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हमहुँ मेला देखे जाबै | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहानी हममें से किसी के पास समय नहीं था कि हम अपने जीवन के असली नाटकों को जी सकें, जो हमारी नियति में लिखे थे. यही चीज़ हमें बूढ़ा बनाती है सिर्फ़ यह और कोई नहीं. हमारे चेहरों की झुर्रियाँ और सलवटें उन विराट उन्मादों, व्यसनों और अंतर्दृष्टियों की ओर संकेत करती हैं, जो हमसे मिलने आए थे और हम घर पर नहीं थे. मेरे साथ-साथ वृद्ध होओ तार पर धागे से मढ़े दानेदार पावर काँच के चश्मे को आँख पर चढ़ाकर भगीरथ काका ने दिन और और मौसम को पढ़ा. आज चश्मे के दोनों के बीच से धुंध की झिलमिलाहट कम लग रही थी. दिन के न जाने कितने बज रहे थे. सूरज देवता भगजोगनी की तरह कभी लुप से चमक जाते तो कभी पिछले 15 दिनों से छाए कोहरे में समा जाते थे. बचा रह जाता था उनके घाम का क्षीण सा अहसास. जाड़े का मौसम, शीतलहरी और कोहरे के साथ हम बूढ़-पुरनियों पर ऐसा कहर बरपाता है कि क्या कहें. न सहते बनता है, न मरते बनता है, सोचते हुए भगीरथ काका ने सामने रखी बोरसी में बुझते कौड़े को उंगलियों से खखोलकर जिलाने की जुगत में धान की भूसी छिड़की. भूसी छिड़कते हुए उनको हवन करने का आनंद आया. भूसी पाकर बोरसी की बुझती आग लहक उठी. भागीरथ काका उसकी लाल लहक में मुँह गाड़कर नथने से लेकर ललाट तक गरमाने में लग गए. भगीरथ काका जब बाहर से देह गरमा चुके तब उन्हे हुक्के की सुध आई. ‘‘नीतू, अरे! बचिया नीतू तन्नी गुड़गुड़ी ले आव’. उन्होंने अपनी मुँहलगी नतिनी से गुहार लगाई. "अब्बे ले आय रहे हैं", बाबा की टेर लगाते हुए काले पके नारियल खोपड़े पर मढ़े हुक्के समेत तम्बाकू की थैली उसने भगीरथ काका के सिरहाने रख दिया. भगीरथ काका हुक्के को सुलगाने की तैयारी में जुट गए. पहले-पहल डाँडी से चिलम उतारकर उसमें से रात की बची राख को भिटके पर उलट कर साफ़ किया. बोरसी में से कंडे का एक गरमा-गरम पलका चिमटी से उठाकर चिलम पर चढ़ाने के बाद मसाने को रगड़ने, छाँटने और निबारने में मशगूल हो गए. 'क्या ज़माना आ गया गुड़गुड़ी का मसाला जवन है तवन पहिले एक पइला अनाज में इतना मिलता था कि तीन दिन और चार रात चल जाता था. अब नगदी दो रुपया दो तब भी दो टाईम चलने भर नहीं मिलता.' भगीरथ काका का मन भटकते-भटकते बचपने में जा समाया. बाबू पइला भर अनाज थमा के कहते 'जा शिवधारी साव के हियाँ से गुड़गुड़ी का मसाला लई आवा.' शिवधारी की काली और मोटी देहाकृति भी स्मृति में डूबे भरीरथ काका जब तक उबरते तब तक चिलम पर रखा पलका ठंडा हो गया था. बल्कि राख हो गया था. ‘ख़ैर तमाखू तैयार है ’-बुदबुदाते हुए, उन्होंने बोरसी से दूसरा पलका चिलम पर चढ़ा लिया था. हाथ से हौंक कर लाल करके इस पर तमाखू छोड़ दिया. तमाखू की तीखी गंध नाक में भरते ही, गुड़गुड़ी की