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शुक्रवार, 16 मार्च, 2007 को 07:14 GMT तक के समाचार
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दीवार पर लटका शेर का सिर

चित्रांकनः हरीश परगनिहा

कहानी

कहते हैं कि बहुत-बहुत दिन पहले देश में राजा-महाराजा होते थे, सचमुच के. आजकल तो भूतपूर्व होते हैं जिसमें से उन्हें भूत नहीं सुहाता सो ले देकर पूर्व ही रह जाता है.

इन पूर्व राजाओं के अलावा अभूतपूर्व होते हैं. वह राजा नहीं होते, राजा समझते हैं ख़ुद को. कहलवाते हैं, सुनते हैं और उसे सच समझते हैं. पहले तो ऐसों को विद्धान लोग मूर्ख समझते हैं फिर होते-होते मूर्खों की आबादी इतनी अधिक हो जाती है कि वह अपनी बोली-अपनी बानी छोड़ देते हैं और वही बोलने लगते हैं जो मूर्ख बोलते हैं. आख़िरकार रहना ही उनके बीच है! पहले कौए हंस की चाल चलने की कोशिश करते थे और कोशिश में अपनी भी भूल जाते थे और हंस की तो सीख ही नहीं पाते थे.

इस बात को मुहावरा बने बहुत दिन बीते अब तो हंस अकेला रहकर कौओं की जबान सीखने लगा है, ठीक नहीं बोल पाता तो कौए हँसते हैं-मूर्ख ढंग से काँव-काँव नहीं कर पाता. सुना है कि कौओं में आजकल कोचिंग का रिवाज़ हो गया है कि कौओं की जबान हंसों को सिखा सकें. हंसों को इस प्रशिक्षण की कीमत भी बाकायदा चुकानी पड़ रही है. हंस की गर्दन काट कर दीवार पर लगाने की चलन किसी ने शुरू नहीं किया! अभी तो यह जगह शेरों को हासिल है.

दीवार पर शेर का कटा सिर लटका हो तो बहुत सी बातें साफ़ हो जाती हैं कि घर किसी रईस का है, रईस शौकीन है, रसूख वाला है, घर बड़ा है, उसमें नौकर चाक़र वगैरह होंगे. फ्लैट तो हो ही नहीं सकता. ज़रूर कोई बड़ी सी कोठी होगी या पुरानी हवेली. पोर्ट में गाड़ी खड़ी होगी. द्वार पर चौकीदार/गार्ड होगा. बाहर लॉन में माली काम कर रहा होगा और मालकिन अगर सुघड़ होगी तो उसे सुपरवाइज़ कर रही होगी. न होगी तो कही गहने गढ़वा रही होगी या अपनी कमर की चर्बी घटाने का जतन कर रही होगी.

कहानी की नायिका है इस कोठी की मालकिन. कोठी की ड्राइंगरूम की दीवार पर शेर का कटा हुआ सिर लटका हुआ है. इसमें यह तो साफ़ ही है कि पैसा बहुत है. ख़र्च करना आना चाहिए. मालिक की और से कोई रोक-टोक नहीं है. इतनी देर से कहानी नायिका के नाम के बिना ही चल रही है. इस समय नामकरण की ही परेशानी है. लिखने को तो मैं असली नाम ही लिख दूं पर रिवाज़ यह है कि पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिया जाता है, स्थान भी बदल दें तो और अच्छा. नहीं तो मानहानि का मुकदमा सिर पर लिए-लिए कोर्ट-कचहरी और फिरो.

चित्रांकन-हरीश परगनिहा

नाम कमला-बिमला नहीं रख सकते. पिछली पीढ़ी में यह नाम दादी-नानी के होते थे, इसमें सेविकाओं के हो गए हैं. फूल पर ही नाम रखना हो तो चमेली, चंपा नहीं हो सकता. जूही-केतकी चलेगा. अरूणा-करूणा की इस पीढ़ी में शेर के कटे हुए सिर वाली कोठी की मालकिन का नाम वज़नदार होना चाहिए जैसे कि प्रियंवदा, प्रियंगुमंजरी, प्रफुल्लिता, सुभाषिणी, सुमधुरभाषिणी, सुखदा...

पता नहीं नाम किस सच्चे नाम से जा टकराए और झमेला हो जाए सो कथा नायिका को कोई नाम नहीं मिला है और गाड़ी ‘नायिका’ के सहारे ही खिंच रही है. नायिका ने अपने महल जैसे घर में लटके शेर के कटे सिर को देखा. फिर-फिर देखा. वह परफैक्शनिस्ट थी, घर महल जैसा हो, काम करने को कई-कई नौकर हों तो घर को लकदक चमकना चाहिए. अब यह काम नौकरों के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता. स्पष्ट आदेश देना होता है और सब ओर से नज़र रखनी पड़ती है कि काम ठीक हो गया कि नहीं!

