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शुक्रवार, 09 फ़रवरी, 2007 को 09:05 GMT तक के समाचार
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कहानी - आस

रेखांकन- लाल रत्नाकर

सविता की चिट्ठी पाकर मैं सुन्न बैठा रह गया. एक अजीबोग़रीब ख़याल यह भी आया कि काश, यह मुझ तक पहुँची ही न होती.

लेकिन ख़याल और असलियत के बीच चिट्ठी मेरे हाथ में थी और उसका मजमून किसी फ़िल्म की तरह अब भी मेरे दिलोदिमाग में उथल-पुथल मचाए हुए था. सवि ने शायद उम्र में पहली बार कोई चिट्ठी इस तरह सीधे शुरू की थी.

मेरे प्यारे दद्दा, सच कहती हूँ, मैं यह चिट्ठी कभी न लिखती अगर तुमने मुझे अपने बर्ताव से इस कदर हैरान न कर दिया होता. ज़रा याद तो करो, कित्ती बड़ी-बड़ी बातें बनाया करते थे तुम. हरफ़-ब-हरफ़ आज भी सब कुछ याद है मुझे. तुम्हीं थे न, जो यह कहा करते थे कि इंसान को कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. उसे हर वक़्त अपनी ज़िंदगी के मक़सद का ख़याल रखना चाहिए. अपनी गरिमा बनाए रखनी चाहिए, जमाना भले ही कुछ कहता रहे.

इस वक़्त, जब मैं यह चिट्ठी लिख रही हूँ, मुझे बरसों पहले तुम्हारी कही एक-एक बात याद आ रही है. सच बताऊँ, अपनी इस यादाश्त पर तुम्हारी यह भुलक्कड़ बहन ख़ुद हैरान है. ऐसी-ऐसी चीज़ें याद आ रही हैं कि क्या बताऊँ. याद है, उस रात जब पिट्ठू खेलते वक़्त मेरे पैर के अंगूठे से ख़ून निकलने लगा था और तुम्हारी लाख कोशिशों के बावजूद बंद नहीं हुआ था, तब कैसे तुमने अंगूठा अपने मुँह में रख लिया था. फिर देर तक अंगूठे को कैसे दाबे बैठे रहे थे तुम. तुम्हारी आँखे भीग गईं थीं और तुमने गली के उस पत्थर को ही उखाड़ फेंका था जिसने मुझे घायल किया था.

मेरे क़रीब तुम्हीं तो एक ऐसे शख्स थे जो मुझे समझ सकते थे. माँ, बाबू, बहन और भाई तो मुझे अपना दुश्मन ही समझते थे. क्यों न समझते, आख़िर मैं भाइयों की प्रतीक्षा में ही तो जन्मी थी. बहन को जो प्यार अब तक अकेली होने की वजह से मिला करता था, उसे लगा अब उसे भी बाँटने वाली आ गई है. भाई मुझसे बाद में भले ही आए, लेकिन उन्हें भी इस बात का पूरा यक़ीन हो गया कि अगर मैं न होती तो उन्हें और ज़्यादा प्यार मिलता. माँ और बाबू ने तो शुरू से ही मुझे बोझ समझ लिया था. माँ हरदम कहती,‘‘यह मरगिल्ली जाने कहाँ से आ मरी हमारे घर. जब देखो तब बीमार. न ख़ुद जीती है ढंग से और न पिंड छोड़ती है हमारा.

तुम तो पास ही खड़े थे न उस रोज़ जब जाने किस बात पर माँ ने लोटा फेंक के दे मारा था मेरे सर पर. तब तुम से न देखा गया था माँ का यह बर्ताव और तुमने किसी बुजुर्ग की तरह माँ से कह डाला था, 'एक दिन इसका गला ही क्यों नहीं दबा देतीं चाची. रोज़-रोज़ का टंटा तो खतम हो जाएगा.' वह पहला दिन था दद्दा, जब मुझे लगा था कि सचमुच तुम में वह ताब है जो औरों में नहीं. तुम सच्ची अपनी सवि को सबसे ज़्यादा प्यार करते हो.

