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शह और मात | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह मात्र संयोग नहीं है कि कल तक जिस अणिमा दत्ता के ख़िलाफ़ तख्तियाँ लेकर नारेबाज़ी होती थी आज उसके पक्ष में रहने का प्रस्ताव पारित हो रहा था. इस छोटे से पहाड़ी शहर में अकसर मुर्दनी-सी छाई रहती. दूर-दूर तक बने विशाल बंगले, सघन वृक्ष श्रृंखला और ऊँची-नीची पठारी भूमि इसकी पहचान हैं. पूर्वांचलीय पूर्व जमींदारों के आरामगाह के लिए बनाए गए बंगले इधर गुलजार रहने लगे हैं. एक हाई स्कूल और कॉलेज खुल गया है. एक मल्टीनेशनल ने अपना वर्कशॉप बना रखा है और उन्हीं की आवश्यकतानुसार जनसंख्या वृद्धि हो गई है. इन दिनों और सरकारी संगठन सरकारी संगठनों के आजू-बाजू चलते हैं सो ब्लॉक का यह मुख्यालय है तो कई एनजीओ के क्रिया-कलाप भी जोर-शोर से चलने लगे हैं. गोया हवा पानी की पवित्रता के लिए जाना जाने वाला यह स्थान जन समस्याओं की संकलता के लिए ख्यात हो गया है. डॉक्टर सुशांत चौधरी ब्लॉक के डॉ़क्टर बनकर आए थे. कलकत्ते से मेडिकल पास कर पहली नौकरी इसी ब्लॉक में हुई थी. पहली नियुक्ति और नवविवाहिता की गृहस्थी. पत्नी गार्गी को यह स्थान बेहद पसंद आ गया. डॉक्टर साहब की भी चल निकली. अपने प्रैक्टिस के बल पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी. इन्हीं दिनों अणिमा दत्ता इनके नवस्थापित नर्सिंग होम की नर्स एवं मैनेजर होकर आई. अणिमा कलकत्ते के बड़े नर्सिंग होम की प्रशिक्षित नर्स थी. नर्स का काम तो उसे आता ही था. अपने कौशल से वह वहाँ की व्यवस्थापिका हो गई थी. कम उम्र की होशियार नर्स डॉक्टर को रास आ गई. अणिमा दत्ता ने ईंट गारे के विशाल भवन को एक संवेदनशील विश्वसनीय नर्सिंग होम में बदल दिया. डॉ दम्पत्ति उसपर बारि-बारि जाते. उसके एवज़ में डॉक्टर ने उन्हें एक कोठी खरीदकर रहने को दी. कोठियाँ उन दिनों सस्ती मिल जातीं थीं. सैर सपाटे के लिए लोग पहाड़ों, समुद्र तटों तथा देश से बाहर जाने लगे हैं. इस स्थान का महत्व कम हो गया था. स्त्री-पुरुष के नेचर केयर ट्रीटमेंट के लिए कई विख्यात रिसॉर्ट खुल गए थे. सचमुच के नेचर केयर की उचेर से लोगों ने मुँह मोड़ लिया था. अतः बंगले मुँह बाए रिहायश की प्रतीक्षा में खड़े दिख पड़ते. अणिमा दत्ता ने नर्सिंग होम के परिसर को सवारा ही साथ ही अपनी कोठी को नया रूपाकार देने में जुट गईं. सभी मौसम के स्थाई-अस्थाई खिलने वाले फूल, फलने वाले फलों के बगीचे जो पहले से थे, वो मुरझा-मुरझा गए थे. अणिमा ने उन्हें अपने स्नेहसिंचन से ज़िंदा कर दिया. छोटा-सा उसका बंगला अत्यन्त वैभवशाली लगता. नर्सिंग होम विस्तार पाकर सैचुरेशन प्वाइंट पर पहुँच गया था. लगातार वृद्धि होने के कारण कुछ और स्थान की ज़रुरत थी. डॉक्टर और अणिमा विचार कर नए स्थान की तलाश में जुट गए. दोनों की संयुक्त इच्छा से अणिमा के विशाल अहाते में एक ओर एक बड़ा हॉल बना दिया