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निशाना चूक गया है एकलव्य | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सात साल बाद निर्देशक के रूप में फ़िल्म एकलव्य लेकर आए हैं विधु विनोद चोपड़ा. एकलव्य जो कहानी है -एक शाही अंगरक्षक की. कहानी गढ़ी गई है राजस्थान की पृष्ठभूमि में. अमिताभ बच्चन कहानी के मुख्य पात्र हैं और पूरी फ़िल्म में कहानी उनके ही ईर्द-गिर्द घूमती है. एकलव्य यानी अमिताभ बच्चन देवीगढ़ के शाही परिवार के अंगरक्षक हैं. एकलव्य शाही परिवार की सुरक्षा तो करता ही है लेकिन वो एक रहस्य का भी राज़दार है. ऐसा रहस्य जो राजा (बोमन ईरानी) को तो पता है लेकिन उन्हें भी खटकता है. इसी रहस्य और इससे जुड़े शाही परिवार के ताने-बाने को कहानी में बुनने की कोशिश की है विधु विनोद चोपड़ा ने. लेकिन लेखक अभिजात जोशी और विधु विनोद चोपड़ा इस कहानी के आसपास एक रोचक ड्रामा नहीं रच पाए हैं. कहा जा सकता है कि एकलव्य एक ऐसा ख़ूबसूरत शरीर है जिसमें आत्मा है ही नहीं. विधु विनोद चोपड़ा ने सबसे बड़ी ग़लती की है- रहस्य को फ़िल्म के शुरू में ही उजागर करके. रिश्तों की कहानी में रिश्ते कहाँ? वैसे तो एकलव्य रिश्तों की कहानी है लेकिन ना तो चरित्रों को ठीक तरह से गढ़ा गया है और ना ही आपसी रिश्तों को ठीक तरह से स्थापित किया गया है.
आपसी रिश्तों को संवाद के ज़रिए काफ़ी नाटकीय बना दिया गया है और इससे भी फ़िल्म का भला नहीं होता. अगर कमर्शियल फ़िल्मों के नज़रिए से देखें तो भी फ़िल्म में कई कमियाँ हैं. फ़िल्म में रोमांस का अभाव है. जो थोड़ा-बहुत है, उसे भी ठीक से नहीं प्रस्तुत किया गया है. भावनाएँ दिल को नहीं छू पातीं. सबसे दुर्भाग्य की बात है कि एकलव्य (अमिताभ बच्चन), हर्षवर्धन (सैफ़ अली ख़ान), और उनकी प्रेमिका रज्जो (विद्या बालन) आँसू तो जमकर बहाते हैं लेकिन दर्शक उनके दुख से अपने को नहीं जोड़ पाता. कॉमेडी तो क़रीब-क़रीब है ही नहीं. संगीत कम ही है और जो हैं वो माहौल को हल्का करने में विफल रहता है. ड्रामे में कोई बदलाव नहीं आता और गति तो इतनी धीमी है कि पौने दो घंटे की फ़िल्म भी दर्शकों को तीन घंटे वाली लगती है. अगर कहानी और स्क्रीनप्ले कमज़ोर है तो डॉयलॉग भी इतने साधारण हैं कि लोगों को नहीं पचते. कई बार तो डॉयलॉग इतने धीमे रिकॉर्ड किए गए हैं कि सुनाई ही नहीं देते. अगर मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को डॉयलॉग सुनने में परेशानी होती है तो सिंगल स्क्रीन वालों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा होगा, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है. जहाँ तक अभिनय की बात है, तो ज़्यादातर कलाकार अपने रंग में नहीं दिखते. शायद कमज़ोर स्क्रिप्ट के कारण ही ऐसा हुआ है. फ़िल्म के कुछ अच्छे हिस्सों में भी अभिनय फींका ही दिखता है. हालाँकि अमिताभ बच्चन ने अच्छा काम किया है लेकिन एक अंगरक्षक का चरित्र उनकी छवि से मेल नहीं खाता. राजकुमार हर्षवर्धन के रूप में सैफ़ अली ख़ान का काम भी औसत है. रोमांस कम थकान ज़्यादा वे थके हुए नज़र आते हैं. विद्या बालन को फ़िल्म में काफ़ी कम मौक़ा मिला है. उनमें अभिनय प्रतिभा तो है ही लेकिन उनके चरित्र को दर्शकों की सहानुभूति नहीं मिल पाती. क्योंकि उनका रोमांटिक पक्ष ना तो फ़िल्म में ठीक तरह दिखाया गया है और ना ही उसकी व्याख्या सही से की गई है.
एक पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में संजय दत्त गेस्ट रोल में हैं. बोमन ईरानी राजा की भूमिका में फिट नहीं बैठते. एक प्रतिशाली कलाकार जो फ़िल्म में राजा की पोशाक और उसके गेट-अप में दिखने के लिए जूझता है. शर्मिला टैगोर की तो ऐसी भूमिका है ही नहीं, जिस पर बात की जाए. फ़िल्म में जैकी श्रॉफ़ बुरे लगे हैं. वे फ़िल्म में इस तरह रिएक्ट करते हैं, जैसे उन्हें दोबारा कैमरे के सामने आने का मौक़ा ही नहीं मिलेगा. निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने फ़िल्म को देखने योग्य बनाने के लिए अच्छा फ़िल्मांकन किया है. कई एंगिल से शूटिंग की गई है लेकिन कमज़ोर स्क्रिप्ट के कारण यह भी विफल हो गया है. संगीत तो अपील करने वाला है. लेकिन फ़िल्म में ऐसी जगह आता है जब दर्शकों पर उसका कोई असर नहीं पड़ता. हाँ, बैकग्राउंड म्यूज़िक बहुत प्रभावी है. नितिन देसाई का सेट आँखें खोलने वाला है. एक्शन दृश्य ख़ासकर ऊँटों की दौड़ और ट्रेन में फ़िल्माए गए दृश्य बहुत अच्छे हैं. हो सकता है कि एकलव्य को एक ख़ास वर्ग की सराहना मिले लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म का भविष्य अच्छा नहीं दिखता. |
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