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शुक्रवार, 01 जून, 2007 को 12:40 GMT तक के समाचार
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प्यार

चित्रांकनः हरीश परगनिहा
चित्रांकनः हरीश परगनिहा

कहानी

प्रिय पाठको, मैं आपको कोई कहानी नहीं सुनाने जा रहा हूँ. यह कहानी जैसी कहानी है भी नहीं. और ना ही इस कहानी में कहानी जैसे पात्र हैं. यह एक सच्ची बात है. और इस सच्ची बात के साक्षी दो लोग हैं-मन और श्रीकांत. दोनों ही एक दूसरे को, एक दूसरे से ज़्यादा प्यार करते हैं. वे दोनों एक-दूसरे को किस कदर प्यार करते हैं यह बात इस चिट्ठी से ही जानी जा सकती है. लीजिए, आप ख़ुद ही पढ़ लीजिए.

मन,

तन और मन-दोनों में बहुत थकान है. फिर भी ख़ुद को रोक नहीं पा रहा हूँ. और तुम्हें ख़त लिखने बैठ गया हूँ. यह तेरे नाम दूसरा ख़त है. पहला ख़त आधा-अधूरा ही रह गया था. न पूरा कर पाया था, न ही तुम्हें दे पाया था खैर !

मन! घृणा, क्रोध, क्षोभ, हिंसा-सब तात्कालिक भाव हैं, अस्थाई भाव हैं. बस, प्रेम ही स्थाई भाव है. जानता हूँ, मैं तुम्हें बहुत दुख देता हूँ. पर मन, मैं तुमसे बेहद प्रेम करता हूँ. इतना कि बगैर तुम्हारे मेरी कोई धड़कन नहीं धड़कती. तुम्हारी आँखों से देखने लगा हूँ, ये दुनिया...तुम मानो या न मानो.

तुम कहती हो, मैं तुम्हें नहीं समझता हूँ. पर मैं तुमको तुमसे ज़्यादा समझता हूँ. तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखों में जो छिपा हुआ सूनापन है, उसे तुमसे ज़्यादा समझता हूँ. दुख ही प्रेम को प्रकाश में लाता है. और प्रेम ही दुख के अंधेरे को काटता है और मुक्ति का मार्ग तैयार करता है. प्रेम का अर्थ ही है-मुक्ति.

 मन! घृणा, क्रोध, क्षोभ, हिंसा-सब तात्कालिक भाव हैं, अस्थाई भाव हैं. बस, प्रेम ही स्थाई भाव है. जानता हूँ, मैं तुम्हें बहुत दुख देता हूँ. पर मन, मैं तुमसे बेहद प्रेम करता हूँ. इतना कि बगैर तुम्हारे मेरी कोई धड़कन नहीं धड़कती. तुम्हारी आँखों से देखने लगा हूँ, ये दुनिया...तुम मानो या न मानो.

मुक्ति भय से, मुक्ति घृणा और कुंठा से, मुक्ति किसी की छाया से. मुक्ति मन के आदिम अंधकार से. प्रेम में ही वह शक्ति है, बस प्रेम में ही वह ऊर्जा है जो किसी भी बंधन से मुक्त हो जाने का साहस भरती है. मेरा प्रेम तभी साकार होगा, जब तुम मेरे प्रेम के प्रकाश में नहा उठोगी और तुम्हारे अंदर का आदिम, अमानुष अंधेरा मिट जाएगा. अन्यथा, मेरा प्रेम गर्भ में पल रहे शिशु की तरह अजन्मा ही मर जाएगा.

मैं सारी उम्र तुमसे प्रेम करता रहूँ और तुम्हारे मन का आदिम अंधकार ही न मिट पाए, तुम मुक्ति का ही सुख न भोग पाओ, तो मेरा सच्चा प्रेम, मेरा सर्वांग, मेरा सर्वस्व, मेरा संपूर्ण जीवन ही निष्फल, निरर्थक हो जाएगा. इस बात को समझो मन. इस बात को शांत चित्त से महसूस करो मन.