बीमार होने पर तुम ही मुझे डॉक्टर के पास ले जाते. गर्भ से कमजोर चली आई मैं, धीरे-धीरे तुम्हारी मेहनत से खड़ी हो गई थी. जान बराबर काम तो करती ही थी, कोशिश मेरी यह भी रहती थी कि ख़ुद पर से किसी तरह यह ठप्पा भी हटा दूँ कि लड़की हूँ, इसलिए बोझ हूँ. तुम्हारे साथ घर के बरामदे में पड़ी बड़ी सरकारी मेज पर कॉपी के गत्ते से खेला टेबल टेनिस ख़ूब काम आया. मैं स्कूल की टीटी टीम में सलेक्ट हो गई. जिस दिन मैं टीम की ड्रेस पहन कर शहर से बाहर मैच खेलने गई, कैसे पूरा घर जलन से ख़ाक हो गया था मुझे देखकर. बस, तुम थे जिसने कहा था, 'बक अप सवि...चैंपियन बनने की शुरुआत यही होती है.' मामूली अंतर से हार कर लौटी मैं बेहद दुखी थी क्योंकि हमारे स्पोर्ट्स टीचर ने साफ़ कह दिया था,‘‘खेल तो सविता बढ़िया है तुम्हारा, लेकिन स्टेमिना बनाए रखने के लिए दूध, अंडा और मछली ज़रूरी है. पापा से कहना कि वह तुम्हारे लिए बढ़िया डाइट का इंतज़ाम ज़रूर करें.

रेखांकन -लाल रत्नाकर

पापा तक जब यह संदेश छोटे ने पहुँचाया था तो वह उत्साहित था कि मेरे साथ-साथ उसे भी अंडा खाने को मिलेगा. लेकिन अंडा तो ख़ैर क्या मिलना था, पापा के भीतर के बाबू जाग गए थे. उन्हें यह पसंद ही नहीं था कि छोटू के अलावा कोई उन्हें पापा कहे. वह उन्हें पापा कहता, वह उसे टॉफी थमा पुचकारते. वह उन्हें पापा-पापा कहता, वह उसे गोद में उठाकर दुलारने-पुचकारने लगते. जब वह उसे प्यार कर रहे होते, क्या मजाल मेरी कि मैं उन्हें पापा कह कर उनके कुर्ते का छोर पकड़ लूँ. एक बार कोशिश तो की जब सतीश काका आए हुए थे पीलीभीत से. कितनी ख़ुश थी मैं उस दिन जब उन्होंने मेरी तारीफ सबके सामने खुले दिल से की थी, ‘इस लड़की को खेल में जाने दो. देखना एक दिन ये पूरे खानदान का नाम रोशन कर देगी.’ उत्साह में आकर मैंने बाबू को छोटू की तरह लाड़ में आकर पापा कह दिया था,‘पापा, तुम चलोगे न इस बार मेरा मैच देखने. रघुनाथ स्कूल से टक्कर होगी. सब कह रहे हैं...मैं ज़रूर जीतूंगी.

सतीश काका के सामने ही बाबू उखड़ गए थे,‘क्या पापा-पापा लगा रखी है. छोटू से अपनी बराबरी मत किया कर. वह लड़का है. और ये खेल-वेल छोड़, अपनी मां के काम में हाथ बँटाया कर ज़रा...जब देखो, तब टेनिस-टेबल की रट लगाए रहेगी.

बुरा तो सतीश काका को भी बहुत लगा होगा, लेकिन उन्होंने शायद बाबू का मूड देखकर उस वक़्त चुप रहना ही बेहतर समझा होगा. उनके जाने के बाद तुमने ही मेरा मूड ठीक करने के लिए चोरी से उबला अंडा ला कर मुझे बरसाती में ले जाकर खिलाया था. आज पूरे 35 साल की हो गई हूँ, लेकिन ज़िंदगी में खाया वह पहला अंडा और उसका स्वाद आज तक याद है.

