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शुक्रवार, 16 फ़रवरी, 2007 को 06:44 GMT तक के समाचार
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कहानी- नम्रता डर रही है

रेखांकन- हेम ज्योतिका
नम्रता आजकल बहुत परेशान रहती है. हर आहट पर, मामूली खटके पर चौंक उठती है. ज़रा-ज़रा सी आशंका पर घबरा जाती है. बात-बेबात चिंता की गिरफ्त में आ जाती है. एक तरह से नम्रता दहशत के साए में घुट रही है.

इस डरी-डरी नम्रता ने ऐसा कोई अपराध नहीं किया है कि वह उसकी सज़ा से डर रही हो. न किसी से ऐसी कोई बैर या दुश्मनी कि उसके बदले की कारवाई से डर रही हो वह. वह तो हर किसी से सदैव कुछ ज़्यादा ही कोमलता से पेश आती रही है.

मगर सच में, नम्रता बहुत-बहुत डरी है...

उस रात इरा और मीरा दोनों सो गई थीं. जतीन भी लेट गया था. नम्रता ने बिस्तर पर आकर लाइट बुझाई. अभी ठीक से तकिए पर सिर भी नहीं रखा था उसने कि एक आशंका आ गई. उठकर उसने लाइट जलाई. दरवाज़े-खिड़कियों की सिटकनी चेक की. सभी ठीक से लगे ही हुए थे. वह फिर बिस्तर पर लौट आई और लाइट बुझाकर चित लेट गई.

कुछ क्षण बाद उसके बाएं गाल पर जतीन की काँपती हथेली की गर्मी महसूस हुई. उसने उसकी तरफ़ करवट ली. अगले क्षण उसका सिर जतीन के सीने की बगल से लगा था. जतीन उसी तरह अपनी गर्मी से राहत देने की कोशिश करता रहा.

 रात गहरा गई. निंदिया आ गई. काली बिल्ली शेर बनने लगी. अचानक एक दुःस्वप्न के बीच नम्रता की नींद टूट गई. जाड़े की रात में भी वह पसीना-पसीना थी. काँपते हाथों से उसने लाइट जलाई. बारी-बारी इरा, मीरा को देखा.

रात गहरा गई. निंदिया आ गई. काली बिल्ली शेर बनने लगी. अचानक एक दुःस्वप्न के बीच नम्रता की नींद टूट गई. जाड़े की रात में भी वह पसीना-पसीना थी. काँपते हाथों से उसने लाइट जलाई. बारी-बारी इरा, मीरा को देखा. दोनों की नाक के पास हाथ ले जाकर साँसों का मुआयना करने के बाद ही वह आश्वस्त हो पाई.

‘‘क्या हुआ नम्रता?’’ मामूली आहट पर ही जग चुके जतीन का स्वर आया.

‘‘कुछ नहीं!...सपना!...काली बिल्ली!...’’ नम्रता की लड़खड़ाई आवाज़.
‘‘कोई बात नहीं, पानी पी के सो जाओ!...’’
पानी पीकर फिर लेट गई नम्रता, मगर नींद ग़ायब हो गई थी.

करवटें बदलते काफ़ी रात गुज़र गई, तब जाकर सुबह के क़रीब फिर निंदिया आई थी.
सात बजे के क़रीब जतीन ने जगा दिया था उसे....वरना ख़ुद तो परेशान होती ही, इरा, मीरा की स्कूल-बस भी छूटती!...ख़ैर.

इरा, मीरा को स्कूल-बस चढ़ाते समय रोज़ की हिदायतें दोहराने में भूल नहीं की नम्रता ने. लौटकर ख़ुद भी झटपट तैयार हुई. आधा घंटा बाद ही उसकी ऑफ़िस बस आती थी.

बिस्तर पर बैठा अख़बार पढ़ रहा जतीन ने नम्रता को मुस्कुराकर विदा किया. बदले में मुस्कुराने का उसका प्रयास असफल रहा. यह अहसास देर तक नम्रता के भीतर कचोट पैदा करता रहा.

बस में बैठी नम्रता देर तक जतीन के बारे में ही सोचती रही.