गया जिसमें दस पलंग डाले गए. पश्चात इसके, ऊपर भी हॉल बन गया और बीस पलंग का प्रबंध हो गया. व्यवस्थापिका अणिमा ही थी सो कोई परेशानी नहीं हुई. डॉक्टर साहब अणिमा से चमत्कृत रहते. उसके हाथ के जादू पर कुर्बान थे. नर्स की ड्यूटी बजाती अणिमा, नर्सिंग होम की हाउस कीपिंग करती अणिमा, बाग-बगीचों पर नज़र रखती अणिमा, सॉफिस्टिकेटेड, फ्रेज़ाइल, वेल ड्रेस्ड अणिमा कईयों के साथ डॉ सुशांत चौधरी की भी ड्रीम गर्ल सी बन गई. ड्रीम गर्ल से रियल संगिनी का सफ़र तय करने में वक़्त जो भी लगा डॉक्टर सुशांत उसकी गिरफ्त में पूरी तरह आ गए. टोटल सरेंडर कर दिया. आज के शब्दों में टोटल केमिस्ट्री मिलने लगी. अणिमा ने डॉक्टर को अपना संगी बना लिया पर गार्गी से द्रोह मोल ले लिया. गार्गी को जब इनके संबंधों की जानकारी मिली तो वे हतप्रभ रह गईं. स्वयं अपने टूथब्रश में पेस्ट न लगा सकने वाले, गार्गी के बिना जीवन का अहम निर्णय न ले सकने वाले सुशांत ने अपने भावभूमि की अलग रचना कर ली. किशोरावस्था से साथ गार्गी, डॉक्टर को पग-पग पर दिशा देने वाली गार्गी का क्या डॉक्टर की भाव-भूमि से कोई संपर्क ही न रहा? डॉक्टर सुशांत ने गार्गी को समझाया कि अगर अणिमा के साथ उनका संबंध जुड़ ही गया है तो इसे क्या स्वीकार कर चला नहीं जा सकता? गार्गी को यह गवारा न था और तब चला उत्पीड़न का दौर. गार्गी डॉक्टर के नर्सिंग होम से घर गई, घर में भी बेगानी-सी हो गई. उसकी इस दशा को देख स्थानीय महिला संगठनों ने तख्तियों पर नारे लिख डाले. ‘‘डॉक्टर सुशांत, यह है अस्मिता का अपमान है.’’ डॉक्टर सुशांत घर में बैठी गार्गी पर बेहद ख़फ़ा हो गए थे. बड़ी बेरहमी से उसे अपमानित करते. गार्गी के लाख कहने पर कि वे इन प्रदर्शनों की जिम्मेदार नहीं हैं, डॉक्टर नहीं मानते. धीरे-धीरे इनका संबंध परवाना चढ़ता गया, नर्सिंग होम की आमदनी घटती गई. डॉक्टर ने सुना जाना और देखा कि एक दूसरा नर्सिंग होम एक लेडी डॉक्टर ने खोल लिया है. इनके एकाधिकार का समय समाप्त हो गया था. अपने नर्सिंग होम की ओर नज़रे दौड़ाई वह बदहाल था. तह में जाने पर पता चला कि कुछ तो अफवाहें और कुछ गार्गी का नर्सिंग होम से असहयोग ने धूल चटा गया है. डॉक्टर ने कुछ सोचा, अपने जिरह बख्तर फिर पहन लिए, साँस खींचकर सीधे खड़े हुए और घुटनों के बल बैठ कर गार्गी से माफ़ी माँगी. धर्मपत्नी होने के नाते गार्गी ने न सिर्फ़ माफ़ कर दिया बल्कि नर्सिंग होम फिर से जाने-आने लगी. देखा गया कि अणिमा घर बैठ गई. गार्गी अहाते वाले नर्सिंग होम का विस्तार करने लगी. अणिमा ने रोका. कहा अब इससे अधिक विस्तार करने की अनुमति वह नहीं देगी. गार्गी ने शांत भाव से हँसकर कहा कि उसे अनुमति की आवश्यकता ही कहाँ है, यह तो उसी का है. अणिमा ने कहा कि यह मेरा बंगला है, गार्गी ने कहा कि डॉक्टर सुशांत की तरह सिर्फ़ पॉवर ऑफ अर्टानी उस बंगले की अणिमा के पास है और कुछ नहीं. वह इंतमीनान से विस्तार कार्य करने लगी.