 तुम भी तो एक के बाद एक बच्चा पैदा करने में लगे रहे. अब इस सब्बो को तो मैंने तुमसे पहले ही गिरवाने को कहा था. तुम्हें जाने क्यों लग रहा था उस बार कि लड़का ही होगा. हरकतें तो इसकी ज़रूर लड़कों जैसी हैं, लेकिन शादी के लिए तो पूरा ताम-झाम करना ही पड़ेगा. खेल-खेल के शरीर का और सत्यानास किए जा रही है करमजली. घर के काम में तिनके तक तोड़ के नहीं देती

दद्दा, तुम तो कुछ ही दिनों के लिए आए थे हमारे यहाँ. तुम्हारे जाने के बाद मैं अकेली रह गई. पूरा घर एक तरफ और मैं एक तरफ. और उस दिन के बाद तो सच बताऊँ मेरी जीने की इच्छा की ख़त्म हो गई थी जब मुझे बगल वाले कमरे से आती माँ की आवाज़ सुनाई दी थी,‘‘तुम भी तो एक के बाद एक बच्चा पैदा करने में लगे रहे. अब इस सब्बो को तो मैंने तुमसे पहले ही गिरवाने को कहा था. तुम्हें जाने क्यों लग रहा था उस बार कि लड़का ही होगा. हरकतें तो इसकी ज़रूर लड़कों जैसी हैं, लेकिन शादी के लिए तो पूरा ताम-झाम करना ही पड़ेगा. खेल-खेल के शरीर का और सत्यानास किए जा रही है करमजली. घर के काम में तिनके तक तोड़ के नहीं देती...

सोने का नाटक करते हुए भी जाने कैसे, झोला हुआ खाट पर मैं एन उसी वक़्त करवट बदल बैठी थी और उससे हुई आवाज़ सुनकर माँ फ़ौरन दबे स्वर में बातें करने लगी थीं. उन्होंने ही बाबू को मेरे ख़िलाफ़ भड़का-भड़का कर ऐसा बना दिया था शायद. मैं हैरान थी दद्दा कि कोई माँ क्या सचमुच अपनी बेटी के लिए इस कदर दुश्मन बन सकती है. तब मुझे तुम बेतरह याद आए थे. मैं धार-धार रोते हुए भी ख्यालों में तुम्हारा अपनत्व भर चेहरा खोज रही थी. तुम तो खैर कहाँ से आते, हाँ तुम्हारी बातों ने मुझमें ताक़त ज़रूर भर दी. लगा जैसे तुम पीछे खड़े अपनी पहले कही बातें दुहरा रहो हो,‘‘रो मत पगली. तू बड़ी होकर ख़ुद समझ जाएगी माँ-बाबू की तकलीफ. तुम से नहीं, उन्हें सबसे ज़्यादा नफ़रत दरअसल ग़रीबी से है. माली हालत खराब न होती तो परेशान थोड़े ही होते वे. उन्हें तो यही नज़र आता है कि आए दिन तुझे डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है. दवा लानी पड़ती है. डॉक्टर अच्छी खुराक देने को कहता है...यह सब उनके बस में होता तो सब ठीक रहता पगली.

ठीक ही सोचा था सवि ने. जब कोई सहारा न हो तो बातें ही ताक़त बनती हैं अकेले रह गए इंसान के लिए. सवि के पास भले ही मैं बाद में न रह पाया होऊँ, लेकिन घर के भीतर उसके संघर्ष की कल्पना तो कर ही सकता हूँ. चाचा-चाची की तंगी में मजबूरी भी मैं खूब समझ सकता हूँ. वह अपने पोलियोग्रस्त बेटे के पैर का इलाज करवाएँ कि सवि का ख्याल रखें. कभी-कभी तो मुझे चाची की इस सोच में भी दम नज़र आने लगता था कि लड़कियों की परवरिश तो हवा-पानी से हो जाती है लेकिन मुझसे सवि के प्रति उनका सौतेला बर्ताव बर्दाश्त न होता था. विरोध करने की मेरी भी सीमा ही थी. आख़िर मैं ख़ुद उनके घर पर कुछ दिनों के लिए बोझ बन कर आन पड़ा था. लेकिन झूठ क्यों बोलूं, मुझसे उन्होंने कभी एक शब्द नहीं कहा. जैसा वे खाते, मुझे भी देते. कोई दुभांत नहीं. बस, अपनी ही बेटी सवि से उन्हें जाने क्या चिढ़ थी. हरदम यही कहती रहतीं, ‘‘न सकल की है न अकल की, कौन ले जाएगा इसे अपने घर.’’