नलकी दोनों ओठ से दाबकर धीरे-धीरे खींचने लगे. धुआँ एकसार होते ही जमकर कश लगाया और नाक-मुँह से धुआँ उगलते हुए, उन्होंने फिर से मिचमिचाती आँखों को चश्मे के दानों के बीच साधा. कोहरा छँट गया था. नरम-गरम धूप से नीम पेड़ के पत्तों से टपकती ओस-बूंदों की पट-पट की ध्वनि हुक्के की गुड़-गुड़ की आवाज़ से संगत करती सी लग रही थी. धुँधआती आँख पर से चश्मा उतारकर चेहरे को रगड़ते हुए भगीरथ काका नाक को सहलाने लगे. चश्मे की कमानी के निसान, जो नाक पर गहरी लकीर में बदल चुके थे, पर उनकी उँगलियाँ ठहर गईं. बीस बरस हो गया इस गोल-गोल तार की कमानियों में मोटे पावर काँच वाले चश्मे को उनकी आँख पर चढ़े. बीस सालों में चश्मे के काँच झरते-झरते कई छोटे-छोटे दानों से भर गए हैं. ठीक ही तो है. जब चेहरे से शुरू हुई झुर्रियाँ पूरी देह में पसर गई हैं, तो चश्मे के काँच झरें तो क्यों न झरें. राख हो गया था हुक्के का तमाखू. जिसके कसैले स्वाद से भरी खांसी का ठसका छाती से उठते ही भगीरथ काका सोच की दुनिया से बाहर निकले.
बाबा गमछा, बंडी अऊ धोती कुल लाय दिए हैं. जाव नहा आओ-नीतू की आवाज़ सुनने के बाद उनको नहाने की सुध आई. नहाने की बात से भगीरथ काका एक बार फिर डूब गए बचपन की यादों में. सिरचन भर उन्हें याद आए. सिरचन को संक्राँति के दिन नहवाने में पूरी भरौटी लग जाता था. धरिया-हो...,पकड़ा भागे न पाए जैसे जुमलो से शुरू होता था सिरचन को नहवाने का परब. सिरचन की गजबें मानुस थे. जब तक जिए साल में एक दिन वो भी लोगों की बरियासी से नहाते थे. नहीं, साल भर काँख से, बंडी से या फिर जंघिया से चिल्लर काढ़ के नख पर रखकर चट-चट मुँआते रहते थे. संक्राँति, माने खिचड़ी, माने सूरज देवता से मकर में प्रवेश का दिन. इसी दिन सरचन काका नहा के साफ़ होते और नया कपड़ा पहिनते तो फिर अगली खिचड़ी में ही उतारते थे. मकर-संक्राँति से पन्द्रहियों दिन पहिले से माई तिल और गुड़ के जुगाड़ में लग जाती थी. बाबू घर भर की खातिर नया कपड़ा के फेर में पड़ जाते थे. वैसे तो बाबू कम बेसी करके दशहरा और होली में भी नए कपड़े खरीदते थे, लेकिन संक्राँति में घर भर को नया कपड़ा मिले ही इसका ध्यान ज़रूर रखते थे. और तो और बहिन के ससुराल भी खिचड़ी भेजना अनिवार्य था. भगीरथ काका को बचपन की यादों से नीतू की आवाज़-नहा लिए का बाबा ने खींचा. गुड़गुड़ी को ताजा करते हुए भगीरथ काका ने कहा कि का बताएं, बचिया अपनी लड़िकाई में हेरा गए रहे. अच्छा किया जो तूने हमें खोज-बाहर किया. क्या जमाना रहा वो, बाबू गाँव भर का हल-फार तैयार करते रहे, तब कहीं खेत खनाए और खेती होवै. अगहनी और बैसाखी खेती के मौसम में तो बाबू को पुकारते लोगों का हुजूम लगा रहता था. उद्धब बाबा हो या फिर का भइया उद्धव खाली हऊव्वा, की आवाज़ों से ये छोटा सा सहन भर रहता था. तब पैसे की बात कहाँ होती थी बचिया. बस