बीस साल तक मैं अपना सर्वस्व त्याग कर, तुम्हारी प्रतीक्षा करूँ और बीस साल बाद भी तुम उसी आदिम अंधकार के साथ मेरे पास आओ तो मेरा सारा प्रेम, मेरी सारी प्रतीक्षा, मेरा सारा तर्पण व्यर्थ हो जाएगा. वह दिन मेरे लिए जीवन नहीं, मृत्यु लेकर आएगा. मुझे लगेगा कि मेरा प्रेम कितना मलीन था, कितना मंद था कि तुम्हारे मन का अंधेरा न मिटा पाया.

क्या सचमुच मेरा प्रेम इतना निस्तेज है? क्या मेरे प्रेम में इतनी कम रोशनी है कि मेरे प्रेम की रोशनी से तुम्हारे मन का अंधेरा नहीं मिट पाएगा? एक तीली की मद्दम सी लौ से पूरे कमरे का अंधेरा मिट जाता है और कोना-कोना दृश्यमान हो जाता है. तो मेरा प्रेम तुम्हारे मन में आसमान के सारे चांद, सूरज और तारों से कहीं कम रौशनी भरता है क्या? क्या मेरा प्रेम सचमुच इतना निस्तेज है? बोलो मन, चुप क्यों हो?

तुम कहती हो, चालीस बसंत बाद तुम्हारा प्रेम तुम्हें मिला है. तो इसे बावरी की तरह, उन्मादिनी की तरह, रणचंडी की तरह, शक्तिरूपा की तरह, नवयौवना की तरह भोगो मन. भोगो मन. मुक्त होकर भोगो. जहाँ हो, जैसे हो, वहीं रहकर भोगो. भय से मुक्त होकर भोगो. भय से मुक्ति ही प्रेम है. उन्माद ही प्रेम है. इस उन्माद का स्वागत करो, सम्मान करो मन. प्रेम का उन्माद जीवन में एक बार, बस केवल एक बार दस्तक देता है. इस सुरीले दस्तक को अनसुना मत करो. यह उन्माद एक बार लौट गया तो लाख बुलाओ, नहीं आएगा यह. नहीं आएगा मन.

जानती हो, ऐसे विराट उन्मादों के बारे में वॉल्टर बेंजामिन क्या कहते हैं? वे कहते हैं,''हममें से किसी के पास समय नहीं था कि हम अपने जीवन के असली नाटकों को जी सकें, जो हमारी नियति में लेखे थे. यही चीज़ हमें बूढ़ा बनाती है-सिर्फ़ यह, और कोई नहीं. हमारे चेहरों की झुर्रियाँ और सलवटें उन विराट उन्मादों, व्यसनों और अंतर्दृष्टियों की ओर संकेत करती हैं, जो हमसे मिलने आए थे और हम घर पर नहीं थे.''

इसलिए कहता हूँ, इस उन्माद में डूब जाओ मन. जहाँ हो, जैसे हो, वहीं उठ खड़ा होओ, और तन जाओ. और वहीं इस उन्माद में नाच उठो. बस तुम और तुम्हारा यह उन्माद. सिर्फ़ तुम और तुम्हारा यह विराट उन्माद. जीवन का सबसे, हाँ सबसे सुंदर उत्सव है यह-इसे जीयो मन, इसे जीओ मन. इस उत्सव का, चालीस बसंत बाद तुम्हारे जीवन के द्वार पर दस्तक देते इस सुंदर उन्माद का स्वागत करो, सम्मान करो. अपनी दुनिया की चौखट से जरा बाहर आकर देखो तो सही, सामने कौन खड़ा है? क्या यह तुम्हारा श्रीकांत नहीं कोई और है?

