कैलेंडर गर्ल्स: 90 के दशक की 'मधुर' यादें

कैलेंडर गर्ल्स
    • Author, मयंक शेखर
    • पदनाम, फ़िल्म समीक्षक

फ़िल्म कैलेंडर गर्ल्स

निर्देशक: मधुर भंडारकर

कलाकार: आकांक्षा पुरी, अवनि मोदी

रेटिंग: *1/2

इस फ़िल्म के निर्देश मधुरजी, अपने नाम के अनुरूप बहुत अच्छे व्यक्ति हैं. वो चाहते हैं कि उनके दर्शक फ़िल्म को वैसे ही देखें, जैसे कि वे हैं.

और अगर फिर भी चीजें उनके सिर के ऊपर से निकल जाएं तो वो खुद स्क्रीन पर आ जाते हैं और हर किसी को समझाते फिरते हैं कि उनका मतलब दरअसल ये था.

कैलेंडर गर्ल्स

रोहतक की एक लड़की जिसे मल्लिका शेरावत की तरह दिखाया गया है, मधुरजी के साथ सेल्फ़ी लेती हैं. वो उन्हें ऐसा निर्देशक बताती हैं, जिनकी फ़िल्में हक़ीक़त के बेहद क़रीब हैं, साथ ही इसमें कुछ ‘एक्सपोज़े’ भी हुए हैं.

वो फ़िल्म में जिस 'एक्सपोज़े' के बारे में बात कर रही हैं, वो आईपीएल मैचों के बाद की पार्टियों से जुड़ा हुआ है.

जैसा नाम, वैसी फ़िल्म

कैलेंडर गर्ल्स

इमेज स्रोत, Madhur Bhandarkar

मधुरजी (फ़िल्म में) कहते हैं कि मौजूदा सुपरस्टार के साथ काम करना मुश्किल है, वे बेहद ग़ैरपेशेवर हैं और यही वजह है कि वह लड़कियों के साथ फ़िल्म करते हैं.

फ़िल्म का नाम है कैलेंडर गर्ल्स. जैसा कि नाम से जाहिर है मधुरजी ने फ़िल्म को सीधा सादा नाम दिया है. अपनी पुरानी फ़िल्मों में भी जो इस जैसी ही हैं, का नाम भी वो ऐसे ही रखते हैं, मसलन पेज, सत्ता, फैशन, जेल, ट्रैफ़िक सिगनल, हीरोइन...

इसमें शक नहीं कि दुनिया सेक्स और पैसे के इर्दगिर्द घूमती है. कामकाजी या मिडिल क्लास को रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता करने के लिए बुरा महसूस करने की ज़रूरत नहीं है.

हसरतें तो होती ही हैं- अगर आप महिला हैं तो आप मांस का लोथड़ा भर हैं.

कितनी रिसर्च?

कैलेंडर गर्ल्स

तो भंडारकर रिसर्च इंस्टिट्यूट की इस नई फ़िल्म में आख़िर नया क्या है? इसमें एक की जगह चार महत्वाकांक्षी महिलाएं हैं.

इनमें से हर महिला अपना मुकाम हासिल करने के लिए अपना तरीक़ा अपनाती है. और इनमें से केवल एक ही पूरी तरह बर्बाद होती है. वो भी थोड़ी बहुत दया दिखाने के चलते.

मुझे लगता है कि 90 के दशक के सौंदर्य प्रतियोगिताओं पर आधारित फ़िल्म की पटकथा मधुरजी की आलमारी में धूल फांक रही होगी और इसे झाड़ पोंछकर दर्शकों के सामने पेश किया गया है.

कैलेंडर गर्ल्स

ये वो समय था जब मिस इंडिया के ख़िताब को सफलता को- बॉलीवुड, ब्रांड एम्बैसेडर, विज्ञापनों, उद्घाटन समारोहों में फीता काटने, पैसे की एकमात्र सीढ़ी माना जाता था.

मुझे नहीं पता कि चीजें ठीक वैसे ही होती होंगी अगर प्रसिद्ध उद्योगपति विजय माल्या अपने कलैंडर के लिए लड़कियों का चुनाव कुछ ऐसे ही करते.

इस फ़िल्म को देखने का ये एक तरीक़ा हो सकता है, लेकिन आप जानते हैं, मैं ऐसा नहीं कर सकता. सफल फ़िल्म निर्माता मधुरजी फ़िल्मी दुनिया के ही आदमी है, इसलिए वे चीजों को अच्छी तरह से समझते हैं.

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