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गुरुवार, 10 मई, 2007 को 21:37 GMT तक के समाचार
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वाश्विता एक नाम

चित्रांकन-हेम ज्योतिका
चित्रांकन-हेम ज्योतिका

कहानी

‘‘कभी-कभी इच्छा होती है कपड़े बदलने के साथ-साथ शरीर भी बदल डालूँ.’’
‘‘क्या...’’
स्वयंभू की दृष्टि वाश्विता के चेहरे पर घूमकर वापस लौट आई वहाँ अनमनेपन की परत के पीछे उसका अपना ठंडा ऊहापोह कुहरे की नाई लिपटा पड़ा था.

रेलिंग की सतह पर दोनों हथेलियाँ टिकाकर खड़ी वाश्विता की मुद्रा में न कोई प्रश्न था न उत्तर की प्रतीक्षा. सामने नीम के तने पर मजबूत पकड़ जमा-जमाकर फैली मनीप्लांट की लतर की दिशा में पसरी निगाहों में छिपी उलझन की लकीर सीधी नीम के खुरदरे तने तक फैली हुई थी. सोच में डूबी उस मुद्रा के पीछे शायद उसके स्वयं के स्वप्न थे. मानों बहुत से स्वप्नों के बीच उनकी सत्यता असत्यता को तौलती हुई वह खड़ी थी. लाल फर्श की पारदर्शिता पर हल्के आसमानी रंग की पोशाक में मूर्तिवत खड़ी वाश्विता की गर्दन की खम में वही राजरानियों वाला सौंदर्य था, सुराहीदार कंधों पर टिकी ऐश्विर्यित मुस्कान से ढ़ंकी लंबोत्तरी गोलाई.

स्वयंभू ने सोचा कि वह वाश्विता करीब जाए, थोड़ा आगे बढ़कर दाहिने कंधे के नीचे बाँह और पीठ पर अपनी दाहिनी हथेली को नरमी से टिका दे और तब शायद उलझनें स्वयं वहाँ से तिरोहित हो जाएँगीं. झाड़ियों के बीच छिप-छिपकर चुनमुन करती चिड़ियाओं के पास चली जाएँगी.

उसने गोलाई में कटी गुड़हल की झाड़ी को देखा, वहाँ पत्तों की ओट पूरी गोलाई में फैली हुई थी, अंदर के गोलक में डालियाँ एक दूसरे में उलझी हुई, उसके अंदर शायद चिड़ियों के घोंसले थे. उस गोल झाड़ी के अंदर से हमेशा चिड़ियों की चुनमुनाहट की आवाज़ आती.

‘‘कल शाम ही ड्रेसिंगरुम में कपड़े बदलते समय यह बात में उगी.’’

‘‘क्या फायदा? फिर से गर्भगृह, फिर बचपन.’’

स्वयंभू ने सोचा कि वह आगे कहे कि फिर एक बार कई वर्ष प्रबुद्ध होने के इंतजार में बीत जाएँगे. इतने सालों में जो इतनी मेहनत से यह सारा कुछ सीखा समेटा गया है पुरानी अड़चनों को परे हटाकर मंजिल की ओर चले गए रास्ते पर आगे और आगे बढ़ने की चेष्टा के बीच समृद्ध वर्ष बिताए गए हैं, वह सारा कुछ फिर से मुट्टी से रेत की नाई फिसल जाएगा. क्या पता फिर से कायाकल्पित जीव वह सब पुराना समेट पाने में सक्षम हो पाए या नहीं.

‘‘हूँ, मेरे मन में भी यही बात आई थी.’’

वाश्विता की अनमनी आवाज़ बरामदे के रेलिंग के पार चली गई. मोटे लकड़ी के डंडों से बनी रैलिंग सफेद पेंट से पुती हुई जड़ भाव में स्थित थी. लकड़ी के लंबे टुकड़ों के पार पूरा बगीचा पसरा पड़ा था. एक, दो, तीन, चार- यहाँ सामने रेलिंग के पूरे 16 डंडे ऊर्ध्व खड़े थे. बीच में बर्फी की शक्ल के काठ के टुकड़े सीधे खड़े डंडों को ऊपर से अपने अंदर समेटते हुए. पूरे बरामदे को घेरने वाले उभरी हुई सतह वाले मोटे डंडे सरीखे लकड़ी के लंबे टुकड़े रेलिंग की ऊपरी सतह को सिरजते हुए लंबाई में बरामदे को घेरे हुए खड़े थे.