घर पीछे पसेरी नाज साल में दो बार आता था. भगीरथ काका गुड़गुड़ी के गुड़गुड़ में डूब गए. उनको इसका भी भान नहीं रहा कि नीतू कबकि अंदर समा गई है. घाम तनिक चटक हुआ तो भगीरथ काका चौकी से उतर कर ओसारे से बाहर निकले. कंधे पर गमझा, एक हाथ में लोटा-बल्टी और दूसरे हाथ में धोती-बंडी लटकाए चांपाकल की ओर चल पड़े. दुपहर एक दम खड़ी थी. चांपाकल सूना पड़ा था. चांपाकल का गोल चबूतरा सूखा और चक्क साफ़ था. कल के नल के नीचे बाल्टी रखकर भगीरथ काका धीरे-धीरे चांपाकल के हैंडिल को चलाने लगे. बाल्टी में गिरते पानी की छुल्ल-छुल्ल की आवाज़ में रहट के कल-कल करते पानी का संगीत तलाशते भगीरथ काका की नज़र खंडहर हो चुके जगन बाबा के कुएँ की तरफ चली गई. इसी कुएँ में लगी ती रहट. गोल-गोल घूमता था बैल जिसकी गति से रहट के डिब्बों में भरा पानी ऊपर आता और खाली डिब्बे पानी में बुड़ते जाते थे. जंगन बाबा की गालियों के साथ नहाने का स्वाद भगीरथ काका के पोर-पोर में भर गया था. उनकी जवानी तक को टयूबवेल, पंप आ गया था और अब चांपाकल. जमाना बदलता गया. बदले जमाने के ये लड़के पुरानी चीज़ों, पुराने लोगों और त्योहारों के पुराने तरीकों को निबाहने में ऐसी कोताही दिखाते हैं कि क्या कहें. अपने लड़के की बातों की याद कर भगीरथ काका जमाने के बदलाव को महसूस -- रहे थे. संक्राँति में बेटी को खिचड़ी भेजने की बात करने पर बड़के ने कहा कि अब, कहाँर कहाँ से लाएँ, खिचड़ी पठाने के लिए फिर बाज़ार से नए कपड़े खरीदो. मन दो मन अनाज दो, ऊपर से तिलवा, फल और न जाने कितने टिटिम्मे करो. अढ़ाई सौ मनीआर्डर करके छुट्टी लेना ही ठीक होगा बाबू जी. फिर उठी घर के लोगों के लिए नए कपड़ों की बात तो उनसे जवाब दिया कि नया कपड़ा पहिन के तिलवा और चूरा फाँकने के ढकोसले से निजात पाने की ज़रूरत है. हाँ, जिनके कपड़े फट गए हैं, उनके लिए कपड़े ले आऊँगा. भगीरथ काका बड़के की बातों से आहत थे. बोले कुछ नहीं. ऐसा नहीं है कि भगीरथ काका के जीवन में कठिनाई नहीं आई. गाँव में तीन-चार ट्रैक्टर क्या हुए लोगों ने हर-फार सुधरवाना और गढ़वाना कम कर दिया. ट्रैक्टर से जुताई और हेंगा सब जल्दी और आसामी से जो होने लगा था. तब उन्होंने पीढ़े, खंटी और आलमारियाँ बनाकर उसकी भरपाई की थी. ये सब सामान कभी कभार ही बिकते थे. बिकते तो हाथ में पैसा आ ही जाता था. उन पैसों में से तीज-त्योहार के लिए चार पैसे अलग छोड़े जाते थे. इन पैसों को कोई बड़ी मुसीबत न आए तो छुआ नहीं जाता था. हाँ, दशहरा, होली में नए कपड़ों और रंग-संग के काम में ये ही पैसे आते थे. संक्राँति में सबके लिए मोटा-झोटा ही सही वे नए कपड़े ज़रूर लाते थे. जब तक उनका जांगर चला बड़के के ना-नुकुर की भरपाई वे ख़ुद करते थे. अब लाचार हो गए हैं. हाथ-गोड़ में दम जो नहीं रहा अब. इन दिनों तो उनको भी उसी ना-नुकुर के आसरे जीवन