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भारतीय वर्णमाला | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ध्वनि ने कभी कहा था,‘‘पावस! मेरा बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो जाए...बस मेरा दायित्व खत्म... फिर तुम मुझे अपने पास बुला लेना...बुला लोगे न! मुझे सिर्फ़ तुम्हारा साहचर्य-सान्निध्य चाहिए...बोझ नहीं बनूंगी मैं तुम पर...अपने गुजारे के लायक बूंद-बूंद करके जमा कर लिया है मैंने.’’ पावस का मर्म जैसे छू गया हो बेगम अख्तर की गज़ल से, कहा था, ‘‘ध्वनि! हृदय में तो तुम रहती ही हो, अपने शयन-कक्ष में भी मैंने तुम्हारे लिए बहुत पहले स्थान सुरक्षित कर दिया है...तुम्हारी मरजी, उसे तुम जब भर दो. बोझ तो मैं ख़ुद अपने आप पर हो जाऊँगा जब वह स्थान एक निश्चित समय सीमा के बाद खाली रह जाएगा. तुम अब मेरी सांस हो ध्वनि, तुम्हें सहेज कर ही जीवन अस्तित्व में रह सकता है.’’ जब बच्चे अपनी-अपनी दुनिया बसाकर उनमें मसरूफ़ हो जाएंगे और माँ-बाप के लिए उनके पास ज़्यादा गुंजाइश नहीं रह जाएगी. अर्थात जब वे बच्चों की दुनिया की एक अवांछित वस्तु बन जाएंगे तो उनकी दोस्ती, उनकी मोहब्बत जीवन के इस चौथे पहर के संक्रमण काल में सबसे ज़्यादा काम आएगी. वे एक साथ बसेरा डाल लेंगे...पावस और ध्वनि ने किन्हीं घनिष्ठ अंतरंग क्षणों में ऐसा तय किया था. पावस को पत्नी ने छोड़ दिया था और ध्वनि को उसके पति ने. दोनों ज़िंदगी की एक ही डगर के यायावर थे. उनकी यायावरी एक ही वाहन पर चढ़कर आगे बढ़े, इसके लिए वे दोनों बड़े उत्सुक थे. वह समय आ रहा था धीरे-धीरे...पावस जैसे मन ही मन प्रतीक्षारत था जीवन के उस अध्याय के शुरू होने के प्रति...वह अपनी कल्पनाओं के भिन्न-भिन्न चित्र और दृश्य की रूपरेखा बना लेता था. मगर होनी को कुछ और ही बदा था.
ध्वनि के कंप्यूटर साइंस में इंजीनियर बेटे गौरव का अमेरिका के सिलिकॉन वैली की एक बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में बहुत बड़ी वार्षिक पगार पर चयन हो गया. वह अमरीका चला गया और साथ में अपनी माँ को भी ले जाने पर राजी कर लिया. कहा,‘‘जब अपने देश और अपने लोगों के बीच मैं तुम्हारे बिना न रह सका तो फिर पराए देश और अनजाने लोगों के बीच मैं कैसे रह पाऊँगा. प्लीज ममा, तुम मेरे साथ चलो, तुम्हारी छत्रछाया की मुझे अब भी बेहद ज़रूरत है वरना मैं वहाँ एक पल नहीं टिक पाऊँगा. मेरे कैरियर की पतवार अब भी तुम्हारे हाथ में है, ममा.’’ पति से अलग होने के बाद पिछले 15 वर्षों से बेटे के कैरियर संवारने में ही उसकी सारी कसरत, कवायद और इबादत केंद्रित रही. बेटे की एक-एक नाज-नखरे पर कुर्बान ध्वनि, उसकी एक-एक इच्छाओं पर बलि-बलि जाने वाली ध्वनि, बेटे को ही अपने जीने का आधार और लक्ष्य माननेवाली ध्वनि, भला आँख के उस तारे-दुलारे की इतनी सी बात कैसे उठा दे! चली गई वह अमरीका. पावस को उसने फ़ोन करके सूचना दी. जानकर पावस को लगा कि उम्मीदों की एक ऊँची मीनार ज़रा-सी दरक गई और एकाउंट का डेबिट साइड आज पहुँच से बाहर हो गया. वह यात्रा के शुभ होने की कामना करने के सिवा और कह भी क्या सकता था! जानता था कि बेटे के नाम पर वह कोई कंपरमाइज नहीं कर सकती. ध्वनि ने उसे एक जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा,‘‘अपना नया उपन्यास मैंने प्रकाशक को भेज दिया है. तुम उसका फॉलो-अप करते रहना. मेरा ध्यान इस पर लगा रहेगा.’’ जाने के कुछ महीने बाद ध्वनि ने पत्र लिखा,‘‘तुम्हारी बहुत याद आती है. यहाँ मन एकदम नहीं लग रहा. लगता है उड़कर तुम्हारे पास चली आऊँ. मगर कैसे आऊँ...अकेले यहाँ गौरव का दम घुट जाएगा...खाने-पीने-सोने सभी मामलों में तो यह लड़का मुझ पर ही निर्भर है. बहुत मन मारकर रहना पड़ रहा है मुझे. यहाँ मुझे कुछ भी निश्चिंत, इत्मीनान और स्थिर नहीं दिख रहा, लगता है जैसे यहाँ का सब कुछ लट्टू की तरह नाच रहा हो. मुझे बहुत घबराहट होती है और तुम्हें अपने पास देखने के लिए मन व्याकुल हो जाता है. मेरे उपन्यास का क्या हुआ, बतलाना.’’ पावस ने मन ही मन ध्वनि की मनःस्थिति का अनुमान लगाया...आदमी कभी-कभी परिस्थितियों के मारे कितना लाचार हो जाता है. उस पराए मुल्क में ध्वनि कितना अकेलापन और उदासी झेल रही होगी. बेटे की ख़ुशी के लिए चली तो गई मगर गौरव के घर में नहीं रहने पर वह एक बीरान मरुभूमि बन जाती होगी. सोचते हुए अनायास पावस की आँखें भर आईं. उसने उसे समझाते हुए और तसल्ली देते हुए पत्र लिखा,‘‘थोड़े ही दिनों में सब कुछ ठीक हो जाएगा. गौरव वहाँ के वातावरण का अभ्यस्त बन जाएगा, उसके कुछ दोस्त बन जाएँगे, परिचय का एक वृत्त तैयार हो जाएगा, फिर तुम, स्वदेश वापस आ जाओगी तो उसे कोई असुविधा नहीं होगी. तब तक मैं तुम्हारे आने का इंतजार कर लूंगा. तुम्हारे लिए मैंने अपने घर में ढेर सारी जगहें तय कर रखी हैं और ढेर सारे इंतजाम कर रखे हैं. ये जगहें, ये इंतजाम तुम्हारे आने के मुंतजिर हैं. तुम्हारा उपन्यास ‘जलकुंभी’ जल्द ही छप जाएगा. प्रकाशक को मैंने पत्र लिखा था. छपते ही उसकी प्रतियाँ मैं तुम्हें भिजवा दूँगा.’’ कुछ ही सप्ताह बाद ध्वनि ने फ़ोन किया,‘‘पावस, प्रकाशक से मेरा उपन्यास ‘जलकुंभी’ वापस ले लो...उसका एक अंग्रेज़ी प्रकाशक मिल गया है. अतः पहले इसका प्रकाशन अंग्रेज़ी में होगा. एक लाख डॉलर की अग्रिम रॉयल्टी पर अनुबंध हो गया है. अब मुझे अमेरिका बहुत अच्छा लग रहा है. जानते हो पावस...अब मेरी किताब पूरी दुनिया में छा जाएगी...देखना, मेरा नाम रातोंरात सुर्खियों में होगा. तुम जो उपन्यास लिख रहे थे ‘हर डाल पर उल्लू’ उसे भी हिंदी में मत छपवाना...उसका अनुवाद मैं करूंगी. वह भी अंग्रेज़ी में छपेगा. उसकी पांडुलिपि मुझे शीघ्र भेजो...प्रकाशक उसे देखना चाहता है. ऐसे मैं तुम्हारे उपन्यास के बारे में जितना जानती थी, बता चुकी हूँ. उसने कहा है कि इंडिया के जो हास्यास्पद और विचित्रता भरे फूहड़ और काले पक्ष हैं, उन्हें ज़्यादा फोकस करो...उन्हें इंक्लूड करो...वहाँ का सेक्स ...ग़रीबी...अंधविश्वास....आडंबर...छुआछूत...जादू-टोना...ओझा-डायन...’’ पावस तिलमिलाकर रह गया जैसे कोई प्रेत उसे अपना रक्तसना जबड़ा और पंजा दिखा गया हो. उसने एक पंक्ति में जवाब दे दिया,‘‘तुम्हारा उपन्यास मैंने प्रकाशक से वापस ले लिया है...उसकी जगह उसे मैंने अपना उपन्यास दे दिया है. मेरे इस उपन्यास का पहला प्रकाशन हिंदी में ही होगा. हिंदी में छप जाए तब हम आगे कोई फ़ैसला करेंगे.’’ ध्वनि उसे फ़ोन पर समझाने की कोशिश करने लगी,‘‘इतने बड़े अवसर को तुम हाथ से न जाने दो. धन भी और यश भी एक साथ नहीं मिलता किसी को. प्रकाशक चाहता है कि तुम यहाँ आकर ख़ुद ही अनुबंध पर हस्ताक्षर करो. मैं पूरा मार्ग-व्यय भेज रही हूँ. तुम्हारे आने में मैं अपना स्वार्थ भी देख रही हूँ. तुम आ जाओगे तो लगेगा जैसे पूरा इंडिया मेरे पास आ गया. मेरे अच्छे पावस..