उदग्र खड़े 12 टुकड़ों को जोड़कर बनी हुई रेलिंग की एक यूनिट थी. बरामदे को घेरती हुई यहाँ से वहाँ तक फैली हुई, पूरी संरचना के बीच ऐसे चौबीस यूनिट उपस्थित थे. एक लंबा बरामदा था वह.

वाश्विता ने लम्बे बरामदे को एक बार उसकी पूर्णता में पूरा देखा. वहाँ हमेशा की तरह फर्श की लाल पारदर्शिता पसरी पड़ी थी. वहाँ हर समय चिकनी पारदर्शिता को काटते हुए यहाँ-वहाँ रक्खे गए गमलों के पौधों का चिकना हरापन सुबह से शाम तक वहाँ की शाँति फिजा में दमकता रहता.

मांसटेरा की गोलाकार पत्तियों की सतह कमल की तर्ज पर अपने अंडाकार बनावट को छोड़ मानों गोलाई की ओर मुड़ना चाहती. हरे डंठलनुमा तने से एक-एक करके पत्ते निकलते. पहले वे लपेटे गए गोल मुलायम डंडे जैसे दिखते फिर शनैः शनैः एक-एक पत्ति खुलनी शुरु होती. नर्म हरेपन की छाँह में डूबी चिकनी सतह.

वाश्विता ने सभी गमलों को एक साथ देखा, वहाँ पौधों की अपनी दुनियाँ थी, उनका समाज था. छोटे-मोटे, ठिंगने, लंबे. बरामदे के मध्य में गोलाकार फर्श पर बेंत की कुर्सियों के तिरछे झुकाव बेत की गोलाईयों में डूबे हुए. धूप थोड़ी तिरछी होकर छत के मुड़े कोनों से अंदर झाँककर चुपचाप कुर्सियों की पीठ पर पसर गई थी. वहाँ पोर्टिको के खंभे से लेकर बेंत की कुर्सियों तक स्वर्ण रश्मियाँ अगले घंटों में अपना साम्राज्य फैलाने वाली थीं.

 हवा में अनजानेपन की छुअन, धुनों की तेज़ सरगम के संग कौंधने लगतीं, स्वयंभू के अंदर का अजनबीपना वातावरण के ज़र्रे-ज़र्रे पर छा जाता. ऐसे में वाश्विता की इच्छा होती वह स्वयंभू के करीब जाए उसे छूकर महसूस करे

उन स्वर्ण रश्मियों के संग एक-एक जूही के पत्तों से एक-एक सूर्य किरण टकराएगी. कुछ किरणें तो सीधी निकल जाएगी, कुछेक परावर्तित हो इधर-उधर फैल जाएंगी और जूही की लतरों से घिरे मेहराब की ऊपरी गोलाई को बिना छुए हुए धूप का एक गुच्छा सीधा बरामदे की फर्श पर जा लोटेगा. फर्श की सीमेंटी सतह अंतिम किरण के रहने तक प्रकाशित रहेगी, फिर वहाँ एक कच्चा धुंधलका घिर आएगा.

‘‘मैं अंदर जा रहा हूँ.’’

स्वयंभू की आवाज़ गोल मेहराब के पीछे कुनमुना कर छिप गई, वाश्विता ने ड्राईगरुम के दरवाजे से अंदर जाती हुई उसकी आकृति को देखा.

वह स्वयं के आर्गन बजाने का समय था. उसकी एकमात्र बची-खुची हॉबी जिसे उसने एहतियात से संभाल समेट कर रक्खा था.

पिछले बरामदे में खुलने वाले अंदर के गोल कमरे में आर्गन लंबे स्टैंड पर रक्खा रहा करता, छुट्टियों के दिन ढलती शाम के पहले वाले घंटे में स्वयंभू के अंदर एक तलब जाग उठती. एक अनदेखी हवा की तह लहर की शक्ल में उसके बालों के सिरे को छूती, सभी बालों की जड़ें एक साथ सिमसिमा उठती. झुरझुरी की तह बाहों के बालों से लेकर समूची त्वचा पर सरसरा उठती, उसका पूरा ज़िस्म अलग किस्म की लालसा तले लरज उठता, वह जहाँ कहीं भी बैठा होता, बस उठ खड़ा होता.