मन, मैं तुम्हें मूरख इसलिए कहता हूँ क्योंकि तुम चालीस बसंत बाद आए इस सुंदर उन्माद का खुलकर स्वागत नहीं कर पा रही हो. और उस सुपुरुष श्रीकांत का भी नहीं, जो तुम्हें दुनियाँ की सबसे सुंदर स्त्री कहता है. तुम्हें भय है कि इस उन्माद से वह सबकुछ नष्ट हो जाएगा, जिसके साथ अभी तुम जी रही हो. लेकिन मूरख. ओ मूरख. प्रेम रचता है, बनाता है. अगर प्रेम से कुछ मिट रहा है तो मानो, जानो, समझो कि वह मिटता ही, उसे मिटाता ही था. प्रेम के उन्माद से जो मिट जाए, वह तो माटी के ढेले से भी बदतर हुआ न? उस पर क्यों शोक मनाना? मन, स्वार्थ का सच दिखाता है प्रेम का उन्माद. इस स्वार्थ के सच को भी देखो मन. जहाँ तुम एक स्त्री नहीं, कभी न थकने वाला एक कमाऊ यंत्र हो.

और मैं तुम्हें क्षुद्र इसलिए कहता हूँ कि तुम जहाँ गिरी पड़ी हो, वहाँ से उठना नहीं चाहती. मैं हाथ भी बढ़ाता हूँ तो भी उठना नहीं चाह रही. बस, वहीं पड़े-पड़े जीना चाहती हो. जैसे अब तक जीती आई, घुट-घुटकर, पिस-पिसकर जीती आई, अब भी वैसे ही जीना चाहती हो. फिर मेरे हाथ बढ़ाने का क्या अर्थ रहा? फिर तुम्हारे जीवन में चालीस बसंत बाद मेरे आने का क्या अर्थ रहा? क्या मैं इतना बेमोल, इतना व्यर्थ, इतना बेमतलब, इतना तुच्छ हूँ कि मैं किसी का सहारा नहीं बन सकता? फिर मुझे श्रीकांत कहके क्यों पुकारा? फिर तो मैं एक अजनबी से भी ज़्यादा अनजान ही ठहरा न? बोलो मन, बोलो, यह क्षुद्रता है या नहीं? जो किसी भय के पाँवों में ही पड़े रहना चाहता हो; प्रेम का, सच्चे प्रेम का संबंल, सामर्थ्य, सहारा पाकर भी नहीं उठना चाहता हो, उसे क्या पतित करना भूल होगी?

या फिर कह दो, जितना मैंने कहा, सब झूठ, मेरा प्रेम झूठा. या फिर मैं ही कह दूँ-तेरा प्यार झूठा. हाँ, तू झूठी.

मन, यदि हमारा प्रेम सच्चा है, शाश्वत है तो तोड़ डालो इस भय के बंधन को. मुक्त हो जाओ मन के इस आदिम अंधकार से. और मेरे प्रेम के प्रकाश में नहा उठो, जगमगा उठो. तुम्हारे मन के अंधेरे से मेरे मन, मेरी आँखों में अंधेरा छाने लगा है. मुझे इस अंधेरे में डूबने से बचाओ. मैं तुम्हारे लिए, सिर्फ़ तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ. मन, मैं तुम्हारे बहाने जीना चाहता हूँ. मन, मैं जीना चाहता हूँ. मुझे बचाओ. मुझे बचा लो मन. मैं चाहता हूँ, बीस साल बाद जब तुम मेरे घर-अपने घर आओ तो मैं तुम्हारी गोद में सिर रखकर, तुम्हें बार-बार चूमकर यह ख़त दुबारा पढ़ूँ, दुबारा पढ़कर सुनाऊँ. और फिर-फिर तुम्हें खूब-खूब चूमूँ. और फिर तुम्हारी ही गोद में बीस साल तक ठहरी, बीस साल गहरी नींद सो जाऊँ. बोलो न मन, मेरा यह छोटा सा सपना सच होगा न मन? इस सच्चे सपने को मरने तो नहीं दोगी न मन? मेरी मन, हाँ केवल मेरी मन. बोलो न. बोलो न. बोलो न मन.