आ जाना...ना मत करना प्लीज...’’ पावस ने डॉलर लौटाते हुए लिखा,‘‘एक बार विदेश-भ्रमण की हसरत तो ज़रूर है लेकिन इस तरह इतना बड़ा दाम चुकाकर नहीं.’’ ध्वनि रोज़ उसके नाम ई-मेल करने लगी,‘‘देखती हूँ तुम कब तक नहीं मानते. दूर हो गई हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हें कुछ भी कहने का हक मुझे नहीं रहा. मैं चाहूँगी कि तुम मेरे ई-मेल का जवाब रोज़ ई-मेल पर दिया करो.’’ पावस ने लिखा,‘‘ई-मेल मुझे बहुत यांत्रिक लगता है, इससे मन नहीं भरता. कंप्यूटर है भी नहीं मेरे पास. मुझे तो तुम्हारे हाथ के लिखे पत्र से ही तृप्ति और अपनत्व मिलता है.’’ ध्वनि का जवाब,‘‘पावस, अब लंबा पत्र लिखने का न तो जमाना है, न हमारी उम्र और ना ही फुर्सत!’’ ध्वनि भला क्यों मानने लगी. उसने पावस की बेटी श्रुति को पत्र लिखा,‘‘श्रुति, पावस तुम्हारी बात मानता है...समझाओ उसे...ज़िंदगी भर कलम घिसकर क्या कमा लिया उसने! यह तो सरासर एक मूर्खतापूर्ण और बचकाना फितूर है कि अंग्रेज़ी में छपने से जाति और धर्म बदल जाएगा...उससे उसकी भाषा और देश छीन जाएगा. कहो उससे कि उसूलों का मुखौटा मुझे न दिखाए और अपने नए अप्रकाशित उपन्यास की पांडुलिपि भेज दे...कई लाख रुपए उसे रातोंरात मिल जाएंगे.’’ श्रुति ने जवाब दिया, ‘‘आंटी, मैंने पापा से इस बारे में बातें की. मुझे पहले लगता था कि वे ज़िंदगी भर पैसों के लिए कवायद करते रहे और लिखने के पीछे पैसा कमाना भी उनका एक उद्देश्य रहा. लेकिन मेरा यह सोचना ग़लत था आंटी. पापा पर मुझे बेहद गर्व हो रहा है, चूंकि पहली बार मुझे पता चला कि वे पैसे और शोहरत के लिए नहीं बल्कि एक मकसद के लिए घिसते-पिसते रहे. पैसा उन्हें नहीं चाहिए आँटी... कहते हैं पैसा ही लक्ष्य हो तो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ क्या बुरा है...मिनटों में लखपति तो बना ही जा सकता है. अपने उपन्यास का पहला प्रकाशन वे हिंदी में ही कराएंगे ताकि उसे हिंदी उपन्यास होने का ही दर्जा मिले. इसके बाद भले उसका अनुवाद दूसरी किसी भाषा में छपे.’’ ध्वनि को बहुत कोफ़्त हुई...एकदम भन्ना गया उसका मन. संवाद तो पहले ही विरल हो गया था अब उसमें और कमी आ गई. पावस साइबर ढाबा में जाकर हमेशा ई-मेल चेक करता रहा और उसे खाली पाया. अपनी ओर से तब भी वह लिखने से बाज नहीं आया. एकतरफा वह लिखता रहा. लगभग डेढ़ साल बाद एक दिन अचानक कोई उसे ढूंढ़ते हुए उसके घर आया और उसने अपना नाम गौरव बताया. एक खुशी कौंध गई उसके भीतर यह सोचकर कि बेटे के साथ ज़रूर ध्वनि भी आई होगी. मगर गौरव ने बताया कि वह अकेले ही आया है और उसके लाख कहने पर भी उसकी माँ नहीं आई. एक गहरी मायूसी में घिर गया पावस. गौरव ने पावस के कमरे को देखा और हैरत से भर उठा. उसकी माँ अर्थात ध्वनि की स्मृतियाँ कमरे में चारों ओर बहुत करीने से सहेजी हुई थीं...