शेर का सिर घर की दीवार पर लटका है लेकिन घर की मालकिन को पता नहीं है कि इसका शिकार किसने किया है, किस पुरखे ने, कितने साल पहले! मालिक को पता होगा लेकिन मालिक के पास समय नहीं है. समय नहीं है इसलिए मालकिन से संवाद नहीं है. उसका कारण यह है कि मालिक बहुत सफल व्यक्ति है. सफल हो और धनी हो तो वह समय के मामले में नितांत निर्धन होता है. चूंकि वह बीवी की सभी मांग पूरी करता है इसलिए वह आगे कुछ नहीं मांग सकती चाहे वह समय हो या संग.

सो नायिका बिना संग की संगिनी है. अपने महल की रानी बन कर वह अपना मन बहलाती रहती. वह घूम सकती थी, खा सकती थी, खरीददारी कर सकती थी, सखी-सहेलियों की पार्टी कर सकती थी, जो चाहे कर सकती थी. अपार पैसे की वह इकलौती स्वामिनी थी. चाहे जैसे ख़र्च करे. चाहे जितना ख़र्च करे. चाहें जिस पर ख़र्च करे.

 नायिका का कहना यही है कि शेर का शिकार करने शिकारी कितनी कोशिश करता है. पीछे-पीछे भागा फिरता है, मचान पर इंतज़ार में चौकन्ना बैठता है, आहट पर भी सावधान. गोली ठांय-काय और काट कर सिर टाँग दिया दीवार पर! उस पर मालिकाना हक, कब्ज़ा जो भी कहें उस कटे सिर को रोज़-रोज़ कौन देखता है

इसके बाद भी नायिका प्रसन्न नहीं थी. वह नाख़ुश थी. नाख़ुशी का कोई कारण भी उनके पास न था. जब वह इस हवेली उर्फ़ गोठी उर्फ़ महल उर्फ़ पैलेशियल हाउस की मालकिन न थी तब वह ख़ुश थी. किसी ख़ुशी के बिना. अब वह नाखुश थी किसी कारण के बिना.

नायिका सोचती. बहुत-बहुत सोचती. यही तो चाहती थी. ऐसा ही जीवन है. इतना ही पैसा. ऐसा ही लाइफ़ स्टाइल! फिर दुःख क्या है? इस हवेली उर्फ़ जो-जो और हो सकता हो उसकी मालकिन होने से पहले वह एक फ्लैट की मालकिन थी. विकास प्राधिकरण का एक एमआईजी घर, यानी मिडिल क्लास रहना. नायिका सुंदर थी. पढ़ी-लिखी थी. नौकरीशुदा थी. नौकरी एक बड़े मीडिया हाउस की. प्रखर और जानीमानी पत्रकार थी. भाषा पर अधिकार और आँख-कान खुले. दिमाग़ सोचने वाला. ख़ुद निर्णय लेने वाला. वह समझदार थी. ऐसा उसके घर और दफ़्तर वाले सब मानते थे. ब्याह रचाने की माता-पिता ने कोशिश की लेकिन वह कोई गुड़िया न थी. वह कोई गाय न थी कि किसी खूंटे से बंध जाती. वह चिड़िया न थी कि हवा की दिशा में उड़ जाती. ऐसा उसने अपने माता-पिता को बता भी दिया था कि शादी तो वह अपनी पसंद से ही करेगी और जब अपनी पसंद का लड़का मिल जाएगा तभी करेगी.

चित्राकंन-हरीश परगनिहा

किसी के हाथों बेचे जाने या किसी के साथ भाग जाने की संभावना या आशंका न थी और यह आशंका तो कत्तई न थी कि कोई उसे बहका ले जाएगा या भगा ले जाएगा. इन सब संभावनाओं को देखते हुए माता-पिता ने अपनी दुलारी कन्या की बात मान ली. ऐसा नहीं कि इसके अलावा कोई विकल्प न था, बल्कि इससे बेहतर कोई विकल्प न था. इसलिए.

सब तैयार थे. माता-पिता. कन्या. बस वर की तलाश थी. ऐसा जिस दिन आ मिले उसी दिन चट मंगनी पट ब्याह हो जाए. ऐसे वर को कोई ठाकुर-बामन तो ला न सकते थे. मैट्रीमोनियल या शादी डॉट कॉम या ऐसे किसी संपर्क से यह काम न सधना था. यह तो रास्ता ही अलग था जिसमें नायिका को कोई पसंद आना था. अब अपनी सुंदरता, योग्यता और प्रतिभा के साथ-साथ वह शोहरत के ऐसे पायदान पर खड़ी थी जहाँ सब बौने नज़र आते. अपनी योग्यता और अनुभव के चलते नायिका का कद ऊँचा और ऊँचा होता चला गया और लोग बौने होते चले गए. बौने और बौने. और-और बौने! पीठ पर सिल बाँध कर तो नहीं कूदा जा सकता. कोई मिलेगा, जब मिलेगा, तब मिलेगा. तब तक इंतज़ार. इंतज़ार और इंतज़ार.