रेखांकन - लाल रत्नाकर

उनकी बातें पढ़ाई से मेरा मन उखाड़ देतीं. मैं सोचने लगता कि आख़िर क्यों बेटी के प्रति कोई माँ इस कदर जलनखोर हो जाती होगी. अपनी ये जिज्ञासाएँ साथ लिए मैं मुरादाबाद से दिल्ली चला आया था. इस दूरी ने ही मुझे सवि से भी काफ़ी दूर कर दिया था. मैं एक दुनियादार इंसान में तब्दील हो रहा था और बेवकूफ सवि थी कि अब भी मुझे अपना सबसे बड़ा हितैषी समझे बैठी थी.

उसी की चिट्ठियों से मुझे पता लगता रहा कि कैसे एक-एक कर सभी भाई-बहन बड़े होकर अपने-अपने घरों के होते चले गए थे. मुरादाबाद में अब रह गए थे सिर्फ़ सवि और चाचा-चाची. जो चाचा-चाची कभी उसे करमजली कहकर गरियाया करते थे वही अब उसे अपना ‘दूसरा बेटा’ समझने लगे थे. सवि की उन दिनों की चिट्ठियाँ पढ़कर मेरा मन खुशी से भर उठता था. वह लिखना कभी न भूलती कि अगर दद्दा, तुमने मेरे भीतर आग पैदा न की होती तो आज मैं वह न होती जो हूँ. मुझे माँ-बाबू का सहारा बनकर जो खुशी महसूस होती है, उससे बढ़कर कुछ भी नहीं हो सकता. कौन कहता है कि बेटी-बेटों से कमतर होती है. संघर्ष सवि का था और श्रेय मिलता देख, सीना मेरा चौड़ा होता.

कभी-कभी मैं यह ज़रूर सोचता था कि अब जबकि सवि स्कूल में पढ़ा ही रही है, उम्र भी उसकी अच्छी-खासी हो चली है...तो फिर क्यों नहीं कोई अच्छा सा लड़का देखकर उसका रिश्ता कर दिया जाता. लेकिन यह मेरा सोचना था. मुरादाबाद में तो सवि पर कुछ और ही बीत रही थी. उसकी चिट्ठियाँ बतातीं कि कभी वह माँ को अस्पताल ले कर जाती है तो कभी बाबू को. महीने भर दवाई चलती है दोनों की. घर ख़र्च का आलम करीब-करीब वही है जो बचपन में देखती आई थी. बाबू को जो पैसा रिटायरमेंट पर मिला था उससे दो कमरे का मकान बन गया और दीदी की शादी निबटा दी गई. वक़्त-बेवक़्त भाई का फ़ोन आ गया तो कुछ उसे भिजवा दिया. पैसा कोई हरदम थोड़े ही बना रहता है.

फिर अचानक एक दिन सवि की शादी की ख़बर आई थी. कार्ड तो शायद छपा नहीं था. लड़का बहुत जल्दी में था. उसके घर वाले भी चाहते थे कि शादी हो जाए तो बेटे का मन ठीक तो हो. इधर चाचा-चाची को भी जैसे मन माँगी मुराद मिल गई थी. ऐसे बिना ख़र्च शादी इस जमाने में होती है भला. आठ-दस लोगों के बीच दिन-दोपहर में ही वर माला डलवाकर रस्म पूरी हुई और सवि अपने घर चली गई.

घर ज़रूर गई, लेकिन दुर्भाग्य ने उसका पीछा नहीं छोड़ा. पति उसे ऐसा मिला कि इससे तो अच्छा न ही मिलता. उसे सवि का किसी से मिलना-जुलना कतई पसंद न था. न वह ख़ुद कहीं जाता-आता न किसी के पहुँचने पर ख़ुश होता.

