फ़िल्म रिव्यू: तलवार

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- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
फ़िल्म: तलवार
निर्देशक: मेघना गुलज़ार
कलाकार: इरफ़ान, कोंकणा सेन शर्मा
रेटिंग: ****
कोई रियलिस्टिक फ़िल्म बनाने का सबसे आसान तरीक़ा?
किसी असल घटना पर आधारित फ़िल्म बना लो. सिंपल.
अब जिस घटना पर ये फ़िल्म आधारित है उसमें इतना ड्रामा है कि किसी अतिरिक्त ड्रामे की रत्ती भर भी ज़रूरत नहीं.
आरुषि केस पर आधारित

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फ़िल्म 2008 में हुए आरुषि मर्डर केस पर आधारित है.
एक ऐसा केस जिसकी जांच तीन अलग-अलग टीमों ने की.
जिसका महीनों-महीनों तक अख़बारों, तमाम वेबसाइट्स, पत्रिकाओं में कवरेज हुआ. हज़ारों घंटे टीवी पर पैनल डिसकशन हुआ.
बेहतरीन रिसर्च कर लिखी हुई एक बेस्ट सेलिंग किताब (अविरूक सेन की आरुषि) आई.
घटना के सात साल बाद उस पर आधारित ये फ़िल्म आई.
हत्यारा कौन?
लेकिन अब तक उस रहस्यमयी हत्यारे को छोड़कर किसी को नहीं पता कि आरुषि की हत्या किसने की.
और ये भी ज़ाहिर है कि वो हत्यारा ख़ुद तो ये बात बताने हमारे सामने आने से रहा.
मान लिया जाय कि आपकी याददाश्त या तो बहुत कमज़ोर है या फिर आप इस घटना के एक-दो साल पहले ही पैदा हुए. इसलिए मेरा फ़र्ज़ है कि संक्षेप में आपको पूरी घटना बता दूं.
घटना

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हमें चार बातें इस केस के बारे में पता है.
पहली बात- 14 साल की आरुषि (फ़िल्म में श्रुति) अपने बिस्तर पर मरी हुई पाई जाती है.
उसके सर पर चोट का निशान है और गला कटा हुआ है.
दूसरी बात- बिलकुल इसी हालत में घर के नौकर हेमराज (फ़िल्म में खेमपाल) की लाश छत पर पाई जाती है.

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तीसरी बात- दोनों पर जब हमला होता है तो लड़की के मां-बाप तलवार दंपति (फ़िल्म में टंडन) घर में सोते रहते हैं.
और चौथी और सबसे ज़रूरी बात- नोएडा पुलिस के हवलदार से लेकर बड़े अधिकारी तक ने इस केस का कबाड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
तो इस अपर मिडल क्लास हाउसिंग सोसायटी वाले घर में उस रात हुआ क्या होगा?
फ़िल्म इन्हीं संभावनाओं पर विचार करती है. और ये संभावनाएँ ख़ून जमा देने वाली हैं.
ज़बरदस्त फ़िल्म
फ़िल्म में एक भी सीन बेकार में नहीं ठूंसा गया है.
विशाल भारद्वाज की लिखी कहानी बड़ी कसी हुई है.
फ़िल्म की बाक़ी चीज़ें भी बड़ी प्रभावी हैं.
लाइटिंग, कैमरावर्क, सेट डिज़ाइन, कुछ भी ऐसा नहीं है जो बेकार में आपका अटेंशन पाने की कोशिश करती है. सब कुछ बेहद वास्तविक है.
ज़ोरदार अभिनय

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सभी कलाकारों का अभिनय कमाल है.
चाहे सीबीआई के जल्द रिटायर होने वाली चीफ़ की भूमिका में प्रकाश बेलवाडी हों या नौकर खेमपाल की भूमिका निभाने वाला कलाकार या फिर लड़की के पिता की भूमिका में नीरज कबी, जिन्हें हमने शिप ऑफ़ थीसियस में देखा था तब वो कुपोषित से नज़र आते थे.
इस फ़िल्म में डॉक्टर टंडन का रोल निभाने के लिए उन्होंने थोड़ा वज़न बढ़ाया है.
वैसे फ़िल्म ख़ास तौर पर फ़ोकस करती है सीबीआई अफ़सर अश्विन कुमार (असल ज़िंदगी के अरुण कुमार) पर.
इरफ़ान ने इस तेज़ तर्रार ईमानदार अफ़सर की भूमिका निभाई है.
आरुषि केस की जांच कर रही टीम में शायद एकमात्र यही क़ायदे के अफ़सर हैं.
वास्तविक फ़िल्म
आरुषि केस इतना अलग और अनोखा क्यों बन पड़ा है ये फ़िल्म उसे ख़ूबसूरती से दिखाती है.
फ़िल्म उच्च और निम्न आय वर्ग के लोगों के बीच के भेदभाव, नौकर के प्रति मालिक के पूर्वाग्रह और पुलिस के असंवेदनशील रवैए को दिखाती है जिसने बिना जांच पड़ताल के लड़की की निजी ज़िंदगी के बारे में अपनी धारणा को चटखारे लेकर सार्वजनिक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

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फ़िल्म सीबीआई की कार्यप्रणाली पर भी प्रकाश डालती है.
आरुषि केस पर आधारित अविरूक सेन की किताब को जितने लोगों ने पढ़ा है, उम्मीद है कि फ़िल्म को उससे ज़्यादा लोग देखेंगे.
सीबीआई रिपोर्ट फ़ाइल करती है कि इस डबल मर्डर केस में किसी को दोषी बनाने के लिए उसके पास पर्याप्त सबूत नहीं है.
तलवार दंपति (फ़िल्म में टंडन दंपति) इस रिपोर्ट के ख़िलाफ़ अपील करते हैं, क्योंकि वो 'जानना' चाहते हैं कि उनकी बेटी को आख़िर किसने मारा.
वो उसी रिपोर्ट के ख़िलाफ़ अपील दायर करते हैं जिसके आधार पर वो उम्र क़ैद की सज़ा काट रहे हैं.
इस अपील पर फ़ैसला आने में एक दशक भी लग सकता है तब तक तो उन्हें जेल में ही रहना पड़ सकता है.
इस फ़िल्म से एक बात तो सबको समझ आ ही जाएगी.
वो ये कि आरुषि केस का किस तरह से कबाड़ा किया गया.
फ़िल्म को टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप ने सपोर्ट किया है. मुझे नहीं पता कि फ़िल्म को लेकर उनका कितना कमिटमेंट था सिवाय पैसा लगाने के.
लेकिन ये फ़िल्म आरुषि हेमराज मर्डर केस को रिओपन करने का ज़रिया बन सकती है.
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