के बचे दिन काटना है. उसी की मनसा को मानना है. चलो हम पुराने हैं, सो पुराने कपड़े पहिन लेंगे. बच्चे उनको तो नया कपड़ा मिलना ही चाहिए. न सही बंडी-धोती, एक गमछा तो नया ले ही लेना है. भले गुड़गुड़ी के तमाखू में कमी कर लेंगे. भगीरथ काका नहाकर लोटा-बाल्टी लेकर और कंधे पर भींगे लटकाए बीती बातों पर विचार करते घर की ओर चले जा रहे थे. पुराने कपड़ों के फटने के बाद नए कपड़े की बाद याद आते ही भगीरथ काका मकर-संक्राँति के आने का दिन गिनने लगे. ऊँगलियों के पोरों पर गिनकर उन्होंने आह भरी-बीस दिन. हाँ अभी बीस दिन बाकी है. शायद... उस दिन से भगीरथ काका गुड़गुड़ी तैयार करने में ख़ूब-ख़ूब समय लगाने लगे. जिससे तमाखू कम ख़र्च हो और बीस दिनों में कम से कम नए अंगोंछे के दाम बराबर बचत हो जाए. चांपाकल पर नहाने जाते तो बंडी और धोती कचारते समय कपड़ों को देर तक फींचते और पक्के पर पटकते थे. खंघारते समय बंडी को फैलाकर देर तक घूरते रहते थे. धोती को खूंट-खूंट करके चारों तरफ से परखते थे. उनके नहाने में होने वाली देरी आस-पास की औरतों और बच्चों को खलती थी. बूढ़-पुरनिया आदमी से बोले तो कौन बोले. एक दिन नीतू ने ही उनसे कहा कि बाबा अब से आप नराय के हट जाया करो. आपका कपड़ा हम फींच देंगे. उसकी बात सुनकर बाबा को लगा कि अब तो मेरी ख़ुशी भी हाथ से निकलने वाली है. उन्होंने नीतू से कहा कि, बचिया हम ही अपना कपड़ा फींचेंगे और कौनो काम तो करते नहीं यह तो करने दो. ‘‘बाबा आप बहुत देरी तक चांपाकल घेर कर रखते हैं न. इससे बाक़ी लोगों को दिक्कत होती है’’-नीतू ने उन्हें बताया. भगीरथ काका ने नीतू को आश्वस्त किया कि ठीक है, अब हम ध्यान रखेंगे. जब चांपाकल खाली हो तभी नहाने जाया करेंगे. लेकिन, अपना कपड़ा अपने ही हाथों से कचारेंगे और पसारेंगे. समझी न बचिया. भगीरथ काका इधर या तो भिनसारे या फिर खड़हौरी दोपहरी में नहाने जाने लगे थे. ये समय रहता था, जब चापांकल निरापद और सूना रहता था. हाँ, बंडी और धोती धोने का समय दिन-दिन बढ़ता ही जा रहा था. बंडी-धोती को पक्के चबूतरे पर वे ताकत भर पटकने का काम लगातार करते रहते थे. यह काम भगीरथ तब तक करते जब तक कि हँफनी न उभर जाए. हाँफते-हाँफते बंडी को पखारते और निरखते थे. फिर धोती को चौखुट फैलाकर घूरते और निराश भाव से नहाने में भिड़ जाते थे. बाबा का कपड़ों को कचारने की जिद्द नीतू को समझ में नहीं आ रही थी. नीतू जब सोच-सोच कर थक गई, तब उसने माँ से बाबा के स्वभाव में आए बदलाव की बात बताई. ‘‘बुढ़ भइलन सनक चढ़बै करता है इस उमिर में’’-कहकर हँसते हुए माँ ने उसकी शंका को टाल दिया. रात, बड़के खाना खाने धान के पैरा की चटाई से बनी आसनी पर बैठ गया. कांस की थाली में उसके सामने परोसा लगाकर नीतू की माँ बेना डुलाने बैठ गई. यह समय होता था पति-पत्नी में दिन भर के कामों का लेखा-जोखा करने