दूसरों की सुनी-सुनाई पर क्या यक़ीन करना, सोचकर एक दिन मैं ख़ुद ही सवि का घर पूछते-पाछते दिल्ली जा पहुँचा. अचानक मुझे पहुँचा देख सवि तो खिल उठी पर जमाई साहब के अंदाज समझते मुझे कतई देर न लगी. जल्दी लौटने का बहाना कर मैं चाय पीकर ही उठ आया. इसके बाद तो बस फिर सवि की ख़बरें ही मिलती रहीं. कभी पति से लड़ाई-झगड़े की, कभी मार-पिटाई की तो कभी घर से निकाल देने की.

 दद्दा, तुम तो ऐसे बैठ गए जैसे तुमसे मेरा कभी कोई नाता ही नहीं रहा. सच्ची बताना, क्या तुम अपनी सवि को हमेशा के लिए दिल से निकाल चुके हो. तुम्हारी ज़िम्मेदारियों ने क्या तुम्हें इतना कमजोर बना दिया है कि तुम चाहकर भी अपनों के नहीं हो सकते

हार कर फिर सवि मुरादाबाद ही तो लौट गई थी. जिस लगी-लगाई नौकरी को वह शादी के बाद दौड़कर चली गई थी अब उसे फिर से पाने के लिए उसे चिरौरी करनी पड़ी. छोटे बच्चे को साथ ले वह चली आई थी, लेकिन माँ न होती तो वहाँ तो भला इत्ता आसान थोड़े ही था नौकरी करना भी. सवि की ज़िंदगी की गाड़ी पटरी बदलकर ही सही, फिर से चल निकली थी.

इन दिनों भी शायद सवि ने मुझे एकाध चिट्ठी लिखी थी. उसका एक-एक लफ्ज़ ऐसा था कि मुझे ख़ुद पर शर्म हो आई. अब उसके बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि इंसान से ज़्यादा खुदगर्ज कोई हो नहीं सकता. सवि ने लिखा था,‘‘दद्दा, तुम तो ऐसे बैठ गए जैसे तुमसे मेरा कभी कोई नाता ही नहीं रहा. सच्ची बताना, क्या तुम अपनी सवि को हमेशा के लिए दिल से निकाल चुके हो. तुम्हारी ज़िम्मेदारियों ने क्या तुम्हें इतना कमजोर बना दिया है कि तुम चाहकर भी अपनों के नहीं हो सकते.’’

तुम्हें मैंने कितनी चिट्ठियाँ लिख डालीं, लेकिन तुम तो सबकी सब पी कर बैठ गए. जब मेरी शादी नहीं होती थी तो तुम्हीं तो थे जो मुझे हरदम यही समझाते रहते थे कि बेटी को अपने माँ-बाप से प्यार ज़रूर होना चाहिए, लेकिन इतना नहीं कि वह हमेशा के लिए मायके में ही बैठी रह जाए. तुम्हारी ये बातें सुन-सुनकर ही मैंने अपनी सोई इच्छाओं को जगाया था. शादी के बाद जो कुछ हुआ, सच मानिए, उसमें मेरी ज़रा भी ख़ता नहीं. मैं तो फिर भी यही कोशिश करती रही कि जैसे भी हो, निभाती हूँ, निभाती हूँ. लेकिन क्या बताऊँ, तुम्हारी इस अभागन बहन को जो आदमी पति के रूप में मिला वह था ही कुछ ऐसा कि उसके साथ कोई भी जीता-जागता इंसान किसी भी हालत में रह ही न पाए.