...पहले जतीन भी उसी की तरह वक़्त पर दफ्तर जाता था. पाँच साल पहले एक सड़क दुर्घटना में उसकी दोनों टाँगें चली गईं. बिस्तर पर बैठे-बैठे, कैनवस पर ब्रश चलाते, रंगों और रेखाओं की एक नई दुनिया सजाते ख़ुश दिखने लगा था वह. नम्रता कब से सोच रही थी कि उनके चित्रों की एक शानदार प्रदर्शनी लगाए. लेकिन जतीन के पास वह कभी मन की वह इच्छा भी नहीं रख पाई थी...

बस रेड-लाइट पर रुकी थी. बस के भीतर तब नगर-भर में दहशत पैदा करने वाली ख़बरों पर चर्चा गर्म थी. नम्रता को अपने घर में घुस आई काली बिल्ली डराने लगी थी.

सहसा उबासी लेती नम्रता ने अजीब तरह से थकान का अनुभव किया.

अब उसका ऑफ़िस क़रीब आ गया था. सो उसने घर के डर को भूलने का प्रयास किया. मगर अगले ही पल इरा, मीरा का ख़याल आ गया जो ऑफ़िस के दरवाज़े तक उसके साथ रहा.

काउंटर पर खड़े कस्टमर को निबटाते वर्किंग ऑवर कैसे बीत गया, उसको पता भी नहीं चला. सिर्फ़ यह एक समय होता था जब वह सारी चिंताओं से मुक्त अपने काम के प्रति मुतमईन रहती थी.

 सीट पर उसके पहुँचने तक दो तेरह हो चुका था. अब तक काउंटर पर छह-सात कस्टमरों की कतार लग चुकी थी. उसने आगे वाले का फार्म पकड़ा ही था कि पीछे वाले में से किसी की आवाज़ आई,‘‘मैडम को फ़ोन पर घर चलाने का शौक है

लेकिन उसका लंच ऑवर रोज़ ही बड़ा कठित बीतता था... एक तीस में नम्रता का तीस मिनट का लंच ऑवर शुरू होता था जो इरा, मीरा के स्कूल से छुट्टी का समय हुआ करता था. अमूमन एक पचास-पचपन के बीच दोनों बच्चियाँ घर पहुँचती थीं. ठीक एक सत्तावन-अट्ठावन पर वह फ़ोन करती थी. जब तक वह उधर से आश्वस्त होती इधर लंच टाइम ओवर हो चुका होता था. वह अपनी सीट की तरफ़ बढ़ जाती थी.

मगर उस दिन थोड़ी गड़बड़ी हो गई. दो बजे तक भी इरा, मीरा घर नहीं लौटी थी. नम्रता बहुत बेचैन हालत में अपनी सीट पर बैठी. काउंटर पर खड़े एकमात्र कस्टमर का फार्म लेकर उसने एंट्री की. प्रिंट दबाकर समय देखने लगी. दो सात हो रहा था. रसीद थमाकर वह बीच के उस टेबल की तरफ़ बढ़ गई जिस पर लाल रंग का एक टेलीफ़ोन सेट रखा था.

टेलीफ़ोन की घंटी लगातार बज रही थी. उसने अपने काउंटर की तरफ़ झाँका. इतनी ही देर में दो-तीन कस्टमर आ गए थे.

नम्रता बुरी तरह घबरा गई. उसने तत्काल री-डायल किया. अब तक काउंटर पर खड़े कस्टमरों की फब्तियाँ हवा में तैरने लगी थीं. उसके चेहरे पर पसीने चुहचुहा आए थे और रिसीवर थामे हाथ काँपने लगा था. ठीक तभी उधर फ़ोन उठा इरा बोली, ‘‘आ गई, मम्मी!...लेट हो गई आज...बस वाले अंकल कह रहे थे...’’

‘‘चलो लंच करो तुम सब...बाकी सब बातें घर आकर करूँगी.’’ और रिसीवर पटक दिया नम्रता ने.
सीट पर उसके पहुँचने तक दो तेरह हो चुका था. अब तक काउंटर पर छह-सात कस्टमरों की कतार लग चुकी थी. उसने आगे वाले का फार्म पकड़ा ही था कि पीछे वाले में से किसी की आवाज़ आई,‘‘मैडम को फ़ोन पर घर चलाने का शौक है.’’