‘‘एक्सक्यूज मी’’

चित्रांकन-हेम ज्योतिका
चित्रांकन-हेम ज्योतिका

मंत्रबिद्ध सा वह शाम की सपनीली हवा के संग अंदर के गोल कमरे की ओर चल पड़ता. आर्गन पर झुकी उसकी आकृति किसी यूनानीदेव की तरह नर्म धूप-छाँव के बीच खड़ी दिखती. कमर तक सीधी सतर खड़ी आकृति कंघों के पास से थोड़ी झुकी हुई. आर्गन बजाता हुआ वह किसी के पास नहीं होता उस समय वह स्वयं अपने पास भी नहीं रहा करता, वाश्विता ने कई बार इस सत्य को करीब से पहचाना था.

हवा में अनजानेपन की छुअन, धुनों की तेज़ सरगम के संग कौंधने लगतीं, स्वयंभू के अंदर का अजनबीपना वातावरण के ज़र्रे-ज़र्रे पर छा जाता. ऐसे में वाश्विता की इच्छा होती वह स्वयंभू के करीब जाए उसे छूकर महसूस करे.

‘‘मैं कपड़े की तरह शरीर बदल डालना चाहती हूँ.’’ वाश्विता के आवाज़ की गूंज स्वयंभू के पीछे-पीछे चुपके से गोल कमरे तक चली आई थी.

पिछले गोल बरामदे की ग्रिल के करीब खड़े होकर स्वयंभू ने पीछे पसरे बाग के खुले हिस्से को निहारा-अमरुद, नींबू, बेर के झुरमुट के नीचे मिट्टी में जड़ों के पास दिन रात पाइप लगा रहता, सुबह शाम नल आने के समय पानी स्वयं आगे बह-बहकर बीच की पूरी ज़मीन को गीला कर डालता वहाँ बिछी सूखी पत्तियाँ गीले कतरों को अपनी बेतरतीब परतों तले दुबका लेतीं, दूर खड़े नींबू अपनी जड़ों को पसारकर कतरा-कतरा पानी सोख लिया करते. मिट्टी द्वारा निथरी छनी हुई वे बूंदे चढ़ती-चढ़ती ऊपरी तनों तक चढ़ जाती और वाष्पित हो नींबुओं की हरी परत के नीचे छिप जाती.

कुछ पानी वहीं नीचे मिट्टी में पाइप के पास जमा रह जाता, छोटे डबरे की शक्ल में. हर दुपहर वहाँ बुलबुल, हुद-हुद और पंडुक नहाने आते. छोटी गौरेया ऊभ-डूब होक नहाती, बीच-बीच में पंखों को पसार कर धोती. मैना जब नहाती तो स्नान खत्म कर लेने के बाद भी देर तक उसके पंखों की साज संभाल चलती. चोंच घुमा-घुमाकर वह एक-एक पंख को संवारती, बीच-बीच में सिर को ख़ास लय में झटकती.

स्वयंभू ने ऊभ डूभ करके चिड़ियों को नहाते हुए देखा. इनमें से किसी भी चिड़े-चिड़ी को याद है अपना पूर्व जन्म?...

लेकिन वाश्विता तो चिड़ा-चिड़िया नहीं...

थोड़ा तो एहसास रहना ही चाहिए कि किन मुश्किलों से यह दुबारा मिले संग साथ का सफर शुरु हुआ है. उसकी अपनी माँ बार-बार उसके जन्म की बेतरतीबियों का जिक्र किया करती. ऐसे समय में उसके अंदर छिपा हुआ दैवी आश्चर्य वायुमंडल में फैल जाया करता. अंत-अंत तक बच्चे के जन्म के अजन्मे रह जाने की आशंका के विवरण को वे बार-बार दुहराती.

वाश्विता ने भी सुने हैं सारे विवरण, फिर भी वह शरीर बदलने की बात करती है?