नायिका हाथ में वरमाला लेकर स्वयंवर में आमंत्रित सब राजा-महाराजाओं को जाँचती परखती तो नहीं घूम सकती. हाँ! कोई जँचे तो एक कॉफ़ी पी जा सकती है, कहीं पार्टी-सभा-समारोह में मिले, किसी चित्र प्रदर्शनी में मिले. शास्त्रीय संगीत की किसी सभा में मिले. बात की तो पता चला कि लिफ़ाफ़ा ही लिफ़ाफ़ा है या पटाखा फिस्स. ऐसे में कोठी उर्फ़ हवेली का मालिक मिला. कई बार. बार-बार. राशन की दुकान, सब्जी मंडी, सिनेमा, पारिवारिक जागरण-कथा-कीर्त्तन में मिलने वालों में और अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों में, शास्त्रीय संगीत सभाओं में , कला और चित्र प्रदर्शनियों में मिलने वाली इंसानी नस्ल और किस्म अलग-अलग होती हैं. यह प्रतिभा थी, वह वैभव. शौक दोनों के एक. वह अंतर्राष्ट्रीय कवरेज के लिए जा रही होती और वह बिजनेस टूर पर. नायिका ने देखा कि व्यापार करता ज़रूर है पर न तो रुपयों की थैली है, न धान का बोरा. केवल रुपए गिनने या रुपए कमाने की मशीन भर नहीं है. ओके. पास.

नायिका भी उन धनी थुलथुल सेठानियों से अलग है जो ब्याह के समय धनी पिताओं की सुंदर बेटियाँ होती हैं. वह सिंगार पिटार और गहनों का शोरूम भर आती हैं. जिन्हें दीन दुनिया का पता नहीं होता कि हो क्या रहा है. नायिका को देखिए-सर्वगुण संपन्न है. रूप है, गुण है, बुद्धि है, यश है. मुँहमाँगी दुआ है-‘रूप देहि, यशो देहि...’ लीजिए इधर दुआ की, उधर कबूल की. सबने सराही कि मेड फॉर ईच-अदर!

चित्रांकन-हरीश परगनिहा

हनीमून पीरियड ख़त्म होते न होते पैर ज़मीन पर आ गए. बिजनेस वाला तो बिजनेस करेगा ही. पर इतने पैसों के बाद नौकरी की ज़रूरत क्या है! क्यों मारी-मारी फिरना चाहती हो?

‘मैं मारी-मारी फिरती हूँ?’

‘‘यार! क्या पैंतालीस-पचास हज़ार के पीछे परेशान होती हो! इससे ज़्यादा मैं तुम्हें पॉकेटमनी दे दूंगा.’’

निकलते आदमी दाता हैं. मालिक हैं. डोर के साथ उड़ो! दंभी पुरूष. अब सब जानते हैं कि ब्याह शादी में प्रतिभा और कला की परख का क्या काम है! पति की सेवा करो और बस...दरअसल सेवक-सेविका भी सब हैं और जेब में पैसा-धेला हो तो आन की आन में इंदरसभा जुड़ जाए अप्सराओं समेत! राजा इंदर अगर उर्वशी को घर में डाल भी देतें तो क्या मेनका-रंभा को स्वर्ग निकाला दे देंगे. प्रतिभा वगैरह के नीच औरत ले-देकर अपने औरतपन से आज़ाद नहीं होती. अब हर आदमी तो हर समय बीवी को मुकुट बना कर सिर पर धरे नहीं डोल सकता न! औरत को अपनी जगह पहचाननी चाहिए.

नायिका ने अभी-अभी अपनी जगह पहचानी है, ‘‘दीवार पर जो शेर का कटा सिर लटका है न ठीक वही जगह नायका की है.’’ मुझे तो वहाँ नायिका का कटा सिर लटका नहीं दिखाई देता. पर नायिका का कहना यही है कि शेर का शिकार करने शिकारी कितनी कोशिश करता है. पीछे-पीछे भागा फिरता है, मचान पर इंतज़ार में चौकन्ना बैठता है, आहट पर भी सावधान. गोली ठांय-काय और काट कर सिर टाँग दिया दीवार पर! उस पर मालिकाना हक, कब्ज़ा जो भी कहें उस कटे सिर को रोज़-रोज़ कौन देखता है.

नायिका सफाई करवा रही है. मालिक टूर पर है. वह मुझे दीवार पर लटका सिर दिखा रही है.

मुझे नहीं दिखाई देता. दीवार ख़ाली है. औरत की कहानी जो पानी पर पानी की लकीरों से लिखी जाती है! वह कहती है दीवार पर जहाँ शेर का कटा सिर लटका है ठीक वहाँ...

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अलका पाठक
2-सी, सूर्य अपार्टमेंट्स
सैक्टर-13, रोहिणी
नई दिल्ली-110085

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