‘‘अणिमा, तुम चाहो तो हमारे साथ काम कर सकती हो-नर्स बन कर, माइंड यू नर्स बनकर.’’ ‘‘क्या-क्या कह गई वह दो टके की नर्स. तुमने उसे आसमान पर चढ़ा दिया था. मेरे भाइयों ने तुम्हारे इस नर्सिंग होम को स्थापित करने को इतना अधिक परिश्रम इसीलिए किया था कि मैं जिस-तिस से अपमान सहूँ. बड़े आए आशिक मिज़ाज. अब उसका तुम कुछ नहीं बिगाड़ सकते. उसके पास ओरिजिनल पेपर हैं. पर मैं उसे नहीं तो तुम्हें बर्बाद कर दूँगी. आज ही कोलकाता जाऊँगी अपने भाइयों को बुलाने.’’ बोलती हुई पागलों-सी करने लगी गार्गी. कक्ष के सामने तहस नहस करने लगी. डॉक्टर ने दोनों हाथों से घेर कर उसे पकड़ न लिया होता तो सबकुछ नष्ट कर देती. नारों तथा प्रदर्शन का तत्काल कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं जान पड़ा था. परंतु देखा गया कि डॉक्टर सुशांत चौधरी भोजनोपरांत धीमी चाल के सौ कदम पर अणिमा की कोठी पर जाना बंद कर चुके हैं. अणिमा नर्सिंग होम आना छोड़ चुकी है. अणिमा अपने अहाते के नर्सिंग होम तक से कट गई है. वह अपने स्वयं के अनुशासन में क़ैद हो गई हो मानो. उसे जिसने चुनौती दिया है उसका सचमुच का अधिकार है जो प्रबल, प्रथम और पुख्ता है. कुछ दिनों के एकांतवास ने संभवतः उसे आत्ममंथन का मौक़ा दिया. एक बार पुनः उसके अंदर की कुशल परिचारिका जाग्रत हुई और वह दूसरे नर्सिंग होम की प्रधान डॉक्टर से मिलने गई थी. उनसे उसकी क्या बातचीत हुई यह किसी ने न सुना परंतु यह अवश्य देखा कि नर्सिंग होम की डॉक्टर ने कुर्सी से उठकर उसके विदा-अभिवादन का जवाब दिया. अणिमा दत्ता प्रसन्न मुद्रा में उनके कक्ष से बाहर निकली. उनके कदम बताते थे कि वह विश्वास से भरी हैं. उस दिन उन्होंने अपने सहन के फूल पौधों को अपने हाथों से पानी दिया, उन्होंने अपने टेप रिकॉर्डर पर कुछ ख़ुशनुमा बांग्ला गीत सुने गोया अणिमा दत्ता एक बार फिर ज़िंदगी जीने की ललक से भर उठी थीं. एक छोटा सा स्पंदन-युक्त डाल-डाल की ही नहीं पात-पात की ख़बर रखने को उदग्र रहा करता है. दूसरे दिन अणिमा अपने वस्त्रविन्यास में नए नर्सिंग होम पहुँची. यह उनके अपने अहाते के नर्सिंग होम के रहवासियों तथा कर्मचारियों ने देखा. शाम को उन्हें डॉक्टर सुशांत के कक्ष से बुलावा आया. अणिमा दत्ता उनसे मिलने गई थीं. वहाँ डॉक्टर दंपत्ति ने उन्हें आड़े हाथों लिया. वहाँ अणिमा को उनके घर का वह कागज़ दिखाया गया जिसमें लिखा था जब तक अणिमा डॉ सुशांत के साथ काम करेंगी, तब तक कोठी में रहेंगी. अणिमा के आँखों से पर्दे हट गए. यह क्या? इसने किस पर भरोसा किया था? उस पुरुष पर जिसने पहले अपनी पत्नी गार्गी को छला? यहाँ शह और मात की बिसात बिछी है, खेलने वाला यह सुपुरुष सुशांत है. कटने वाली दो भावुक स्त्रियाँ. अणिमा सहसा कहीं गायब हो गई. हफ़्ते भर बाद उसकी सड़ी-गली लाश डॉक्टर के नर्सिंग होम के मेन होल में गिरी हुई मिली. मामला आत्महत्या का बना. परंतु महिला संगठनों को यह बात गले उतरी नहीं. आज उनके बैनर पोस्टर अणिमा के पक्ष में हैं. ‘‘अणिमा को न्याय दो’’ जनता मूक दर्शक हैं कार्यशील स्त्रियों का जत्था स्वयं में उलझे ‘‘राज्य महिला आयोग जाएगा अपील करने.’’ देखें किसकी मात होती है. *********************** |
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