अचानक स्वयंभू ने स्वयं अपने मन को बीते समय की परतों के बीच झिलमिली की नाई मन को विचरते हुए देखा. ग्रिल के बाहर बनती-बिगड़ती परछाइयों के बीच स्वप्ननुमा द्वीप उभर आए. वहाँ एक पूरा जन्म स्वप्न की नाई खड़ा हो गया.

बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाले दालाननुमा कमरे के बीचों-बीच रक्खा हुआ बड़ा सा आबनूसी पलंग. कालीन की सतह को छूते झालरदार पलंगपोश के लेस लगे किनारे. उसी जहाज से पलंग पर तो लेटी थी वाश्विता. नहीं, नहीं, मादाम वारेन. बुढ़ापे से जर्जर शरीर के बीच जगमगाती वे आँखें अभी भी स्वयंभू के निकट आकर पूछती है.

‘‘शैल आय स्टे मोर?’’

बुढापे से झुकी कमर लिए कैप्टन वारेन उस शाम पूरे का पूरा पलंग की पट्टी पर झुक गया था.

‘‘ओह!माय डार्लिंग! माय...माय!’’ बीच के वर्षों को लाख तलाशने पर भी उनके बिंब करीब आने से पहले ही हवा की तरह परावर्तित हो जाते हैं.

बीच के खंड में न जाने कितने स्वप्नों की, कितने जन्मों की छाया है, हर स्वप्न को वह कायदे से तयशुदा खाने में सिलसिलेवार ढंग से रखना चाहता है, लेकिन यह हो नहीं पाता.

पिछले दो दशकों में हर पार्टी, हर जमघट के बीच उसका अकेलापन उसके साथ चलता रहा है. उसके मर्दाना सौंदर्य के कंघों पर टिका रहा है. उसे कुछ भी मोह न पाता था न लंबे सरु के वृक्ष से कद, न आकांक्षाओं से भरी निगाहें. एक कालखंड में दूसरों से नियत एक दूरी को साथ लिए हुए वह इस वर्तमान कालखंड में मंत्रबिद्ध देव सा विचरता रहता था. उसका अंतर्मन यह तो इंगित करता था कि ये नहीं, वो भी नहीं, लेकिन वास्तव में क्या? उसे क्या चाहिए था-यह हवा की किसी भी तह में मौजूद नहीं रहा करता था वहाँ उपस्थित रहती थी एक बैचेनी और ढेर सारे उलझनों भरे ऊन सरीखे गोले, जिनके बीच उसका मानस कैद रहा करता था.

लेकिन अनपेक्षित गंध की तरह वह शाम एक दिन उसके जीवन में आ गई थी.

गुलमुहर के गुच्छों से आसमान के कोने रंगे हुए थे. लाल नारंगी कौंध पुष्प बनी आकाश की चादर पर आयतन सरीखी पसरी पड़ी थी. डामर के सड़क की काली छाती जगह-जगह पुष्पों की पंखुरियों के भार तले उदभासित थी, लालिमा की प्रकाशित तरंगों के बीच सड़क अलग किस्म से आभामंडित थी.

उस शाम डिपार्टमेंटल स्टोर से मैकरोनी, मशरुम, टमाटर और चीज के पैकेट लेकर वह निकला था. वह कार के दरवाज़े को बंद कर चलने की तैयारी में था, उसने चाभी कार में घुमाई नहीं थी, स्टार्टर भी चुप था तभी स्टियरिंग के करीब झुककर एक प्रश्न ठिठक गया था.

‘‘डू यू नो मिस्टर करंजी ज प्लेस?’’

मिसेज वारेन की खनकती आवाज़ की गूज के बीच चौंका हुआ स्वयंभू कब दरवाज़ा खोलकर बाहर आया, कब तक पसीने से भींगे चेहरे पर रुमाल रगड़ता रहा था, याद नहीं. बीच-बीच में फंसी आवाज़ में वह लगातार दुहराता रहा था.

चित्रांकन - हेम ज्योतिका

‘‘एक्सक्यूज मी, एक्सक्यूज मी’’

उस दौरान वाश्विता आश्चर्य से भरी हुई अपलक उसे निहारती खड़ी रही थी.

‘‘हैव आय डिस्टर्ब्ड यू एनी वे?’’