सच बताऊँ, तुम्हें उस दिन भी मैंने ख़ूब याद किया था जिस दिन पति ने मेरी खूब पिटाई की थी. यह वही इंसान था जिसके हाथ में मेरा हाथ तुम्हारी मौजूदगी में थमाया गया था. माँ और बाबू से तो मैं कोई उम्मीद यूँ भी नहीं कर सकती थी, उन्हें ही मेरी परवाह होती तो भला वह मेरी उम्र से दुगना पति खोजते मेरे लिए. तुम्हें ज़रूर लग रहा होगा कि मैं ये क्या खटराग लेके बैठ गई. लेकिन सच बताना, क्या मेरी शादी के वक़्त भी तुम्हें ये नहीं लगा कि तुम्हारी बहन को जबरन किस तरह घर से निकालने का समारोह किया जा रहा है. तुम्हारी नज़र ऐन फेरों के वक़्त भी मुझ पर नहीं पड़ी जब मेरे चेहरे पर घबराहट में पसीना उभर आया था. तब बमुश्किल तमाम कैसे मेरी होने वाली सास ने मुझे सहज किया था और तब कहीं शादी की रस्म पूरी हो पाई थी.

 इससे तो अच्छा होता कि तुम मुझे मुरादाबाद आकर भी फ़ोन न करते. अपने बेटे के भविष्य की तो तुम्हे फिक्र है कि मंदिर में घंटा चढ़ा आए और यहाँ जो मेरा वर्तमान गर्क हुआ जा रहा है, उसकी तुम्हें कोई परवाह ही नहीं. मुझे तो लगता है, अगर तुम्हें यह ख़बर होती कि आजकल मैं बच्चे के साथ अकेली ही ज़िंदगी की लड़ाई में जुटी हूँ तो शायद तुम मुझे फ़ोन भी न करते

सच्ची बताऊँ, मैं तो उस वक़्त भी आपसे यही उम्मीद लगाए बैठी थी कि तुम किसी भी पल एक झटके में उठ खड़े होगे और मेरा हाथ पकड़ कर कहोगे कि चल सवि, भाग यहाँ से. ये लोग तुझे ख़त्म कर डालना चाहते हैं. इंसान नहीं, ये कसाई हैं. यकीन मानो, तुम ऐसा कहते न, तो मैं तुंरत उठकर चल भी देती. मैंने तो कई बार उम्मीद भरी नज़रों से तुम्हारी तरफ देखा भी था, लेकिन तुम जाने किस धुन में मस्त थे. देखकर भी जैसे कुछ देख नहीं रहे थे.

कोई भी यह सोच सकता है कि सविता जो कह रही है, सो तो ख़ैर ठीक है, लेकिन मैं क्या सोच रहा था उस वक़्त, यह भी तो पता चलना चाहिए.

मैं क्या बताऊँ, मैं ख़ुद उस वक़्त एक दुनियादार बना बैठा था. सोच रहा था कि एक बार शादी हो जाएगी तो फिर सवि की ज़िंदगी अपने आप एक ढर्रे पर चलने लगेगी. दुनिया भर में जाने कितनी लड़कियाँ ऐसे ही अपने घर जाती हैं और सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहता है. ज़्यादा शंका-सुबहा भी कोई अच्छी बात थोड़ी है. दो-एक बार लड़के को देख कर मुझे लगा था कि कैसा लग रहा है जैसे किसी और की शादी में आया हो. लेकिन फिर मैंने ख़ुद को समझा लिया था, शक्ल में क्या रखा है, आदमी ठीक होना चाहिए बस.

सवि की चिट्ठी की एक-एक पंक्ति मेरा कलेजा चीर रही है,‘‘वाह दद्दा वाह, तुम भी खूब बदले. बच्चों और भाभी को लेकर मुरादाबाद तक आए और तुमसे ये तक नहीं हुआ कि अपनी प्यारी बहना सवि का हाल-चाल भी लेते जाओ. जब तुम घंटे वाले मंदिर तक पहुँच ही गए थे तो फिर वहाँ से मेरा घर रह ही कित्ता दूर गया था बताना तो ज़रा. किसरौल मुहल्ले से अगर तुम रिक्शा भी पकड़ते तो पंद्रह मिनट में मेरे घर या स्कूल पहुँच जाते. लेकिन यह तो तब होता न, जब तुम्हारे दिल में मुझसे मिलने या मेरा हाल जानने की इच्छा होती. इससे तो अच्छा होता कि तुम मुझे मुरादाबाद आकर भी फ़ोन न करते. अपने बेटे के भविष्य की तो तुम्हे फिक्र है कि मंदिर में घंटा चढ़ा आए और यहाँ जो मेरा वर्तमान गर्क हुआ जा रहा है, उसकी तुम्हें कोई परवाह ही नहीं. मुझे तो लगता है, अगर तुम्हें यह ख़बर होती कि आजकल मैं बच्चे के साथ अकेली ही ज़िंदगी की लड़ाई में जुटी हूँ तो शायद तुम मुझे फ़ोन भी न करते."