बस तुम्हारा,
केवल तुम्हारा,
श्रीकांत

ख़त के आखिर में कुछ और प्यार-भरी इबारतें थीं

''प्रीत करियो तो ऐसे करियो जैसे कपास,
जीते जी तन ढाँके, मरने पर भी ना छोड़े साथ.''

''प्रेम-प्रेम सब करे, प्रेम ना जाने कोय,
जो आठों पहर बहे, सो ही प्रेम हो.''

और आखिर में जगजीत सिंह की गज़ल की ये पंक्तियाँ थीं

''तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को,
तुझे भी अपने पे एतबार है कि नहीं.''

श्रीकांत ने देर रात जागकर, मन के प्यार में सराबोर होकर, तन्हाई के आगोश में डूबकर यह ख़त लिखा था. ख़त को पूरा कर उसे अजीब-सी खुशी मिली और उसके पूरे बदन में एक मीठी-सी सिहरन दौड़ गई. उसने अपने ही लिखे ख़त को, अभी-अभी लिखे ख़त को बार-बार, कई-कई बार पढ़ा; बार-बार चूमा, कई-कई बार चूमा. फिर आखिर में उसने इस ख़त को अपने पूजाघर के देवी-देवताओं के श्रीचरणों में रात भर के लिए सौंप दिया. मानो, उसने इस ख़त को मन के लिए नहीं, इन्हीं देवी-देवताओं के लिए लिखा हो. फिर उसने अपने कमरे की बत्ती बुझाई, अपने सेलफोन से मन को मिस्ड कॉल किया, मन ही मन ईश्वर को याद किया, अपने मन को याद किया, रोज की तरह मन को अपने पास बुलाया और सो गया. सोते हुए उसने महसूस किया कि आज की रात उसे बड़े दिनों बाद बड़ी गहरी नींद आएगी.

 श्रीकांत ने देर रात जागकर, मन के प्यार में सराबोर होकर, तन्हाई के आगोश में डूबकर यह ख़त लिखा था. ख़त को पूरा कर उसे अजीब-सी खुशी मिली और उसके पूरे बदन में एक मीठी-सी सिहरन दौड़ गई. उसने अपने ही लिखे ख़त को, अभी-अभी लिखे ख़त को बार-बार, कई-कई बार पढ़ा; बार-बार चूमा, कई-कई बार चूमा. फिर आखिर में उसने इस ख़त को अपने पूजाघर के देवी-देवताओं के श्रीचरणों में रात भर के लिए सौंप दिया.

प्रिय पाठकों, जब तक श्रीकांत नींद से जागे, तब तक आइए, श्रीकांत के बारे में आपको कुछ-कुछ बता दूँ. वैसे बताने के लिए कुछ-कुछ से ज़्यादा कुछ है भी नहीं. श्रीकांत लंबा, छरहरा, थोड़ा सांवला लेकिन सुंदर इंसान है. मिजाज से संजीदा लेकिन रूमानियत भी थोड़ी-थोड़ी चस्पाँ है चेहरे पर. इस तेज़ रफ़्तार भागती दुनिया में भी गाँधी जी उसके आदर्श हैं. चाहे लाख मुसीबत आ जाए, वह सच का साथ नहीं छोड़ता, ईमानदारी की ज़िंदगी से तंग नहीं आता, लालच की धूल से अपनी हमेशा थोड़ी हँसती-थोड़ी उदास आँखों को भोंथरा नहीं होने देता. अकेला रहता, अकेला जीता, कविताई करता, कभी ख़ुद से कभी अपनी तन्हाई से बातें करता. और अपनी मन से बेपनाह मोहब्बत करता. अपने और अपने ईश्वर से ज़्यादा अपनी मन पे भरोसा करता.