पिछले जन्म में सुनी हुई वह अदभुत सौंदर्यवती आवाज़ फिर से कभी अपने समस्त अनुगूंजों समेत उसके करीब गूंजेगी, स्वयंभू को अपने किसी भी स्वप्न के दौरान इस बात का भरोसा नहीं था.

‘‘प्लीज बी सीटेड. मैं उधर ही जा रहा हूँ, आपको छोड़ दूँगा.’’

उस शाम वह गाड़ी लेकर नहीं चला था, स्वयं उसे गाड़ी समेत लिए जा रहा था. आगे और आगे. कार दौड़ती रही थी, बिना वजह और आगे. दो किलोमीटर की जगह उसने भुलभुलैया से भरी सड़कों वाले उस शहर में लंबा रास्ता चुना था. तिहारे-चौराहों से भरी कालोनियों को उसकी गाड़ी ने बार-बार पार किया. तालाबों के बगल से वह बार-बार गुजरा, सड़क किनारे लगे वृक्ष उसके नजदीक आते-जाते एकदम से पीछे छूट जाते. जानबूझर वह पूरी शाम लंबे रास्तों पर गाड़ी दौड़ाता रहा था. वह वाश्विता को अपने से दूर नहीं होने देना चाहता था. मिसेज वारेन को फिर उसने पा लिया था.

घर ढूंढने के नाटक के बीच वाश्विता निश्चिंत बैठी रही थी. स्वयंभू को केप टाउन के उस विशाल कमरों वाले घर की याद आई जिसकी खिड़कियों और दरवाज़ों के बीच मात्र ढाई फुट की ऊँचाई का फर्क था. ऊँची दीवारों और चिकनी छतवाले कमरे, पोर्टिको के चौकोर खंभे नाइट लैंप के बीच भुतहे दीखते. लंबी ड्राइव के बीच घंटों वह ड्राइविंग सीट पर रहा करता और मादाम वारेन बैठी रहतीं मिस्टर वारेन की बगल में.

उस शाम ड्राइव करते हुए उसने धीरे से वाश्विता की ओर देखा था, अंडाकार चेहरे पर तनी हुई भवों के नीचे पुतलियाँ कुछ सोचती सी थीं. बाल कंधों को छूते कटे हुए नहीं थे लेकिन वे कंधे पर गुच्छों की शक्ल में अब भी टिके हुए थे.

शहर के बाहर निकलने वाले फ्लाइ ओव्हर के ऊपर से गुजरते हुए उसने पाया कि नीचे बहते ट्रैफिक का रेला पुल के सबसे लम्बे पायों के बीच चलता-चलता गुम हो जाता दीख पड़ता था और तब वहाँ नीचे बहती हुई सलेटी काली नदी के बहने का गुमान होता था, जो वहाँ थी ही नहीं.

 उसने लंबी सड़क को उसके पूरे स्वरुप में देखा था अशोक के लंबे वृक्षों की कतार, उनके पीछे पसरा खेत, जिसके अंतिम किनारे की रेख ने स्वयं को पूरा तानकर क्षितिज की गोलाई के बीच घुल जाने के लिए छोड़ दिया था

स्टियरिंग पर टिकी हथेलियों से जुड़ी बाहों और पूरे शरीर के साथ बैठा वह कार चलाता रहा था, लेकिन उसका मन पिछले बिताए काल की ओर जोरों से दौड़ पड़ा था. मिस्टर व मिसेज वारेन के बिम्ब वहीं उस काल के बीच टिके खड़े थे. एक किस्म के जादुई आवेश की चौंकन तले घिरा वह पूरे रास्ते एकदम मौन रहा.

आखिरकार गंतव्य पर कार पहुँची थी-करंजी हाउस. वाश्विता उतरकर खिड़की के नजदीक आई थी.

‘‘थैंक्यू, मुझे बिलकुल नहीं लगा कि किसी अजनबी के साथ बैठी हूँ. बड़े लेक के पास की कालोनी में मेरा घर है, बंगला नं.210. कीप माय कार्ड.’’

स्वयंभू बिना कुछ कहे गाड़ी आगे बढ़ा ले गया था.

