंझट की जड़ है. जब से तुम्हारे भैया को मैंने बताया कि मैं इस सर्विस से इस्तीफा देकर किसी बच्चों की किंडर गार्डेन में काम करने वाली हूँ, घर में बवाल मचा रखा है उन्होंने. गुस्से में सुलग रहे हैं. सारी बुद्धि विवेक एवं सदभाव को तिलांजलि देकर कलसे जली-कटी सुना रहे हैं मुझे. दकियानूसी, गंवार, फूहड़...जाने क्या-क्या बक रहे हैं. दरअसल अपनी पिछली लंबी बेकारी का आतंक अभी तक उनके अवचेतन में इस कदर समाया हुआ है कि किसी भी कीमत पर आर्थिक दृष्टि से सुरक्षित हो जाना चाहते हैं-पूर्णतया सुरक्षित.’

मुझसे कहते हैं-‘लोग तो आगे बढ़ने की सोचते हैं और मैं हूँ जो पीछे लौटकर चार हज़ार की मास्टरी से ही चिपकी रहना चाहती हूँ. मुझमें महत्वाकांक्षा है ही नहीं.’

कभी-कभी कहते हैं-‘ज़िंदगी में कहीं न कहीं, कुछ न कुछ तो समझौता करना ही पड़ता है....’

कभी कहते हैं-‘तुममें चैलेंज का सामना करने की शक्ति नहीं है...अरे, वहीं रहकर बॉस का सामना करो...नौकरी से त्याग-पत्र देना तो पलायन है...’

‘अपनी कनिंग इंटेलिजेंस से मेरा ही ब्रेन वाश कर देना चाहते हैं. यह तो सर्विस हाथ में रखकर पहली वाली सर्विस छोड़ी है और यदि यूँ ही छोड़ देना पड़ता तो जाने क्या करते.’ कहकर वे मेरी और देखने लगीं सीधी लपक. पता नहीं मेरा समर्थन चालती थीं या सहानुभूति.

पर मुझे लगा मेरा सिर घूम रहा है. उदभ्रांत सा घूम रहा है. उनके आज के गृहयुद्ध पर अब और अधिक ‘रिसर्च’ करने की शक्ति मुझमें सचमुच ही नहीं बची थी. याद आया कभी ये ही प्रभात भैया थे जो अपनी युवा बहनों को शाम के समय बालकनी तक में नहीं खड़े होने देते थे. पर प्रत्यक्षतः मैंने भाभी से अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कहा और उनसे इजाज़त लेकर लंबे-लंबे डग भरता अपने घर की राह ली. पर भगवान ही जानता है...उस दिन किसी अच्छे-भले की शक्ल देखकर ही निकला था कि सही सलामत पूरा का पूरा हंड्रेड परसेंट घर तक पहुँच गया वरना जाने कितनों से टकराया, कितनों से भिड़ा. सड़क पर चलते आदमियों की भीड़ में से मुझे प्रायः हर चेहरा प्रभात भैया से मिलता-जुलता लगता...पास जाता तो वही चेहरा मेरे बॉस का बन जाता या कभी दोनों ही चेहरे एक-दूसरे में गड्डमड हो जाते.

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मधु काँकरिया
द्वारा, अशोक कुमार सुनील कुमार
54 इजरा स्ट्रीट, ग्राउंड फ्लोर
कोलकाता-700001

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