स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी के दिनों में ''फ्लर्ट एंड फॉरगेट'' की पट्टी पढ़ाता फिरने वाला यह श्रीकांत अपने निजी जीवन में प्रेम को जीवन का सबसे सुंदर उत्सव मानता था. बकौल उसके, ''लव इज़ द रिलीजन ऑफ़ माई हार्ट. एंड इट शुड बी द रिलिजन ऑफ द एन्टायर मैनकाइंड.'' प्यार के मामले में उसका एक मात्र सिद्धांत था ट्रिपल 'सी'. यानी, ''काँफीडेंट, केयरिंग एंड कमिटेड.'' और प्यार में उसे बस सीरत चाहिए थी, सूरत नहीं. मन चाहिए था, तन नहीं. ''बॉडी इज द एबोड ऑफ सोल, सोल इज द एबोड ऑफ लव.'' ''ब्यूटी इज ओनली स्कीन डीप.''

मन श्रीकांत की इन्हीं कुछ-कुछ बातों पर मोहित थी. मोहित तो श्रीकांत भी था मन की कुछ-कुछ बातों पर. कुछ-कुछ बातें कुछ-कुछ ऐसी कही जा सकती हैं, जैसे कि मन, मन की सचमुच अच्छी थी. सच्ची थी. हरदम हँसती रहती थी. किसी भी मदद के लिए हरदम हाथ बढ़ाती रहती थी. थोड़ी मोटी थी. लेकिन आँखें उसकी बेहद खूबसूरत थीं. उसमें एक गजब का सम्मोहन था-मीठा-मीठा, भीनी-भीनी खुशबू उठती रहती थी उसकी आँखों में शायद प्यार की. शायद श्रीकांत के लिए. श्रीकांत के जीवन का भूगोल बड़ा उबड़-खाबड़ था और मन के चेहरे पर जीवन के संघर्षों की छाप बड़ी गहरी थी. श्रीकांत कर्मठ और कर्मयोगी होते हुए भी स्वप्नजीवी था, कविमानुस था. मन कर्मठ थी, कर्मयोगिनी थी. श्रीकांत की तरह प्रेमिल तो थी लेकिन भावुक नहीं, व्यावहारिक थी. दोनों को ही दुख की गहरी और सच्ची पहचान थी. या कह लें, दोनों के ही जीवन में जाने-अनजाने दुख ही स्थाई भाव था. और शायद इसलिए भी दोनों एक-दूसरे के करीब थे, एक-दूसरे के करीब आए बगैर.

चित्रांकन - हरीश परगनिहा
चित्रांकन - हरीश परगनिहा

खैर! जब श्रीकांत अगली सुबह जागा तो कमरे में धूप की चहलक़दमी शुरू हो चुकी थी. आज थोड़ी ज़्यादा ही नींदियाई आँखों से उसने जिस चीज़ को सबसे पहले देखनी चाही, वह था उसका रात वाला ख़त. मानो रात-भर में वह ख़त देवी-देवताओं के श्रीचरणों से गायब न हो गया हो. वह उठा, सीधे पूजा-घर गया और ख़त को यथास्थान पाकर बेहद खुश और ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हुआ. मानो उसके ईश्वर ने रातभर उस ख़त की रखवाली की हो. उसने ख़त को उठाया, चूमा और फिर वहीं रख दिया. आज उसने समय से पहले ही शेविंग कर ली; रोज के उलट, भरपेट नास्ता कर लिया; जल्दी नहा-धोकर तैयार हो गया. धूप-बत्ती दिखाई, माथा नवाया, ख़त उठाया, घर के हरेक देवी-देवता के आगे शीश झुकाया, ख़त उठाया और चल दिया.

मन ठीक समय पर ही आई. पर उसे लगा, आज कितनी देर कर दी. उसने बिना लाग-लपेट के, वह ख़त मन को थमा दिया. ख़त थमाते हुए उसके हाथ नहीं काँपे. हाँ, उसकी आँखें प्यार से लबरेज थीं. चेहरे पर एक दीप्ति थी. मन में एक धुन थी. प्यार की धुन.

