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होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने शायर तो वो अच्छा है प' बदनाम बहुत है ग़ालिब ने अपने बारे में यह भी कहा था और यह भी कि और पंद्रह फ़रवरी को ग़ालिब की बरसी के मौक़े पर दुनिया भर से आए लोगों ने बस्ती हज़रत निज़ामुद्दीन में स्थित मज़ारे-ग़ालिब पर जमा हो कर यही ज़ाहिर किया कि ग़ालिब को आज भी उसी शिद्दत से याद किया जाता है. इस मौक़े पर ग़ालिब की ग़ज़लों को गाया गया, उनके मज़ार पर फूल की चादर चढ़ाई गई और मुशायरे के माध्यम से ग़ालिब को श्रद्धांजलि पेश की गई. इस समारोह का आयोजन अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (दिल्ली) ने किया और इसमें दिल्ली उर्दू अकादमी, ग़ालिब इंस्टीच्यूट और अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिंद) ने सहयोग किया. यह वर्ष भारत में पहले स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है इसलिए भी यह समारोह यादगार रहा.
इस वर्ष ग़ालिब के नाम पर एक पार्क का नाम रखा गया और ऐवाने ग़ालिब में ग़ालिब की प्रतिमा भी स्थापित की गई और आयोजकों ने इस समारोह में मेट्रो रेल के एक स्टेशन का नाम ग़ालिब के नाम पर रखने की मांग भी की. इसी के साथ दिल्ली के साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन पर सेमिनार का भी आयोजन हुआ. इस अवसर पर एक तरही मुशायरे का भी आयोजन हुआ जिसमें इक़बाल मिर्ज़ा (लंदन), गुलज़ार देहलवी और दूसरे जाने-माने शायरों ने ग़ालिब की ज़मीन में ग़ज़लें पेश कीं. उस मुशायरे को तरही मुशायरा कहा जाता है जिसमें शेर की एक पंक्ति दी जाती है और उसी पंक्ति के आधार पर शायर अपनी ग़ज़लें पेश करते हैं. यह परंपरा ग़ालिब के ज़माने में भी थी और दिल्ली के लाल क़िले में उस युग के जाने-माने शायर ग़ालिब, ज़ौक़, मोमिन और ख़ुद बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र अपने कलाम पेश करते थे. इस बार ग़ालिब के जिस शेर को तरह (आधार) के तौर रखा गया था वह इस प्रकार है सब कहाँ कुछ लालओ-गुल में नुमायां हो गईं समारोह में वक्ताओं का कहना था कि शाहजहाँ की बसाई हुई दिल्ली या उनसे पहले निज़ामुद्दीन औलिया की दिल्ली हिंदू-मुसलमान साझा संस्कृति की अदभुत मिसाल थी. हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल इसमें जिस धूमधाम से ईद और शबेबारात मनाई जाती थी उसी धूम से होली और दीवाली भी मनाई जाती थी और फूल वालों की सैर तो साझा संस्कृति की मिसाल थी ही. दिल्ली के मश्हूर लेखक ख़्वाजा हसन निज़ामी की किताबों का हवाला देते हुए वक्ताओं ने कहा कि दिल्ली के पहनावे, बोलचाल, शादी ब्याह में हिंदू-मुसलमान एक ही रंग में रंगे हुए थे. दिल्ली के साहित्यिक जीवन के हवाले से यह बात सामने आई कि ग़ालिब के ज़माने के शायरों के तज़करे (विवरण) में 84 हिंदू शायरों का नाम शामिल है जो उर्दू में शायरी करते थे. उसके बाद लिखी गई एक और किताब में दो सौ से ज़्यादा हिंदू शायरों के नाम दर्ज हैं. ग़ालिब की ग़ज़लें ग़ालिब की मशहूर ग़ज़लों को अब्दुर्रहमान ने राग दर्पण, राग दीपक और दूसरे रागों में गाया जिनमें ये ग़ज़लें शामिल थीं नक़्श फ़रयादी है किसकी शोख़ीए तहरीर का शौक हर रंग रक़ीबे सरो सामां निकला |
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