का और आगे आने वाले समय में उठने वाले संकटों से बचने की योजना बनाने का. बेना से हवा करते हुए नीतू की माँ ने बताया कि अब बुढ़ऊ चांपाकल दिन-दिन भर घेरे रहते हैं. का त बंडी और धोती कचार रहे हैं. बड़के ने थाली से नज़रें उठाकर उसकी ओर देखते हुए ज़ोर से ‘हूँ’ की आवाज़ निकाली. फिर खाना समाप्त कर बाहर ओसारे में हाथ-मुँह धोने पहुंच गया. ख़ूब खल-खल की आवाज़ करते हुए गलगला करके मुँह साफ़ करने के बाद लोटा ओटे पर टिका दिया. पिता की खाट के पास जाकर खड़ा हो गया और भीतर दरवाज़े की ओर निगाह करके बहुत ही एहतियात के साथ धीमी आवाज़ में उसने कहा,‘‘जान-बूझकर पक्का पर कपड़ा पटक कर फाड़ने से नया मिलेगा, सो बात आप जैसे उमिर वालों के लिए ठीक नहीं है क्या? बुढ़ौती में नए वस्त्र की ख़ौफ आप ही में दिख रही है, और किसी में नहीं. ’’ खाट पर लेटे भगीरथ काका उठकर बैठ गए और दरवाज़े के भीतर घर में जाते बड़के की पीठ को घूरते रहे. भगीरथ काका देर तक करवट बदलते रहे. करवट बदलने से उकता जाने पर तीखी ठंड की परवाह न करके ओसारे से लेकर बथान टक टहलने लगे. रात ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी. संक्राँति पर्व अभी और कितना दिन है, गिनने की अब ज़रूरत नहीं थी. सातवें दिन ही तो है-बुदबुदाते हुए भगीरथ काका खटिया पर धम्म से बैठ गए. चश्मा सिरहाने की दीवार में बने ताखे में रखकर खटिया में फैल गए. ठंडाती बोरसी के नरमाती गर्मी का पीठ में एहसास करते हुए नींद बुलाने के लिए सूखी खरखराती ध्वनि के साथ निर्गुन गुनगुनाने में लग गए. सुबह नीतू बाबा के लिए दतुअन पानी लेकर आई तो पाया कि बाबा ओसारे में नहीं हैं. बाबा कहाँ गए की आवाज़ से बड़के को खटका हुआ. लुंगी की गांठ बांधकर अंगोछा कंधे पर डाल उनकी खोज पर निकल गया. पूछने-पाछने के बाद पता चला कि भगीरथ काका भरौटी में दिखे थे, वहाँ पता चला कि कह रहे थे कि हमके मजूरी चाही, केहू के काठ-कठवत बनवानै का है. भरौटी में काठ के सामान बनवाने की सामर्थ्य वाले लोग नहीं मिले जो भगीरथ काका नोनियापुरा की तरफ बढ़ लिए. ‘‘बुढ़ऊ सनक गए हैं का भाय बड़के!’’ जैसी सहानुभूति की बातों में छिपी तंजगी को भाँप बड़के चीखते-झींकते घर वापस आ गए. ‘‘भाय भाड़ में, बुढौती में गाँव भर डोल-डोलकर नाक उतारने में लगे हुए हैं. बाप हैं कि कसाई जायं भाड़ में’’ भगीरथ काका ने नोनियापुरा छान मारा, दुआर-दुआर टेर लगाते,‘‘अरे भइया केहुके मचिया, पीढ़ा, खूंटी, खटिया, कुछौ गढ़ावे का है का.’’ जहाँ-जहाँ गए तहाँ-तहाँ कुभाख मिला. कोई कहता सनक गए हो का काका, ख़ुद तो देह संहार नहीं पाते बसूला और आरी कैसे चलाओगे? भगीरथ काका जवाब में कहते थे अरे बचवा हाथ सधा हुआ है जो कहोगे सो करके दिखावेंगे. कौनो काम हो तो बतावो. दरवाज़े से उत्तर मिल जाता कि कौनो कान नहीं है काका, और तोहसे काम करवाए के पाप के भागी नहीं बनै का है.