मन पहले भौंचक्क हुई. फिर खुश हुई. बेहद खुश. बेहद-बेहद ख़ुश. इतनी कि उसकी आँखें छलक आईं. आँखें क्या छलक आईं, वह रो उठी. बुक्का फाड़कर, फफक-फफक कर रो उठी. मानो, पूरी उम्र उसने अपने रोने को बस इसी दिन के लिए रोक रखा था. वह खूब रोयी. जी-भर के रोयी. इतना रोयी कि उसकी साड़ी का पल्लू पूरी तरह भींग गया. भींग तो श्रीकांत भी गया. उसने मन की सूजी आँखों को, माँ की आँखों से, पिता की आँखों से, प्रेमी की आँखों से और कुछ-कुछ ईश्वर की आँखों से देखा. उसने उसकी आँखों से रुक-रुककर फिर छलक उठते आँसुओं की आखिरी बूंदों को कुछ इस तरह छुआ, फिर पोंछा मानो किसी देवी के चरणों से मन्नत के फूल चुन रहा हो. मन थोड़ी सहज हुई तो उसने पीने के पानी का बोतल बढ़ाया. दो घूंट पीकर मन ने बोतल वापस किया और आँखें मूंद ली.

 मन पहले भौंचक्क हुई. फिर खुश हुई. बेहद खुश. बेहद-बेहद-बेहद. इतनी बेहद कि उसकी आँखें छलक आईं. आँखें क्या छलक आईं, वह रो उठी. बुक्का फाड़कर, फफक-फफक कर रो उठी. मानो, पूरी उम्र उसने अपने रोने को बस इसी दिन के लिए रोक रखा था. वह खूब रोयी. जी-भर के रोयी. इतना रोयी कि उसकी साड़ी का पल्लू पूरी तरह भींग गया. भींग तो श्रीकांत भी गया.

कुछ देर बाद उसने आँखें खोली और ख़त पढ़ना शुरू किया. उसकी आँखों से फिर टप-टप आँसू टपकने लगे. वह फिर रोने लगी. पढ़ती गई और रोती गई. ख़त के आखिर तक आते-आते वह फफक-फफककर रोने लगी. जबरन आँसू रोक-रोककर, कभी रोकर, फिर रुककर उसने ख़त पूरा किया. ख़त पूरा क्या किया, फिर ज़ार-ज़ार रोने लगी. रोती गई, रोती गई. ऐसे रोई जैसे संसार की सारी स्त्रियाँ एक साथ रो रही हों. ऐसे रोई जैसे इस ख़त को संसार की सारी स्त्रियों ने एक साथ पढ़ हो. फिर चुप हुई. चुप हुई तो चुप ही रही देर तक. चुप-चुप ही देखते रही श्रीकांत को देर तक, अपलक, एकटक. फिर उसने ख़त को ऐसे सहेजा, मानो जीवन की आखिरी पूंजी सहेज रखी हो.

प्रिय पाठको, यहाँ आकर लेखक असमंजस में पड़ गया है और अब वह आपसे मुखातिब है. क्या यह कहानी बीस साल बाद पूरी होगी? क्या बीस साल बाद श्रीकांत का सपना सच होगा? क्या श्रीकांत को बीस साल तक मन के आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए? क्या श्रीकांत सचमुच बीस साल तक प्रतीक्षा कर पाएगा? क्या बीस साल तक श्रीकांत और मन के बीच प्रेम बचा रह पाएगा? क्या श्रीकांत को बीस साल की प्रतीक्षा के बजाए कहीं किसी और के साथ घर बसा लेना चाहिए? और यदि श्रीकांत बीस साल तक प्रतीक्षा करता रहा और मन नहीं आई तो?

क्या आपमें से किसी के पास जवाब है?

*************
राहुल राजेश
सीएमपीएफ
डी-3, पोस्ट बाक्स-58
धनबाद, झारखंड-826001
rahulrajesh_2006@yahoo.co.in

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