कतार में हँसी की लहर दौड़ गई.

गुस्से और अपमान को जब्त करते नम्रता की हालत और बिगड़ गई. न की-बोर्ड पर उसकी अँगुलियाँ ठीक चल रही थीं, न माउस पर उसका कंट्रोल था. मगर चुपचाप वह अपना काम निबटाती रही.

जैसे-तैसे पाँच बजे काउंटर बंदकर उसने हिसाब-किताब पूरा किया. झटपट पहली बस की तरफ़ लपकी जो खुलने ही वाली थी. दो मिनट भी देर करती तो अगली बस के लिए पूरा एक घंटा इंतज़ार करना पड़ता.

सात बजते-बजते नम्रता घर पहुँची. उसके भीतर की बेचैनी और चेहरे पर छाई मुदर्नी बाक़ी दिनों से कुछ अलग थी. कुछ ज़्यादा डरावनी भी. इरा, मीरा जो दौड़कर मम्मी के पास पहुँची थी, अचानक सहम गई. तकिए के सहारे पीठ टेककर बैठा जतीन भी डर गया. क्षणभर की चुप्पी के बाद आख़िरकार जतीन ने ही पूछा,‘‘क्या हुआ नम्र?...’’

सोफे पर बैठती नम्रता का सर्द स्वर आया,‘‘कुछ नहीं.’’ फिर क्षणभर की चुप्पी के बाद उसने बच्चियों से पूछा,‘‘तुम लोगों को आज देर क्यों हुई आने में? ’’

‘‘ममा! बस वाले अंकल ने कहा है, बच्चे रिसीव करने के लिए भी स्टॉप पर पैरेंट्स को रहना होगा.’’इरा बोली.

‘‘घर के आगे ही तो है स्टॉप...तुमने पैरेंट्स का प्रॉब्लम नहीं बताया?’’

‘‘बताया था, लेकिन वो नहीं मान रहे. कल एक बच्चा अपने घर के आगे ही स्टॉप से ग़ायब हो गया है. आज जिनके पैरेंट्स नहीं आए थे उनको बस रुकवा कर घर तक छोड़े हैं. हमें भी वह गेट तक छोड़ गए हैं.’’

‘‘अयँ!...’’ नम्रता का मुँह खुला रह गया.

तभी मीरा बोली,‘‘स्टॉप पर भी छोड़ देंगे. लेकिन कुछ होने पर उसके लिए स्कूल जिम्मेदार नहीं होगा, ऐसी बात लिखकर देना होगा.’’

नम्रता ने सोफे से सिर टिकाकर आँखें मूंद लीं.

कमरे में ऐसी चुप्पी छा गई थी कि नम्रता को लगा, उसकी बच्चियाँ भी ग़ायब हो गईं...इस अहसास ने उसे इस कदर दहशत से भर दिया कि वह आँखें खोल नहीं पाई. बदन बुरी तरह काँपने लगा था उसका कि एक लंबी चीख़ निकल गई...

और वह सोफे पर लुढ़क गई...

अस्पताल से नम्रता के लौटने में पूरा सप्ताह लग गया. पूरे सप्ताह कई संबंधियों का घर आना-जाना लगा रहा. पूरे सप्ताह इरा, मीरा न स्कूल गई, न बाहर खेलने. इस बीच किसी और की इरा,मीरा ग़ायब होती रही.

मनोचिकित्सक की सलाह पर नम्रता को लंबी छुट्टी लेकर आराम करना पड़ रहा है. देखभाल के लिए गाँव से उसकी ननद आ गई है. इरा, मीरा अब फिर से स्कूल जाने लगी हैं. जतीन भी फिर से पैंटिंग शुरू कर चुका है. सब कुछ ठीक-ठाक सा ही है...

बस, नम्रता अब भी डर रही है...

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संपर्क-
सी-56/यूजीएफ-4
शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II
ग़ाज़ियाबाद-201005 (उप्र)

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