उस पूरी रात वह बिना वजह शहर की सड़कों पर गाड़ी के दौड़ते पहियों के साथ चला था. वह रात वैसी ही बितानी तय थी शायद. उस रात न तो वह अपने बीते हुए समय से ऊबर पा रहा था न ही बीता हुआ वक़्त उसे छोड़ने को तैयार था. बत्तियों की लंबी कतार विंडस्क्रीन पर उभरती एक,दो,तीन. अनगिनत चमचमाती चेतावनी ----

आसमान पर सलेटी नीलाहट के साथ ललाई के कतरे उतर आए थे तब उसे हल्की सी थकान ने नरमी से छुआ था. कार रोक वह वही उस सड़क के शुरुआती कदमों पर ठहर गया, थर्मस से निकाली गई काली काफी के गर्म घूंट उसके अंदर पूरब के आसमान की समस्त उजास भरते रहे थे. सुनहले रेशों में डूबी हल्की ललाहट.

उसने लंबी सड़क को उसके पूरे स्वरुप में देखा था अशोक के लंबे वृक्षों की कतार, उनके पीछे पसरा खेत, जिसके अंतिम किनारे की रेख ने स्वयं को पूरा तानकर क्षितिज की गोलाई के बीच घुल जाने के लिए छोड़ दिया था. उस सुबह भी वहाँ सूरज पहले अपने मस्तक के सबसे ऊपरी बिंदु में जड़ें सुनहले लाल हीरे की कनी को निकाल जगमगाया था.

प्रहरों पर छाया अनिश्चितता का आलम समाप्त हो चुका था. उतनी सुबह उसने अपनी गाड़ी बंगले नंबर 210 की ओर मोड़ दी थी, उसके अंदर वाश्विता की नींद से तुरंत जागी हुई आंखों को देख पाने की इच्छा जादू की तरह जागी थी.

अल्लसुबह वह उसके घर के आगे आ खड़ा हुआ था, घंटी बजाने पर स्वयं वाश्विता ने ही दरवाज़ा खोला था ‘मादाम वारेन’.

वाश्विता उसे देखकर बिल्कुल नहीं चौंकी थी. वह अंदर आकर चुपचाप सोफे पर बैठ गया था. घर की मालकिन चाय बनाने किचन में चली गई थी.

तब से आज तक वे एक दिन के लिए भी अलग नहीं हुए थे....स्वयंभू ने एक साथ बीते हुए सभी दिनों के बारे में सोचा था.

शाम की गंध कमरे में फैलने लगी. एकदम धीमे-धीमे, स्वयंभू ने पहले आर्गन पर मद्धम सुरों को साधने की चेष्टा की. फिर अचानक तेज सुर स्वयं उसके करीब आ गए.
‘‘कम टू मी...ओ ...कम..अलोन...

धूप तिरछी होकर दीवार पर तैर उठी थी, गोलाकार बिंब एक दूसरे में उलझे हुए. उनके बीच पत्तों की छाया. पत्तों की छायाओं के बीच रोशनी के घेरों से निर्मित निरंतर प्रवाहित जादू. उथल-पुथल भरा जादू. कमरे के सन्नाटे ने ऊपर उठकर रोशनदान के शीशे को छुआ फिर पल्लों के तिरछे दरार से होकर बाहर निकल गया.

आज यह धुन क्यों?’’

वाश्विता के चेहरे पर पुराने दिन अनधुले रूप में चिपके खड़े थे.

नहाधोकर आई हुई दरवाज़े के फ्रेम में खड़ी वह किसी महारानी की तरह अपनी शानदार कत्थई पोशाक के बीच तनी खड़ी थी.

स्वयंभू डूबकर मुस्कुराया.

दो पंजे नजदीक आए और नजदीक.

छाती पर छिपटी कलाइयाँ और पीठ पर सलोने चेहरे का नर्म दबाव, ‘‘स्वाम्भो!सौमी!माय डार्लिंग!’’

स्वयंभू ने गहरी सांस खींची. मन में दुहराया, ‘‘नहीं. इस बार दोनों साथ जाएंगे. चाहे जहां भी.’’

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इला कुमार
102, श्री गणेश इन्कलेव
गायत्री नगर रोड, नागपुर-22
ilakumar2002@yahoo.co.in

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