दीवारों पर कई मुद्राओं वाली उसकी तस्वीरें, मेज पर उसकी किताबें और एक कोने में रखे एक बोर्ड पर उसकी कई प्रकाशित कहानियों के पहले पृष्ठों के कोलाज. इस दीवानगी पर गौरव का हृदय भर आया. उसने बहुत अफसोस जताते हुए कहा,‘‘अंकल, ममा बहुत बदल गई है वहाँ... इतना कि अब मुझे भी पहचानने में तनिक दिक्कत होती है. उसके कई नए दोस्त बन गए हैं. पाश्चात्य रंग में बहुत तेज़ी से रंग लिया है उसने ख़ुद को. चाहिए था कि नई उम्र के जोश में पश्चिम की हवा में मैं बह जाता और वह मुझे बरजती-चेताती, मगर यहाँ उल्टा हो गया.’’ एक आघात लगा पावस को...ज़िंदगी का पूरा जमा एकाउंट इस तरह गड़बड़ मानों कंप्यूटर में किसी वायरस के कारण पूरी फाइल करप्ट हो गई हो, उसका कंठ अवरुद्ध हो गया...बहुत देर बात कराहते हुए पूछा उसने,‘‘मेरी चिट्ठियाँ तो वहाँ जाती होंगी, वह पढ़ तो लेती है न!’’ ‘‘मैं आपको झूठी सांत्वना नहीं दूँगा अंकल, मुझे नहीं लगता कि पढ़ती होगी. आपकी चिट्ठी के पढ़ने के बाद उसमें एक स्फूर्ति भरा उल्लास उतर आता था, जिसे मैं देखकर ही पहचान जाता था. इधर महीनों से मैंने ये उल्लास नहीं देखे. अब वह फुर्सत में रहती ही कहाँ है! मीटिंग...सेमिनार...डिबेट...पार्टी...उसकी किताब छप गई है और वह इन दिनों चर्चा में है.’’ पावस में सन्नाटा और गाढ़ा हो गया...किताब छप गई और उसने एक प्रति भी भेजना ज़रूरी नहीं समझा! पहले किताब की सबसे पहली प्रति उसके नाम समर्पित की जाती थी. आज उससे फुर्सत नहीं है...यह शब्द फुर्सत सचमुच कितना समय सापेक्ष है. आदमी की अपनी ज़रूरत के अनुसार इसकी प्राथमिकता बदल जाती है. मन में वह विचार करने लगा...क्या याद दिलाए ध्वनि को कि कभी उसने कहा था, ‘‘तुम्हें नाराज़ कर दिया, तो यह तुमसे नहीं ईश्वर के प्रति कृतघ्नता और वादाख़िलाफ़ी होगी.’’ ‘‘तुम मेरे सौरमंडल के सबसे बड़े प्रकाश हो.’’ ‘‘तुमने मेरे मन-प्राण पर एक शिलालेख अंकित कर दिया है...और ध्यान रखना कि शिलालेख एक ही बार लिखा जाता है...बार-बार नहीं.’’ आज ये सारे छंद, सारी सूक्तियाँ, सारे मुहावरे, सारे आप्त वाक्य कितने बेमानी और खोखले से लग रहे हैं. यह सब याद दिलाने और उनकी दुहाई देने का शायद अब कोई मतलब नहीं था. आज एकदम अप्रासंगिक हो गए थे वे लम्हें जब ये वाक्य उच्चरित हो रहे थे या लिखे जा रहे थे. यह सब जिसने कहा था उसका नाम तब ध्वनि था... वह ध्वनि अब साउंड बन गई है, जिसका ज़्यादा अर्थ शोर और कोलाहल होता है. पावस ने अपने नवीनतम उपन्यास ‘‘हर डाल पर उल्लू’’ की एक प्रति सेल्फ से निकालते हुए कहा, ‘चंद रोज़ हुए, यह पुस्तक छपकर आई है. गौरव, तुम मेरी ओर से पहली प्रति अपनी माँ को दे देना...’’ पन्ने पलटकर पावस ने कलम से उस पर कुछ लिखना चाहा, तभी उसकी आँखों से आँसू की कुछ बूंदे टप-टप करके चू पड़ीं. पावस ने कलम बंद कर दी...अब लिखने की कोई ज़रूरत नहीं है...जो वह लिखना चाहता था, उससे कहीं ज़्यादा वजनदार और हृदयस्पर्शी अर्थ आंसुओं ने उकेर दिए पन्नों पर. अगर हृदय की भारतीय वर्णमाला अब भी ध्वनि को याद होगी तो इस अश्रुलिपि को वह ज़रूर पढ़ लेगी. | इससे जुड़ी ख़बरें दबी हुई एक लहर23 नवंबर, 2006 | पत्रिका तीन मौन दृश्य और एक पीला फूल23 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका मन्नो का ख़त15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका देखते-देखते25 जनवरी, 2007 | पत्रिका कहानी - बुआ01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका चश्मा05 जनवरी, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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