"माँ-बाबू तो मकान बेच-बाचकर चले ही गए अपने बेटों के पास. अच्छा हुआ, रही-सही आस तुमने भी तोड़ दी. लेकिन यह मत समझना दद्दा कि मैं यह सब तुम्हें अपना दुखड़ा रोने के लिए लिख रही हूँ. मैं तो तुम्हें ये दिखाना चाहती थी कि दो साल के बच्चे को साथ लेकर भी मैं कैसे बगैर किसी मदद के यहाँ रह रही हूँ तुम्हारे सिखाए पाठ याद करते हुए. तुमने कहा था न, तोड़ना नहीं, जोड़ना चाहिए. बिखेरना नहीं, सहेजना चाहिए. बस, अपने बच्चे को बड़े होता देख जी रही हूँ मैं. न मेरी कोई अपनी ज़िंदगी है और न ख्वाहिश. कमा-खा भी रही हूँ तो सिर्फ़ इसलिए कि बच्चा ठीक तरह से पनप सके. कभी इसके पापा का मन बदला भी, तो उन्हें पत्नी नहीं, बेटा ही मिलेगा. मन के तार तो बिखर चुके हैं, तन को मजबूरन संभाल रखा है मैंने. कितना मन था कि तुम एक बार आकर अपनी बहादुर सवि का काम-काज देख जाते तो तुम्हें भी लगता कि हाँ पीट-पीटकर जो पाठ तुमने पढ़ाए थे, वे बेकार नहीं चले गए."

अरे तुम तो ऐसे चोरों की तरह भाग लिए उसी शहर से जहाँ तुमने कभी मुझे अपने बड़े भाई होने का एहसास दिया था. ज़रूर तुम्हें ये लगा होगा कि कहीं तुम्हारे सामने मैं कोई माँग न रख बैठूँ. तुम्हें कभी ऐसी चिट्ठी न लिखती दद्दा, लेकन मुझे जाने क्यों भीतर से यह लगा कि अगर अपनी बात तुम तक न पहुँचाई तो शायद मेरे दिमाग की नसें फट जाएंगी. जैसे-जैसे यह चिट्ठी पूरी होती जा रही है, सच बताऊँ, मेरा दिमाग भी हल्का होता जा रहा है. कैसा अजीब नाता है न दद्दा, दिल और दिमाग का भी.

तुम भी सोच रहे होगे, पूरी चिट्ठी में मैं अपनी ही हाँके जा रही हूँ. तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के बारे में तो कुछ खैर-ख़बर ही नहीं ली मैंने. इसकी वजह भी तुम ही हो दद्दा. लंबे समय से न तुमने कभी अपनी ख़बर दी और न मेरी ही ख़ैर पूछी. वैसे भी तुम्हीं ने तो सिखाया था न, जो काम करो, उसी में रमो. इधर-उधर भटकने से लय बिगड़ती है. बस ये सबझ लो कि किसी तरह ज़िंदगी की लय बनाए हुए हूँ. तुम्हारा भांजा बड़ा हो जाए, फिर मुझे कोई फिक्र न रहेगी...मेरी ईश्वर से यही विनती है कि तुम सपरिवार सुखी रहो हमेशा...हाँ, कभी वक़्त निकाल कर अपनी सवि को देखने आ सकोगे तो अच्छा लगेगा.

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महेश दर्पण
सी-3/51, सादतपुर
करावलनगर रोड
दिल्ली-110094

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