भगीरथ काका ने हार नहीं मानी आखिर यादवों की बस्ती मठिया में खिड़की गढ़ने का काम मिल ही गया. खिड़की गढ़ने के दौरान अगल-बगल के लोग सस्ते में काम करते बुढ़ऊ भगीरथ को देखकर पीढ़ा, मचिया बनवाने के लिए पटरा और लकड़ी लेकर पहुँचने लगे. खिड़कियाँ गढ़ने के दौरान दो दिनों में भगीरथ काका दर्ज़न भर पीढ़े और छह सात मचिया बना लिए थे. बस्ती के लोग हैरान थे कि बुढ़ापे में कहाँ से इतना जांगर भर गया है भगीरथ में. तीसरे दिन काम ख़त्म करने तक भगीरथ काका की दसों उंगलियाँ लकड़ा गईं थीं. हाथ की गदेलियाँ छालों और घट्ठों से भर गई थीं. गमछें में पैसा बांधाना भी उनको कठिन लग रहा था. ओसारे में सुबह-सुबह खटर-पटर की आवाज़ सुनकर नीतू ने झांका तो देखा कि उसके बाबा बोरसी में आग ताप रहें हैं. खटिया पर सिरहाने नई धोती और बंडी पड़ी है. बगल में हरे-लाल छींटों वाली फ्राक और पीले रंग का स्वेटर भी रखा हुआ है. भगीरथ काका भोर में ही नहा-धोकर लौटे थे. चांपाकल के ताजे सुषुम पानी का अहसास उनके तन-मन में समाया हुआ था. ताखे पर बेरूखी से फेंके हुक्के की चिलम फूट गई थी. ताखे से हुक्का उतारकर नई चिलम फंसाते हुए भगीरथ काका लगातार मुस्कुरा रहे थे. नीतू दाना-चाय लेकर आई तो देखा कि बाबा गुड़गुड़ी सुलगाते हुए गा रहे हैं. अबिक हमहूँ मेला देखै जाबै, खिचड़ी के दिनवाँ ‘‘का बाबा बड़ा ख़ुश हैं आज’’ नीतू की बात सुनकर भगीरथ काका गुड़गुड़ी में तमाखू बुरकते हुए हँस पड़े. नाटकीय ढंग से उन्होंने नीतू से कहा कि का बताए बचिया नहाए के धोती पसारे रहे, भोला की गइया चबाय दी है. पहनने जोग नहीं रही धोती अब, एक बात अऊ बताएं बंडियों में छेद दिखा आज. नीतू भी उनके इस खेल में शामिल होकर ठठाकर हँसते हुए सिरहाने से नई धोती और बंडी उठाकर बोली,‘‘लो बाबा नई धोती और बंडी, खिचड़ी का पहिरावा.’’ भगीरथ काका ने दोनों हथेलियों को जोड़ा और फैला दिया. घाम का एक टुकड़ा छप्पर छेदकर उनकी घट्ठे और छालों भरी गदेलियों में समा गया. नए कपड़े की गंध ओसारे में भरी हुई थी. बड़के अंदर से निकला. भगीरथ काका को देखा. बिना कुछ पूछे-पाछे अपनी लकड़ी-कारखाने के लिए कस्बे जाने वाले रास्ते की ओर चल दिया. | इससे जुड़ी ख़बरें तारीख़ी सनद22 मार्च, 2007 | पत्रिका दीवार पर लटका शेर का सिर16 मार्च, 2007 | पत्रिका भारतीय वर्णमाला08 मार्च, 2007 | पत्रिका कहानी- नम्रता डर रही है16 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका तीन मौन दृश्य और एक पीला फूल23 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका मन्नो का ख़त15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका देखते-देखते25 जनवरी, 2007 | पत्रिका कहानी - बुआ01 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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